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चाची 420 की जातिवादी चार सौ बीसी[1]

ऐसा प्रतीत होता है कि जातिवाद की खिल्ली उड़ाने के लिए बनाए जा रहे सभी तरह के कार्टून चित्रों के पोस्टर बॉय आजकल अभिनेता कमल हसनहसन ही हैं। बीते दशकों के दौरान सिनेमा में चित्रित पात्रों के भोलेपन को समझने और अपने इस लेख के लिए बेहतर जानकारी पाने के उद्देश्य से हाल ही में मैंने कमल हसन की कुछ प्रसिद्ध और “क्लासिक” कही जाने वाले फिल्मों को देखा। 90 के दशक के बड़े हुए अधिकांश सिनेमा प्रेमी तमिल बच्चों के तरह मेरी भी मजबूरी थी कि मुझे कमल हसन या रजनीकान्त में से किसी एक को पसंद करना था। अपने पसंदीदा अभिनेता कमल हसन के पक्ष को मजबूत करने और मेरे पिता को चिढ़ाने (क्योंकि वे रजनीकान्त के फैन हैं) के लिए, मेरी माँ ने मुझे अनेक रविवार के दिनों में सन टीवी चैनल देखने की बजाय सोनी मैक्स चैनल पर प्राइम टाइम फिल्में दिखानी शुरू कीं। चूंकि एक दूजे के लिए, सदमा और हे राम जैसी फिल्मों को देखकर उनके बारे में विस्तार से लिखने की समझ मुझमे उस समय तक नहीं थी, तो मुझे यही सही लगा कि मैं कमल हसन की 1997 में आई फ़िल्म चाची 420 को देखूँ और समीक्षा करने के दृष्टिकोण से इस कहानी को समझूँ। अच्छी बात यह है कि इस फ़िल्म के कथानक की समीक्षा करने के लिए कोई बहुत ज़्यादा जटिलता से सोच-विचार करने की ज़रूरत नहीं है। साम्राज्यवाद का शासन खत्म होने के बाद से ही, भारतीय फ़िल्म कथानक में जाति और जाति व्यवस्था पर बहुत ध्यान दिया जाता रहा है। इस फ़िल्म, चाची 420 में भी जाति के विषय को उभार कर सामने लाया गया है।       

फ़िल्म की कहानी, अँग्रेजी में बनी मूल अमरीकी फ़िल्म, मिसेस डाउटफायर (Mrs. Doubtfire) (1993) की कहानी पर आधारित है। यह एक ऐसे दंपति की कहानी है, जिनका विवाह विफ़ल हो चुका है और वे बड़े ही नाटकीय अंदाज़ में मिल कर अपनी संतान, अपनी बेटी की परवरिश करने की कोशिश करते हैं। फ़िल्म के अंत में दोनों पति-पत्नी फिर एक बार इककट्ठे हो जाते हैं। आमतौर पर ब्राह्मण पुरुष और साथ में बच्चे को फिल्मों में दिखाया जाता रहा है लेकिन इस फ़िल्म में कमल हसन ने दुसाध जाति के दलित पुरुष, जय पासवान की भूमिका निभाई है। जय, जानकी भारद्वाज (अभिनेत्री तबू) से प्रेम करता है जो एक अमीर ब्राह्मण लड़की और और अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध इस दलित व्यक्ति से विवाह करने की “हिम्मत” दिखाती है। जानकी के इस तरह विद्रोह कर देने पर उसके शाकाहारी पिता दुर्गाप्रसाद भारद्वाज (अभिनेता अमरीश पुरी) अपनी बेटी को परिवार और अपने चमड़े के कारोबार से बेदखल कर देते हैं। हालांकि जानकी पिता के इस फैसले से बहुत आहत होती है लेकिन फिर भी जानकी पिता के प्यार और पैसे की जगह जय के प्रेम को चुनती है।        

