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इन्टरनेट पर परिवार और यौनिकता : एक रिव्यु  

यह मेरी इन्टरनेट पर भारतीय परिवारों द्वारा और ‘परिवार और यौनिकता’ विषय पर पोस्ट की जाने वाली सामग्री को पढ़ कर इस विषय पर चल रही लोक-चर्चा की समीक्षा करने की कोशिश है। मुझे ऐसा लगता है कि इन्टरनेट पर, जहाँ हर विषय पर असीमित जानकारी उपलब्ध रहती है, वहाँ इस चर्चा के बारे में खोज कर उसकी समीक्षा कर पाना भी सरल ही होगा। मैं गूगल सर्च इंजन में ‘भारत में परिवार और यौनिकिता’ टाइप कर सामग्री ढूँढने की कोशिश करती हूँ। मेरे आश्चर्य की तब सीमा नहीं रहती जब इस विषय पर मुझे कुछ भी लिखा दिखाई नहीं देता।

‘परिवार’ और ‘यौनिकिता’ शब्द एक साथ लिख कर खोजने पर गूगल पर कुछ दिखाई नहीं देता। हालांकि यहाँ ‘बाल यौन शोषण’, ‘किशोर एवं यौनिकता’, ‘यौन साथी की अदला-बदली करने वाले दम्पति’ और ‘ऐतिहासिक काल से संस्कृतियों में यौनिकता’ जैसे विषयों पर अनेक अकादमिक अध्यनन दिखाई पड़ते हैं। थोड़ा और ढूँढने पर किसी व्यक्ति की यौनिकता के विभिन्न पहलुओं और उन व्यक्ति के अपने परिवार और दुनिया के साथ संबंधों पर कुछ फिल्में भी दिखाई पड़ती हैं। संभव है कि कुछ पुस्तकों की जानकारी भी यहाँ हो।

ऐसा प्रतीत होता है कि यौनिकिता या तो बहुत ही अकादमिक विषय है या फिर पूरी तरह से प्राकृतिक और अनियंत्रित और संभवत: अत्यंत व्यक्तिगत और निजी भी। परिवार का सम्बन्ध समाज, मूल्यों और सब के बीच साझा की जाने वाली वस्तुओं, विचारों और संसाधनों से है। परिवार एक बहुत ही सुरक्षित प्रतीत होने वाला शब्द है जबकि यौनिकता एक भयभीत करने वाला शब्द लगता है। सबसे सुरक्षित शब्द तो ‘माता-पिता’ और ‘परवरिश’ लगते हैं। ‘भारत में परवरिश’ और ‘भारतीय माता-पिता का ब्लॉग’ जैसे विषय पर खोज करने पर मेरी किस्मत ने साथ दिया और मुझे काफ़ी सामग्री दिखाई दी।

मैंने पाया कि सार्वजनिक चर्चा में ‘परवरिश’ से संबंधित लेखों में अब ‘अपनी बेटी को मासिक शुरू होने से पहले मासिक धर्म के बारे में बताएँ’ जैसे विषय भी शामिल हो गए हैं। समाचार सेवाओं के लिए लिंक की लिस्ट में मुझे स्कूल में पढ़ने वाले लड़के और लड़कियों के बीच तुलनात्मक विश्लेषण भी देखने को मिला जिसमें इन समूहों में भावनात्मक समस्याएँ होने की सम्भावना या आशंका की तुलना की गयी थी। इस लेख से लगा कि लड़कियों में भावनात्मक उलझनें होने की अधिक सम्भावना थी। लेकिन इसके जो कारण लेख में बताए गए थे उन्हें समझ पाना भूसे के ढेर में सुई तलाश करने जैसा था – ‘इसके पीछे यह कारण हो सकता है कि लड़कियों के मन में उस शारीरिक सौष्ठव को पाने की लालसा बहुत अधिक होती है जो सोशल मीडिया द्वारा निर्मित है और युवा महिलाओं में सेक्स या यौनिकता के प्रति बढ़ती जागरूकता का कारण होती है’। यह लेख बीबीसी द्वारा किया गया एक अध्यनन था जिसके बारे में द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के ‘पेरेन्टिंग’ भाग में रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। इस रिपोर्ट को यहाँ पढ़ा जा सकता है

परिवार और यौनिकता जैसे विषयों पर जानकारी के ये अनमोल रत्न आपको स्कूल, परीक्षा या पोषण जैसे विषयों पर लिखी जा रही जानकारी में छिपे मिल जाएंगे। इसके लिए आपको बहुत ही कुशलता और धैर्य से खोज करते रहना होगा। ‘परिवार’ और ‘यौनिकता’ जैसे शब्दों के बीच कोई सीधा संपर्क सूत्र आपको संभवत: न मिल सके, शायद इसलिए क्योंकि ये दोनों एक ही मूल से नहीं हैं। क्या इन्टरनेट की आभासी दुनिया में जो जानकारी है वह वास्तविक दुनिया की सच्चाई दर्शाती है?

