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In this interview with Shikha Aleya, Maya speaks with a deep knowledge of ground realities about the increasing informalisation of labour and its implications for gender and sexuality, and about what labour rights and inclusion mean in real terms.
चूँकि दुनिया हाशिये में जीने वाले लोगों के प्रति इतनी प्रतिकूल रही है, इसलिए वे लोग हमेशा से, हर जगह ‘सुरक्षित स्थान’ बनाने की कोशिश करते आ रहे हैं।
ये लेख किसी रिपोर्ट या रिसर्च पर आधारित नहीं है, लेकिन सच ये है, कि हम जानते भी तो बहुत…
हम भाषा पर निर्भर करते हैं। “हाँ” का मतलब इजाज़त देना, और “ना” का मतलब मुकरना। आसान और सरल शब्दों में हमें बताया जाए तो सहमति का मतलब इन्हीं दो अल्फ़ाज़ों से आता है। आसान है, है न?
डिजिटल मीडिया ने भारत में CSE को नई दिशा दी है। इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब चैनल और आधुनिक कहानी-आधारित सामग्री ने न केवल जानकारी का लोकतंत्रीकरण किया है बल्कि युवाओं में आत्मविश्वास, समझ और संवेदनशीलता भी बढ़ाई है।
कैथ के किरदार और उसके जीवन को दिखाया जाना वास्तव में उन अनगिनत फैनगर्ल्स के प्रति अन्याय ही कहा जाएगा जो एक फैन के रूप में अपनी पहचान को अपने वास्तविक सामाजिक और यौनिक जीवन व रुझानों पर कभी भी हावी नहीं होने देती।
सबसे ख़ूबसूरत बात यह है कि समावेशी दोस्ती समाज में भी बदलाव लाती है। जब दोस्त एक-दूसरे को बिना भेदभाव अपनाते हैं, तो यह उदाहरण बनता है और धीरे-धीरे एक ऐसी संस्कृति का निर्माण होता है जहाँ विविधता को सम्मान और स्वीकार्यता मिलती है।
यौनिकता पर संलाप या डिस्कोर्स नया नहीं है। समाज में हर प्रकार के विशेषज्ञों ने इस पर चर्चा की है। विज्ञान से लेकर अध्यात्म तक यौनिकता के प्रसंग विशेषज्ञों को रिझाते रहे हैं।
कई लोगों को नहीं लगता था कि पैरालिंपिक्स वास्तव में एक खेल आयोजन है। लेकिन इन गेम्स ने दिखा दिया कि कैसे विकलांगता के साथ खेलने वाले ऐथलीट्स असाधारण लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं, भले ही उनके आसपास के लोगों को लगता हो कि वे नहीं कर सकते।
शुभांगी कश्यप एक ऐसे समाज में जहाँ किसी व्यक्ति द्वारा अपनी यौनिकता की खुली अभिव्यक्ति कर पाना प्रतिबंधित हो और…
मैं उत्तरी दिल्ली के एक कमर्शियल कॉम्प्लेक्स में एक छोटे तंग से ऑफिस में हूँ। यहाँ बाहर किसी भी कंपनी…
2006 में जब पहले-पहल मैं दिल्ली आई, उस समय मेरी उम्र 22 वर्ष की थी और मुझे यौनिक व्यंग्य या…
शहरों में सार्वजनिक स्थानों पर अपनी मौजूदगी दर्ज करने के नारीवादी प्रयासों में वर्ग के आधार पर विभाजन को समझने के लिए हमें पहले यह जानना होगा कि किस तरह शहरों में सार्वजनिक स्थान लगातार कम हो रहे हैं और इनके लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है।