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A woman walking, holding hands with her preschooler son in a garden.
Parenting and Sexualityहिन्दी

एक नारीवादी माँ के रूप में जेंडर और यौनिकता पर बात करना : मामले को और भी पेचीदा कर देता है

हम शानदार मैसूर चिड़ियाघर के आलीशान जानवरों को देख रहे थे जब मेरी चार वर्षीय बेटी अपनी खोज पर खुश होते हुए कहती है, “माँ, देखो, वह लड़का ज़िराफ है, मैं उसका लिंग देख सकती हूँ।” अपनी बेटी की बुलंद आवाज़ पर मैंनें मुस्कुराते हुए कहा, “आप तो बड़ी होशियार हैं”, मेरे स्वर में दूर-दूर तक कोई शर्मिंदगी नहीं थी।

जेंडर और यौनिकता पर चर्चा से जुड़ी सहजता का एक दूसरा पहलू भी है जिसमें हास्य रस की एक बड़ी मात्रा की ज़रुरत है और जिसमें आपको अपनी प्रतिष्ठा की चिंता को ताक पर रखना होगा। छः महीने बाद, एक दूसरी छुट्टी पर, हम रणथम्भोर नेशनल पार्क घूमने गए और उस दौरान हम एक ऐसे होटल में रुके जो जयपुर के भूतपूर्व महाराजा का शिकारी खेमा हुआ करता था। मेरी उस वक़्त साढ़े चार साल की बेटी होटल की सजावट के रूप में इस्तेमाल होने वाले बाघों और दूसरे जानवरों के कटे हुए सरों की संख्या को देखकर डर सी गई। सजावट के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पूरे शरीर वाले जानवर उसे जितना भयभीत कर रहे थे, उतना ही वो उनकी ओर आकर्षित भी हो रही थी, मोटे तौर पर क्यूंकि वह यह पता करना चाहती थी कि वह जानवर ‘लड़का’ है या ‘लड़की’ और मेरी बेचैनी बढ़ाते हुए (होटल के दूसरे मेहमानों की नज़रों के सामने), यह देखने के लिए कि क्या वह जानवर का लिंग “बता” सकती है वह जानवर के पिछले हिस्से की तरफ़ झांकनें चली जाती।

पहला किस्सा मेरे एजेंडा की सफलता का एक आत्मसंतुष्टि से भरा एक क्षण था जिसके अंतर्गत मैं एक भलीभांति जानकार और सेक्स पॉजिटिव बच्चे की परवरिश कर रही थी, जो अपने शरीर के साथ सहज महसूस करती थी, लेकिन सामान्य तौर पर एक नारीवादी माँ का काम, जो रोज़मर्रा की चर्चा में यौनिकता के बारे में बात करने के लिए दृढ संकल्पी हो, अनिश्चितता से भरा है। और इसलिए मैं चिंता करती हूँ। मुझे चिंता है कि मैं उसे “बहुत अधिक जानकारी” दे दूंगी और उसकी “मासूमियत” ख़त्म हो जाएगी। मुझे चिंता है कि मैं उसे बहुत कम जानकारी दूंगी और वह मुझसे पूछना ही बंद कर देगी।

अन्य नारीवादी दोस्तों के साथ बातचीत और संसाधनों जैसे तारशी की अभिभावकों  के लिए लिखी गई उत्कृष्ठ किताब द यलो बुक से आई मेरी रणनीति है कि सवालों का ठीक-ठीक जवाब देना, जब भी वे पूछे जाएँ। हालाँकि, मुझे उम्र के हिसाब से जानकारी देना सीखने में समय लगा। पहली बार जब उसने लड़कियों और लड़कों में अंतर पूछा, तब मैंने XX और XY गुणसूत्रों पर बहुत ही गंभीर बातचीत शुरू कर दी। कुछ मिनटों के बाद, उसने मुझे एक बहुत ही हैरान नज़रों से देखा। “माँ, इन गुण…चीजों का लड़कों के ड्रेस पहनने के साथ क्या लेना-देना है?”   

