निधि गोयल के साथ बातचीत

A picture of disabillity rights activist nidhi goyal

भारत के मुंबई शहर में रहने वाली निधि गोयल जेंडर और विकलांगता से जुड़े अधिकारों की पैरवीकार हैं।

अनिषा दत्त विकलांगता के साथ रह रहे लोगों के अधिकार और जेंडर अधिकार की पैरवीकार के रूप में आपका यह सफ़र अब तक कैसा रहा है? इस क्षेत्र और विषय से आपका जुड़ाव कैसे हुआ?

निधि गोयल जैसे कि अक्सर सफ़र होते हैं, मेरा यह सफ़र भी बहुत ही रोचक रहा है। मैं आपको शुरुआत से बताती हूँ जब मैं मास-मीडिया से जुड़ी थी और बहुत सी महिला पत्रिकाओं और ऑनलाइन पोर्टल्स के लिए स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम करती थी। न जाने क्यों, लेकिन मुझे अपने काम से पूरा संतोष नहीं होता था और मैं चाहती थी कि अपने काम के माध्यम से और अपने हुनर का प्रयोग मैं दुसरे लोगों की मदद करने के लिए करूं। या शायद कह सकते हैं कि मैं लोगों के जीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर पाने की इच्छुक थी।

अपनी किशोरावस्था के आरंभिक वर्षों में जब मुझे दिखाई देना बंद होने लगा तो उस समय मुझे मुंबई में पहुँच से बाहर एवं गैर समर्थक शैक्षिक, बुनियादी ढांचागत, पेशेवर और सामाजिक वातावरण पर मुझे बहुत गुस्सा आता था। अपने जीवंत स्वाभाव और परिवार के लोगों के सहयोग से मैं लगातार आगे बढ़ती गयी और इस पूरे समय में मुझे यह आभास रहा कि मेरे जैसे अनेक लोग हैं जिन्हें मेरी तरह परिवार का सहयोग नहीं मिलता होगा। मेरे मन में यह भावना तभी से उत्पन्न हो गयी थी कि मुझे उनके लिए कुछ करना है। मुझे लगता है कि एक पत्रकार के रूप में मेरे भीतर असंतोष इस संकल्प का एक संकेत था।

तो कुछ वर्षों तक पत्रकारिता करने के बाद मैंने जेंडर और विकलांगता विषय पर काम करने का मन बनाया और मुंबई के ‘पॉइंट ऑफ़ व्यू’ संगठन से जुड़ गयी और उनके साथ विकलांगता के साथ रह रही लड़कियों और महिलाओं के लिए चलायी जा रही परियोजना में काम करने लगी। यहाँ इनके साथ मिलकर मैंने www.sexualityanddisability.org वेबसाइट के लिए सामग्री की रचना की और बस इसके बाद मुझे कभी पीछे मुड़ कर देखने की ज़रुरत नहीं पड़ी।

समाज में विकलांग लोगों के साथ उनके जेंडर के आधार पर होने वाले भेदभाव को देखकर मुझे बहुत आक्रोश होता था लेकिन विकलांगता और जेंडर अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर काम करने से मुझे अपने इस मानसिक आक्रोश को दिशा देने में बहुत मदद मिली। विकलांगता के साथ रह रहे लोगों के साथ काम करने और उनके जीवन की चुनौतीयों को करीब से देखने का मुझ पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा और धीरे-धीरे मेरा बौद्धिक ज्ञान अनुभव पर आधारित जानकारी का रूप लेने लगा। अपने काम से मिलने वाले यही अनुभव मुझे इस विचार से आगे बढ़ने के लिए प्ररित करते रहते हैं कि अभी बहुत कुछ करना बाकि है।

