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समुदाय, अपनापन और साथ रहने के तरीकों पर

A flowing line illustration of a group of friends holding each other from the back. with the words "Our differences don't have to divide us"

लगभग दो साल पहले, एक समय ऐसा आया जब हम अपने चुने हुए परिवार की नई समझ को तलाश रहे थे और यह सोच रहे थे कि एक समूह के रूप में साथ आने का हमारे लिए क्या मतलब है। उसी दौरान हम बार-बार एक सरल-सी बात पर लौटते थे, कि दोस्ती और साझी राजनैतिक विचारधारा किसी भी लंबे समय तक चलने वाले प्रयास की सबसे मज़बूत नींव बन सकती है। उस समय हमने हाल ही में अपना स्नातकोत्तर पूरा किया था, और सामाजिक विज्ञान की हमारी पढ़ाई ने हमें दुनिया को अलग नज़रिए से देखना सिखाया था। हमारे प्रोफ़ेसर, जो एक तरह से हमारे हीरो भी थे, उन्होंने हमें वैकल्पिक संभावनाओं का वादा किया था और इसी भरोसे ने हमें एक समुदाय बनाने के बारे में सोचने के लिए प्रेरित किया। अपने भविष्य को लेकर हमारी कल्पनाएँ एक जैसी थीं। हम दोनों को इस बात पर बहुत भरोसा था कि हमारा रिश्ता भरोसे, देखभाल और एक जैसी राजनीतिक सोच पर टिका था। और यह कि फिर और बाकी चीज़ें वहाँ से काफ़ी आसानी से निकल सकती थीं।

लेकिन कई साल बाद, जब ‘समुदाय’ शब्द आज के समय के सबसे चर्चित और इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों में से एक बन गया है, और हम अपने-अपने सफ़र को पीछे मुड़कर देखते हैं – जो एक-दूसरे के साथ नहीं, बल्कि अलग-अलग और अपनी-अपनी दिशा में आगे बढ़े हैं, तो यह विरोधाभास पहले से कहीं ज़्यादा स्पष्ट और ग़हरा महसूस होता है। जिसे कभी हम दोनों के बीच की एक साझी प्रक्रिया समझी जाती थी, वह अब ऐसे माहौल में है जो तेज़ी से व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से आकार ले रहा है।

दृश्यता के समय में 

ऐतिहासिक रूप से, समुदायों की पहचान एक निरंतर उद्देश्य-भावना से होती थी। उन्होंने सिर्फ़ मौजूदगी के बजाय भागीदारी की मांग की। उन्हें ऐसे रिश्तों के ज़रिए बनाया गया था जिनमें समय, मेहनत और आपसी लेन-देन की ज़रूरत थी। अगर हम सम्बद्धता के नज़रिये से देखें, तो वह केवल एक पहचान नहीं थी जिसका दावा किया गया था बल्कि एक ‘प्रतिबद्धता’ थी जिसे सक्रिय रूप से बरकरार रखा गया था। शायद, एक तरह से, प्रतिबद्धता से ही समुदाय बने, या हो सकता है कि समुदायों ने ही प्रतिबद्धता को बढ़ावा दिया। जो भी हो, हमारी समझ से वे दोनों एक-दूसरे से अलग न हो पाने वाले बन गए।

इसलिए, जब हम आज के संदर्भ में ‘समुदाय’ की बात करते हैं, तो ऐसा लगता है कि हम उसकी सबसे महत्वपूर्ण नींव यानी आपसी सहयोग, लेन-देन और एक-दूसरे के प्रति ज़िम्मेदारी को भूल गए हैं। यही वह आधार है जो समुदाय को आज के नेटवर्किंग, उपभोग और दर्शक जुटाने के तरीकों से अलग करता है। आज इन तरीकों में किसी समूह से जुड़ाव अक्सर अस्थायी और लेन-देन पर आधारित होता है, जहाँ एक-दूसरे के प्रति ज़िम्मेदारी की भावना के लिए बहुत कम जगह बचती है। 