पहला पाठ: यह सुनिश्चित करें कि आप उस सवाल का जवाब दे रहे हैं जो आपसे पूछा गया है!

एक दिन लगभग चार साल की उम्र में, उसने मेरे हाथ में एक पैड देखा और जानना चाहा कि वह क्या है – डायपर की कहानी, जो मैंने पहले इस्तेमाल की थी, दुबारा बतानी अकल्पनीय थी यह जानते हुए अब कि उसने दो साल की उम्र में डायपर पहनना छोड़ दिया था।

तो मैंने उसे बता दिया।

और उसने पूछा, “हर महीने?”

मैंने कहा: “हाँ, हर महीने”

उसने कहा: “खून और, और ज़्यादा खून?”

मैंने कहा: “उतना ज़्यादा भी नहीं लेकिन, हाँ, कुछ दिनों के लिए थोड़ा खून, और उसके बाद बंद हो जाता है।“

उसने कहा (गाते हुए): और फिर बंद हो जाता है और अगले महीने फिर आता है। और फिर बंद हो जाता है और अगले महीने फिर आता है। और फिर बंद हो जाता है और अगले महीने फिर आता है।“

उस शाम को वह “खून देखना” चाहती थी। तो मैंने उसे दिखा दिया। वह डरने की बजाए मंत्रमुग्ध थी। और फिर कुछ महीनों बाद तक, कभी-कभीअचानक ही, वह पूछती, “ क्या आपको माहवारी हुआ?”

और फिर एक दिन, उसने पूछना बंद कर दिया। अगर वह मुझे पैड के साथ देखती तो कहती, “क्या आपकी माहवारी शुरू हो गई है?” लेकिन अधिकतर वह इसे नज़रंदाज़ कर देती। यह जीवन के साधारण रिवाज़ों का हिस्सा सा बन गया।

दूसरा पाठ: ज़ाहिर तौर पर, दिखाना और बताना काम करता है।

बहरहाल, इस ज़ाहिर तौर पर सहज प्रक्रिया के बावजूद, मैं इस बात से चिंतित थी कि वह अपने सहपाठियों या दोस्तों से इसके बारे में कहेगी। (आप कभी भी चिंता करना बंद नहीं करते)। तो मैंने सतर्कता से ज़ोखिम उठाते हुए कहा, “देखो, इस पीरियड वाली बात के बारे में, हो सके तो, अपने दोस्तों से बात मत करना क्योंकि उन्हें इसके बारे में अपनी माँ से पता चलना चाहिए”। “ठीक है”, उसने कहा, उसने मुझे इस पर सवाल नहीं होने से अचम्भे में डाल दिया। “वैसे भी, यह समझाने में मुश्किल है,” उसने कहा, शायद उसने मेरे चेहरे पर उलझन देख ली थी।     

मैंने अकादमिक पत्रिकाओं और मुख्यधारा की मीडिया दोनों ही में नारीवादी ममता के बारे में लिखा है। मैं बहुत ही अच्छे से जानती हूँ कि मुझे कितना विशेष अधिकार प्राप्त है, मित्रों और सहकर्मियों दोनों ही के मामले में, जिनसे मैं इससे सम्बंधित अधिकतर चिंताओं के बारे में बात कर सकती हूँ, साथ ही साथ कई संसाधनों तक पहुँच है और एक भाषा जिससे मैं एक नारीवादी माँ की तरह अपनी राजनीति/पॉलिटिक्स को स्पष्ट कर सकती हूँ। इन सब के बावजूद यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि जो किया/कहा जा रहा है वह सही है। लेकिन फिर, यह भी सच्चाई है कि करने या कहने के लिए कोई ‘एक बात’ ही ‘सही बात’ नहीं होती। इन सब में सबसे सही है बस कोशिश करना।

