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हमें जो कभी नहीं बताया गया

grayscale photo of woman doing silent hand sign

एक याद है जिसकी और मैं बार-बार लौटती हूँ। तब मैं शायद तेरह या चौदह साल की थी। मेरी क्लास की एक लड़की स्कूल की असेंबली में बेहोश हो गई थी। इसके बाद चारों तरफ फुसफुसाहट शुरू हो गई। किसी ने कहा कि वह खाना नहीं खा रही थी क्योंकि उसे एक पारिवारिक शादी में अच्छा दिखना था। किसी और ने कहा कि यह “लड़कियों की समस्या” है। लेकिन असल में किसी ने यह नहीं बताया कि हुआ क्या था। न हमें, न उसे। हम बस उससे आगे बढ़ गए। लेकिन वह ख़ामोशी मेरे साथ रह गई, और उसने अपने आप में बहुत कुछ कह दिया। जिस तरह शिक्षकों ने नज़रें फेर लीं। जिस तरह कुछ शब्द कभी ज़ुबाँ पर नहीं आए। ऐसा लगा जैसे हमें कुछ सिखाया जा रहा था, लेकिन उस समय मैं समझ नहीं पाई कि वह क्या था।

हम में से बहुत से लोग ऐसे ही बड़े हुए हैं। अपने शरीर के बारे में, सेक्स के बारे में, रिश्तों के बारे में हमने अच्छे से और सोच-समझ के बातचीत से नहीं, बल्कि उन चीज़ों से सीखा जो कभी कही ही नहीं गईं। मज़ाकों के ज़रिए। चेतावनियों के ज़रिए। उन चेहरों के ज़रिए जो लोग कुछ ख़ास बातों पर बनाते थे। यह ऐसी चीज़ है जिसके बारे में मैं कभी-कभी सोचती हूँ। उस समय यह शायद ग़लत जानकारी जैसा नहीं लगता था, जैसे कि इंटरनेट पर कोई ग़लत तथ्य। असल में यह उससे भी पहले की बात है – वो चीज़ें जो आपके अंदर बहुत पहले बैठ जाती हैं, इससे पहले कि उस पर सवाल उठाना भी आए।

मंगलौर में पलना-बढ़ना

मैं मंगलौर में बड़ी हुई। बचपन में मैं मोटी थी और किशोरावस्था में भी मोटी ही रही। उस दौरान ज़्यादातर समय मुझे ऐसा लगता था जैसे मेरा शरीर कोई ‘सामाजिक संपत्ति’ हो। परिवार के हर मिलन-समारोह में कोई न कोई कुछ न कुछ कहता ही था। कोई रिश्तेदार गाल खींचते हुए साथ ही यह भी कह देते कि मेरा वज़न बढ़ गया है। शादियों में आंटियाँ आपस में बातें करती थीं कि कौन अच्छा लग रहा है, कौन नहीं, और कौन “हेल्दी” है (जिसका असल में मतलब कभी भी सेहतमंद होना नहीं होता था)। यह सब लगातार चलता रहता था। और बात यह है कि किसी को लगा ही नहीं कि वे क्रूर हो रहे थे। एक वयस्क होने के बाद मुझे इसी बात के साथ बैठना पड़ा है। उन सभी सामाजिक व्यवहारों के ज़रिए मैंने यह सीखा कि ये वही लोग थे (जो सच में मुझसे प्यार करते थे) जो चीज़ों को इसी नज़र से देखते थे, और उसी तरह बात करते थे क्योंकि उन्हें सिखाया गया था कि एक महिला की क़ीमत उसके रूप-रंग में होती है, और उस पर टिप्पणी करना, उसे परखना, उसे “सही दिशा” में ढालने की कोशिश करना, बस उसकी देखभाल करने का हिस्सा है। इसलिए उन्होंने वही किया – उन्होंने मेरी देखभाल की, उसी तरीके से जिसे वे जानते थे।

बारह साल की उम्र तक ही मैं यह समझ गई थी – बिना किसी के बताए, कि मेरे शरीर को ठीक होने की ज़रूरत है। और जब वह ठीक हो जाएगा, तभी मेरी असली ज़िंदगी शुरू हो पाएगी। यानी, तब तक के लिए मेरी ज़िंदगी मानो रुकी हुई थी। यह सोच लंबे समय तक मेरे साथ रही। इसने तय किया कि मैं क्या चाहूँ। मुझे क्या मिलना चाहिए, यह भी इसी से तय हुआ। मैंने ख़ुद को कितनी जगह लेने दी, यह भी इसी पर निर्भर था। और मुझे पता है कि मैं इस मामले में अकेली नहीं हूँ। हर किसी के अनुभव के विवरण अलग होते हैं, लेकिन उनका ढांचा एक जैसा होता है। यह संदेश है कि आपका शरीर पूरी तरह ठीक नहीं है। कि आपको और छोटा होना चाहिए, और शांत रहना चाहिए, ख़ुद को और सीमित रखना चाहिए। यह कि आप मुख्य रूप से दूसरों के संबंध में मौजूद हैं – उन्हें आपसे क्या चाहिए, वे आपके बारे में क्या सोचते हैं, क्या वे आपको चुनेंगे? यह सिर्फ़ मोटापे के बारे में नहीं है। यह इस देश में महिलाओं के पालन-पोषण के बहुत बड़े हिस्से में मौजूद है। अच्छी बनो। समझौता करो। ज़्यादा सवाल मत पूछो। ज़्यादा मत चाहो। मुझे याद है कि मैं इससे जूझती थी – कि मुझे “एक लड़की की तरह” सलीके से बैठना है, लड़कों की तरह नहीं चलना है, ज़ोर से नहीं हँसना है, ज़ोर से नहीं बोलना है, ताकि मैं “अच्छी लड़की” लगूँ।

