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सुरक्षित स्क्रीन, सुरक्षित रिश्ते – मेरी ट्रस्टलाइन के ज़मीनी अनुभव

an illustration showing Meri Trustline with a number . The illustration shows a hand holding a phone screen with a landscape behind.

यह लेख डिजिटल रिश्तों में बनने वाली नज़दीकी, भरोसे और उनसे जुड़े जोख़िमों को समझने का प्रयास है।

Meri Trustline हेल्पलाइन पर आने वाले वास्तविक केसेस के ज़रिए यह दिखता है कि ऑनलाइन स्पेस में सहमति, सीमाएँ और सुरक्षा कैसे धीरे-धीरे टूट सकती हैं। यह लेख डिजिटल शोषण को सिर्फ़ तकनीकी या कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि एक भावनात्मक और सामाजिक अनुभव के रूप में देखने की कोशिश करता है। साथ ही, यह बताता है कि कई बार मदद की शुरुआत किसी रिपोर्ट से नहीं, बल्कि सुने जाने से होती है।

Meri Trustline एक सपोर्ट हेल्पलाइन है, जहाँ लोग डिजिटल हिंसा, ऑनलाइन शोषण, धमकी, ब्लैकमेल, निजी तस्वीरों/वीडियो के दुरुपयोग, साइबर स्टॉकिंग और डिजिटल रिश्तों में हुए नुकसान को लेकर मदत के लिए संपर्क करते हैं।

डिजिटल दुनिया आज हमारे जीवन का ज़रूरी हिस्सा बन चुकी है। जहाँ रिश्ते बनते हैं, संवाद होता है, सीखने और अभिव्यक्ति के नए अवसर खुलते हैं। लेकिन इसी डिजिटल स्पेस में असुरक्षा, उत्पीड़न और धोखाधड़ी के नए रूप भी सामने आ रहे हैं। मेरी ट्रस्टलाइन पिछले तीन वर्षों से ऑनलाइन उत्पीड़न, डिजिटल हिंसा और नेटवर्क्ड हेट से प्रभावित लोगों को सहायता प्रदान कर रही है।

मेरी ट्रस्टलाइन पर आने वाले कॉल केवल तकनीकी शिकायतें नहीं होते, बल्कि वे लोगों की घबराहट, डर, शर्म, गुस्सा और कभी-कभी टूटे हुए भरोसे की आवाज़ होते हैं। बीते वर्ष में दो हजार से अधिक लोगों ने हेल्पलाइन से संपर्क किया। अधिकतर लोगों ने सीधे फोन कॉल के माध्यम से बात की, जबकि कई लोगों ने व्हाट्सऐप और ईमेल का सहारा लिया। व्हाट्सऐप पर भी हमारी ही काउंसलर टीम बात करती है, कोई चैटबॉट नहीं होता। यह हमारी विशेषता है कि हर संवाद इंसान से इंसान के बीच होता है।

पाँच सौ से अधिक मामले हमारी हेल्पलाइन पर दर्ज हुए, जहाँ कॉलर्स को व्यावहारिक सहायता दी गई। इन मामलों में ज़रूरत के अनुसार संबंधित प्लेटफ़ॉर्म पर रिपोर्ट एस्केलेट करना, फेक अकाउंट और लिंक रिपोर्ट करवाना, टेकडाउन प्रक्रिया के जरिए आपत्तिजनक सामग्री हटवाने में मदद करना शामिल था। इसके साथ-साथ कॉलर्स को स्टेप-बाय-स्टेप तकनीकी सहायता भी दी, जैसे प्राइवेसी सेटिंग्स सुरक्षित करना, सबूत सुरक्षित रखना, पासवर्ड बदलना और सही तरीके से शिकायत दर्ज करना। जहाँ आवश्यक हुआ, वहाँ उन्हें काउंसलिंग, प्राथमिक मनोवैज्ञानिक सहायता (PFA) और ज़रूरत पड़ने पर लंबी अवधि का भावनात्मक सहयोग दिया गया। कुछ मामलों में उचित रेफ़रल की व्यवस्था की गई और सामाजिक सहयोग तंत्र से जोड़ने में भी मदद की गई, ताकि व्यक्ति को अकेला महसूस न हो।

