A digital magazine on sexuality in the Global South
Black-and-white face-photo of Maya Sharma, middle-aged, white boy-cut hair, and is wearing specks.
People's Movements and Sexualityहिन्दी

जन आन्दोलन पर माया शर्मा के साथ साक्षात्कार – भाग १

माया शर्मा एक नारीवादी एक्टिविस्ट हैं जो भारत के महिला आन्दोलन में पूरे जोश के साथ जुड़ी रही हैं। उन्होंने महिला मजदूर अधिकार एवं एकल महिलाओं पर किताबों का सह-लेखन किया है। वे वीमेन्स लेबर राइट्स की सह लेखक हैं जो एकल महिलाओं के जीवन के बारे में है। वे विकल्प महिला समूह के साथ काम करती हैं, जो ज़मीनी स्तर पर काम करने वाली बड़ोदरा, गुजरात की एक संस्था जो जनजातीय महिलाओं और ट्रांसजेंडर लोगों के साथ काम करती है।

तारशी की वालंटियर अंजोरा सारंगी ने भारत के जन आन्दोलनों पर उनके अनुभवों के बारे में माया के साथ बातचीत की।

अंजोरा सारंगी: जन आंदोलनों जैसे मजदूर आन्दोलन और महिला आन्दोलन में अपनी भागीदारी और बीते वर्षों की अपनी यात्रा के बारे में कुछ बताइए।

माया शर्मा: आन्दोलन के साथ मैं काफ़ी बाद में जुड़ी, अपनी उम्र के ४० के दशक में। परंपरागत, पित्रसत्तात्मक तरीके से अलग हट कर सोचने का पहला अनुभव मुझे तब हुआ जब एक शादीशुदा महिला के रूप में मैंने खुद अत्याचार झेला। उस समय मैं जो अनुभव कर रही थी उसका मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मैं उस समय सहेली नाम के एक महिला समूह के साथ जुड़ी और महिलाओं के एक ऐसे समूह के साथ जुड़ना अनोखा एहसास था जहाँ आप खुलकर स्वयं को व्यक्त कर सकते हों।

मैं दिल्ली में साहित्य की छात्रा थी और नारीवाद के साथ मेरा पहला परिचय द फीमेल यूनक (जेरमाईन ग्रीर द्वारा लिखित) नामक किताब के ज़रिए हुआ। एक ऐसा साहित्य पढ़ना, जिसने मेरे दिल के तारों को छेड़ दिया, अपनेआप में क्रांतिकारी/ परिवर्तनवादी था। जन आन्दोलन में मेरा पहला जोशीला जुड़ाव महिला आन्दोलन के साथ था। तभी से मैंने इस क्षेत्र में काम करना शुरू कर दिया।

मजदूर विषयों में मेरी दिलचस्पी बस्तियों में काम करने के दौरान बढ़ी। औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्र में बहुत अंतर है और महिलाएँ ज़्यादातर अनौपचारिक क्षेत्र में ही काम करती हैं, जैसे घर के काम, भवन निर्माण आदि। मैंने ध्यान दिया कि महिलाएँ दिन के समय किराना या अन्य कोई भी सामान नहीं खरीदती हैं क्योंकि उनको अपने काम की पगार दिन के आखीर में ही मिलती है। इन बातों ने मुझ पर बहुत असर डाला, विशेषकर तब जब मैंने देखा कि महिलाएँ कठिन परिश्रम करती हैं पर उनको उसके बदले सही और समय पर भुगतान नहीं मिलता।

इसलिए, जब मुझे केन्द्रीय मजदूर संघ के साथ काम करने का मौका मिला तो मैंने मजदूर विषयों पर काम करने का निर्णय लिया। मैं महिला आन्दोलन से थी और मैं जो भी थी महिला आन्दोलन के कारण थी, और मैं संघ में रोज़ इस बोध के साथ काम करने आती थी। श्रमिक संघ पदानुक्रमिक प्रकृति के होते हैं और इसलिए महिलाएँ पीछे रह जाती हैं। मैं अब मजदूर आन्दोलन में अधिक सक्रिय नहीं हूँ पर ज़्यादा कुछ बदला नहीं है, श्रमिक संघ के नेताओं की तरफ़ से महिलाओं को कम ही बढ़ावा मिलता है।

अंजोरा: क्या आप इस बात से सहमत होंगी कि महिलाएँ या असुरक्षित यौनिक समुदाय जन आन्दोलनों जैसे कि श्रमिक संघ आन्दोलन या जनजातीय आन्दोलन में हाशिए पर धकेल दिए जाते हैं?

