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सेक्सी फ़ील करना ओके है!

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मैं जब भी कहती हूं कि मैं एक यौनिकता प्रशिक्षक हूं, कुछ लोग अचानक चुप्पी साध लेते हैं और आगे कोई सवाल नहीं करते। ऐसा नहीं है कि वे मेरे काम के बारे में जानने के लिए उत्सुक नहीं हैं, बल्कि उन्हें इस पर बात करने में असहजता महसूस होती है। फिर कुछ और लोग हैं जो यौन हिंसा और शोषण की बढ़ती वारदातों के ज़माने में ‘इतना अच्छा काम’ करने के लिए मेरी वाहवाही करते हैं और बात को बाल यौन शोषण और बच्चों को इसका मुक़ाबला करने के लिए तैयार करने की ज़रूरत पर ले आते हैं। मुझे बच्चों से शोषण के रोकथाम के बारे में बात करने के लिए शाबाशी मिलती है और मैं विनम्रता से ये शाबाशी क़ुबूल भी कर लेती हूं, लेकिन ये नहीं बताती कि शोषण के बारे में बात करना मेरे काम का एक छोटा-सा हिस्सा भर है और मेरा काम ख़ासतौर पर शारीरिक सुख और यौन-सकारात्मक मूल्यों पर केंद्रित है।

भारत जैसे देश में सेक्स जैसी चीज़ों के ज़रिए शारीरिक सुख का आनंद उठाने को लालच और कमज़ोरी के रूप में देखा जाता है। भारतीय उपमहादेश में हमें आमतौर पर ये सिखाया जाता है कि सुख की तलाश महज़ फ़िज़ूल की ऐयाशी है जो हमें आत्मबोध तक पहुंचने से रोकती है, जिसकी वजह से हमें लुभावों से दूर रहना चाहिए। हमें ये भी बताया जाता है कि शारीरिक वासनाओं को पूरी करने के चक्कर में हम ये नहीं देख पाते हैं कि इसका नतीजा क्या हो सकता है और ये हमारे आत्म-विकास को कैसे नुकसान पहुंचा सकता है। चूंकि हमें इस नैतिक कंपास के मुताबिक ज़िंदगी जीना सिखाया जाता है, हम अपनी चाहतों और अपने सुखों (ख़ासकर अगर वे यौनिक हों) के बारे में बात करने से कतराते हैं क्योंकि हमें लगता है हम कोई बड़ा पाप कर रहे हैं।

वयस्कों के बीच भी सुख और वासना को लेकर बात बहुत कम होती है। सेक्स के बारे में अगर बात हो भी जाए तो ये बातें प्रजनन और शोषण, संक्रमण, और अनचाही प्रेगनेंसी से बचाव तक ही सीमित रहतीं हैं। शारीरिक सुख पर बात करने के लिए एक ही रूपरेखा है जिसे समाज जायज़ मानता है, और उस रूपरेखा के अंतर्गत बचाव, रोकथाम, और सुरक्षा की बातें होना ही मुमकिन है। ऐसे में लोगों के मन में ये सवाल पैदा होते हैं – क्या शारीरिक सुख को केंद्रित करते हुए सेक्स पर बात करने से लोग ज़्यादा सेक्स करने लगेंगे और अपनी इच्छाओं पर क़ाबू नहीं रख पाएंगे? अगर एक बार हमें पता चल गया कि शारीरिक सुख क्या है, क्या हम उसके ग़ुलाम बन जाएंगे?

और इसीलिए शारीरिक सुख पर बातें सिर्फ़ व्हाट्सैप पर भेजे गए, मर्दों की यौनिकता पर केंद्रित ‘चुटकुलों’ तक ही सीमित रहतीं हैं। ये चुटकुले उन मर्दों का ‘दर्द’ बयां करते हैं जिन्हें औरतें शारीरिक सुख ‘देने’ से इनकार करतीं हैं और जिन्हें आख़िर में “मेरा हाथ ही मेरा साथी” कहते हुए हस्तमैथुन पर निर्भर होना पड़ता है। अब हस्तमैथुन करना तो बहुत अच्छी बात है, फिर इसे आख़िरी विकल्प की तरह देखने की क्या ज़रूरत है? क्यों न हम इस तरह अपने ऊपर तरस खाने के बजाय अपने शारीरिक सुख की ज़िम्मेदारी अपने हाथों ले लें?

