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अपना किरदार निभाना

An illustration of stage-curtains in bright color.

ऐसी जगहें बहुत ज़रूरी होतीं हैं जहां हम बाक़ी दुनिया से छुटकारा पाने के लिए जा सकें। इन जगहों से हमें सुकून, एकांत, और अपनेपन का एहसास होता है। मुझे हमेशा से ऐसी एक जगह चाहिए थी जहां मैं अपने हिसाब से जी सकूं और जहां मैं जो कुछ भी करता हूं उसके लिए मुझे टोका न जाए। मैं एग्ज़ाम में अच्छे नंबर न लाने, मैथ्स की क्विज़ या कोई रेस न जीत पाने जैसी चीज़ों की बात नहीं कर रहा हूं। मुझे अपने चाय का कप पकड़ने, पानी पीने, हंसने, और चलने के तरीक़े की वजह से भी बहुत ताने सुनने पड़े हैं। हमेशा मेरा मज़ाक़ उड़ाया जाता था। “तुम अपने हाथ क्यों हिलाते हो, वेस्ली?”, “तुम्हारी आवाज़ इतनी ऊंची क्यों है, वेस्ली?”, “लड़कों की तरह चला-फिरा करो, वेस्ली!”

ऐसा लगता था कि मैं वो चीज़ें ढंग से नहीं कर पा रहा जो मुझे करनी आनी चाहिए। मेरे आस-पास के लोगों के मुताबिक़ मैं कोई भी काम ठीक से नहीं कर पा रहा था। जब मैं छोटा था तब मैं ‘काफ़ी’ नहीं था और बड़ा होते होते ‘हद से ज़्यादा’ हो गया।

जब मुझे पता चला कि मेरे स्कूल में द पाइड पाइपर ऑफ़ हैमलिन कहानी पर नाटक होने वाला है, आप सोच ही सकते हैं कि मैं कितना ख़ुश था। इस नाटक में हिस्सा लेने की मेरी दो वजहें थीं – पहली, कि मेरी इंग्लिश की टीचर ने हमें ये कहानी सुनाई थी और ये मुझे बहुत पसंद आई थी, और दूसरी, मुझे हर रोज़ कुछ घंटों के लिए रोज़मर्रा की ज़िंदगी से छुटकारा मिलता।

मैं गोवा के एक छोटे-से गांव में पला-बढ़ा हूं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे छोटे राज्य का हूं। मेरा स्कूल एक छोटी पहाड़ी के ऊपर बसता था जहां से खेत और नदी नज़र आते थे। पूरे स्कूल में लगभग 600 छात्र थे और सब एक-दूसरे को जानते थे। उस स्कूल के टीचर भी वहां की कुर्सियों और टेबलों जितने पुराने लगते थे। कभी-कभी दिन बहुत अच्छा जाता था और खेल का मैदान ठहाकों से खिल उठता था, लेकिन अक्सर वहां पढ़ने वालों में एक क्रूरता नज़र आती थी जो सिर्फ़ बच्चों में ही नज़र आती है।

मैं रोज़ जल्द से जल्द अपना खाना खाकर एक कोने में बैठ जाता था जहां कोई मुझे देख न सके। वहां बैठकर मैं किताबें पढ़ता रहता था। मेरी एक आंख घड़ी पर रहती थी और मैं क्लास में तब वापस जाता था जब बाक़ी बच्चे मैदान छोड़ने की सोचते भी नहीं थे। कोई मुझे वापस क्लास में जाते हुए देख लेता तो ज़ोर-ज़ोर से ये कहने लगता कि मेरे चलने का तरीक़ा ‘लड़कियों जैसा’ है। मैं जानता हूं कि मैं अकेला नहीं हूं और कई लड़कों को ऐसा बोला जाता है, फिर भी ये बात मुझे कुछ ज़्यादा ही चुभती थी। कुछ ज़्यादा ही दर्द पहुंचाती थी।