अपने जीवन से जुड़ा एक रोचक अनुभव मैं आपको बताती हूँ – जब शुरू में मैंने विकलांगता के साथ रह रहे लोगों के साथ काम करना शुरू किया, मुझे याद है उस समय एक बहुत ही वरिष्ठ कार्यकर्ता ने मुझसे कहा कि मैं इस क्षेत्र में काम न करूं क्योंकि लोग यह सोचेंगे कि खुद एक विकलांग महिला होने के कारण तुम कुछ और हासिल नहीं कर सकती और शायद इसीलिए विकलांग लोगों के लिए काम करने वाले एनजीओ के साथ जुड़ रही हो। एक अन्य व्यक्ति ने कहा कि अभी तुम्हारी शादी नहीं हुई है और तुम शायद यौन अधिकारों पर काम करते हुए अपने लिए एक साथी की तलाश कर रही हो और इसीलिए इस काम से जुड़ी हो; एक दुसरे व्यक्ति ने तो यहाँ तक कह दिया कि तुम बहुत तेज़ और चालू लगती हो क्योंकि तुम सेक्स के बारे में बहुत खुल कर बात कर लेती हो। लोगों की इन सभी बातों पर मेरी खुद की प्रतिक्रिया भी होती थी – कभी मैं केवल आँखें घूमा कर उनकी बात सुन लेती, मुस्कुरा देती या फिर जोर से खिलखिला कर हँस देती – मुझे लगता था कि इन बातों का यही उत्तर होना चाहिए। लेकिन अब भी कुछ ऐसा है जो मुझे तकलीफ़ देता है और वह यह कि विकलांग लोगों, ख़ासकर विकलांग लड़कियों और महिलाओं की यौनिकता और उनके यौन व् प्रजनन स्वास्थ्य अधिकारों से जुड़े मुद्दे को अभी भी बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता; इसे पुर्णतः एक बेमानी मुद्दा मान लिया जाता है, यहां तक की खुद विकलांग लोगों के लिए काम रहे लोग भी इसे बहुत बड़ा मुद्दा नहीं मानते। मैं अपने काम के माध्यम से धीरे-धीरे ही सही, इस मानसिकता और इस धारणा को बदलने की कोशिश कर रही हूँ।

अनिषा दत्त – हमें यौनिकता और विकलांगता वेबसाइट के बारे में और विस्तार से बताइए।

निधि गोयल ऑनलाइन जानकारी देने वाली इस पहली वेबसाइट के सहलेखन और आरंभिक शोध में मेरी भागीदारी रही है। www.sexualityanddisability.org वेबसाइट विकलांगता के साथ रह रही लड़कियों और महिलाओं को जानकारी देने के लिए तैयार किया गया एक ऑनलाइन जानकारी का स्रोत है। विकलांग लड़कियों और महिलाओं के यौन अधिकारों पर चर्चा करने वाली यह अपनी तरह की पहली वेबसाइट है और इसे 2012 में शुरू किया गया था।

इस परियोजना के लिए मैंने पूरे भारत में अलग-अलग आयु और सामाजिक-आर्थिक वर्ग की और तरह-तरह की विकलांगताओं के साथ रह रही महिलाओं से बातचीत की और उनके व्यक्तिगत अनुभवों की जानकारी को इस वेबसाइट में डाला है। जानकारी के इस स्रोत को तैयार करने में एक ख़ास चुनौती यह थी की हम इसमें विकलांग महिलाओं की रोज़मर्रा की आम तकलीफों को शामिल करने का प्रयास तो कर ही रहे रहे थे लेकिन साथ ही साथ हमारी कोशिश यह भी थी कि इससे अलग-अलग विकलांगताओं के साथ रह रही महिलाओं को भी उनके लिए आवश्यक जानकारी मिल सके क्योंकि सभी शारीरिक विकलांगताएं और उनसे जुड़ी ज़रूरतें एक सामान नहीं होती। हमने एक और सावधानी यह बरती कि वेबसाइट में जानकारी देते समय हमने बिलकुल व्यवहारिक जानकारी देने का कोशिश की है और अपने दृष्टिकोण एवं सुझावों को ना ही ज़रुरत से ज्यादा सकारात्मक रखा है और ना ही नकारात्मक।

इस वेबसाइट के माध्यम से हमने विकलांग महिलाओं को अक्षम और यौन-रहित मान लिए जाने की धारणा को चुनौती देने की कोशिश की है। इस वेबसाइट में शारीरिक बनावट पर जानकारी दी गयी है और शरीर में होने वाले बदलावों, यौनिकता-शिक्षा, यौनिकिता व् यौनिक पहचान, संबंधों, बच्चों की देखभाल, उत्पीड़न और हिंसा, इन सभी विषयों को शामिल किया गया है।