कोई आपको बिठाकर ये बातें सीधे तौर पर नहीं कहता। उन्हें ऐसा करने की ज़रूरत भी नहीं होती। आप इन्हें ख़ुद-ब-ख़ुद अपना लेते हैं। और एक बार जब ये आपके मन में बस जाती हैं, तो इन्हें पहचानना या इन पर सवाल उठाना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि ये आपको मान्यताएँ नहीं, बल्कि सच लगती हैं।

क्या आपको किताब और फिल्म “द प्रिंसेस डायरीज़” याद हैं? यह पूरी तरह उस बदलाव के बारे में थी, जहां “ज़्यादा सुंदर” दिखने से मुख्य किरदार की ज़िंदगी बदल जाती है। जैसे बस एक बदलाव चाहिए और आपकी ज़िंदगी पूरी तरह बदल जाएगी। इससे मुझे हमेशा लगता था कि शायद अगर मैं और पतली होती और सुंदर होती, तो मेरी दुनिया भी बदल जाती। और अब पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो समझ आता है कि यह सोच अपने आप में कितनी समस्या वाली थी।

ख़ामोशी असल में क्या करती है

जब सेक्स, शरीर या रिश्तों के बारे में कोई खुली और सच्ची बातचीत नहीं होती, तो लोग बस अनजान ही नहीं रहते। वे उन खाली जगहों को भरते हैं – अक्सर डर से, या शर्म से, या फिर उन मान्यताओं से जो उनके आसपास के लोग रखते हैं। लड़कियाँ शादी में यह नहीं जानतीं कि क्या उम्मीद करनी है। उन्हें बस इतना बताया जाता है कि उन्हें ख़ुद को समायोजित करना है और ‘अच्छी पत्नी’ बनना है। महिलाएँ बच्चे को जन्म देने के बाद सालों तक इस सोच के साथ संघर्ष करती हैं कि उनका डिप्रेशन सिर्फ़ उनकी कमज़ोरी है, यह जाने बिना कि इसका एक नाम है, कि यह आम है, और इसके लिए मदद मौजूद है। कई साथी जिन्हें बच्चे पैदा करने का मन होता है पर किसी कारणवश नहीं कर पाते हैं, वे इस समस्या का सामना करते हुए सालों तक इसे अकेले झेलते हैं, यह मानकर कि उनके व्यक्तित्व में कुछ गड़बड़ी है।

यह सब इसलिए नहीं होता कि लोगों को परवाह नहीं होती। यह इसलिए होता है क्योंकि उन्हें किसी ने बताया ही नहीं। और उनसे पिछली पीढ़ीको भी किसी ने नहीं बताया था। यह ख़ामोशी यूँ ही नहीं है। इसका काफी हिस्सा किसी न किसी तरह जानबूझकर बनाए रखा जाता है, क्योंकि शरीर, सेक्स और इच्छाओं के बारे में समझदार तरह से बातचीत करने का मतलब होगा यह मानना कि महिलाओं की अपनी आकांक्षाएं और इच्छाएं होती हैं। उनके लिए भी आनंद मायने रखता है। और फिर यह भी लगेगा कि एक महिला के प्रजनन से जुड़े फ़ैसले उसी के होते हैं। यह सब बातें आज भी कई जगहों पर ज़ोर से कहना असहज माना जाता है।

असल में क्या मदद करता है

एक मनोचिकित्सक और पीएचडी शोधार्थी के रूप में, मैंने देखा है कि जब लोग पहली बार अपने शरीर, अपनी यौनिकता, अपने अनुभव के बारे में ईमानदारी से बात करते हैं तो अक्सर वे अपने चौथे दशक (तीस की उम्र के बाद) होते हैं , जिसमें लगभग हमेशा एक गहरा दुःख होता है। यह दुःख इस बात का होता है कि उन्होंने कितने समय तक ऐसी शर्म ढोई, जिसकी उन्हें ज़रूरत ही नहीं थी। उन फ़ैसलों का, जो उन्होंने पूरी जानकारी के बिना लिए। उन सालों का, जो उन्होंने ख़ुद के साथ लड़ते हुए बिताए।

और फिर, उस दुःख के बाद, कुछ तो है जो खुलने लगता है। इसे शब्दों में समझाना मुश्किल है। बस ऐसा लगता है जैसे राहत मिल गई हो। जैसे वे सालों से कुछ कसकर पकड़े हुए थे और आखिरकार उन्हें उसे छोड़ने की इजाज़त मिल गई हो। यह कोई छोटी बात नहीं है। असल में, ठीक-ठाक होने का एहसास कुछ ऐसा ही होता है।

मुझे आज भी उस लड़की की याद आती है जो असेंबली में बेहोश हो गई थी। कैसे सबने नज़रें फेर ली थीं। कैसे वह ख़ामोशी उसे ढक गई और हम सब आगे चलते गए। हम इससे बेहतर कर सकते हैं। हमें करना ही होगा।

प्रांजलि शर्मा द्वारा अनुवादित।

प्रांजलि एक अंतःविषय नारीवादी शोधकर्ता हैं, जिन्हें सामुदायिक वकालत, आउटरीच, जेंडर दृष्टिकोण, शिक्षा और विकास में अनुभव है। उनके शोध और अमल के क्षेत्रों में बच्चों और किशोरों के जेंडर और यौन व प्रजनन स्वास्थ्य अधिकार शामिल हैं और वह एक सामुदायिक पुस्तकालय स्थापित करना चाहती हैं जो समान विषयों पर बच्चों की किताबें उपलब्ध कराएगा।

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Cover image by Kristina Flour on Unsplash