माया: सभी आन्दोलनों के लिए ये कहना मुश्किल है, पर हाँ व्यापक तौर पर मैं इस बात से सहमत हूँ कि जो अपनी यौनिक पहचान अलग तरह से करते हैं उन्हें हाशिए की ओर धकेल दिया जाता है। मुझे लगता है कि जो महिलाएँ अन्य महिलाओं के साथ सम्बन्ध में हैं उनके लिए अपनी पहचान ज़ाहिर करना और भी नामुमकिन हो जाता है क्योंकि भारत में यह आज भी वर्जित माना जाता है।

अंजोरा: विकल्प महिला समूह की स्थापना कैसे हुई? क्या आप जनजातीय महिला एवं एलबीटीआई (लेस्बियन, बाईसेक्शुअल, ट्रांस, इंटरसेक्स) समुदाय के साथ काम करने वाली परियोजना के साथ जुड़ने के अपने निजी कारण बता सकती हैं?

माया: जब मैं अपनी किताब ‘लविंग वीमेन: बींग लेस्बियन इन अनप्रिविलेज्ड इंडिया’ के लिए अन्वेषण कर रही थी, तब मैंने पाया कि दूर-दराज़ इलाकों में महिलाएँ बहुत अकेली और एकाकी होती हैं, और इस बारे में लिखने की और उनको एकजुट करने की ज़रुरत महसूस हुई। विकल्प के साथ जुड़ने का यह एक कारण था, क्योंकि अन्य संस्थाओं से अलग, विकल्प इन मुद्दों पर काम करने को तैयार था। दूसरा कारण था कि विकल्प में कुछ लोग सक्रिय तौर पर महिला समाख्या में कामगारों का संघ बनाने की ओर काम कर रहे थे, महिला समाख्या एक सरकारी कार्यक्रम है जिसमें कामगारों, जिन्हें स्वयं सेवक कहा जाता है, को वेतन तो मिलता है पर अन्य कोई लाभ या सुविधा नहीं। हमारी कोशिश थी कि हम संघ बनाकर अन्य लाभों की मांग कर सकें। इस संघर्ष का एक और इतिहास या कहानी थी – राजस्थान के एक कामगार के साथ बलात्कार हुआ था और उसके खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन चल रहे थे, पर जब महिलाओं ने विरोध में शामिल होने के लिए छुट्टी का आवेदन दिया तो राज्य सरकार ने उनकी छुट्टी का आवेदन अस्वीकार कर दिया। तब हमें इस बात का एहसास हुआ कि राज्य सरकार लोगों की मांगों को स्वीकार नहीं करेगी। अतः संघ का निर्माण और भी महवपूर्ण हो गया।

विकल्प जिन विषयों पर काम कर रहा था, उन विषयों को उठाने की ज़रुरत महसूस हुई, चाहे वो जनजातीय समूह के साथ हो, सिलिकोसिस [सिलिका के कणों के कारण होने वाली सांस की बीमारी] के मुद्दे पर हो, या एचआईवी एवं एड्स के मुद्दे पर। अपने अन्वेषण/रिसर्च के बाद मैं विकल्प के साथ जुड़ गई।

अंजोरा: विकल्प की प्रथम साझेदार ग्रामीण एवं जनजातीय महिलाएँ हैं। इनके साथ अपने अनुभवों के बारे में हमें कुछ बताइए।

