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महिलाओं का विवाह पश्चात् ‘प्रवसन’ और उससे जुड़े कुछ मुद्दे

भारत और कई अन्य विकासशील देशों में ये कोई बड़ा रहस्य नहीं है कि विवाह से जुड़े प्रवसन की जब बात होती है तो मायने महिला के प्रवसन से ही होता है, भले ही वह एक घर से दूसरे घर में हो, एक शहर से दूसरे शहर या एक देश से दूसरे देश में हो।  यहाँ यह सवाल भी अपना अस्तित्व खो देता है कि किस तरह विवाह की व्यवस्था में किसी पुरुष को अपने परिवार, अपने समर्थन तंत्र, अपने दोस्त, अपनी पहचान के किसी भी हिस्से का त्याग करके पत्नी के घर प्रवास करने की ‘संस्कृति’ नहीं है। यदि कोई पुरुष ऐसा करना भी चाहें तो यह तुरंत ही नामंजूर कर दिया जाता है और यदि, फ़िर भी, कोई पुरुष इस व्यवस्था को चुनौती देना चाहते हैं तो वे यह अच्छी तरह जानते हैं कि उन्हें लगातार इस बात को सिद्ध करने के लिए तैयार रहना होगा कि उनका यह फ़ैसला उनके ‘पुरुषत्व’ की किसी ‘कमी’ की वजह से नहीं है।

यूँ तो विवाह और उससे जुड़े महिलाओं के ‘स्थान परिवर्तन’ को ‘प्रवसन’ का दर्ज़ा दिया ही नहीं जाता है, इसको एक अपरिहार्य व्यवस्था की तरह देखा जाता है जिसमें पत्नी का स्थान पति के साथ ही है, चाहे वो जहाँ भी जाए। पूर्वी एशियाई देशों में, १९८० के दशक के बाद से एक बड़ी संख्या में महिलाओं के विवाह पश्चात् प्रवसन का चलन देखा गया है जिन्हें ‘फॉरेन ब्राइड’ या विदेशी वधु के नाम से जाना जाता है। इन देशों की लिस्ट में भारत के साथ जापान, चीन, ताइवान, सिंगापुर, कोरिया, नेपाल जैसे कई देशों के नाम हैं। यदि विवाह से जुड़े प्रवसन को कुल प्रवसन के आकड़ों के साथ जोड़ा जाए तो शायद ये महिलाओं का सबसे बड़ा प्रवसन होगा।

एक घर में महिला के योगदान को पित्रसत्तात्मक समाज में भले ही कोई ख़ास दर्ज़ा ना दिया गया हो, महिला के इस अवैतनिक काम की अपेक्षा हमेशा ही रही है और स्वेच्छा से या विवाह जैसी व्यवस्था द्वारा, महिलाओं को इस अपेक्षा पर खरा उतरना पड़ता है । विवाह से जुड़े प्रवसन के लिए भारत और कई अन्य दक्षिण-एशियाई देशों में लड़कियों को बचपन से ही तैयार करना शुरू कर दिया जाता है, इस बहुत ही दृढ सन्देश के साथ कि “भले ही इस घर में तुम्हारा जन्म हुआ है पर तुम्हारा घर कहीं और है”।  “उस घर जाएगी तो क्या करेगी ये लड़की”, इस सवाल का भार लिए हर लड़की अपने आप को एक अनदेखे भविष्य के लिए तैयार करती रहती है। हालाँकि विवाह के बाद हर लड़की या महिला अपने जन्म के घर से दूर नहीं जाती, हाँ पर दूरी इतनी अवश्य होती है कि जन्म के परिवार से उनका रोज़मर्रा का संपर्क और संवाद टूट जाता है। प्रवसन की इस व्यवस्था में चार चाँद लग जाते हैं, जब लड़का विदेश में बसा हो। जी हाँ, ‘लड़का’ विदेश में हो, लड़की के विदेश में बसने का मुद्दा विचारनीय नहीं है, क्योंकि माना जाता है कि यदि लड़की विदेश में बस गई है तो उनकी आशाओं पर कोई ‘देशी पुरुष’ क्यों ही खरा उतरेगा!