कॉल करने वालों में महिलाओं और युवतियों की संख्या स्पष्ट रूप से अधिक रही। ऑनलाइन छवि का दुरुपयोग, मॉर्फ्ड तस्वीरें, फेक अकाउंट बनाकर बदनाम करना, ब्लैकमेल करना और निजी सामग्री के आधार पर दबाव बनाना जैसे मामले प्रमुख रूप से सामने आए। कई लड़कियों ने बताया कि शुरुआत में उन्हें कहा गया कि “चुप रहो”, “इग्नोर करो”, लेकिन आखिरकार उन्होंने मदद लेने का फैसला किया।

पुरुष कॉलर्स की संख्या अपेक्षाकृत कम रही, लेकिन पुरुषों और नाबालिग लड़कों के भी कई मामले सामने आए। उनके मामलों में सेक्सटॉर्शन, ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी, सोशल मीडिया अकाउंट हैक होना और डिजिटल पहचान का दुरुपयोग जैसे मुद्दे दिखाई दिए। विशेष रूप से सेक्सटॉर्शन के मामले अधिक रहे। कुछ कॉलर्स ने अपनी जेंडर पहचान साझा नहीं की, इससे यह भी समझ आता है कि डिजिटल हिंसा कई बार बहुत निजी और शर्म से जुड़ा अनुभव होता है। साथ ही LGBTQ+ समुदाय से भी कई कॉलर्स पहुँचे, जिन्हें डेटिंग ऐप्स के माध्यम से उत्पीड़न और ब्लैकमेल का सामना करना पड़ा।

उम्र के हिसाब से देखें तो पंद्रह से पच्चीस साल के किशोर और युवा सबसे ज्यादा प्रभावित रहे। स्कूल और कॉलेज के बच्चे सोशल मीडिया पर ज्यादा सक्रिय होते हैं और कई बार जल्दी भरोसा कर लेते हैं। दोस्ती के नाम पर फुसलाना, निजी फोटो माँगना और बाद में उसी से ब्लैकमेल करना यह एक बार-बार दिखने वाला पैटर्न है। रिश्ते टूटने के बाद निजी चैट या तस्वीरें वायरल करने की धमकी देना भी एक गंभीर समस्या बनकर सामने आया।

यह भी स्पष्ट हुआ कि डिजिटल जोखिम केवल युवाओं तक सीमित नहीं है। मध्यम आयु वर्ग और वरिष्ठ नागरिकों ने भी हेल्पलाइन से संपर्क किया, विशेषकर आर्थिक ठगी, ऑनलाइन धोखाधड़ी और सेक्सटॉर्शन के मामलों में। कुछ मामलों में बच्चों की तस्वीरें परिवार के सदस्यों द्वारा सोशल मीडिया पर साझा की गईं, जिनका बाद में दुरुपयोग हुआ। इससे डिजिटल शेयरिंग और बच्चों की ऑनलाइन गोपनीयता का मुद्दा भी गंभीरता से सामने आया।

भौगोलिक दृष्टि से कॉल देश के विभिन्न हिस्सों से आए। प्रमुख महानगरों के साथ-साथ छोटे शहरों और कस्बों से भी लोग सहायता के लिए पहुँचे। महाराष्ट्र से संपर्क करने वालों की संख्या अधिक रही, लेकिन उत्तर भारत, पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तर-पूर्वी राज्यों सहित अन्य क्षेत्रों से भी उल्लेखनीय मामले सामने आए। कुछ मामले विदेशों से भी प्राप्त हुए, जहाँ भारतीय मूल के लोग डिजिटल उत्पीड़न या धोखाधड़ी का सामना कर रहे थे। यह दर्शाता है कि डिजिटल असुरक्षा सीमाओं से परे एक साझा चुनौती है।

