हिन्दी
क्या वादे समय के साथ बदलते हैं? और क्या वे सच्चे बने रहते हैं?
हमसे समुदाय बनाने और नारीवादी जगहों में किसी भी तरह का सामूहिक प्रयास करने को लेकर सबसे बड़ा झूठ यह कहा गया है कि उसके सभी सदस्यों का एकमत होना ज़रूरी है।
प्रतिबद्धता केवल किसी रिश्ते में बने रहने का वादा नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति ज़िम्मेदारी, विश्वास और सम्मान निभाने का निरंतर प्रयास है
हमें एक ऐसी डिजिटल दुनिया चाहिए जहाँ जानकारी डर नहीं बल्कि समझ पैदा करे
आज इंटरनेट और सोशल मीडिया हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। हम इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप और यूट्यूब के…
वैकल्पिक मीडिया (या यूँ कहें, ऑनलाइन मीडिया) और सोशल मीडिया सक्रियता के शक्तिशाली माध्यम बन गए हैं
हम अपने “स्वयं” को सीधे-सीधे नहीं समझते, बल्कि उसे शब्दों के माध्यम से पहचानते हैं
मैं एक साथ वही सब कुछ हो सकती हूँ जो मैं बनना चाहूँ, और मेरी संभावनाएँ असीमित हैं
हमारा ‘स्वयं’ यानी हम जो हैं, वह बहुत सारी चीज़ों से मिलकर बना होता है। इसमें हमारा शरीर, हमारा मन, हमारी सोच, हमारी भावनाएँ और हमारे अनुभव शामिल होते हैं।
डिजिटल रिश्तों में एसेक्सुअल लोगों को सबसे ज़्यादा संघर्ष अपनी सीमाओं को लेकर करना पड़ता है। “मुझे इसमें दिलचस्पी नहीं है” या “मैं ऐसा नहीं चाहता” जैसे वाक्य कई बार सामने वाले को अपमान या रिजेक्शन जैसे लग सकते हैं।
ऐसे परिवेश में आत्मीयता ही निगरानी की संरचना बन जाती है।
यडिजिटल हिंसा सिर्फ़ टेक्नोलॉजी की समस्या नहीं है। यह समाज में पहले से मौजूद असमानताओं का ही विस्तार है।
डिजिटल स्पेस ने क्वीयर और ट्रांस समुदाय को वह दिया है, जो अक्सर घर, स्कूल और समाज नहीं दे पाए। देखे जाने का हक़, बोले जाने की जगह और चुने हुए रिश्ते।