जब हम नारीवादी और क्वीयर जगहों में शामिल होते हैं और उनमें हिस्सा लेते हैं, तो यह विरोधाभास और भी उलझा हुआ हो जाता है। हम ‘समुदाय खोजने’ और ‘चुने हुए परिवार’ के बारे में ऐसे बात करते हैं, मानो वे स्वाभाविक रूप से देखभाल और सुरक्षा की जगहें हों। कई क्वीयर लोगों के लिए, वे अक्सर ऐसे ही होते हैं। ‘चुने हुए परिवारों’ की अवधारणा ही इसलिए पैदा होता है क्योंकि जैविक परिवार और मुख्यधारा का समाज उन लोगों की ज़िंदगी को न तो पहचान पाते हैं और न ही बनाए रख पाते हैं जो पारंपरिक व्यवस्था को चुनौती देते हैं। ये वही जगहें हैं जो साथ मिलकर रहने और ज़िंदा रहने के वैकल्पिक तरीके देती हैं। लेकिन फिर भी, कभी-कभी इन अवधारणाओं को चुनौती दी जाती है।

असल में, प्रतिबद्धता को इन जगहों का कोई स्वाभाविक गुण नहीं माना जा सकता, बल्कि यह ऐसी चीज़ है जिस पर लगातार बातचीत और अमल करना पड़ता है। तो फिर, इस प्रतिबद्धता को कैसे बनाए रखा जा सकता है? और तब क्या होता है जब समूह के प्रति प्रतिबद्धता ऐसी चीज़ की माँग करने लगती है जो किसी की अपनी ज़रूरतों या दिशा के विपरीत हो? 

मतभेदों और एकजुटता बनाए रखने के बारे में

इस लेख की जड़ें असल में एक ऐसी शाम में हैं जब हम बैठकर उन लोगों के बारे में बात कर रहे थे जिन्हें हम दोनों जानते हैं और हम दोनों एक तरह से उनके बारे में गप लड़ा रहे थे। नीतिगत बदलाव के लिए आवाज़ उठाना (एडवोकेसी), मीडिया और नारीवादी कार्यप्रणाली के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के तौर पर, हम अक्सर ऐसे ग्रुप और समूहों से मिलते हैं जो इसी तरह का काम कर रहे हैं। लेकिन, इन जगहों पर हमें उतनी ही बार मतभेद, आपसी टकराव और ऑनलाइन एक-दूसरे को सार्वजनिक रूप से जवाबदेह ठहराने की (“कॉलिंग आउट”) घटनाएँ भी देखने को मिलती हैं।

धीरे-धीरे, वह गपशप सिर्फ़ बातचीत तक सीमित नहीं रही, बल्कि हम उन बातों पर गंभीरता से सोचने लगे। फिर यह एहसास और स्वीकारोक्ति सामने आई कि अपनी-अपनी ज़िंदगी के अलग-अलग पड़ावों पर हम भी टकराव, मतभेद और इस संभावना से गुज़रे हैं यह सोच कर कि शायद इस रिश्ते या जगह से बस दूर हो जाना ही आसान हो। इसमें एक तरह का डर भी छिपा था, कि कहीं कुछ गलत कह देने का, अलग-थलग कर दिए जाने का, और उन बुनियादी मूल्यों के खिलाफ़ जाने का, जिनके आधार पर हम वह सब बनाने की बात कर रहे थे जिसे हम सच में बनाना चाहते थे। 