इस ऑनलाइन वेबसाइट में दी गयी जानकारी को अभी तक 2,50,000 से अधिक पाठकों ने देखा और पढ़ा है। वेबसाइट पर मिली प्रतिक्रियाओं में विकलांगता के साथ रह रही महिलाओं के अनेक अनुभव शामिल हैं जिनसे इस वेबसाइट की सफलता का पता चलता है। वेबसाइट में एक ऐसी विकलांग महिला ने अपने बारे में बताया है जिन्होंने परिवार के नियंत्रण के अधीन रहते हुए भी आर्थिक रूप से खुद को स्वाबलंबी बनाया है, एक अन्य विकलांग महिला ने अपने मन से डर को निकाल कर अब बिना किसी डर के शहर में कहीं भी आने जाने की बात कही है तो वहीँ एक अन्य विकलांग महिला हैं जिन्होंने अपने ऊपर अपने परिजनों द्वारा किए जाने वाले मानसिक दबाब और उत्पीड़न का विरोध किया है। आज यह वेबसाइट विकलांगता के साथ रह रही महिलाओं, उनके साथियों और परिजनों, उनकी देखभाल करने वालों, इस विषय पर काम कर रहे संगठनो, डॉक्टरों और संभवत: नगर, राज्य और राष्ट्र स्तर पर नीति-निर्माताओं के लिए जानकारी का प्रमुख स्रोत बन गयी है।

अनिषा दत्तक्या शरीर से जुड़ी राजनीति और विकलांगता के बारे में पिछले कुछ वर्षों में आपके विचारों में कोई बदलाव आया है?

निधि गोयल मैं एक ऐसे परिवार से सम्बन्ध रखती हूँ जहाँ कभी भी बेटियों और बेटों में कोई अंतर नहीं किया गया और न ही कभी किसी की शक्ल या उनकी विकलांगता के आधार पर किसी व्यक्ति के बारे में कोई व्यक्तिगत राय कायम की जाती है, और इसीलिए मुझे लगता है कि मेरा खुद का रवैया भी बहुत अधिक सकारात्मक रहा है और मेरे विचार हमेशा ही प्रगतिवादी रहे हैं। हाँ, लेकिन 15 वर्ष की आयु में अपनी आँखों की रौशनी जाने के बाद मुझे एक अलग ही दुनिया के बारे में पता चला, यह एक ऐसी दुनिया थी जिसे इससे पहले तक मैंने बाहर से ही लेकिन बहुत नज़दीक से देखा था क्योंकि मेरे एक सिबलिंग (भाई/बहन) भी आँखों से देख नहीं सकते थे।

अपने जीवन के उस पड़ाव पर, एक किशोरी के रूप में, निश्चित रूप से अपने नेत्रहीन होने की वास्तविकता से जूझ रही थी, मुझमे आत्मविश्वास की बहुत कमी थी और मैं शारीरिक रूप से सक्षम लोगों और मॉस-मीडिया में विकलांग लोगों के प्रति धारणाओं और विचारों से खासी आशंकित रहती थी। मैंने इस बारे में और अन्य विषयों पर भी काफ़ी कुछ लिखा है।

मुझे लगता है लगभग उसी समय मैंने इस प्रचलित सामजिक धारणा को आत्मसात कर लिए था कि व्यक्तिगत स्तर पर – दोस्ती में, किसी रोमांटिक सम्बन्ध में या परिवार के अन्दर – अपने किसी निकट व्यक्ति की विकलांगता को स्वीकार कर लेना बहुत कठिन होता है और अगर कोई व्यक्ति सफलतापूर्वक ऐसा कर पाता है तो वास्तव में वह व्यक्ति अनुपम प्रेम और त्याग की मूर्त कहलाने के काबिल है। हाँ, बाद में जब मैंने www.sexualityanddisability.org पर काम करना शुरू किया तो ज़रूर मेरे विचारों में बदलाव आया। मैं खुद को बहुत प्रगतिशील और खुले विचारों का मानती थी लेकिन तब मुझे एहसास हुआ कि मेरी सोच में भी बदलाव आ रहा था। अगर पूरी ईमानदारी से कहूं तो कहीं न कहीं मेरे मन भी विकलांगता को लेकर कुछ अत्यंत सूक्ष्म लेकिन जटिल कुंठाएँ घर कर गयीं थीं और उनसे छुटकारा पाना सही मायने में बहुत राहतकारी अनुभव था!