भारत में आज भी अधिकतर विवाह परिवार वालों द्वारा तय किये जाते हैं जहाँ लड़के-लड़की को एक दूसरे को ठीक तरह से जान पाने का मौका विवाह के बाद ही मिल पाता है। इस बात का यह अर्थ नहीं है कि परिवार वाले अपनी लड़कियों के हित के बारे में नहीं सोचते, पर यह अवश्य ही लड़कियों के अपने जीवन पर पूर्ण अधिकार ना होने को दर्शाता है। विवाह के मामले तय करते समय फ़ैसला जाति, धर्म, वर्ग, सांस्कृतिक मान्यताओं को ध्यान में रखकर लिया जाता है, और कम ही मामलों में लड़के-लड़की की मर्ज़ी को एहमियत दी जाती है। चूँकि विवाह हर व्यक्ति के जीवन के लक्ष्य के रूप में देखा जाता है, कुछ मामलों में पाया गया है कि केवल विवाह करने के लिए परिवार वाले लड़के की अप्रवासन स्थिति (यदि वह विदेश में बसा है तो), रोज़गार, कमाई, संपत्ति, आदि की गलत या अधूरी जानकारी देते हैं।  किसी एनआरआई या किसी बड़े शहर में नौकरी कर रहे लड़के से विवाह के प्रस्ताव को कोई भी आसानी से नहीं जाने देना चाहता है। बेहतर जीवन की आशा में अक्सर लडकियाँ और उनके परिवार वालों का उतावलापन उन्हें उन साधारण बातों को नज़रंदाज़ करने पर मजबूर कर देता है जो आम तौर पर कोई भी रिश्ता तय करते समय देखी जानी चाहिए। दुर्भाग्यवश जब तक लड़की या उनके परिवार वाले इस सच्चाई को पूरी तरह जान पाते हैं तब तक देर हो चुकी होती है और अक्सर लड़कियों के पास हालात से समझौता करने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह जाता।

चूँकि विवाह के पश्चात् महिला अपने जन्मस्थान से दूर चली जाती है, इसका एक बड़ा असर उनके शिक्षा के स्तर पर भी देखा जा सकता है। कई लड़कियों एवं महिलाओं को विवाह तय होते ही अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ देनी पड़ती है। यदि विवाह के पश्चात् महिला विदेश में जाकर बसने वाली हों तो हो सकता है कि उनकी अब तक की पढाई और डिग्री नए देश में कोई मायने ना रखती हो। शिक्षा की कमी या डिग्री और अनुभव को मान्यता ना मिलने का असर महिला की स्वायत्तता पर पड़ता है जो उनके खिलाफ़ हिंसा पर सीधा असर डालता है। हो सकता है कि वहाँ का खाना, कपड़े, विचार शैली और अन्य सांस्कृतिक पहलू महिला के विवाह के पहले के जीवन से बिलकुल अलग हों। हो सकता है महिला विवाह के बाद जहाँ रहने जा रही हों, उन्हें वहाँ की भाषा का कोई ज्ञान ना हो, ऐसे में दूसरे लोगों से बात-चीत करना, उन्हें या उनकी संस्कृति, उनके रहन-सहन को समझना और नए दोस्त बनाने में महिला को कठिनाई हो सकती है। इस स्थिति में महिला पूरी तरह केवल अपने पति और ससुराल के परिवार पर ही निर्भर रह जाती हैं और अपने लिए नया समर्थन तंत्र बनाने में असमर्थ होती हैं। अक्सर इस सांस्कृतिक अलगाव के कारण महिलाएँ स्वयं को असहाय महसूस करने लगती हैं, विशेषकर तब जब वे घरेलू हिंसा या नज़्दीकी साथी द्वारा हिंसा का शिकार हो। ऐसे में ‘विदेशी ज़मीन’ पर जीवन और भी अभिभूत कर देने वाला हो सकता है।

एनआरआई विवाह पश्चात् मामलों में हिंसा की यह फेहरिस्त और भी लम्बी हो जाती है। पति द्वारा विवाह के तुरंत बाद पत्नी को छोड़ कर वापस विदेश चले जाना; कभी कोई संपर्क ना रखना; पत्नी को साथ ले जाना पर एअरपोर्ट पर उन्हें छोड़ देना या यदि पत्नी स्वयं पति से मिलने जाए तो उन्हें सही पता ना देना या एअरपोर्ट लेने ना जाना; यदि पत्नी साथ रह रही हों, तो उनके या बच्चों के कागज़ात पूरे ना करवाना, उनका या बच्चों का पासपोर्ट अपने पास रखना, जिससे वे हमेशा पति या परिवार वालों के नियंत्रण में रहें, ऐसे कई मामलों के बारे में हम अक्सर ही अख़बारों में पढ़ते रहते हैं। कुछ मामलों में ये भी देखा गया है कि जब पत्नी विदेश पहुँचती हैं तो उन्हें पता चलता है कि उनके पति पहले से ही विवाहित हैं और ये विवाह उन्होंने परिवार वालों का ‘दिल रखने’ के लिए किया था या ये सोच कर किया था कि उन्हें एक नौकरानी मिल जाएगी।