हमसे समुदाय बनाने और नारीवादी जगहों में किसी भी तरह का सामूहिक प्रयास करने को लेकर सबसे बड़ा झूठ यह कहा गया है कि उसके सभी सदस्यों का एकमत होना ज़रूरी है। जैसे, किसी सामूहिक प्रयास को बनाए रखने के लिए ज़रूरी हो कि हम हर मुद्दे पर एक-दूसरे से पूरी तरह सहमत हों और हर बात पर साथ खड़े हों। उस एकजुटता के लिए आम सहमति की ज़रूरत होती है, यानी साझी राजनीति का मतलब साझी राय भी होना चाहिए, और असहमति किसी न किसी तरह सामूहिक प्रयास की विफलता का सबूत मानी जाती है। असल में, बात इसके उलट है। किसी समूह की परख या उसका मूल्यांकन इस आधार पर नहीं होता कि उसके सदस्य कितनी आसानी से सहमत हो जाते हैं, बल्कि इस आधार पर होता है कि जब वे सहमत नहीं होते, तब समूह उन पलों में क्या करता है। असल में, हमारी बातचीत में बार-बार एक बात सामने आई कि हमें मतभेदों या अलग-अलग विचारों के प्रति खुला नज़रिया रखना चाहिए, और साथ ही पूरे समूह या समुदाय का भी ध्यान रखना चाहिए।

साथ ही, जो मतभेद पैदा होते हैं, उन्हें रोकना मुश्किल होता है। जब किसी चीज़ को बनाने में शामिल लोग लगातार बदल रहे हों, आगे बढ़ रहे हों, असहमत हो रहे हों और अलग-अलग दिशाओं में जा रहे हों, तो मिलकर कुछ बनाने का क्या मतलब होता है? और इन मतभेदों के बावजूद एक-दूसरे के प्रति समर्पित बने रहने के लिए क्या करना पड़ता है, ताकि ये मतभेद अलग होने की वजह न बन जाएं? इन विरोधाभासों को समझने और उनके साथ तालमेल बिठाने की कोशिश में ही हम यह सोचने लगते हैं कि असल में समुदाय को बनाए रखने का क्या मतलब है – यह टकराव न होने की स्थिति नहीं, बल्कि टकराव के बावजूद आपसी रिश्ते बनाए रखने की लगातार चलने वाली प्रक्रिया है।

लंबे समय तक चलने और साथ निभाने वाली जगहें बनाना

हम इन सवालों पर इस सोच के साथ विचार करते हैं कि किसी भी तरह का समुदाय किसी के अकेलेपन का तुरंत इलाज नहीं है। यह ख़ास तौर पर इसलिए आज़ादी देने वाली जगह नहीं है चूंकि यह क्वीयर, नारीवादी या अपनी मर्ज़ी से चुनी गई जगह है। ऐसी ही जगहों और व्यवस्थाओं के साथ जुड़ने के हमारे अनुभवों ने हमें बहुत कुछ समझने का मौका दिया है। हमने महसूस किया कि अक्सर ये जगहें भी उन्हीं नवउदारवादी (निओलिबेरल) परिस्थितियों से प्रभावित होती हैं, जो व्यक्तिवाद और भावनात्मक थकान को बढ़ावा देती हैं। इनमें लोगों को आसानी से छोड़ देने या उनसे किनारा कर लेने की प्रवृत्ति भी शामिल है। ऐसे में, हम अक्सर बेहतर और अधिक संतोषजनक रिश्तों की तलाश करने लगते हैं। इसके अलावा, किसी भी जगह का स्वरूप वहाँ रहने वाले लोगों से तय होता है, जो अपने साथ आघात, असमान सत्ता, टकराव और रिश्तों को निभाने के सीखे हुए तौर-तरीकों का इतिहास लेकर आते हैं। और फिर नतीजतन, चुने हुए परिवार और राजनीतिक समुदाय अक्सर वही ख़राब तौर-तरीके अपना लेते हैं जिनसे वे बचना चाहते थे। 

इससे हमारे मन में और भी सवाल उठते हैं, कि तब क्या होता है जब वे समुदाय, जिन्होंने अपनापन देने का वादा किया था, दु:ख और चोट पहुँचाने वाली जगहें बन जाते हैं? जवाबदेही कब ज़िम्मेदारी बन जाती है और कब यह सज़ा में बदल जाती है? जैविक परिवारों की आलोचना अक्सर इस बात के लिए की जाती है कि वे किसी भी कीमत पर रिश्तों को निभाते रहने की अपेक्षा रखते हैं। लेकिन क्या इसके बिल्कुल उलट रवैया अपनाने से क्वीयर समुदाय भी किसी अलग तरह के जोखिम का सामना कर सकते हैं? 