यही कारण है कि मैं विकलांगताओं के साथ रह रहे लोगों के साथ काम करने में विश्वास करती हूँ और इस पर पूरा ध्यान दे पाती हूँ। मेरे विचार से इन लोगों के साथ काम करने से पहले आपको खुद अपने मन से उन छोटी-छोटी कुंठाओं को निकाल देना चाहिए जो आगे चल कर आपके काम में रूकावट बनती हों। इस तरह से विकलांग व्यक्ति खुद को सशक्त बनाते हुए अपने आसपास के वातावरण को बेहतर बना पायेंगे और इस समाज को सबके लिए और अधिक समावेशी और स्वीकार्य बना पायेंगे।

अनिषा दत्त – आपने एक बार कहा था, “लोग शारीरिक रूप से सक्षम लोगों को ‘गैर-विकलांग’ कहने की बजाए आसानी से ‘सामान्य’ (नार्मल) कह कर संबोधित करते हैं और इस बारे में उन्हें दोबारा सोचने की ज़रुरत नहीं पड़ती। क्या आप अपने इस वक्तव्य को और स्पष्ट कर बतायेंगी?

निधि गोयल हम जिस किसी भी वस्तु या विचार को सामान्य मान लेते हैं उसकी  ‘सामान्य’ की उस परिभाषा को फिर कभी छोड़ना नहीं चाहते। जैसे कि किसी महिला के लिए गुलाबी रंग पसंद करना या किसी पुरुष के लिए खेलों में रूचि लेने को हमारा समाज ‘सामान्य’ समझता है लेकिन ईमानदारी से मुझे नहीं लगता कि सभी महिलाओं या पुरुषों पर यह बात एक समान रूप से लागू होती है। फिर जैसे हम कहते हैं कि, ओह वह लड़की कितनी मोटी है या अमुक लड़की कितनी छोटी है या कितनी लम्बी है….। यही कारण है कि मैं ‘सामान्य’ की परिभाषा को चुनौती देना पसंद करती हूँ और साथ ही उन लोगों को भी चुनौती देती हूँ जो इस परिभाषा को पुष्ट करते हैं।

जहाँ तक ‘गैर-विकलांग’ शब्द के प्रयोग का ताल्लुक है, इसका औचित्य केवल लोगों को यह समझाना है कि किस तरह से हम केवल अपनी धारणाओं के आधार पर लोगों को अलग-अलग वर्ग और श्रेणियों में बाँट देते हैं। अगर ‘सामान्य’ लोग समझते हैं कि कुछ लोगों को वे अपने दिमाग में ‘विकलांग’ मान सकते हैं तो उसी तरह संभव है कि विकलांग लोग भी इन्हें श्रेणियों में बाँट लें। मुझे बहुत साल पहले का वह प्रशिक्षण याद है जिसमे प्रशिक्षक ने ‘देख पाने में सक्षम’ या दृष्टिहीनता न रखने वाले लोगों को परिभाषित करते हुए बताया था कि ऐसे लोग ‘दृष्टि आश्रित’ होते हैं। तो सही मायने में यह आपकी धारणा पर निर्भर करता है कि आप किसी व्यक्ति को किस रूप में देखते और समझते हैं। मेरे विचार से जब हम विकलांगता के साथ रह रहे लोगों को इस तरह से वर्गीकृत करते हैं तो हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि वे लोग भी इंसान पहले हैं और विकलांग या सक्षम बाद में।

अनिषा दत्त – आपके विचार से क्या विकलांगता, यौनिकता और आनंद आपस में जुड़े हैं? क्या ज़्यादातर लोग भी ऐसा ही समझते हैं? 

