A digital magazine on sexuality, based in the Global South: We are working towards cultivating safe, inclusive, and self-affirming spaces in which all individuals can express themselves without fear, judgement or shame
हिन्दी

मैंने भारत में 1 वर्ष बिताया और असहज सी रही! 

Annie McCarthy

मेरे लिए हैरानी की बात यह है कि मुझे कुर्तियाँ पहनने में उतनी घबराहट कभी नहीं हुई जितनी कि मुझे तब होने लगती है जब मुझे अपने कपड़ों की अलमारी में टंगे हुए किन्ही खास मौकों (आम तौर पर मेरी माँ इसका फैसला लेती हैं) पर पहने जाने वाले महिला परिधानों को पहनने के लिए कहा जाता है। बाकी आम दिनों में मैं पुरुषो से संभंधित जो पहनावा जाना जाता है वैसे कपड़े पहनना पसंद करती हूँ। अपने देश ऑस्ट्रेलिया की बजाए यहाँ भारत में ‘महिला परिधान’ पहनने को लेकर मेरी चिंता कुछ हद तक इसलिए कम हो गई थी क्योंकि मैं जानती थी कि मैं कितनी भी कोशिश कर लूँ, मैं यहाँ फिट नहीं हो पाउंगी। एक विदेशी होने के कारण, भारत में मेरे जेंडर और यौनिकता से ज़्यादा सरोकार मेरे विदेशी दिखने पर था, और यह मेरे लिए एक तरह से बहुत तसल्ली देने वाली बात थी लेकिन मैं इसके बारे में सोचकर बहुत परेशान भी होती थी।      

भारत में आने के बाद मुझे अपने खुद के उन विचारो और समझ के बोझ से बहुत हद तक राहत मिली थी कि ‘सही मायने’ में लड़कियों की तरह रहना कैसा होता है; मेरे देश में लड़कियों के ‘सही मायने’ में लड़कियों की तरह व्यवहार न करने को अक्सर विफलता की निशानी समझा जाता है। मुझे यह भावना मेरे साथ जीवन भर के लिए जुड़ चुकी इसलिए लगती थी क्योंकि मैं खुद पर एक महिला की बजाए ‘ट्रांस’ होने का लेबल लगाए जाने से बचना चाहती थी क्योंकि मैं जानती थी कि ट्रांस के लेबल से भी मैं बहुत सहज नहीं हो पाऊँगी। 

हालांकि दिल्ली आने के बाद, मेरे जीवन में पहली बार ऐसा हुआ कि मेरे जेंडर का महत्व मेरी नस्ल के मुक़ाबले कम हो गया, और मेरे श्वेत होने को अधिक महत्व मिलने लगा। यहाँ मैंने वो सब अनुभव किया जो मैं अपने देश में नहीं कर पाई थी। वहाँ मेरे विशेषाधिकारों वाले श्वेत वर्ग (भले ही यह दर्जा अश्वेत लोगों की सामूहिक हत्याओं के कारण मिला हो) के होने का कोई विशेष महत्व नहीं था या मेरी नस्ल लगभग अदृश्य ही थी। यहाँ भारत में मेरी श्वेत त्वचा ही बहुत अधिक महत्व रखती थी (मैं इसपर किस तरह के कपड़े पहनती हूँ, यह ज़्यादा महत्व नहीं रखता था), और कम से कम शुरुआती दिनों में तो मैंने यह समझना शुरू कर ही दिया कि समलैंगिक होने की मेरी यौनिक पहचान अगर लोगों पर उजागर हो भी गई तो शायद मेरे विदेशी होने के कारण इस पर किसी का ज़्यादा ध्यान नहीं जाएगा।  

और विदेशी लोग तो वैसे भी मूल निवासियों के लिए हमेशा कौतूहल का विषय होते ही हैं, है ना? यह बहुत स्वाभाविक ही था कि अपने देश, अपने घर से बहुत दूर यहाँ मुझे परायापन महसूस हो। और ऐसा हुआ भी लेकिन इसके कारण मुझे कभी भी वैसा संकोच नहीं लगा जैसा मुझे ऑस्ट्रेलिया में रहते हुए लगता था। वहाँ अपने मन में मुझे कहीं न कहीं यह दबाब महसूस होता था कि जैसे-तैसे करके मुझे खुद को दूसरों के अनुरूप बनाना ही है। फिर भी, बहुत सी आंटियों और मेरे दोस्तों के अनेक बार कोशिश कर लेने के बाद मुझे नहीं लगता कि मैं यह समझ पाई थी कि उस समय मैं यहाँ कितनी अलग और अजनबी और विचित्र लगती हूँ। इसकी एक वजह यह थी कि भले ही मैं रोज़ कुर्ती पहनती थी, लेकिन फिर भी मुझे कुर्ती को पहनने के ‘नियम’ शायद समझ नहीं आ पाए थे। मैं लगभग हर रोज़ कुर्ती के ऊपर पहने जाने वाले दुपट्टे को घर पर ही भूल जाती थी। मेरी सलवार या चूड़ीदार पायजामी मेरे कूल्हों पर इतनी नीचे बंधी होती थी कि दूसरी आंटियाँ हमेशा इन्हें ऊपर की ओर खींचती ही रहती थी। रोयें वाली मेरी बाजुओं और टांगों पर अजनबी लोग भी हाथ लगा कर देखते या फिर कोई टिप्पणी कर देते। लेकिन जैसे अपने देश, अपने घर में मुझे इन बातों से कुछ फर्क नहीं पड़ता था, या कुछ ‘समझ नहीं आता’ था, यहाँ भी मुझे कुछ पता नहीं चलता था।    