भाषा के संदर्भ में भी विविधता देखने को मिली। कॉलर्स हिंदी, अंग्रेज़ी और मराठी सहित विभिन्न भाषाओं में अपनी बात रखते हैं। कुछ कॉल बंगाली और दक्षिण भारत के राज्यों से भी आए, जहाँ हमें कई बार भाषा अनुवादक की सहायता लेनी पड़ी। कई लोग केवल अपनी मातृभाषा में ही सहज महसूस करते हैं। भाषा की बाधा के कारण कई बार औपचारिक शिकायत दर्ज करना या प्लेटफ़ॉर्म की प्रक्रिया समझना कठिन हो जाता है। ऐसे में धैर्य से सुनना, सरल भाषा में समझाना और भरोसा देना बहुत ज़रूरी होता है।

इन सब अनुभवों से एक बात साफ है, डिजिटल असुरक्षा सिर्फ तकनीकी समस्या नहीं है। यह भावनाओं, रिश्तों और भरोसे से जुड़ी हुई बात है। इसलिए सिर्फ तकनीकी समाधान काफी नहीं हैं। ज़रूरत है संवेदनशील, भरोसेमंद और इंसानी सहायता की, ताकि लोग डर के बजाय विश्वास के साथ मदद ले सकें।

यहाँ आने वाले ज़्यादातर कॉलर बातचीत की शुरुआत इस तरह नहीं करते कि “मेरे साथ अपराध हुआ है।”, “मेरे साथ हिंसा हुई है।”

अक्सर लोग ख़ुद से ही सवाल करने लगते हैं,
“शायद मेरी ही गलती थी।”
“मैंने ही भरोसा किया था।”
“सब कुछ सहमति से हुआ था।”
“मैंने ख़ुद फोटो भेजी थी।”
“हम रिलेशनशिप में थे।” इत्यादि

Meri Trustline की भूमिका यहीं से शुरू होती है – डर, गिल्ट और शर्म के उस बोझ को पहचानना, और यह समझने में मदद करना कि भरोसा करना कोई अपराध नहीं है। यह हेल्पलाइन केवल तकनीकी या कानूनी जानकारी तक सीमित नहीं है। यहाँ बातचीत, भावनात्मक सहारा और ज़रूरत पड़ने पर आगे के विकल्पों पर भी साथ-साथ काम किया जाता है।

आज के वक्त में रिश्ते या रिलेशनशिप सिर्फ़ फेस-टू-फेस या आमने सामने नहीं बनायें जाते, बल्कि डेटिंग ऐप्स, सोशल मीडिया, चैट, वीडियो कॉल और डिसअप्पेअरिंग मैसेजेस के ज़रिए भी आगे बढ़ रहे हैं। भले ही डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने एक दूसरे से जुड़ने के नए रास्ते खोले हैं पर कुछ नए तरीके के जोख़िम भी उत्पन्न हुए हैं,जहाँ रिश्तों में असमानता, दबाव और डर बहुत आसानी से जगह बना लेते हैं। कई बार यह सब इतना धीरे-धीरे होता है कि सामने वाले यह भी नहीं समझ पाते कि कब रिश्ता असहज और असुरक्षित हो गया।

सहमति की उलझन
कई कॉल्स और मैसेज में एक बात बार-बार सामने आती है, लोग सहमति को एक बार का फ़ैसला मान लेते हैं। जैसे अगर उस वक्त ‘हाँ’ कहा था, तो बाद में सवाल उठाने का हक़ ही नहीं बचता।

लेकिन ज़मीनी अनुभव कुछ और बताते हैं। रिश्ते बदलते हैं। भावनाएँ बदलती हैं। हालात बदलते हैं। ऐसे में सहमति भी बदल सकती है। फ़िर भी डिजिटल रिश्तों में अक्सर यह उम्मीद की जाती है कि जो चीज़ कभी साझा की गई थी, उस पर सामने वाले का हमेशा के लिए अधिकार हो गया।

कई लोग यह बात बहुत देर से समझ पाते हैं कि सहमति सिर्फ़ कंटेंट बनाने या भेजने तक सीमित नहीं होती। सहमति इस बात की भी होती है कि उस कंटेंट का इस्तेमाल कैसे होगा, कहाँ होगा और कब तक होगा।

जब यह सीमाएँ टूटती हैं, तो नुकसान सिर्फ़ ऑनलाइन नहीं रहता। उसका असर असल जिंदगी जैसे नींद, पढ़ाई, काम, रिश्तों और मानसिक स्वास्थ्य तक पर पड़ता है।