मैं कई वयस्क औरतों को जानती हूं जिन्हें पता ही नहीं कि ‘क्लिटोरिस’ (भगशेफ) क्या होता है और जो ये नहीं जानतीं कि लिंग-योनि के मिलन के अलावा भी ऐसे कई तरीक़े हैं जो एक औरत के शरीर को चरम सुख तक पहुंचा सकते हैं। कई शादीशुदा औरतें ‘सेक्स टॉयज़’ का इस्तेमाल करने से इनकार कर देतीं हैं ये कहते हुए कि, “मेरा पति तो है। उसके ‘औज़ार’ के रहते हुए किसी और चीज़ की क्या ज़रूरत?” शादीशुदा दंपतियों के बीच यौन संबंधों के जायज़ माने जाने के बावजूद भी उनके लिए आपस में यौन इच्छाओं के बारे में बात करने के लिए जिस माहौल और भाषा की ज़रूरत है, वो मिल पाना अक्सर बहुत मुश्किल होता है।

सेक्स के बारे में बात करना एक मुश्किल काम लग सकता है और वयस्क लोग ख़ुद ही अपनी चाहतों के बारे में दिल खोलकर बात कैसे करें, ये समझ नहीं पाए हैं। ऐसे में युवा लोगों के साथ सुख के बारे में बात करना तो बिलकुल ही नामुमकिन लगता है।

इसलिए जब मैं सुख-केंद्रित यौनिकता शिक्षा की बात करती हूं, मुझे कई सवालों का सामना करना पड़ता है जो पूछते हैं कि बच्चों और युवा लोगों को यौन सुख के बारे में बताने की ज़रूरत ही क्या है? डर ये रहता है कि “वे आपस में बहुत कुछ करने लगेंगे।” तो क्या हुआ? इसमें दिक्कत क्या है? इसी बात का डर है न, कि उन्हें सेक्स की ‘लत’ लग जाएगी और पढ़ाई जैसी ज़रूरी चीज़ों से उनका ध्यान भटक जाएगा?

ये सोच भी बहुत आम है कि बच्चों और युवा लोगों के साथ सुख की बात करना फ़िज़ूल का काम है और उनसे शोषण और इसके रोकथाम के बारे में बात करना बेहतर होगा क्योंकि ये कहीं ज़्यादा ज़रूरी मुद्दा है। दरअसल सुख को प्राथमिकता देते हुए बात करना इसलिए भी ज़रूरी है कि शोषण एक गंभीर मुद्दा है और लोग इससे पीड़ित हो रहे हैं। सेक्स से जुड़ी शर्म लोगों को अपने साथ हुए यौन शोषण के बारे में बात करने से रोकती है और बच्चों को सुख और व्यक्तिगत सीमाओं के अंतरसंबंधों के बारे में न समझाया जाए तो उनके लिए शोषण, ख़ासकर परिवार के अंदर यौन शोषण को पहचानना मुश्किल हो सकता है।

जब यौन सुख के बारे में बात करने का माहौल ही नहीं बन पाता, युवा लोग अपने शरीर को पहचानने के अलग-अलग तरीक़ों से भी नावाक़िफ़ रह जाते हैं। अगर वे हस्तमैथुन की बात करें भी तो इससे जुड़ी संकोच और नैतिक न्याय-परायणता की भावनाएं उन्हें ये महसूस करातीं हैं कि वे कुछ ग़लत कर रहे हैं। वे अपने हमउम्र लोगों या अभिभावकों से अगर पूछकर देखें तो ही उन्हें पता चलेगा कि ये दरअसल कितनी आम बात है। मगर पूछने की हिम्मत ही कहां से आएगी और सच्चे दिल से जवाब ही कौन देगा? जब तक हम सुख के बारे में बात शुरु न करें, तब तक शर्म, संकोच, और डर पर चर्चा भी बहुत मुश्किल होगी।

बच्चों और युवा लोगों के साथ बातचीत के दौरान मैंने देखा है कि सही जानकारी से ज़्यादा वे मिथकों पर यक़ीन करते हैं। लड़कों में ये माना जाता है कि हस्तमैथुन से स्तंभन दोष (erectile dysfunction) होता है, बाल झड़ जाते हैं, आंखें ख़राब हो जातीं हैं, शुक्राणुओं की संख्या कम हो जाती है, हाथों पर बाल आ जाते हैं, और लिंग छोटा हो जाता है। एक बार मैं किशोरियों से हस्तमैथुन पर बात कर रही थी और जिन लड़कियों ने इस बात से सहमति जताई कि लड़कियां भी हस्तमैथुन करतीं हैं, उन्हें बाक़ी लड़कियों से धिक्कार मिला क्योंकि उनके मुताबिक हस्तमैथुन ‘असंस्कारी’ है। युवा लोगों को जो भी जानकारी मिलती है उस पर शर्म, संकोच, और डर का साया रहता है और इससे उनके ख़ुद के और दूसरों के साथ रिश्ते पर बुरा असर पड़ता है। जब परिवार, स्कूल, और समाज उन्हें सुख-केंद्रित जानकारी पाने से रोकते हैं तो उनके पास पॉर्नोग्राफ़ी देखने के अलावा और कोई चारा नहीं रहता। इस पर भी सरकार ने रोक लगा दी है और ये देखने के लिए उन्हें वीपीएन और प्रॉक्सी सर्वर का सहारा लेना पड़ता है।