विवाह के नौ वर्षों के बाद जानकी अपनी जाति से बाहर और अपनी हैसियत से नीचे के व्यक्ति से विवाह कर लेने के अपने फैसले पर पछताने लगती है। जानकी न केवल जय की कम और अनियमित आमदनी को लेकर परेशान रहती है बल्कि उसे जय का बॉलीवुड की फिल्मों में एक सहायक नृत्य निर्देशक की तरह काम करना भी बिलकुल पसंद नहीं है और इससे भी वो बहुत शर्मिंदगी महसूस करती है। अपनी निम्न मध्यमवर्गीय जीवन शैली से परेशान और “पिछड़ी जाति के भांड”[2] की तरह नाच-गाना करने वाले पति से दुखी होकर, जानकी जय से संबंध विच्छेद करने के लिए तलाक का मामला दायर कर देती है। हालांकि तलाक हो जाने पर जय अपना जीवन व्यतीत करने लगता है, लेकिन अदालत द्वारा उनकी बेटी भारती को जानकी के सुपुर्द कर देने के कारण बेटी की परवरिश के तरीकों और व्यवस्था को लेकर उसके और जानकी के बीच मतभेद लगातार चलते रहते हैं।    

दरअसल, शुरू से ही जय और जानकी के बीच बेटी की परवरिश के तरीके को लेकर खींचतान हमेशा ही चलती रहती थी। जय ने एक बार जब अपनी पाँच वर्ष की बेटी भारती के लिए बॉलीवुड की फ़िल्म में नृत्य करने का रोल लिया था तब भी जानकी ने इसका यह कहते हुए विरोध किया था कि “भारद्वाज खानदान की पोती पैसे के लिए नाच नहीं करेगी”। उस समय गुस्से-गुस्से में जानकी ने जय से कह दिया था कि वो कैसा आदमी है जो दुनिया के मनोरंजन के लिए अपनी बेटी की दलाली करने को तैयार है। जानकी की यह बात ही उन दोनों के तलाक का कारण बनती है। 

उधर जानकी के पिता, दुर्गाप्रसाद हालांकि पहले ही जानकी को एक दलित आदमी से विवाह करने के कारण ब्राह्मण जाति से बाहर कर चुके होते हैं, फिर भी वे अपनी पोती भारती को ‘नैतिक पतन’ से बचाने के लिए जानकी को फिर से अपने परिवार में शामिल कर लेते हैं। पोती के पुनर्वास, उसकी परवरिश करने के लिए दुर्गाप्रसाद अखबार में भारती के लिए एक गवरनेस रखने के लिए विज्ञापन देते हैं। विज्ञापन में कहा जाता है कि “आया की नौकरी के लिए एक साफ-सुथरी, पढ़िलिखी ब्राह्मण महिला की ज़रूरत है”। जय, जिसे कि अपनी बेटी से मिल पाने से पूरी तरह से वंचित कर दिया गया है, वह इस मौके का फायदा उठाता है और एक पावन पवित्र ब्राह्मण महिला, श्रीमति लक्ष्मी गोडबोले के स्वांग धरके भारद्वाज परिवार में प्रवेश पा लेने में सफ़ल हो जाता है। 

भारद्वाज परिवार की सहानुभूति पाने के लिए लक्ष्मी (उर्फ़ जय) को एक मनगढ़ंत कहानी बनानी पड़ती है कि उसका पति शराबी है और इसलिए उसका वैवाहिक जीवन संकट में है। लेकिन जय तब हैरान-परेशान हो जाता है जब उसका मकान मालिक हरीभाई (परेश रावल) और दुर्गाप्रसाद, दोनों ही लक्ष्मी के प्रेम में पड़ जाते हैं। ये दोनों पुरुष लक्ष्मी की अपने ऐसे शराबी पति के प्रति पतिभक्ति को देखकर अचंभित हो जाते हैं जो उसे छोडकर चला गया होता है। इस तरह लक्ष्मी के शुद्ध ब्राह्मण व्यवहारों के कारण उसकी प्रशंसा होने लगती है क्योंकि लक्ष्मी स्त्रीधर्म और पतिव्रता नारी[3] के सभी कर्तव्यों का पालन करती है। इस तरह, ब्राह्मणवादी पितृसत्ता आदर्शों की मांग दर्शाती यह कहानी आगे बढ़ती है, और कहानी में अनेक बार, ब्राह्मण महिला होने के आदर्शों और खामियों को दिखाया जाता है। 