जब भरोसा डर में बदल जाता है
Meri Trustline हेल्पलाइन पर आने वाले बहुत से मामलों में एक समय ऐसा होता है जब रिश्ता ठीक चल रहा था। बातें होती थीं, वीडियो कॉल होते थे, भविष्य की बातें होती थीं। उस वक़्त निजी फोटो या वीडियो साझा करना कई लोगों के लिए भरोसे का हिस्सा था।

लेकिन जब रिश्ता टूटता है – या कोई मना करता है, दूरी बनाता है तो वही चीज़ें डर का कारण बन जाती हैं।
“अगर उसने यह सब फ़ैला दिया तो?”
“अगर मेरे घर वालों को पता चल गया तो?”
“अगर कॉलेज या ऑफिस में बात फ़ैल गई तो?”

कई लोग सिर्फ़ धमकी की वजह से महीनों तक डर में जीते रहते हैं, भले ही कंटेंट कहीं डाला भी न गया हो। यह डर ही काफ़ी होता है किसी को चुप कराने के लिए।

यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि नुकसान सिर्फ़ ‘लीक’ होने से नहीं होता। नुकसान उस अनिश्चितता और असुरक्षा से भी होता है, जिसमें कोई रोज़ जीते है।

जेंडर और सामाजिक असमानता
हमारे अनुभव बताते हैं कि डिजिटल शोषण सभी को बराबर तरीके से प्रभावित नहीं करता। इसमें बच्चे, महिलाएँ और LGBTQ+ समुदाय के लोग ज़्यादा निशाना बनाए जाते हैं।

कई बार अपराधी यह जानते हैं कि समाज किस बात पर चुप हो जाता है – यौनिकता, रिश्ते, “इज़्ज़त”, परिवार की बदनामी – इसी डर का इस्तेमाल करके दबाव बनाया जाता है।

LGBTQ+ युवाओं के मामलों में यह डर और भी ग़हरा होता है। कुछ लोगों ने अभी तक अपने परिवार को अपनी पहचान नहीं बताई हुई होती है। ऐसे में “सबको बता दूँगा” जैसी धमकी बहुत भारी पड़ती है। हमें ऐसे लोग  मिले हैं जहाँ वे  सिर्फ़ इस डर से बाहर निकलना ही छोड़ देते हैं, सोशल मीडिया से, दोस्तों से, कभी-कभी ज़िंदगी से भी।

ये बातें हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि डिजिटल हिंसा सिर्फ़ टेक्नोलॉजी की समस्या नहीं है। यह समाज में पहले से मौजूद असमानताओं का ही विस्तार है। और वह किसी के असल जिंदगी में कितनी प्रभावित हो सकती है।  

सेफ्टी टिप्स और असली ज़रूरत – ऑनलाइन सुरक्षा पर बात करते समय अक्सर कुछ तयशुदा सलाहें दी जाती हैं, जैसे की –

“अजनबियों से बात मत करो।”

“फोटो मत भेजो।”

“ब्लॉक कर दो।”

इन बातों में सच्चाई है, लेकिन यह पूरी कहानी नहीं है। जब पूरा ज़ोर इस पर होता है कि पीड़ित/सर्वाइवर  ने क्या किया या क्या नहीं किया, तो शोषण करने वाले की ज़िम्मेदारी पीछे छूट जाती है।

Meri Trustline पर कई बार हमें सबसे पहले सामने वाले का ख़ुद पर से दोष हटाने का प्रयास करना पड़ता है – लोग इतने गिल्ट में होते हैं कि मदद लेने से पहले भी डरते हैं।

कई बार एक वाक्य से बहुत फ़र्क होता है – “आपने जो किया, वह भरोसे में किया था। इसमें आपकी कोई ग़लती नहीं है।”

रिश्ते, ब्रेकअप और सत्ता
एक सवाल जो हमें बार-बार परेशान करता है, वह यह है की जब रिश्ता ख़त्म  होता है, तो सत्ता किसके पास रह जाती है?