निधि गोयल सबसे पहले तो मैं इन तीनों के बीच के अंतर-सम्बन्ध के बारे में कुछ कहना चाहूंगी। अधिकाँश लोगों को लगता है कि विकलांगता और यौनिकता के बीच कोई सम्बन्ध नहीं होता – सिवाय तब जब वे हिंसा के मामलों के बारे में सुनते हैं। उन्हें लगता है कि विकलांग लोगों को अपनी यौनिकता, इच्छाओं, ज़रूरतों या रुझानों के बारे में ज़्यादा जानने की ज़रुरत ही नहीं होती क्योंकि वे तो मूल रूप से यौन-रहित होते हैं। अगर ऐसे विकलांग लोग किसी तरह जीवित रह पाते हैं, उन्हें भरपेट भोजन मिल जाता है और वे कुछ कमा भी लेते हैं तो उनका जीवन तो वैसे ही उनकी अपेक्षाओं से कहीं अधिक सफल हो जाता है। ऐसी परिस्थिति में आनंद पाना एक बहुत ही अलौकिक वस्तु हो जाती है क्योंकि विकलांग होकर केवल जीवित रह पाना ही अपने आप में बड़ी बात है, आनंद के बारे में सोचना तो बहुत अधिक की आशा करने जैसा है!

लेकिन मेरे विचार से विकलांगता, आनंद की अनुभूति और यौनिकता में बहुत गहरा सम्बन्ध है। विकलांगता के साथ रह रहे लोगों को हम यौन-रहित और आनंद की परिकल्पना करने से दूर इसलिए समझ लेते हैं क्योंकि कहीं न कहीं हमारे मानस में यह बात घर गयी है कि विकलांग लोग कमतर श्रेणी के मनुष्य हैं और इसलिए मनुष्यों की सभी ज़रूरतें उनके लिए नहीं हैं।

अनिषा दत्त – बिलकुल, मीडिया और आज की फिल्में भी अक्सर इसी धारणा को पुष्ट करती हैं। क्या आपको लगता है कि इस अवधारणा में समय के साथ कुछ बदलाव आया है या फिर आज भी स्थिति उतनी ही विकट है?

निधि गोयलमेरे विचार से मीडिया में विकलांगता के चित्रण में बहुत अधिक बदलाव नहीं आया है। 60, 70 और 80 के दशक में विकलांगता के साथ रह रहे लोगों को हमेशा समाज पर बोझ के रूप में दिखाया जाता था – जैसे बूढी अंधी माँ या लंगड़ी बहन । हालाँकि उस समय पर स्पर्श और कोशिश जैसी ईमानदार और गहरे अर्थ लिए फिल्में बनी थी लेकिन फिर भी आमतौर पर विकलांगता का चित्रण बहुत ही नकारात्मक रूप से किया जाता था।

फिर उसके बाद संजय लीला भंसाली की फिल्मों का दौर आया जब मन, गुज़ारिश जैसी फिल्में बनी जिनमें किसी भी विकलांग व्यक्ति के जीवन से आनंद के हर रूप को दूर कर दिया गया और ऐसी ही फिल्में आज विकलांगता के बारे में समाज में व्याप्त धारणा के लिए ज़िम्मेदार हैं। यही वह समय था जब मैं किशोर आयु की थी और इन्हीं सब फिल्मों का मुझ पर गहरा असर हुआ था – इसमें मन फिल्म का कथानक विशेष है जिसमे यह सन्देश दिया गया था कि अगर आप विकलांग हैं तो आपको यह मान लेना चाहिए कि आप किसी भी अन्य व्यक्ति के साथी बनने के लायक नहीं है और इसलिए पीछे हट जाना ही आपके लिए बेहतर होगा। इन फिल्मों में भी यही सन्देश था कि विकलांगता एक तरह का बोझ है और विकलांग जीवन जीने से तो जीवित न रहना बेहतर विकल्प होता है।