सेक्स को लेकर युवा लोगों का एक डर ये रहता है कि क्या वे ‘स्वाभाविक’ हैं? क्या वे जो करते हैं वो ‘स्वाभाविक’ है? मैं कई युवाओं से मिली हूं जिन्हें अपने शरीर से नफ़रत है क्योंकि वो औरों के शरीर से ‘अलग’ है, या जो अपने आप को ‘अजीब’ समझते हैं क्योंकि उन्हें अपने ही जेंडर के लोग पसंद आते हैं, या सभी जेंडरों के, या उन्हें किसी की तरफ़ यौनिक आकर्षण महसूस ही नहीं होता। अपनी ही नज़रों में ‘अजीब’ होना एक बहुत भारी बोझ है जिसे ढोते हुए बड़े होना बिलकुल आसान नहीं है।

इस बोझ को हल्का करने के लिए बच्चों और युवा लोगों से बस इतना ही कहना ज़रूरी है कि, “इट्स ओके!” वे सिर्फ़ यही सुनना चाहते हैं कि वे जो सोचते हैं, महसूस करते हैं, और उनके जो अनुभव हैं वे सब स्वाभाविक हैं। उन्हें बताना ज़रूरी है कि यौन इच्छाएं कोई बुरी चीज़ नहीं हैं जब तक इन्हें पूरी करने में वे किसी को नुकसान न पहुंचा रहे हों। उन्हें ऐसा माहौल दिलाने की भी ज़रूरत है जहां वे इन चीज़ों के बारे में बात करते हुए सुरक्षित ही नहीं बल्कि ‘सेक्सी’ महसूस करें, यानि वे आश्वस्त रहें कि उनके शरीर या उनके ख़्यालों में कोई बुराई नहीं है, कि वे जैसे हैं वैसे ही सुंदर और स्वस्थ हैं। सुख-केंद्रित और यौन-सकारात्मक शिक्षा की यही भूमिका है। ये यौन संबंधों से जुड़ी शर्म को दूर हटाती है और यौनिकता, उसकी अभिव्यक्तियों, और उसके अनुभवों की विविधता को प्राथमिकता देती है। ये ‘स्वाभाविकता’ क्या है इस पर भी सवाल उठाता है क्योंकि इसकी कोई एक परिभाषा नहीं है।

अफ़सोस, इस देश में फ़िलहाल व्यापक यौनिकता शिक्षा की ही कमी है। सुख-केंद्रित, यौन-सकारात्मक शिक्षा तो बहुत दूर की बात है। यौनिकता शिक्षा अगर दी भी जाए तो ये लड़कियों के लिए माहवारी के दौरान स्वच्छता पर ज्ञान तक ही सीमित रहती है, जैसे कि किशोरावस्था के दौरान लड़कों के शरीर में कोई बदलाव ही नहीं आता। कभी-कभी शोषण और संक्रमण से बचाव की शिक्षा भी दी जाती है और मैं ये बिलकुल नहीं कह रही कि ये मुद्दे ज़रूरी नहीं हैं, लेकिन यौनिकता की ओर ये नज़रिया बहुत एकतरफ़ा है। ये एक ऐसा नज़रिया है जो शर्म और डर से उत्पन्न होता है। अगर शिक्षा के ज़रिए बच्चों को ‘ना’ कहना सिखाना ज़रूरी है तो उतना ही ज़रूरी है उन्हें ‘हां’ या ‘शायद’ कहना सिखाना।

सुख को हां कहना ख़तरे को ना कहना जितना ही ज़रूरी है। सिर्फ़ ख़तरे के बारे में सिखाने और सुख को नकार देने का नतीजा अल्पज्ञान होता है। टीचिंग प्लेज़र ऐंड डेंजर इन सेक्शूऐलिटी एजुकेशन[1] नाम का ये शोधपत्र कहता है कि सुख और ख़तरे को इस तरह अलग कर देना “युवा लोगों को ऐसे माहौल से वंचित करता है जहां वे रज़ामंदी के बारे में सीख सकें, अपने साथी से यौन इच्छाओं और सीमाओं के बारे में कैसे बात की जाती है ये जान सकें, समझ सकें कि सुख को स्वीकार करने के साथ-साथ ख़तरे से बचाव कैसे किया जा सकता है, और यौनिकता और यौनिक रिश्तों के अंतर्गत जितनी जटिलताएं और विविधताएं हैं उन्हें पहचान सकें।” सुख के बारे में बात करने से रज़ामंदी के बारे में एक परिपूर्ण समझ भी तैयार होती है और ये पता चलता है कि हर किसी की इच्छाएं अनोखी हैं और ये हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं, इसलिए आपस में खुलकर बातचीत करते रहना बहुत ज़रूरी है ताकि सेक्स का अनुभव सभी के लिए सुखदायी हो।

