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स्वयं की देखभाल एवं खुशहाली के बारे में मेरी सीख

घरेलु हिंसा विषय पर काम कर रही एक नारीवादी संस्था के साथ सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में अपने करियर के शुरूआती दिनों में हर रोज़ मेरी मुलाकात लगभग 10 – 15 ऐसी महिलाओं से होती थी जो किसी न किसी रूप में उत्पीड़न और हिंसा का सामना कर रही होती थीं। इनमें से ज़्यादातर महिलाओं के प्रति यह उत्पीड़न और हिंसा उनके पति, साथी अथवा ससुराल वालों द्वारा की जाती थी। हालांकि मुझे अच्छा लगता था कि मैं हिंसा और उत्पीड़न से बचने में उनकी कुछ मदद कर पाती थी, लेकिन दुःख इस बात का होता था कि हिंसा से जूझ रही इतनी महिलाओं से मेरा वास्ता पड़ता था। हिंसा और उत्पीड़न से जूझती इनमें से अधिकाँश महिलाओं के लिए पुलिस, स्वास्थय सेवा कार्यकर्ताओं और गैर-सरकारी संगठनो के पास मदद के लिए निरर्थक चक्कर काटना अक्सर एक जटिल और असंतोषजनक काम होता था। सामाजिक कार्यकर्ताओं की अपनी भूमिका निभाते हुए, इन सभी वास्तविकताओं को जानते हुए और न्याय प्रक्रिया में आने वाली अनेक बाधाओं को दूर कर पाने में और हिंसा को झेलने और जेंडर असमानताओं के प्रति समाज के बोझिल रवैये को बदलने की कोशिश में, मैं और मेरे साथी समाजसेवी इतने व्यस्त रहते थे कि हमें कभी यह सोचने का मौका ही नहीं मिला कि अपने काम के बोझ से, इन महिलाओं के अनुभवों से, उनके इन दुखों को दूर कर पाने में अपनी असमर्थता कारण हम खुद भी बहुत व्यथित रहते थे। ऐसी स्थिति में अपने खुद के बारे में और खुद की देखभाल के बारे में सोचना भी सही नहीं लगता था।   

इसके कुछ समय बाद मैंने यौनिकता और यौन अधिकारों के क्षेत्र में कार्यरत एक अन्य संस्था में काम करना शुरू किया। हालांकि मैंने पहले भी यौन एवं प्रजनन स्वस्थ्य पर काम किया था लेकिन तब मुझे मिले कार्यों में, अधिकतर, हिंसा को रोकने से सम्बंधित कार्य शामिल थे और अन्य मुद्दों पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता था। यौन अधिकारों के विषय पर काम करते हुए मैंने यह जाना कि यौनिकता का विषय न केवल यौन उत्पीड़न और हिंसा से अलग होता है (अपने पहले कार्य अनुभव के दौरान मेरी मुलाकात घरेलु हिंसा की शिकार जिन महिलाओं से होती थी उनके जीवन में यौन उत्पीड़न और हिंसा ही प्रमुख विषय रहे थे) बल्कि मैंने लोगों के जीवन और अनुभवों में उनकी इच्छाओं, अंतरंगता और अभिव्यक्ति में यौनिकता के सकारात्मक पहलु को भी जाना। यहाँ अपने काम के दौरान मैंने खुशहाली को एक व्यापक विषय के रूप में समझा, जिसमें न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक और भावनात्मक खुशहाली भी शामिल होती है। यह केवल किसी शारीरिक अथवा मानसिक रोग की अनुपस्थिति से बहुत अलग होती है। इसका सम्बन्ध केवल स्वास्थ्य, सुरक्षा या कल्याण (जो परोपकार के भाव से प्रेरित जान पड़ते हैं) से जुड़े विषयों से ही नहीं होता बल्कि इसमें और भी बहुत कुछ शामिल होता है। यौनिकता के विषय पर सकारात्मक रवैये के साथ काम करने के दौरान मेरी नज़्दीकी संबंधों में इस तरह की हिंसा के विषय में समझ बढ़ी, जिसे मैंने अपने जीवन में पहले देखा था। खुशहाली और यौनिकता के विषय पर काम का मायने मेरे लिए अब, व्यक्ति के अनुभवों को हिंसा के ही आधार तक सीमित ना करके, हिंसा को समझना, उससे निपटना और और स्वयं की देखभाल की प्रक्रिया को अपनाना भी था। मुझे इस विषय पर काम करते हुए सीखने, समझने और मनन करने के लिए बहुत समय दिया गया और इससे मुझे बहुत मदद मिली। अब मैं खुद के अंतर्मुखी होने से संतुष्ट थी और साथ ही साथ यौनिकता अधिकारों की प्रबल समर्थक भी बन गयी थी।