क्या ब्रेकअप के बाद भी सामने वाले की निजी चीज़ों की ज़िम्मेदारी  बनी रहती है? क्या नज़दीकी का मतलब हमेशा के लिए नियंत्रण होता है?

डिजिटल रिश्तों में यह सवाल और भी ज़रूरी हो जाता है, क्योंकि वहाँ कंटेंट आसानी से कॉपी, सेव और शेयर किया जा सकता है।हमारे अनुभव बताते हैं कि बहुत से लोग ब्रेकअप को बदले की वजह बना लेते हैं। जैसे रिश्ता ख़त्म होने के साथ ही सम्मान और ज़िम्मेदारी भी ख़त्म हो गई हो।

ब्रेकअप के बाद भावनाएँ संभालना किसी के लिए भी आसान नहीं होता। दुःख, ग़ुस्सा और उलझन स्वाभाविक हैं। लेकिन इन भावनाओं के साथ क्या किया जाए, इस पर थोड़ा ठहरकर सोचना ज़रूरी है। हर कहानी ‘कबीर सिंह’ जैसी नहीं होनी चाहिए, जहाँ दर्द नियंत्रण या ज़िद में बदल जाए। कभी-कभी ‘विवाह’ फ़िल्म के प्रेम की तरह रुककर, सुनकर और सामने वाले की सीमाओं का सम्मान करते हुए आगे बढ़ना भी एक रास्ता होता है। रिश्ता रहा हो या ख़त्म हुआ हो, देखभाल और ज़िम्मेदारी बनी रह सकती है, क्योंकि असली ताक़त दबाव या नियंत्रण में नहीं, बल्कि संयम, समझ और बराबरी में होती है।

मानसिक स्वास्थ्य
ऑनलाइन शोषण का असर अक्सर लंबे समय तक रहता है। डर, शर्म, नींद न आना, पढ़ाई या काम में मन न लगना, ये सब बहुत आम है।कुछ लोग बार-बार फोन चेक करते रहते हैं।
कुछ सोशल मीडिया पूरी तरह छोड़ देते हैं।
कुछ किसी से बात ही नहीं करना चाहते।

इन हालात में सिर्फ़ “रिपोर्ट कर दो” कहना काफ़ी नहीं होता। कई लोगों को पहले भावनात्मक सहारे की ज़रूरत होती है, कोई जो सुने, समझे और जल्दबाज़ी न करे। Meri Trustline पर हमारा काम इसी संतुलन को समझने की कोशिश करता है, जहाँ कानूनी और तकनीकी मदद के साथ-साथ मानसिक/भावनात्मक सहारा भी उतना ही ज़रूरी है।

आगे की दिशा
डिजिटल नज़दीकी अपने आप में ग़लत नहीं है। लोग जुड़ना चाहते हैं, भरोसा करना चाहते हैं। लेकिन नज़दीकी तब ही सुरक्षित हो सकती है, जब उसमें देखभाल, सम्मान और जवाबदेही हो।

हमें सहमति को सिर्फ़ एक शब्द या टिक बॉक्स की तरह नहीं, बल्कि एक लगातार चलने वाली बातचीत की तरह समझना होगा।हमें यह मानना होगा कि ब्रेकअप बदले का लाइसेंस नहीं होता।और हमें यह भी समझना होगा कि ऑनलाइन हुआ नुकसान भी उतना ही असली है, जितना ऑफलाइन।

शायद असली सवाल यह नहीं है कि लोग डिजिटल रिश्ते क्यों बना रहे हैं।शायद सवाल यह है कि क्या हम डिजिटल रिश्तों में भी सम्मानजनक बने रह पा रहे हैं?

Meri Trustline के अनुभव हमें रोज़ यही याद दिलाते हैं कि लोग नियंत्रण नहीं चाहते। वे बस सुरक्षित रहना चाहते हैं, अपनी पहचान, अपने रिश्तों और अपनी ज़िंदगी के साथ।

Meri Trustline हेल्पलाइन

फोन नंबर – 6363176363
समय – सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक
कार्य दिवस – सोमवार से शुक्रवार

Cover image by Siddharth Shivshankar, RATI Foundation (Meri Trustline Annual Report Vol. 2, 2023–2024)