वास्तविक दुनिया में तो हम परिवार, स्कूल, तनाव, पोषण, छुट्टियों की योजना, प्रजनन स्वास्थ्य, गर्भनियोजन, करियर, माता-पिता व् बच्चों के सम्बन्ध जैसी जीवन की अनेक महत्वपूर्ण गतिविधियों और मुद्दों पर बहुत सा समय और उर्जा व्यय करते हैं। परिवार आपस में चर्चा कर, मशवरा कर इन विषयों पर फैसले लेते हैं। मैं बहुत से वेब-लिंक क्लिक किए और उनमें मुझे ये सब विषय दिखाई दिए:

पेरेंट्स इंडिया पर एक सामुदायिक मंच उपलब्ध करवाया गया है जहाँ माता-पिता बालों को होने वाले नुक्सान सहित अनेक विषयों पर चर्चा करते हैं। इसमें कार्यस्थल पर अनिवार्यत: पालना घर (क्रेच) सुविधा उपलब्ध कराने की याचिका के लिए लिंक दिया गया है, और डाक-टिकटों के संग्रह के बारे में भी कुछ जानकारी उपलब्ध है।

व्यायाम करने का महत्व,

वज़न कम करना,

जीवन में दादा-दादी, नाना-नानी का महत्व,

खेलों के द्वारा पिता-पुत्र में जुड़ाव,

बच्चों के कमरे की साज-सज्जा….

… और इसके अलावा कपड़े के बने पैड के विज्ञापन जैसा भी एक लेख है जिस पर किसी ने कोई टिपण्णी नहीं की थी …

घिसे-पिटे वक्तव्यों द्वारा जेंडर भूमिकाओं को सदृढ़ करते हुए यहाँ ‘अपने पति से सीखने योग्य परवरिश के तरीके’ विषय पर एक लेख भी है। इसमें पहले से जानी-समझी बातों को दोहराया गया है जैसे कि माँ ज़रुरत से ज़्यादा सुरक्षा को लेकर फिक्रमंद होती है, पिता अपने बच्चों को जोखिम उठाने देते हैं, और जैसे कि ‘पिता को अपने बच्चों के साथ मस्ती करना ज़्यादा पसंद होता है बजाय यह चिंता करने के कि खाना बना है या नहीं या फिर कपड़े प्रेस हुए हैं या नहीं’।

इस लेख को पढ़ने के तुरंत बाद मुझे न्यू ऐज मॉम नाम से एक दुसरे भाग के लिए लिंक दिखाई दिया जो किसी अन्य लेख के भीतर कहीं छुपा हुआ था। इसमें लिखा था …बैंकर नेहा त्यागी का मानना है… अपने बच्चे के साथ कड़ा अनुशासन बरतने के बेहतर है कि आप अपने बच्चे की मित्र बनें”। “मुझे ख़ुशी है कि मेरी 10 वर्षीय बेटी मेरे साथ हर बात शेयर करती है, भले ही यह अपनी क्लास के किसी साथी को आकर्षक पाने के बारे में बताना हो। इस तरह से मेरे लिए इस मित्रवत बातचीत द्वारा उस पर निगाह रख पाना आसान हो जाता है”।  

आकर्षक! पारिवारिक बातचीत के लिए यह एक बहुत बढ़िया और सुरक्षित शब्द है लेकिन गर्भधारण, माहवारी, सेनेटरी पैड, गर्भनिरोध आदि नहीं। यहाँ इन्टरनेट की आभासीय दुनिया में एक 10 वर्षीय लड़की की माँ अपनी बेटी के साथ उसकी क्लास में आकर्षक दिखने वाले साथी के बारे में चर्चा कर रही है। इस विषय पर बहुत कुछ या सब कुछ नहीं दिया गया, लेकिन मैं हर छोटी से छोटी बात को भी देख रही हूँ।