ये सवाल काल्पनिक नहीं हैं। जब हम अपने आस-पास लंबे समय से चली आ रही दोस्ती को देखते हैं, तो हमें एक ऐसी खूबी नज़र आती है जो अक्सर उन जगहों और समूहों में नहीं दिखती, जिनका हम आज हिस्सा हैं। जो लोग साथ रहते हैं, ज़रूरी नहीं कि वे राजनीतिक रूप से सबसे ज़्यादा मुखर, भावनात्मक रूप से जागरूक या विचारधारा के स्तर पर एक-दूसरे से मेल खाते हों। कई मायनों में, उनके विचार ऐसी कई बातों को लेकर हैं जिनसे हम पूरी तरह असहमत हो सकते हैं। फिर भी, उनमें एक ऐसी बात है जो आजकल कम ही देखने को मिलती है – असहमति होने के बावजूद मुश्किल और असहज मुद्दों पर बातचीत करते रहना। वे हर मतभेद को तुरंत रिश्ते के अंत के रूप में नहीं देखते। ऐसी बातचीत के लिए भी जगह होती है, जहाँ कोई बिना पूरी तरह सही शब्द चुने सवाल पूछ सके, अपनी उलझन या अनिश्चितता व्यक्त कर सके, अधूरे तरीके से ही सही, माफ़ी माँग सके और फिर भी बातचीत जारी रख सके। किसी के साथ मतभेद इस बात का आधार नहीं होता कि उसे किसी समूह का हिस्सा न माना जाए या उसकी बात न सुनी जाए।

सामुदायिक जगहों की सहनशीलता और उनकी जीविका के बारे में

किसी समूह को टकराव के अभाव से सार्थक नहीं बनाया जाता। अगर कुछ है, तो वह यह कि टकराव भी उन परिस्थितियों में से एक है, जिनके ज़रिए कोई सामूहिक समूह ख़ुद को समझ पाता है। इससे वह जान पाता है कि उस समूह के मूल्य क्या हैं, वह किन बातों को स्वीकारेंगे, किन मुद्दों पर समझौता करने को तैयार हैं और किन बातों पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। सबसे अहम बात यह है कि इससे यह समझने में मदद मिलती है कि वह समूह आख़िर बना ही क्यों है और उसका उद्देश्य क्या है। फिर भी, पूरी निष्ठा और पूरी तरह से पीछे हट जाने के बीच की स्थिति के लिए हमारे पास शायद ही कोई शब्द रहते हैं। अक्सर हमारे सामने दो ही विकल्प दिखाई देते हैं – या तो हम बने रहें और अपनी प्रतिबद्धता साबित करें, या फिर रिश्ता छोड़कर उसे ऐसा मान लें जिसे सुधारा नहीं जा सकता।

लेकिन हमारे ज़्यादातर रिश्ते इन दोनों में से किसी भी चरम पर नहीं होते। ये ग़लतफ़हमियों, निराशाओं और ऐसे स्वरूपों से बने होते हैं जिन्हें हम तब तक नहीं पहचान पाते जब तक कि वे नुकसान न पहुँचा दें। इसे मानने का मतलब यह नहीं है कि मुश्किल हालात को झेलने को बहुत अच्छा या आदर्श माना जाए, या यह कहा जाए कि लोगों को दमनकारी रिश्तों में बने रहना चाहिए। और कभी-कभी ऐसा वक़्त आता है जब इन रिश्तों को जान बचाने तक के लिए छोड़ना ज़रूरी हो जाता है। और सवाल यह है कि उस कहीं ज़्यादा बड़े दायरे में क्या होता है जहाँ बात सिर्फ़ उस रिश्ते में रहने या छोड़ देने की नहीं, बल्कि मुश्किल या अनसुलझे हालातों में भी उस रिश्ते को बनाए रखने की आ जाती है। 