माया: इन समूहों एवं समुदायों में कई पेचीदे ताने-बाने गुथ मुथ हैं, और ये दमन के नियमों को बदलते रहते हैं। ये एक जैसा नहीं रहता। हालाँकि इसका स्वरुप निरंतर बदलता रहता है, जनजातीय संस्कृति ऐतिहासिक तौर पर मतभेद/विरोध और जीवनशैली के विकल्पों को बेहतर तरीके से स्वीकार एवं बर्दाश्त करने के लिए जानी जाती है। जनजातीय लोगों के लिए कृषि मुख्य व्यवसाय है पर चूँकि यह मौसम के अनुसार होती है, उन्हें बीच-बीच में बेरोज़गारी का अनुभव भी करना पड़ता है। कई जनजातीय लोग समलैंगिक संबंधों में भी होते हैं और समाज में इसकी जानकारी भी होती है पर समस्या तभी होती है जब खुले तौर पर उनपर सवाल किया जाए। हालाँकि, जब आप समुदाय के साथ करीब से जुड़ते हैं तो आपको बारीक अंतर समझ में आते हैं। अलगाव होता है क्योंकि अगर कोई विषमलैंगिक नहीं हैं तो वे अकेले होंगे, जो कायदे से अलग है। वृहद् समाज में युगल के समलैंगिक सम्बन्ध पर कोई चिंतन नहीं है; एक मान्यता जो अपनेआप में आलोचना करने योग्य है।

भारत में अपनी पहचान ज़ाहिर करना (कमिंग आउट) महत्वपूर्ण संकल्पना नहीं है क्योंकि हमारी संस्कृति इस विषय पर मुखर या प्रकट नहीं है। इसके साथ ही संस्कृति पदानुक्रम प्रकृति की है। उदहारण के लिए, एक ग्रामीण क्षेत्र में हम एक समलैंगिक किसान युगल से मिले जो शुरू में गाँव से भाग गए थे पर बाद में वापस आ गए। होली के मौसम में जब फसल कटती है, गाँव के नए विवाहित जोड़े होलिका के चक्कर लगाते हैं, और इस जोड़े ने भी यह रसम पूरी की। किसी ने कोई सवाल नहीं किया और शायद उनसे इस रस्म की अपेक्षा भी की जा रही थी। हालाँकि, औपचारिक रूप से किसी ने इस सम्बन्ध को स्वीकृति नहीं दी पर रस्में निभाई गईं जो रिश्ते को स्वीकृति देती हैं।

गुजरात में, जनजातीय समलैंगिक लोगों और ट्रांसजेंडर लोगों को शहरीकरण के कारण नौकरी मिल रही है, जैसे चौकीदार की या ब्यूटी पारलर में। परिवार के नज़रिए से नौकरी मिलना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि ट्रांसजेंडर लोगों को अक्सर यह जताया जाता है कि वे अलग हैं। पर जब पैसे आने लगते हैं तो स्वीकृति का स्तर भी बढ़ जाता है। कुछ माता-पिता अलग संबंधों को स्वीकार कर रहे हैं जब तक वे रिश्तेदारों और बड़े बुजूर्गों की नज़र में ना आए। हमें ऐसे किस्सों की जानकारी है जिसमें पिता ने अपनी जायदाद एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति को दे दी है क्योंकि उन्हें विश्वास था कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति उनकी जायदाद की बेहतर देखभाल करेंगे। उसी जगह ऐसे भी उदहारण हैं जहाँ सरकार की मध्यस्थता अनुकूल नहीं रही और लोगों को कष्ट झेलना पड़ा है।

अंजोरा: आपके अनुसार कौन से यौन अल्पसंख्यक समूह हैं जो शोषण और हिंसा से सबसे अधिक प्रभावित हैं?

माया: मेरे हिसाब से हिंसा और शोषण से सभी प्रभावित हैं। इसमें कोई कम या ज़्यादा नहीं है।

TARSHI कि दीपिका श्रीवास्तव द्वारा अनुवादित

——-

Cover Image: Samanvay Indian Languages Festival

Comments

Article written by:

Anjora is presently volunteering with TARSHI and works as an Analyst at the Bharti Institute of Public Policy at the Indian School of Business (ISB). She has studied political science at Lady Shri Ram College and at the London School of Economics. Her interests are in gender and violence, women in politics and policy making, and education. Anjora has previously interned at Feminist Approach to Technology (FAT) and Youth Ki Awaaz. She loves exploring new food and all things Harry Potter. She can be reached at anjorasarangi@gmail.com

x