अब मैं भारतीय परवरिश के वेबसाइट और ब्लॉग पर जाती हूँ जो यहाँ उपलब्ध है। ‘परवरिश के बारे में 10 मुख्य मिथक’ नाम से दिए गए एक लेख में मुझे पहचान के बारे में एक पैराग्राफ दिखाई पड़ता है। पहचान शब्द देखते ही मेरी अंगुलियाँ पेज को तेज़ी से नीचे स्क्रॉल करने लगती हैं। यहाँ लिखा है, ‘मैंने बहुत से माँ-बाप को देखा है कि वे अपने बच्चों को पहचान के बारे में समझाना शुरू करते हैं और उनके लिए दीवारें खड़ी कर देते हैं। आमतौर पर ये पहचान धर्म, राष्ट्र या जाति की होती हैं। उन्हें बताया जाता है कि तुम इस पहचान के हो।“’ ओह, यह तो बहुत करीबी मामला था, लेकिन अभी भी उस पहचान की बात नहीं हुई है। हम थोड़ा सा ही दूर रह गए।

रिवो किड्स बच्चों और माता-पिता के लिए एक वेबसाइट है। साईट पर अन्य भागों के अलावा ‘स्वास्थय और सुरक्षा’ विषय पर भी जानकारी दी गयी है। बच्चों की सुरक्षा के बारे में पुछा गया एक प्रश्न था, “घर के बाहर सुरक्षा : मेरी 13 वर्ष की एक बेटी है। जब भी वो अकेली कार में जाती है तो मुझे बहुत चिंता होती है। क्या आप सुरक्षा के बारे में मुझे कुछ टिप्स दे सकते हैं जो मैं उसे बता सकूं और उसे जानकार बना सकूं”?

हालांकि यह सवाल अपने आप में अधूरा और चिंता भरा लगता है, लेकिन इसके दिए गए इस उत्तर से लगा मानो बच्चे को जानकार बनाने के सवाल को तो अनदेखा ही कर दिया गया : “सेफ्टीकार्ट जल्दी ही एक नया उपकरण बाज़ार में ला रहा है जिसमें जीपीएस सुविधा है। आप उसे अपने बच्चे के बैग में रख सकती हैं और अपने स्मार्ट फ़ोन द्वारा उसके आने-जाने का पता लगा सकती हैं। यह तब और भी सहायक हो सकता है जब आप अपने बच्चे के हाथ में स्मार्टफ़ोन न देना चाहती हों”।

अब यहाँ जो कि एक परिवार के लिए बनी वेबसाइट पर पारिवारिक चर्चा का अच्छा अवसर हो सकता था वो खिसक कर यौनिकता के धुंधले माहौल में चला गया और उसका हल मिला टेक्नोलॉजी के माध्यम से। चलिए अब जल्दी से चल कर वह जीपीएस खरीद ही लें।

पैरेंटट्यून की वेबसाइट पर पैरेंट टॉक में ‘मूल्यों या नैतिकता’ पर भी एक भाग है। इसे क्लिक करने पर आप स्कूलों के बारे में की जा रही बातचीत पर पहुँच जाते हैं।

तो चलिए अब चलते हैं ‘नेट पर माता-पिता के समुदायों’ की ओर जो यहाँ उपलब्ध है। यहाँ तो मानो मेरे हाथ सोने का खजाना लग जाता है। सबसे पहले मैं सुनीता रजवाड़े द्वारा लिखी गयी कहानी ‘टॉय स्टोरी’ पढ़ती हूँ। सुनीता रजवाड़े एक माँ भी हैं और दादी भी और टॉय स्टोरी कहानी में उनके अनुभव बताए गए हैं कि किस तरह घिसी-पिटी और देखी-भाली जेंडर मान्यताओं को पूरा करने वाले खिलौने बच्चों के लिए अपर्याप्त रहते हैं। वे लिखती हैं कि किस तरह उनका पोता खिलौनों की बजाय घर के मिक्सर और ग्राइंडर से खेलता है। वे कहती हैं, ‘जब हम सब उसके खिलौनों के ब्लॉक्स से बिल्डिंग बना रहे होते हैं या उसकी कारों को ऊपर नीचे भगा रहे होते हैं तब वह जोर-जोर से ‘गाआआआआआआआ…’ जैसी मिक्सर की आवाज़ निकालता है जैसे कि वह मेरे असली मिक्सर में अपना काल्पनिक खाद्ध पदार्थ पीस रहा हो’।