लेकिन हाल ही में प्रदर्शित हुई बर्फी, शमिताभ, पा और मार्गरीटा विद अ स्ट्रॉ जैसी फिल्मों में देखा गया है कि कुछ बदलाव ज़रूर दिखाई देने लगा है लेकिन फिर भी मुझे नहीं लगता कि विकलांगता और यौनिकता के विषय पर चित्रण में कोई ख़ास परिवर्तन आया है। हाँ, मार्गरीटा विद अ स्ट्रॉ जैसी फिल्म के बाद भी मैं यह कह रही हूँ जिसमे विकलांगता और यौनिकता के बीच के संबंधों पर कुछ ज़रूर कहा गया था। मेरे लिए सही मायने में बदलाव तब दिखाई देगा जब दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे जैसी किसी फिल्म में हीरो शाहरुख़ खान एक विकलांग व्यक्ति होगा जिसके कुछ सपने, जीवन, दोस्त, असफलताएं, अच्छी आदतें, बुरी आदतें और कमियाँ हों। ऐसा तभी हो पायेगा जब फिल्म निर्माता और निर्देशक अपने विचारों की श्रृंखला, अपनी सोच की प्रक्रिया और फिल्म निर्माण प्रक्रिया में अधिक से अधिक विकलांग लोगों को जगह देंगे, क्योंकि हालांकि वे ईमानदारी से कोशिश तो कर सकते हैं लेकिन उन्हें ये भी ध्यान में रखना होगा कि ‘हमारे बारे में बिना हमारी भागीदारी के, कुछ न हो पाएगा’।

अनिषा दत्त – हाल ही में अभिनेत्री सोनल वेंगुर्लेकर ने फिल्म मार्गरिटा विद अ स्ट्रॉ की यह कहते हुए आलोचना की थी कि विकलांगता के साथ रह रहे लोगों के मन में यौनिकता से जुड़े भाव आते ही नहीं। इस बारे में आपका क्या कहना है?

निधि गोयल मुझे नहीं पता कि बॉलीवुड के प्रशंसकों के लिए सेक्स किस तरह से एक विचित्र या परेशान करने वाला विषय हो सकता है। आपको क्या लगता है कि जब फिल्म में अभिनेता और अभिनेत्री ‘तेरे मेरे मिलन की ये रैना’ या फिर ‘भीगे होंठ तेरे..’ गा रहे होते हैं या फिर जब ‘सुबह होने न दे, शाम खोने न दे’ पर नाच रहे होते हैं तो उनके मन में क्या विचार होते हैं या फिर वे कौन सा भाव दिखा रहे होते हैं? हमें बिलकुल भी अटपटा नहीं लगता जब बॉलीवुड की 90 प्रतिशत फिल्मों में प्रेम, सेक्स और रोमांस दिखाया जाता है – लेकिन फिर अचानक मार्गरीटा विद अ स्ट्रॉ  पर इतनी आपत्ति क्यों? हो सकता है यह केवल विकलांगता के प्रति उपजी असहजता हो।

लगता है सोनल को इस फिल्म के ईमानदार और खुले संवादों से तकलीफ़ हो और उन्हें और अधिक असहज करने के लिए मैं इतना ही कहना चाहूंगी की एक समाज के रूप में हमें तब शर्मिंदा होना चाहिए जब हम यह कहते हैं कि विकलांगता के साथ रह रहे लोगों को किसी मुकाम तक पहुँचने, अपनी योग्यता को पहचाने जाने और भेदभाव से लड़ने के बारे में चिंता करनी चाहिए। ऐसा कहकर हम यह दर्शाना चाहते हैं कि हमने अपने समाज में विकलांग लोगों के सामने इतनी बाधाएं खड़ी कर दी हैं कि उन्हें अपनी यौन ज़रूरतों के बारे में सोचने का अवसर ही नहीं मिल पाता। बहिष्करण के अपने तौर-तरीकों से हम विकलांग लोगों को उनकी मौलिक ज़रूरतों, इच्छाओं और सपनों को एक बक्से में बंद करने पर मजबूर कर देंगे। विकलांग लोगों को केवल जीवित रहने और आनंद प्राप्त करने के बीच चुनाव करने के लिए बाध्य किया जा रहा है – और यह एक ऐसा चुनाव है जो हम में से अधिकाँश को कभी नहीं करना पड़ता।