यहाँ यह जान लेना भी महत्वपूर्ण है कि आदर्श ब्राह्मणवादी नारीत्व की संरचना किया जाना अलग से चलने वाली एक प्रक्रिया नहीं है। आदर्श ब्राह्मण नारीत्व की तुलना यहाँ पथभ्रष्ट दलित महिलाओं द्वारा किए जाने वाले व्यवहारों से करते हुए उसे आदर्श दिखाने का प्रयास है। चाची 420 फ़िल्म में लक्ष्मी, घर की नौकरानी कौशल्या का पर्दाफ़ाश करके खुद को एक वफ़ादार आया और इज़्ज़तदार गेवर्नस के रूप में स्थापित कर लेती है। कौशल्या घर में चोरी करती है और कई पुरुषों के साथ उसके संबंध हैं। लेकिन साफ-सफाई करने वाली कामवाली बाई का इस तरह से आदमियों को रिझाने वाली, ओछे चरित्र वाली महिला के रूप में चित्रांकन, आमतौर पर भारतीय सिनेमा में किया जाता रहा है।  

अगर दलित नारीवादी दृष्टिकोण से देखा जाए तो हमारा ध्यान निश्चित ही जाति, यौनिकता और श्रम करने वालों के बीच इस तरह दिखाए जाने वाले इस संबंध की ओर आकर्षित होगा। चाची 420 फ़िल्म तो केवल एक उदाहरण है कि किस तरह समाज में जाति के आधार पर सामाजिक वर्ग अनुक्रम में स्त्रीत्व गुणों को एक दूसरे के विरुद्ध खड़ा कर दिया जाता है और सिनेमा का माध्यम भी इसे चित्रित कर मजबूती देता है। फ़िल्म के कथानक के माध्यम से जेंडर और जाति सम्बन्धों का उपयोग करते हुए दलित महिलाओं को बुरा बताते हुए ब्राह्मण स्त्रीत्व को पवित्र दिखाने की कोशिश की गयी है। यह सब देखकर ज़रूरत इस बात की महसूस होती है कि इस वास्तविकता पर और गहराई से विचार हो कि जाति आधार पर लोगों की पहचान और स्थिति निरधारण सबसे अधिक जेंडर के कारण ही होती है।          

कमल हसन जैसे अभिनेताओं और चाची 420 सरीखी फिल्मों को हम गए जमाने की सरलता के साथ जोड़कर देखते हैं लेकिन यह सब इतना सरल नहीं है। इस फ़िल्म की आलोचनात्मक समीक्षा कर लेना ही जाति विरोधी समालोचना का आदि और अंत नहीं है। आप प्रयास कर उन सभी फिल्मों के बारे में एक बार इस नज़रिए से सोचें, जो आपकी पसंद की फिल्में रही हैं। उम्मीद है कि चाची 420 फ़िल्म की जातिगत चार सौ बीसी को समझ कर आप अपनी पसंदीदा कुछ फिल्मों के बारे में फिर से सोचेंगे और उनमें जाति, जेंडर और यौनिकता के बीच दिखाये गए सम्बन्धों को समझने की कोशिश करेंगे।  

[1] यह भारतीय दंड संहिता की धारा 420 से लिया गया एक शब्द है, जो धोखाधड़ी और बेईमानी से संबंधित अपराधों को सम्मिलित करता है, और इसका उपयोग उस व्यक्ति को संदर्भित करने के लिए किया जाता है जिसे धोखाधड़ी या चालबाज माना जाता है।

 

सोमेन्द्र कुमार द्वारा अनुवादित 

To read this article in English, please click here.

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Full-time butler to cats on two continents. Part-time procrastinator researching queer cities and city queers at graduate school. Former NGO karamchari and future academic berozgaar.

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