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Sanitary napkins made of cloth. (Image credit: The Kachra Project)
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घरों में जेंडर आधार पर जगहों का संघर्ष

मैं घर के बैठक वाले कमरे में दाखिल हुई तो पाया कि वहाँ एक अंजान सी खामोशी पसरी हुई थी। आम तौर पर बतियाते रहने वाले मेरे मम्मी-पापा बिना एक दूसरे की ओर देखे, चुपचाप अपनी शाम की चाय पीने में मशगूल थे। मेरे अचानक कमरे में आ जाने पर भी उन्होने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। उनके इस तरह खामोश बैठे होने का कारण यह था कि वे टीवी पर की आने वाली फिल्म, ‘पैड मैन’ के ट्रेलर में अक्षय कुमार को एक सैनिटरी नैपकिन को खोल कर दिखाते हुए देख कर भौचक्के हो गए थे और शर्मिंदगी महसूस कर रहे थे। हमारे देश में इस तरह के दृश्य को देख कर किसी भी ‘सामान्य’ परिवार के लोग ऐसे ही शर्म और असहज महसूस करते हैं। मासिक धर्म एक इतना वर्जित विषय है कि इसके बारे में बहुत से माएँ और उनकी बेटियाँ भी दबे स्वर में ही बात करती हैं और इस बारे में परिवार का कोई दूसरा सदस्य आमतौर पर बात भी नहीं करता। 

अलग-अलग जगहों की बात करते हुए, हम अक्सर यह स्वीकार नहीं कर पाते कि हमारे घरों का माहौल भी स्पष्ट रूप से जेंडर के आधार पर विभाजित होता है। महिला और पुरुष, इन दो जेंडर की विचारधारा के आधार पर न केवल हमारे यहाँ सार्वजनिक स्थान, बल्कि हमारे घरों का माहौल भी लंबे समय से परिभाषित और विभाजित होता रहा है। माहवारी के निषिद्ध विषय माने जाने के कारण, घरों में भी इस से जुड़े सभी कामों के बारे में स्पष्ट नियम बन जाते हैं। आम तौर पर घर में सैनिटरी पैड किसी अलमारी में छुपा कर रखे जाते हैं और इस जगह की जानकारी केवल घर की महिलाओं को ही होती है। घर के पुरुषों को अगर इस जगह की जानकारी हो तो भी वे जानबूझकर इससे अनभिज्ञ बने रहते हैं। इसके अलावा, बाल साफ करने की क्रीम और महिलाओं के रेज़र आदि भी घर में कहीं भी रखे हुए देखने को नहीं मिलते और इसका कारण केवल यही है की जहाँ किसी पुरुष के रेज़र को पड़ा देखना आम बात हैं वहीं किसी महिला के रेज़र को देखना किसी को भी भयभीत कर पाने की क्षमता रखता है (तो ऐसे में खतरा मोल क्यों लेना!)।   

ज़्यादातर भारतीय घरों के बाहर तारों पर सूखने के लिए डाले गए धुले कपड़े देख पाना एक आम बात है, ये कपड़े ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे पेड़ों की शाखों से चमगादड़ उल्टे लटके हुए हों। लेकिन आपने देखा होगा कि इन तारों पर महिलाओं के अंदरूनी वस्त्र कभी भी दिखाई नहीं देते। इन कपड़ों को देखने वाले किसी भी बाहरी व्यक्ति को यही लगेगा मानो इस घर में या तो महिलाएँ हैं ही नहीं या फिर वे अंदरूनी वस्त्र ही नहीं पहनतीं। असल में महिलाओं के ये अंदरूनी वस्त्र घर के अंदर ही कहीं ‘लुकी-छुपी’ (जहाँ आमतौर पर कोई न जाता हो) जगह पर सूखने डाले जाते हैं – घर में यह ऐसी जगह होती है जो आमतौर पर बाहरी लोगों और घर में रहने वाले पुरुषों की नज़र से दूर होती है। घर में ऐसी जगह का चुनाव घर की बनावट के आधार पर किया जाता है। महिलाओं के कपड़े सुखाने की इस ‘जनाना’ ज़रूरत को पूरा करने के लिए घर की उस जगह का इस्तेमाल कभी नहीं या न के बराबर होता है जहाँ घर के आदमी लोगों का आना-जाना रहता हो।  