एक सामाजिक कार्यकर्ता या एक्टिविस्ट के रूप में यौन अधिकारों को संबोधित करना एक जटिल विषय होता है। कम से कम वर्ष 2000 के आरम्भ तक तो सामजिक कार्यों की कार्यसूची में यह एक महत्वपूर्ण विषय नहीं हुआ करता था और किसी भी व्यक्ति की यौनिकता या उनके यौन एवं प्रजनन अधिकारों से जुड़ी किसी भी कड़ी को केवल सरसरी तौर से देखा जाता था। ऐसे मुदों को सुलझाने में कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखाई जाती थी, हालांकि इतना ज़रूर माना जाता था और अब भी माना जाता है कि ये किसी भी व्यक्ति के जीवन और उनके अन्तरंग अनुभवों का अभिन्न हिस्सा होते हैं। यही कारण है कि भारत जैसे जटिल सामजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक देश में यौनिकता और यौन स्वास्थय विषय पर काम करने का निर्णय लेना आसान नहीं था, और इसके अलावा इस बारे में अपने मित्रों और परिवारों में चर्चा कर पाने में भी बहुत सी पेचीदगियां थीं – क्योंकि सेक्स और यौनिकिता पर बात करने में शर्म और लाज आड़े आती है और इससे पार पाना और बिना संकोच के बात कर पाना बहुत आसान नहीं होता।

एक दमनकारी या घुटे वातावरण में यौनिकता अधीकारों के पैरवीकार के रूप में काम करने से इन लोगों कि खुशहाली पर भी बहुत बुरा असर पड़ सकता है। इसलिए यह बहुत ज़रूरी है कि हम समाजसेवी, पैरवीकार, सक्रियवादी और इस क्षेत्र से जुड़े सभी लोग अपना और एक दुसरे का ध्यान रखें, एक-दुसरे के मदद करें, अगर हम में से किसी को सहायता की ज़रुरत हो तो उनकी मदद करें और यह मान कर चलें कि हमसे भी अपने काम में गलतियां हो सकती हैं। अपना और एक दुसरे के ख्याल रखने में साथ बैठ कर, मिल-बाँट कर खाना-पीना, आपस में मेल-जोल रखना शामिल है, जिससे कि हम एक ऐसे सौहार्दपूर्ण और गैर-आलोचनात्मक वातावरण में इक्कठे रह सके जो सक्रियवादियों के रूप में काम करते हुए अक्सर हमें नहीं मिल पाता है। एक साथ मिल-जुल कर बैठने और खाने-पीने के महत्व को बहुत कम करके आँका जाता है। मेघन मोरिस इस आमोद प्रमोद को बहुत अधिक महत्व देती हैं वे मानती हैं कि मिल कर सुख-दुःख बांटे जाने से समस्याएँ कम होती हैं और हमें अपने काम को करते रहने की शक्ति मिलती है। ऑस्ट्रेलिया के लोग इसी साथ मिल-बैठने को ‘अच्छा समय गुजारना’ भी कहते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि मैंने अपने काम के अनौपचारिक पलों में – जैसे खाने के समय होने वाली बातचीत, अपने मित्र सहकर्मियों के साथ फिल्म देखते हुए – लोगों को अधिक बेहतर रूप में जाना है और यौनिकता व अधिकार विषय पर बेहतर समझ पायी है। काम के दौरान यह अनौपचारिक मेलमिलाप एक ऐसा समय होता है जब आप संस्था और अपने व्यवसाय की औपचारिकता को छोड़, आपस में बेहतर मेल-मिलाप के साथ काम करते हैं। मेघन मोरिस अपने कार्यस्थल और संस्थाओं में इस तरह की मेलजोल बढाने के तरीकों को अपनाने के महत्व पर जोर देती हैं। अनौपचारिक रूप से मेलमिलाप करते हुए काम करने की यह पद्ध्ति हम सक्रियवादी भी अपने काम में अपनाते हुए ‘सभी के यौनिक अधिकारों’ का परचम ऊंचा रख सकते हैं और समय समय पर काम के दौरान होने वाली हताशा और थकान को बहुत हद तक दूर रख सकते हैं।