फिर, कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि क्या कोशिश करना ही पर्याप्त है। हमने उसे यह महसूस कराने के लिए कड़ी कोशिश की है कि उसके शरीर पर उसका अधिकार है। हमने उसे बताया है कि यदि उसकी इच्छा नहीं है तो उसे किसी के गले लगने की ज़रुरत नहीं है। मैंने उसे वो भाषा प्रदान करने की कोशिश की है जिसमें वो अपनी बात स्पष्टता से कह सके: “यह तुम्हारा शरीर है” मैंने उससे कहा। एक दिन उसने मुझे बताया, “मेरे पीछे वाला लड़का मुझे धक्का देने की कोशिश कर रहा था क्योंकि मैं उसके सामने खड़ी थी और उसको दिख नहीं रहा था। तो मैंने उसको बोल दिया. यह मेरा शरीर है – तुम्हें मुझे छूने की ज़रुरत नहीं है, बस मुझे बैठने को बोल दो।”

किसी-किसी दिन मैं जानती हूँ कि कोशिश करना पर्याप्त है।

इस साल की शुरुआत में, उसने मुझे समलैंगिक शादी पर अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बारे में बातचीत करते हुए सुना। “आप किस बारे में बात कर रहीं थीं?” उसने पूछा। संक्षिप्त में बताने की कोशिश करते हुए, मैंने उसे बताया कि अब अमेरिका में एक महिला किसी दूसरी महिला से शादी कर सकती है, और एक पुरुष किसी दूसरे पुरुष से। उसने पूछा, “और भारत में?”। मैंने कहा, “नहीं, अब तक नहीं”। “हमारा कानून इसकी अनुमति नहीं देता”। उसने पूछा “कानून क्या है?”। मैंने बताने की कोशिश की, “सरकार”। परेशान दिखते हुए, उसने पूछा “सरकार?”, “वही जो ग़रीब लोगों को घर नहीं देती?” अब मैं अपने आपको हाशिए के अलग-अलग वर्णनों में फंसता हुआ देख रही थी, और मुश्किल से अपने आपको बड़बड़ाने से रोक पाई। मैं फिर से कोशिश करती हूँ। “तुम्हें पता है, असल में कई महिलाएँ, महिलाओं से प्यार करती हैं, लेकिन भारत में, इस तरह की शादियों को नहीं माना जाता। तो आप को वह पेपर नहीं मिलेगा जिसमें लिखा होगा कि आप शादीशुदा हैं।” उसने ज़ोर डालते हुए कहा “लेकिन फ़िर भी क्या आप शादी कर सकते हैं?” “हाँ, कुछ हद तक,” शादी के विचार को सबसे बड़े संभव नज़रिए के माध्यम से देखते हुए और ख़ुद को इस संस्था की आलोचना करने से रोकते हुए, मैं बोली, “लेकिन यदि सरकार इसे मान्यता दे तो अच्छा होगा”। मुझे पता नहीं कि उसे समझ आया या नहीं, लेकिन मेरी राहत के लिए उसने और सवाल पूछना बंद कर दिया।

कुछ हफ़्तों के बाद, उसने अपनी नानी से कहा, “जब मैं बड़ी हो जाउंगी, और यदि मैं किसी लड़की से शादी करना चाहूंगी तो मुझे यह करने के लिए अमेरिका जाना होगा क्योंकि भारत की सरकार लड़कियों से लड़कियों की शादी को नहीं मानती”। मेरी माँ मुझसे खुश नहीं थीं। उन्होंने पूछा “तुम क्यों उसे उलझन में डाल रही हो?” अपने मन में हवा में एक मुठ्ठी बनाते हुए, मैंने अपनी माँ की तरफ़ देखा, “कौन सी उलझन? उसे अच्छी तरह से समझ आता है!” [1]   

और किसी किसी दिन, कोशिश करना ही आपको विजयी बनाता है।


[1] मैं उम्मीद करती हूँ कि मेरी बेटी की पीढ़ी के बच्चों को अपने पसंद के साथी चुनने के लिए देश छोड़कर ना जाना पड़े।

श्रद्धा माहिलकर द्वारा अनुवादित

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Article written by:

Shilpa Phadke is a writer and an academician. She is a Professor at the School of Media and Cultural Studies at the Tata Institute of Social Sciences, Mumbai. She is co-author of the critically acclaimed book, Why Loiter? Women and Risk on Mumbai Streets (2011). She is co-director of the documentary Under the Open Sky (2017).

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