घर के भीतर इस तरह जगहों को अलग-अलग कामों के लिए इस्तेमाल करने का निर्धारण करने से घर के अंदर ही महिलाओं और पुरुषों के बीच सीमाओं का बंटवारा हो जाता है। कहीं पर महिला शरीर का या उनकी यौनिकता का ज़रा सा भी आभास होने नहीं दिया जाता। अपने घर की बाल्कनी में सिर्फ़ निक्कर, जाँघिया पहन कर निकल आना आदमियों के लिए एक आम बात होती है, लेकिन उसी बाल्कनी की यह जगह महिलाओं के लिए एक ऐसा स्थान है जहाँ उन्हें बहुत सावधानी से कदम रखने होते हैं। अपने ही घर की बाल्कनी में या बैठक वाले कमरे में, बिना पूरे कपड़े पहने आ जाना एक ऐसा विशेषाधिकार है जो महिलाओं को प्राप्त नहीं है। महिलाओं को, अक्सर अपने ही घर में सहज महसूस नहीं होने दिया जाता।  

हालांकि, ऐसा माना जाता है कि घर के अंदर ‘महिलाओं का एकाधिकार’ होता है, लेकिन पूरे घर में ऐसी कोई जगह नहीं होती जिसे अलग से केवल महिलाओं के लिए आरक्षित रखा जाता हो। ऐसा कहा जाता है कि औरतें पूरे घर पर अपना नियंत्रण रखती हैं, लेकिन देखने वाली बात यह है कि कभी-कभी तो घर की औरत के पास पूरे घर में, सिर्फ़ अपना कहने लायक कोई जगह नहीं होती। औरतों का घर की रसोई में मौजूद रहना एक ज़रूरत समझा जाता है जबकि घर के पुरुषों से रसोई में आने की कभी उम्मीद भी नहीं की जाती, और यही जेंडर के आधार पर श्रम के बँटवारे का सबसे बढ़िया उदाहरण है। अगर आदमी रसोई में जाकर कोई काम करता है या रसोई के काम में हाथ बंटवाता है तो ऐसा करना उसकी अच्छाई और बड़प्पन समझा जाता है। आज की आधुनिकतम मॉड्यूलर रसोई में भी जब यह उम्मीद की जाता है कि घर की औरत ही, भले ही वह कामकाजी महिला हो या गृहिणी, परिवार के सब लोगों के लिए खाना बनाएगी, तो इससे तो यही पता चलता है कि महिला की योग्यता और उनका व्यावसायिक दर्जा भले ही कितना ही ऊँचा क्यों न हो, घर पर उसका मेहनत करना ज़रूरी है। इसलिए देखा जाए तो घर का रसोईघर किसी महिला के खुद को व्यक्त कर पाने की जगह कम, और एक ऐसी ज़रूरी जगह अवश्य है जहाँ से महिला यह सुनिश्चित कर पाती है कि परिवार भली-भांति चलता रहे। उस पूरे घर में, जिसे कहा जाता है कि घर तो पूरा घर की औरत का ही है, ऐसा अक्सर होता है कि उस महिला का उस घर में अपना खुद का, बिलकुल निजी कहने लायक एक कोना भी न हो – एक ऐसी जगह जहाँ वह अकेली खुद से दो-चार हो सके, एकांत का सुख ले सके और जिस जगह पर जेंडर आधार पर बनी भूमिकाओं का कोई दखल न हो – ऐसी जगह जो सही माने में महिला की अपनी कही जा सकती हो। 

इसलिए, भले ही ऐसा माना जाता हो कि ‘घर’ एक सुकून और आराम देने वाली जगह होती है – एक ऐसी जगह जहाँ हम अपनी इच्छा से अपने जेंडर, यौनिकता और शरीर के साथ उन्मुक्त भाव से रह सकते हैं – लेकिन सच्चाई यही है कि वास्तव में घर इनमें से किन्ही भी मानकों पर खरा नहीं उतरता, घर में ऐसे अनेक कहे-अनकहे नियम लागू होते हैं जिनसे घर में जगह का बंटवारा और उसका उपयोग कर पाने की क्षमता निर्धारित होती है। जेंडर के आधार पर घर में हमारा व्यवहार, हमारा पहनावा, हमारे काम और यहाँ तक कि हमारी बोलचाल की भाषा भी नियंत्रित और नियामित की जाती है। 

विख्यात नारीवादी शेरी ओर्ट्नर[1] का एक मशहूर कथन है जिसमें उन्होंने ‘प्रकृति’ को महिलाओं और ‘संस्कृति’ को पुरुषों के समरूप बताया है। संस्कृति ‘मानवीय चेतना’[2] का प्रतीक है जिसमे विचारों और तकनीक के प्रयोग से उपजी विभिन्न वस्तुएँ और सुविधाएं आती हैं और यही वस्तुएँ और सुविधाएँ बहुत ही आसानी से मनुष्य के क्रिया-कलापों को प्रभावित कर पाती हैं। यह सभी चीज़ें दिखाई पड़ती हैं और भौतिक हैं और इसीलिए समाज में इन्हें कहीं अधिक आदर सम्मान मिलता है। प्रकृति, जैसा की हम में से ज़्यादातर लोग समझते हैं, कुछ ऐसी है जो स्थायी है, भरोसेमंद है और हमेशा बनी रहने वाली है। यह किसी पर भी अपना नियंत्रण नहीं जताती बल्कि यह सबको पोषित करती है और यही कारण है कि यह किसी भी तरह से सत्ता या प्रभाव पाने की होड़ में लगी नहीं दिखती। विचारों का, यह द्विविभाजन, आज के समय में बहुत उपयोगी है, और हम इस विभाजन को ठीक अपने घरों में, अपनी आँखों के सामने घटित होता देख और महसूस कर सकते हैं। 