लेकिन समाज द्वारा विकलांग लोगों के सामने इतनी सारी बाधाएं खड़ी कर देने के बाद भी क्या विकलांग लोग अन्य लोगों की तरह सोचना या महसूस करना छोड़ दते हैं? अपनी वेबसाइट के लिए किए गए शोध के दौरान और उसके बाद भी गाँवों में अपने अध्ययन के दौरान मैंने देखा है कि जब बात प्रेम संबंधों की और विवाह की आती है तो विकलांग महिलाओं को बहुत भेदभाव का सामना करना पड़ता है। इसके कारण उन्हें कमतर होने का एहसास होता है, उन्हें लगता है कि उनकी ज़रुरत नहीं है, वे काबिल नहीं हैं और इससे एक व्यक्ति के रूप में उनके मानस और उनके आत्म-विशवास पर बहुत बुरा असर पड़ता है।

इस फिल्म में एक किशोर आयु की लड़की की कहानी दिखाई गयी है और जैसा कि होता है कि किशोर आयु में अधिकाँश युवा लोग – विकलांगता के साथ रह रहे या बिना – प्रेम, संबंधों और सेक्स के बारे में सोचते हैं। आप कह सकते हैं कि वे इसके अलावा भी बहुत कुछ सोचते हैं। वे अपने जीवन लक्ष्यों के बारे में, करियर, शौक आदि के बारे में सोचते हैं और ऐसे ही फिल्म में यह नायिका लैला भी करती है। फिल्म में दिखाया गया है कि लैला अपने संगीत और म्यूजिक बैंड में बहुत रूचि रखती है। उन्हें रचनात्मक लेखन विषय में अमरीका जाकर आगे की पढाई के लिए छात्रवृति मिली है जो कोई कम उपलब्धि नहीं है। यहाँ तक सब ठीक है, सब स्वीकार्य है। समस्या केवल यह है (सोनल जैसे लोगों की नज़र में) कि अपनी विकलांगता के कारण उसे अपनी यौनिकता और सेक्स से जुडी ज़रूरतों के बारे में सोचना नहीं चाहिए। अब देखिये ना, अमरीका में अपनी यूनिवर्सिटी पहुँच कर उसे पता चलता है कि उसके लिए पढाई के नोट तैयार करने के लिए एक खूबसूरत से दिखने वाले आकर्षक लड़के को नियुक्त किया गया है। लैला उस लड़के की सहायता लेना स्वीकार कर लेती है हालांकि उसे इसकी बहुत अधिक ज़रुरत नहीं होती। लेकिन विश्वास मानिए, लैला की जगह अगर कोई अन्य गैर-विकलांग लड़की भी होती तो ऐसी स्थिति में वह भी ऐसा ही करती।

लगता है सोनल इस फिल्म को पूरी तरह से समझ नहीं पायीं और इसलिए उनको लगता है कि फिल्म का मुख्य किरदार स्वीकार न किए जाने की वजह से ‘समलैंगिक’ बन गईं। इस फिल्म में साफ़ तौर से बाई-सेक्सुअलिटी की बात की जा रही है और संभव है कि अनेक दर्शकों के लिए यह विषय और कथानक की विषयवस्तु बिलकुल नई रही होगी जिसे समझ पाने में कठिनाई होती ही है।

मेरे विचार से सोनल के जो अनुभव रहे और जिनके बारे में उन्होंने अपने पत्र में विस्तार से लिखा भी, वह शायद सभी आम लोगों के विचारों के सामान ही हैं। हम जब कभी भी विकलांगता के विषय पर कोई फिल्म देखते हैं तो हमें यह उम्मीद बिल्कुल नहीं होती की फिल्म में विकलांगों को हमारी धारणा से अलग किसी रूप में दिखाया जाए। हम विकलांग लोगों को ‘आम – सामान्य’ लोगों की तरह व्यवहार करते हुए नहीं देखना चाहते, न ही हम उन्हें प्रेम करते हुए, विवाह करते, संतान पैदा करते या वैसे ही बस शरारती या कुटिल देखना पसंद करते हैं। हम चाहते हैं कि फिल्म में उन्हें संघर्ष करते हुए दिखाया जाए, यह दिखाया जाए कि कैसे वे कुछ हासिल करने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाकर मेहनत करते हैं और विफल होते हैं। दरअसल हम स्क्रीन पर विकलांगों को वही सब करते हुए देखना चाहते हैं जो हम सोचते हैं वे कर सकते हैं ना कि वो जो  वे हक़ीकत में हैं।

 

सोमेन्द्र कुमार द्वारा अनुवादित

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