मेरी एक करीबी रिश्तेदार की शादी एक व्यवसाई के साथ तय हुई जो सिंगापुर में अपने परिवार के साथ रहते थे। लड़का प्रवासी भारतीय (नॉन रेसिडेंट इंडियन, एनआरआई) था इसलिए परिवार में खासा उत्साह था। लड़के वालों को विवाह की जल्दी थी और लड़की के अलावा उनकी कोई ‘मांग’ नहीं थी, जो आज के समय में अपनेआप में ही बड़ी बात थी, इसीलिए चट-मंगनी-पट-ब्याह हो गया। शादी के बाद लड़की के परिवार वालों का उनसे संपर्क केवल फ़ोन के ज़रिए ही रहता था, जिसमें आधा समय लड़के की माँ और बहन से बात करने में निकल जाता था और बाकी का, अन्य औपचारिकताओं में। लड़की के मायके वालों की लड़की और उनके ससुराल वालों से शादी के बाद पहली मुलाकात होली पर हुई जब वो सभी भारत आये, और साथ आईं शिकायतों की लम्बी लिस्ट। शुरुआत इससे हुई कि लड़की को खाना बनाना नहीं आता, “अरे अगर विदेश में शादी करनी थी तो वहां का खाना बनाना भी तो सीखना था ना”। और फिर इस सिलसिले का अंत हुआ दो साल बाद जब लड़की ये कह कर मायके आ गई कि उनकी माँ की हालत बहुत ख़राब है। असलियत तब पता चली कि उन लोगों को शायद घरेलू काम के लिए कोई चाहिए था और शादी करके बहु घर ले आना उनको इसका एक सस्ता उपाय लगा। लड़की ने बताया कि जब पति और परिवार के अन्य सदस्य कहीं बाहर जाते थे तो उन्हें घर में बंद रखा जाता था और उन्हें मानसिक रूप से परेशान किया जाता था। इसके बाद तलाक के लिए मामला कोर्ट में गया, पर कोर्ट की कार्यवाही आगे तब बढ़ती जब लड़का कोर्ट में हाज़िर होता। हार कर लड़की के घर वालों ने लड़के वालों के साथ कोर्ट के बाहर समझौता कर लिया और लड़के वालों ने किसी भी निर्वाह-व्यय (ऐलमोनी) ना देने की शर्त पर आपसी सहमति से तलाक की कार्यवाही पूरी कर दी। इन सब परिस्थितियों ने हमारे परिवार को एक बड़ी सीख दी कि शादी विवाह के रिश्ते तय करते समय सतर्कता बरती जाए, विशेषकर तब जब महिला की पहुँच अपने मायके के समर्थन तंत्र तक ना हो। जल्दबाज़ी में और किसी के दबाव में निर्णय ना लें; मामलों को दूर से फ़ोन पर या ईमेल पर तय ना करें; किसी भी एजेंट, दलाल, बिचौलिए या रिश्तेदार पर आँख बंद करके भरोसा ना करें; यदि विवाह के पश्चात् विदेश जाना हो तो अपने सारे कागज़ पूरे होने के बाद ही जाएँ; विवाह का कानूनी पंजीकरण या रजिस्ट्रेशन ज़रूर करवाएं।
यूँ तो विवाह के संस्थान पर हमें इतनी आस्था होती है, हम अक्सर विवाह की तैयारियों को केवल साज-सजावट और अपने नए घर को सवारने से जुडी तैयारी ही समझते हैं, जबकि ये अन्य तैयारियां भी उतनी ही ज़रूरी हैं। कोशिश करें कि विवाह के बाद महिला जिस शहर में रहने वाली हों, उस शहर में उनका एक बैंक खता हो जिससे आवश्यकता पड़ने पर उन तक आर्थिक मदद पहुँच सके। उस शहर या देश के आपातकालीन नंबरों की जानकारी रखें जिससे समय आने पर महिला उसका उपयोग कर सकें। कोशिश करें की महिला जिस शहर या देश में जा रही हों वहां की भाषा का उनको कुछ ज्ञान हो। ये सभी सुझाव इस बात की ओर संकेत हरगिज़ नहीं करते की हर विवाह का अंजाम वैसा ही होता है जैसा मेरी इन रिश्तेदार के साथ हुआ, पर यह निश्चित करते हैं कि यदि ज़रुरत पड़ी तो महिला किसी पर आश्रित ना हों। इतना सब ध्यान रखने के बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं होती कि हर रिश्ता कामयाब रहेगा।

विवाह से जुड़ा प्रवसन हर किसी के लिए एक अलग माएने रखता है, किसी के लिए ये उनके और उनके परिवार के गरीबी से निकलने का रास्ता है, तो किसी के लिए एक सुनहरे भविष्य की झलक, किसी के लिए एक बंदिश भरी ज़िन्दगी से बाहर आज़ादी की सांस है तो किसी के लिए जीवन का बस एक और अध्याय। विवाह और प्रवसन का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है महिला की इस व्यवस्था में एजेंसी, उनकी स्वायत्तता और अपने और अपने परिवार के लिए निर्णय लेने की क्षमता। जहाँ पत्नी के रूप में एक कामोत्तेजक, आकर्षक युवती के साथ घर को निपुणता से सँभालने वाली की इच्छा रखी जाती हो वहाँ महिला की एजेंसी एक ऐसा सवाल है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है। इस बात को अभी और समझने की आवश्यकता है कि विवाह से जुड़ा प्रवसन महिला के लिए सिर्फ़ एक सुनहरा सपना है या इस यथार्थता में महिला के अधिकार की खुशबू भी है!

This article was originally published in this issue of our magazine

चित्र स्त्रोत : जेसन कोरी (सी सी बाई २.०)

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Has a keen interest and experience in training and on reproductive and sexual health related issues.With a Post Graduate Diploma in Rural Development and Management from the Institute of Engineering and Rural Technology, Allahabad, she has worked in the area of sexual and reproductive health and rights for over ten years.

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