इसलिए देखा जाए तो ‘घर’ के मायने, महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग होते हैं। किसी भी घर की बनावट, उसकी वास्तुकला इस विचार की गवाह है। अधिकांश घरों में, खासकर पुराने बने घरों में, रसोई और औरतों के रहने के कमरे, आमतौर पर घर के बिलकुल अंदर किसी एकांत जगह पर बनाए गए होते हैं – इन का बाहरी दुनिया से कोई सरोकार नहीं होता। घर का गैरेज, गाड़ी खड़ी करने की जगह और ‘पुरुषों के प्रयोग’ के दूसरे स्थान, घर के शुरू में या बाहर ही होते हैं।   

अलग हैं, लेकिन बराबर हैं’, इस तरह के विचार शायद नारीवादी स्लोगनों में उदारवाद की पैरवी में ही अच्छे लगते हैं। वास्तविक ज़िंदगी में इसका इस्तेमाल बहुत कम और ना के बराबर दिखाई देता है। हमारे घरों में महिलाओं की यौनिकता, अपने किसी भी रूप में बहुत की कम दिखाई देती है। यह व्यवस्था पहले से विद्यमान उन भेदभावों और वर्जनाओं से बल पाती है और कायम रहती है जो हमारे जीवन में केवल बाहर ही नहीं है, बल्कि हमारे घरों तक में घुसपैठ कर चुके हैं। अभी तो हालात यह हैं कि यह सोच पाना कि, घर के अंदर व्यक्ति के शरीर और यौनिकता के भाव उन्मुक्त रूप में व्यक्त हों, एक कोरी कल्पना ही लगती है। 

‘दाग अच्छे हैं’ कहकर जहाँ किसी डिटर्जेंट पाउडर को बेच पाना बेहद आसान है, लेकिन कोई भी इसी टैग लाइन का उपयोग कर एक सैनिटरी पैड को बेचने की हिम्मत नहीं कर सकता। महिलाओं के जीवन की विडम्बना ही यह है कि उनसे एक मकान को घर बना देने की उम्मीद तो की जाती है लेकिन वो घर कोई ऐसी जगह नहीं हो सकता जो उनके आराम और इच्छाओं को पूरा करता हो। समाज में एक ‘आदर्श घर’ वही माना जाता है जहाँ महिलाएँ घर के बाहर दिखाई न दें और जो घर महिलाओं के वहाँ होने की घोषणा न करते हों। अपने लिए निर्धारित कर्तव्यों को निभा कर, और अपने लिए बनाए गए दायरे के भीतर रह कर ही कोई महिला, ‘घर की महिला’ होने के अपने वास्तविक दायित्व को पूरा कर पाती है। घर में एक महिला, उन अनेक सम्बन्धों का मूर्त रूप होती है, जिनका लेबल उस पर लगा दिया जाता है, जैसे कि माँ, पत्नी या बेटी आदि। अंत में यह कहा जा सकता है कि एक महिला से यह आशा की जाती है कि वह परिवार की स्थिरता, उसके स्थायित्व को अक्षुण्ण बनाए रखे, घर की ‘मर्यादा’ को कायम रखे और घर को सुचारु रूप से चलते रहने में अपना योगदान देती रहे, लेकिन यह सब करते हुए वह अपनी इच्छाओं को और अपनी यौनिकता को पूरी तरह से वश में रखे। 

[1] Ortner, S.B. 1974. Is female to male as nature is to culture? In M. Z. Rosaldo and L. Lamphere (Eds.).

Woman, Culture, and Society. Stanford, CA: Stanford University Press, pp. 68-87 

[2]  ibid

 

सोमेद्र कुमार द्वारा अनुवादित

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Cover Image: Sanitary napkins made of cloth. (Image credit: The Kachra Project)

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Zeba Siddiqui is a research scholar based in Delhi. Having studied at the JNU and Delhi School of Economics, her work have been focused on sociology of public health and medicine. She has keen interest in public health polices and reproductive rights issues of women. She has written on similar issues which have been published previously.

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