यह बात नारीवाद और क्वीयर समूहों में और भी जटिल हो जाती है, जहाँ देखभाल, एकजुटता, जवाबदेही और राजनीति की भाषा ही कई बार यह तय करने का ज़रिया बन जाती है कि कौन इस समूह का हिस्सा है और कौन नहीं। जो समुदाय सामाजिक और सत्ता की ऊँच-नीच को चुनौती देने के लिए बनाए गए थे, वे भी समय के साथ अपनी ख़ुद के अनुक्रम की व्यवस्था विकसित कर सकते हैं। इसी तरह, जो जगहें नैतिक सत्ता और उसके अधिकार को चुनौती देने के लिए बनाई गई थीं, वे भी नए तरह के नैतिक अधिकार और नियंत्रण को जन्म दे सकती हैं। बातचीत, भावना, व्यवहार और राजनीति करने के कुछ तरीकों को मान्यता मिलने लगती है, जबकि दूसरे तरीके संदेह के घेरे में आ जाते हैं।

विडंबना यह है कि जिन व्यवस्थाओं को हम नकारते हैं, उनसे अलग जगहें बनाने की कोशिश में हम कभी-कभी उन्हीं की बुनियादी सोच और तौर-तरीकों को दोहरा देते हैं। सामूहिक रूप से साथ आने और एक समुदाय बनाने का असली मुश्किल काम शायद यह सीखना है कि किसी बात से होने वाली तकलीफ़ का अहसास और वास्तविक नुकसान के बीच फ़र्क कैसे किया जाए। साथ ही, यह समझना भी ज़रूरी है कि किसी रिश्ते या साथ में वास्तविक असंगति क्या है और किन्हीं ऐसे लोगों के साथ जुड़े रहना कितना मुश्किल हो सकता है, जो हमारे जैसे सोचते, महसूस करते या ज़िन्दगी नहीं जीते हैं। 

हाशिए पर रहने के हमारे अनुभव इस बात को गहराई से तय करते हैं कि हम समुदाय से कैसे जुड़ते हैं, टकराव का सामना कैसे करते हैं और सुरक्षा को कैसे समझते हैं। हालाँकि, उत्पीड़न के साझा अनुभव अपने-आप देखभाल के साझा तौर-तरीके पैदा नहीं करते। हमें फिर भी यह समझने की मेहनत करनी पड़ती है कि असहमति को कैसे सुलझाया जाए, ज़िम्मेदारी कैसे ली जाए और रिश्तों को कैसे सुधारा जाए। पहचान यह तो बता सकती है कि हम एक साथ क्यों आते हैं, लेकिन अकेले यह नहीं बता सकती कि हम एक साथ कैसे बने रहें। 

किसी समुदाय को बनाए रखने के लिए शायद यह ज़रूरी है कि हम एक लंबे समय तक साथ बने रहने को तैयार हों कि एक-दूसरे से असहमत होने का बेहतर तरीका सीख सकें। यह समझना ज़रूरी है कि देखभाल करने में मुश्किल काम शामिल है और दूसरों व ख़ुद को बदलने का मौका देना भी ज़रूरी है। यह बार-बार और लगातार चलने वाली एक मुश्किल, अधूरी प्रक्रिया है, जिसमें हमें हर बार यह तय करना होता है कि क्या एक-दूसरे के साथ रहने और जुड़ने का कोई दूसरा तरीका संभव है। प्रतिबद्ध होने का मतलब है उन लोगों के प्रति जवाबदेह बने रहना, जिनसे समुदाय की कल्पना संभव हो पाती है।

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Credit: Image assembled by Anjani Chadha using Freepik