मुझे नैंसी शर्मा द्वारा ब्लॉग पर लिखा गया लेख ‘तीन चीज़ें जो वह अपनी बेटी को नहीं सिखाएगी’ पढ़कर अच्छा लगा। इनमें से एक चीज़ है वे निषिद्ध बातें जो माहवारी के साथ जुड़ी हैं। वे लिखती हैं, “मैं नहीं चाहती कि वो मंदिर के बाहर केवल इसलिए खड़ी रहे क्योंकि उसे माहवारी हो रही है। मैं चाहती हूँ कि वो इसे माने कि महीने-दर-महीने मासिक आना हर महिला के लिए सामान्य और स्वास्थ्यकारी है। और इन दिनों वो जो चाहे काम कर सकती हैं।“

जेंडर स्टीरियो-टाइपिंग विषय पर गौरी वेंकिटारमण लिखते हुए कहती हैं, “आजकल हर एक को ऐसा महिला शरीर पसंद है जिसमें उभरा हुआ वक्ष हो, स्तनों के बीच का अंतराल दीखता हो, जाँघों में दूरी हो, और भी न जाने क्या-क्या। वहीँ दूसरी ओर 6 पैक, 8 पैक या और भी अधिक वाले मांसल सीने, बाजूओं, जांधों और हर जगह से उभरती दिखती मांसपेशि युक्त पुरुष शरीर की छवि भी दिखती है। ऐसे महिला और पुरुषों को स्त्रीत्व और पुरुषत्व की पराकाष्ठा कहा जाता है। हमें तो मकादामिया और पेकैन्न से स्त्रीत्व और पुरुषत्व के उनके दृष्टिकोण के बारे में बात करके बहुत मदद मिली है कि उनके विचार में स्त्रीत्व और पुरुषत्व को परिभाषित करने वाली विशेषताएं कौन सी होती हैं?” (मकादामिया और पेकैन्न उनके बेटों के नाम हैं

नेट पर इस सामग्री की समीक्षा करते हुए मुझे माताओं और दादी-नानी द्वारा लिखे गए विचारों को पढ़ कर बहुत ख़ुशी होती है। मुझे लगता है कि उनके ये विचार हमारे परिवारों में घट रहे उस परिवर्तन के सूचक हैं जिसके बारे में शायद अभी तक हम अनभिज्ञ हैं।

लेकिन फिर भी हैरानी होती है कि ‘परिवार’ या ‘परिवार और यौनिकता’ विषय पर बहुत कम सामग्री उपलब्ध है। आखिर परिवार क्या है? क्या माता-पिता द्वारा परवरिश किए जाने का ही दूसरा नाम परिवार है? क्या एक घर में साथ रहने वाले लोग, या आपस में सम्बन्ध रखने वाले लोग, या एक छत के नीचे रहने वाले लोग, या बिना संतान वाले शादीशुदा लोग परिवार नहीं हैं, क्या वे एक महत्वपूर्ण एकजुट समूह नहीं हैं? उन्हें तो कोई भी कुछ भी बेचने का प्रयत्न करता दिखाई नहीं पड़ता। कोई उनके पोषण की आवश्यकताओं, छुट्टियाँ बिताने की योजना, करियर के फैसलों पर बात करता नहीं दिखता। पर नहीं, जब जबोंग का ‘बी यू’ विज्ञापन परिवार की बजाय प्रेम और रोमांस की नज़र से इस ओर देखता है तो यह नृत्य का एक स्टेप बन जाता है।

अगर हमारे यहाँ परिवार के बारे में संकल्पना ना के बराबर या बहुत कम है तो हम परिवार और यौनिकता पर बातचीत या चर्चा कैसे शुर करें? परिवार की अवधारणा पर फिर से विचार करने की ज़रुरत है और यौनिकता पर तो बहुत ज़्यादा सोच-विचार किया जाना होगा। हमें इन दोनों अवधारणाओं को साथ लाना ही होगा। हमें यह समझना ही होगा कि परिवार और यौनिकता कैसे एक दुसरे पर प्रभाव डालते है, क्योंकि प्रभाव तो निश्चित रूप से होता ही है। हमें ज़रुरत है कि हम इस विषय पर, वास्तविक दुनिया में और इन्टरनेट की आभासीय दुनिया के पटल पर, दोनों जगह चर्चा करें।

सोमेन्द्र कुमार द्वारा अनुवादित

To read this article in English, please click here.

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Reads, writes, does Sudoku, grows plants and walks with dogs as a reasonable option to running with wolves. Is a consultant with TARSHI, focusing on health, disability, gender and rights issues. A post-graduate from XLRI, graduated from Hindu college, Delhi University.

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