यौन-सकारात्मक शिक्षा की प्रभावशीलता को दर्शाने के लिए कई अध्ययन किए गए हैं। उनमें से एक है यंग पीप्ल ऐंड सेक्शुअल प्लेज़र一वेयर आर वी नाओ?[2] नाम का शोधपत्र जो कहता है, “यौनिकता शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों के अंतर्गत सुख की बात करना कई सकारात्मक नतीजों से जुड़ा है जैसे – यौनिक समुदायों में यौनिकता को लेकर खुली चर्चा, विविध यौनिक पहचानों और क्रियाओं के बारे में जागरूकता, नारीवादी दृष्टिकोण की उत्पत्ति, कॉंडम और परिवार नियोजन के अन्य उपायों के व्यवहार में बढ़ाव, शारीरिक यौन प्रतिक्रियाओं के बारे में बेहतर ज्ञान, और ख़ासतौर पर युवा औरतों के लिए शारीरिक सशक्तिकरण और स्वायत्तता का अनुभव।”

जब हम अपनी असहजता और पूर्वाग्रहों को दूर रखते हुए युवा लोगों से इन मुद्दों पर बात करना शुरु करेंगे, हम ज़िम्मेदारी से सेक्स का आनंद लेने के तरीक़ों को बढ़ावा दे सकेंगे, यौनिकता शिक्षा के लिए ‘एथिकल पॉर्नोग्राफ़ी’ का इस्तेमाल कर सकेंगे, और एक ऐसा सामाजिक माहौल बना पाएंगे जो यौनिक संदर्भ में एक-दूसरे की सीमाओं की इज़्ज़त पर आधारित हो।

मैं एक यौनिकता प्रशिक्षक हूं जो यौन-सकारात्मक शिक्षा में विश्वास रखती है और इसे लागू भी करती है। हर सेशन के बाद बच्चों और युवा लोगों की बातें सुनने से मेरा दिल ख़ुशी से भर उठता है। मैं देखती हूं कि उन्हें अपनी यौनिकता को लेकर जो शर्म थी उससे उन्हें कैसे राहत मिलती है, वे किस तरह अपने शरीर और सुख के बारे में एक बेहतर, सकारात्मक समझ बना पाते हैं, कैसे उनका आत्मविश्वास बढ़ जाता है ये जानकर कि उनकी यौनिक पहचान और अभिव्यक्ति की वजह से कोई उनकी आलोचना नहीं कर रहा, कैसे उन्हें बिना संकोच के अपने अनुभव साझा करने में सुकून महसूस होता है, और वे किस तरह अपने यौनिक अधिकारों के बारे में जागरूक होने के बाद सशक्त महसूस करते हैं। यही मेरे काम को सार्थक बनाता है।

रम्या आनंद तारशी के क्षमता निर्माण, जनसंपर्क योजनाओं, कार्यक्रम संरचना और कार्यान्वयन पर काम करतीं हैं। वे यौनिकता से जुड़े मुद्दों पर आत्मस्वीकृति पर आधारित कॉन्टेन्ट बनाने में रुचि रखतीं हैं। उन्हें लोगों से मिलना और कुत्तों के साथ खेलना अच्छा लगता है। वे सैर करने के सपने देखतीं हैं और उन्हें तरह-तरह का खाना बनाने का शौक़ है।

ईशा द्वारा अनुवादित।
To read the original article in English, click here.


[1] वैनेसा कैमेरन-लूइस एवं लूइसा ऐलेन (2013)। टीचिंग प्लेज़र ऐंड डेंजर इन सेक्शूऐलिटी एजुकेशन। सेक्स एजुकेशन, 13:2, 121-132. 

[2] एस्टर मैकगीने एवं मैरी जेन केहिली (2016)। यंग पीप्ल ऐंड सेक्शुअल प्लेज़र – वेयर आर वी नाओ? सेक्स एजुकेशन, 16:3, 235-239. 

कवर इमेज: Image by Ronny Overhate from Pixabay