मैंने अपने जीवन में खुशहाल रहने के लिए मित्रों का सहारा लेना और उन पर भरोसा करना सीख लिया है। यहाँ क्विअर संबंधों में गहरी मित्रता रखने के बारे में फूको के विचार बहुत प्रासंगिक हैं क्योंकि मित्रता न केवल क्विअर होने के बारे में विचारों का आदान-प्रदान करने में सहायक बनती है बल्कि मित्रता रखने से एक दुसरे की सहायता भी हो पाती है। फूको बताते हैं कि कैसे उन्हें दुसरे पुरुषों के साथ सम्बन्ध बनाए रखने की ज़रुरत महसूस हुई, उनके ये सम्बन्ध सिर्फ़ यौन रूप से नहीं थे बल्कि ऐसा करना उन्हें अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए भी ज़रूरी महसूस हुआ था। वे कहते हैं:

पुरुषों के लिए एक साथ रहना कैसे संभव हो सकता है? कैसे वे एक साथ रहें, अपना समय साथ व्यतीत करें, अपना खाना एक साथ खाएं, अपना खाली समय साथ गुजारें, अपने दुःख साझे करें, अपनी जानकारियाँ साझी करें? कामकाजी संबंधों, अपने परिवार, काम या ज़रूरी मित्रता के संबंधों के अलावा किसी पुरुष को दुसरे पुरुषों की संगती में ‘निर्वस्त्र’ होना कैसा लगता होगा? ऐसा करना एक इच्छा, एक असमंजस या उस असमंजस से उपजी इच्छाओं के कारण हो सकता है जो कई लोगों के मन में होती है

संभवत: क्विअर संबंधों के बारे में फूको के इन गैर-पारंपरिक और सामाजिक मान्यताओं के विपरीत विचारों को, अपनाकर हम अपने खुद के अस्तित्व को बनाए रखने का मार्ग भी ढूँढ सकते हैं। अपने कामकाज और व्यवसायिक निष्ठाओं के अतिरिक्त एक दुसरे के साथ समय बिता पाने, एक दुसरे की मदद करने की दिल से कोशिश करने, दुसरे के लिए उपलब्ध रहने, अपने दुःख-सुख साझा करने, मिल बाँट कर भोजन करने और खुशियाँ मनाने से हम अपने मन में प्रसन्नचित और खुशहाल होने के भाव उत्पन्न कर सकते हैं।

सोमेन्द्र कुमार द्वारा अनुवादित

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A feminist scholar-activist, she is pursuing her PhD in gender studies at the University of Sydney. Her doctoral research focuses on intersex people in India. Her academic interests include gender, sexuality, intersexuality, disability and biopolitics. She has worked in South and Southeast Asia on gender-based violence and sexuality rights. She holds a Masters in Social Work from India and a Masters in Women’s & Gender Studies from Europe.

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