इसी दौरान मेरी इंग्लिश टीचर को एक नाटक प्रस्तुत करने की ज़िम्मेदारी दी गई। उन्होंने वही किया जो कभी न कभी हर इंग्लिश टीचर को करना पड़ता है। वे लाइब्रेरी में बच्चों की कहानियों वाले विभाग में गईं और द पाइड पाइपर ऑफ़ हैमलिन उठा लाईं।

नाटक की कहानी तय हो गई थी तो अब वे बच्चों को ऑडिशन देने बुलाने के लिए पोस्टर लगाने लगीं। पोस्टर पर एक नज़र जाते ही मैंने फ़ैसला कर लिया कि मुझे इस नाटक का हिस्सा बनना ही है। अजीबोग़रीब कपड़े पहनकर बांसुरी बजाते हुए झूमने का इससे अच्छा मौक़ा और कहां मिलता?

मैं हर जगह अपने डायलॉग की प्रैक्टिस करता रहता था। कॉरीडोर में, नहाते हुए, स्कूल में ब्रेक के दौरान, और सोने से पहले भी। मैं खाना खाते वक़्त भी दबी आवाज़ में डायलॉग बोलता और मेरे मां-बाप मुझसे तंग रह जाते। मुझे इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था क्योंकि मैं एक अलग दुनिया मे खो जाता था। मैंने क्या बोलना है, कैसे बोलना है, और अपने हाथ-पांव कैसे हिलाने हैं इसकी प्रैक्टिस अच्छे से कर ली थी। मेरा दिल इस उम्मीद से धड़कता जा रहा था कि मुझे नाटक में लिया जाएगा। मैंने एक कॉस्टयूम का इंतज़ाम किया, संगीत विभाग से एक बांसुरी ले ली, और स्टेज पर बुलाए जाने का इंतज़ार करने लगा।

ऑडिशन के दिन मैंने अपनी स्क्रिप्ट अपने सीने से इस तरह लगाए रखी जैसे उसके बग़ैर मैं तबाह हो जाऊंगा। कुछ ही दिनों में ये स्क्रिप्ट जगह-जगह फट-घिस चुकी थी। ऑडिशन देने वाले बच्चों की संख्या कम थी। शायद तीस से भी कम, जिनमें से दस तो सिर्फ़ मां-बाप और टीचरों के कहने पर ही आए होंगे। सबके हौसले बुलंद लग रहे थे। जब मेरी बारी आई, मैं स्क्रिप्ट एक टेबल पर छोड़कर स्टेज पर चढ़ गया। मुझे दिए गए पांच मिनट कैसे बीत गए पता ही नहीं चला।

मैंने ये ध्यान में रखा कि स्टेज पर सिर्फ़ चलना नहीं बल्कि उस पर सरकते हुए जाना है। मेरी आवाज़ के जिन उतार-चढ़ावों का मज़ाक़ उड़ाया जाता था, वे अब मेरे लिए हथियार साबित हुए। जब मैं स्टेज से उतरा तब मेरे रग़ों में एक नई उमंग दौड़ रही थी और मेरे चेहरे पर एक बड़ी-सी मुस्कान थी। मैं जानता था कि मैंने अच्छा किया था और मुझे नाटक में कोई एक किरदार तो ज़रूर मिलेगा।

यही वो वक़्त था जब मैंने अपनी यौनिक पहचान को समझना शुरु किया था। मुझे ये एहसास होने लगा था कि मैं थोड़ा ‘अलग’ हूं, लेकिन मुझमें ऐसा क्या है जो औरों से अलग है ये बयां करने की भाषा मेरे पास नहीं थी। मुझे जो शब्द मालूम थे वे अपमानजनक लगते थे और मैं उनको अपनाना नहीं चाहता था।