कभी-कभी मैं जब आईने में अपने लंबे बालों, (अपने लंबे बाल 6 महीनों तक बढ़ाते रहने के बाद एक दिन मैंने दुखी होकर तब काट दिए जब मेरी उस समय की पार्टनर नें मुझे अपने ऑस्ट्रेलिया वापिस लौटने की खबर सुनाई) चटक रंगीन कपड़ों और अलग तरह के जूतों को देखती, तो अक्सर आईने में मुझे ‘मैं’ नहीं दिखाई देती थी। लेकिन मुझे इससे कोई ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता था; क्योंकि मैं तो सिर्फ दिल्ली में एक ऐनथ्रोपोलोजिस्ट के रूप में अपना शोध कार्य करने के लिए आई थी। मैं चाहती थी कि मैं लोगों को सुनूँ और उनके बारे में सीखूँ। मैं खुद को लोगों के सामने इस तरह से प्रस्तुत करना चाहती थी जो मेरे सुनने और सीखने के उद्देश्य प्रस्तुत करने में सहायक हो सके। मैं हमेशा खुद से कहती, “यह मेरे बारे में नहीं है” और मैं सही भी थी और गलत भी। 

मुझे सबसे ज़्यादा असहज उस समय लगता था जब मैं क्वीयर लोगों के बीच होती, यहाँ मेरे अजनबी होते हुए भी या अपनी जेंडर/पहचान को अभिव्यक्त न कर पाने में भी लोग बड़ी ही गर्मजोशी से मेरा स्वागत करते। मैंने पहनने के लिए कुछ कमीज़ें और पैंटें खरीद ली थीं, लेकिन मेरे लंबे बाल हमेशा ही लड़कियों जैसे ही दिखते थे। यहाँ का मौसम भी ऑस्ट्रेलिया के मुक़ाबले ज़्यादा गरम था, और हर चीज़ के ‘नियम’ इतने विचित्र कि मुझे कभी कुछ समझ नहीं आया। या फिर चूंकि किसी नें शायद मेरी असहजता को नोट नहीं किया, लेकिन फिर भी यही कहना सही होगा कि मैं कभी भी सहज महसूस नहीं कर पाई।     

आज भी यहाँ ऑस्ट्रेलिया में मेरे घर में एक ड्रॉअर है जिसे मैं कभी नहीं खोलती। (मुझे पता नहीं पर लगता है कि अपने देश में इन कपड़ों को पहनना शायद सांस्कृतिक विनियोग करने जैसा होगा जबकि यही अगर भारत में किया जाए तो शायद आप वहाँ के अनुरूप बनने की कोशिश कर रहे होंगे) इस दराज में मैं अपने ‘भारतीय परिधानों’ को बिलकुल उसी तरह से सहेज कर रखती हूँ जैसे मैं कभी बचपन में अपनी स्कूल की यूनिफ़ार्म को रखती थी। 

भारत में अपने शोध कार्य में मैंने यह जानने की कोशिश की थी कि स्थानीय गैर सरकारी संगठनों द्वारा स्लम बस्तियों में रहने वाले बच्चों को ‘विकसित’ करने की कोशिश को किस तरह से स्लम के ये बच्चे चुनौती देते हैं। वापिस आने से पहले यहाँ स्लम की लड़कियों के साथ अपनी विदाई के दौरान बातचीत में बहुत सी लड़कियों नें मुझसे कहा कि मैं ‘पक्का प्रॉमिस’ करूँ कि मैं अपने बाल लंबे करूंगी, शादी कर लूँगी और खूबसूरत दिखूंगी। मैं जानती थी कि यह सब करना मेरे लिए असंभव होगा, लेकिन फिर यह सोचकर कि अपने घर पर भी मेरे लिए अपने परिवार वालों को यह समझा पाना कितना मुश्किल होता था कि मैं ऐसा क्यों नहीं कर सकती, मैंने इन लड़कियों की बात को तुरंत मान लिया और ‘पक्का’ वादा कर लिया। ‘पक्का’, अपने सिर को हिलाते हुए मैंने इन लड़कियों को जवाब दिया था। एक सप्ताह बाद, ऑस्ट्रेलिया वापस पहुँच कर मैंने अपने बाल काट लिए। तब से मेरे ये बाल छोटे ही हैं, केवल कुछ समय के लिए मैंने इन्हें बढ़ाया था और ये ‘Early Beatles’ के दिनों वाली लंबाई से ‘Jim Morrison from The Doors’ वाले दिनों जितने लंबे हो गए थे।  