गोवा की धरती आपका स्वागत तो करती है लेकिन कई तरह से आपको अलग भी महसूस कराती है। गोवा में किसी को ‘बाहरवाला’ बुलाने के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले शब्दों की लिस्ट बहुत लंबी है। कोई भी अगर कम से कम एक-दो पीढ़ियों से गोवा का रहने वाला या लोगों की नज़र में एक ‘आदर्श’ गोवा निवासी न हो तो उसे ‘भाइलो’ (बाहरवाला) या ‘भिकनकार’ (टूरिस्ट के लिए अपमानजनक शब्द) जैसे नाम दे दिए जाते हैं।

वक़्त के साथ मैंने इस लिस्ट में ‘गे’ और ‘होमो’ जैसे शब्दों को शामिल होते हुए भी देखा है। जब मेरे गांव में इंटरनेट आया तब एक दिन घर पर अकेले होते हुए मैंने इन्हें गूगल पर सर्च किया। बहुत घबराहट और बेचैनी के बाद ये स्वीकार करने का वक़्त आया कि यही मेरी पहचान है। लंबे समय तक बहुत असहजता के साथ मैं ये बात अपने मन में लेकर चलता रहा।

लोगों की नज़र में हमेशा ‘अलग’ और ‘अजीब’ बने रहना थका देता है। एक वक़्त ऐसा आया जब आख़िरकार मैंने, “दुनिया भाड़ में जाए!” सोचते हुए अपनी पहचान और हक़ीक़त को खुलकर जीने की ठान ली। मैंने फ़ैसला कर लिया कि मैं इस नाटक का हिस्सा बनूंगा और उसी के ज़रिए अपनी असली पहचान को व्यक्त करता रहूंगा, कम से कम तब तक के लिए जब तक मैं घर से दूर कहीं जाकर अपनी ज़िंदगी अपने दम पर न जीने लगूं (बाहर की दुनिया कितनी बेरहम हो सकती है इसका अंदाज़ा मुझे तब नहीं था)।

मुझे नाटक में पाइड पाइपर का मुख्य किरदार मिल गया और मैंने देखा कि नाटक में मुझसे वही मेकअप और कपड़े पहनने की उम्मीद की जाएगी जो पहनने के लिए हक़ीक़त की ज़िंदगी में मेरा मज़ाक उड़ाया जाता था। उन्हीं कपड़ों और चलने-बोलने के उसी ढंग के लिए मेरी वाहवाही हो रही थी जिनके लिए असल ज़िंदगी में मुझे टोका जाता था।

तभी मुझे समझ आ गया था कि ख़ुश रहने के लिए मेरे लिए ख़ुद को पूरी तरह से स्वीकारना ज़रूरी है। ये सफ़र मुश्किल रहा है और अभी भी पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुआ, लेकिन नाटकों में हिस्सा लेने से ये मेरे लिए आसान हुआ है। नाटकों के ज़रिए ही मुझे ये आत्म-सम्मान का एहसास मिला और मैंने अपने आप में महफ़ूज रहना सीखा। इस किरदार के ज़रिए मैंने अपने बारे में बहुत कुछ सीखा। मेरे अंदर जो ‘अलग’ होने का डर था वो धीरे-धीरे ख़त्म होने लगा और मैंने ये ठान लिया कि एक दिन ‘गे’ और ‘क्वीयर’ जैसे शब्दों को मैं अपना लूंगा और इनसे दूर नहीं भागता रहूंगा।

वेस्ली डी’सूज़ा फ़िलहाल बेंगलुरु के सेंट जोसेफ़ कॉलेज से अंग्रेज़ी साहित्य में मास्टर्स कर रहे हैं। वे ज़्यादातर लिखते और किताबों में डूबे हुए नज़र आते हैं। इसके अलावा वे अक्सर लालबाग़ में टहलते या अपने यूकेलेली पर कोई नया-सा धुन बजाते भी पाए जाते हैं।

ईशा द्वारा अनुवादित।

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Cover Image: Pixabay