मैं दोबारा फिर से भारत वापस नहीं गई हूँ। अगर आप मुझसे पूछेंगे कि मुझे वहाँ जाने से कौन सी बात रोकती है, तो मैं कहूँगी, ‘मेरे बाल’, और मेरा यह कहना पूरी तरह से झूठ भी नहीं होगा। 

अगर मैं अपने बालों को लंबा करने लगूँ तो ये फिर से बढ़ जाएँगे, लेकिन उन बच्चों से, जिन्होने मेरे वादे पर यकीन किया और जिनके जीवन को आधार बना कर मैं अपना शैक्षिक करियर बना रही हूँ, बोले गए अपने झूठ के कारण मुझे बहुत ज़्यादा कठिनाई होती है। 

कभी-कभी जब मैं इस तरह से झूठ बोलने के अपने बोझ को कम करने की कोशिश करती हूँ, तब मैं खुद को उन लोगों की कहानी सुना देती हूँ जो जानते थे कि मैं झूठ बोल रही हूँ। ये कहानियाँ होती हैं उत्तरकाशी के बाहर एक छोटे से गाँव की उस औरत की, जिसके मेरे शादी न करने के कारण के पूछने पर उत्तर में मैंने कहा था कि मुझे पुरुष पसंद नहीं हैं। इस पर उसने मुझसे वो पूछा जो और किसी ने नहीं पूछा, कि क्या मुझे औरतें पसंद हैं? मैंने तुरंत उत्तर दिया था, “हाँ”। “मुझे भी”, उस महिला नें कहा और वो मुझे एक कहानी बताने लगी, लंबी और दर्दभरी कहानी।  

ये कहानियाँ होती हैं मेरे उस पसंदीदा लड़के (हम ऐन्थ्रोपोलोजिस्ट्स को हालांकि इस तरह से पसंद नहीं बनानी चाहिए) की, जो उम्र में तो 16 बरस का था लेकिन जिसने धीरे से कमरे में आकार मुझे अपने चित्र दिखाएँ थे, और मुझे दिखाया था कि कैसे दूसरे लड़के उसे छेड़ते और परेशान करते थे। 

उस रिक्शा चलाने वाले की कहानी जिसने मुझे एक सुंदर महिला को सराहते हुए देख लिया था। फिर यह सोचकर कि मैंने भी यह जान लिया है कि उसनें मुझे देख लिया है, या फिर इस डर से कि वो मुझे देखते हुए पकड़ा गया था, उसनें रिक्शा पर लगे आईने से मुझे देखते हुए सिर हिलाकर बस इतना ही कहा, “बहुत अच्छी लड़की है न?” 

या फिर कहानी उस व्यक्ति की जिससे मेरी कभी बात नहीं हुई, जिसके जेंडर और यौनिक पहचान के बारे में मुझे कुछ नहीं पता, लेकिन जिसके साथ एक दूसरे को पहचान पाने के 2 क्षण मैंने बिताए थे। एक दिन मेरे घर के पास के सबवे से गुज़रते हुए एक व्यक्ति बराबर से गुज़रा जो मुझे ऐसा लगा कि मेरे जैसा ही था, दिखने में नहीं बल्कि जैसा मैं महसूस करती हूँ, वैसा। हम एक दूसरे की बगल से निकले तो दोनों नें बहुत ध्यान से एक दूसरे को देखा; भीड़ में एक दूसरे के कंधो के छू जाने पर दोनों पूरे तीन कदम चलकर वापिस पलटे और फिर एक दूसरे को देखा। एक पल के लिए हम दोनों की नज़रें मिली रहीं और फिर हम अपनी-अपनी दिशा में वापिस मुड़ गए। हमारी कोई बात नहीं हुई, बात करने की कोई ज़रूरत ही हमें महसूस नहीं हुई थी। 

लेखिका – Annie McCarthy

Annie McCarthy ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी में पीएचडी की छात्रा हैं। इन्होने ऐन्थ्रोपोलोजी में पीएचडी के शोधकार्य के दौरान दिल्ली में एक वर्ष बिताया और यहाँ रहते हुए अनेक सुखद यादें संजोई और यहाँ के नए परिप्रेक्ष्य में जेंडर और यौनिकता से जुड़े व्यवहारों को लेकर अनेक गलतियाँ भी कीं।

सोमेंद्र कुमार द्वारा अनुवादित।

To read this article in English, click here.

Images courtesy the author.

Article written by:

TARSHI supports and enables people's control and agency over their sexual and reproductive health and wellbeing through information dissemination, knowledge and perspective building within a human rights framework.

x