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क्या चुनना ज़रूरी है? जेंडर बाइनरी की वैधानिक और भाषिक हिंसा पर विचार

gender bathroom signage in red neon lighting

हिंदी एक जेंडर्ड भाषा है। हिंदी एक ऐसी भाषा है जो उन लोगों के लिए एक अद्भुत समस्या पैदा करती है जो ख़ुद को द्विलिंगी ढांचों (जेंडर बाइनरी) में नहीं देखते। हिंदी भाषा का जेंडर्ड होना उन लोगों के लिए एक ऐसी चुनौती प्रस्तुत करता है जो ख़ुद को जेंडरक्वीयर या नॉन-बाइनरी पहचानने की वजह से दूसरों से मिसजेण्डर (गलत जेंडर के रूप में संदर्भित किए जाने) का जोख़िम तो उठाते ही हैं, बल्कि स्वयं को भी मजबूरी में गलत जेंडर में संबोधित करने के तनाव से रोज़ गुज़रते हैं। जेंडर से जुडी ऐसी रोज़मर्रा की तनावपूर्ण स्थितियां बहुत से जेंडरक्वीयर या नॉन-बाइनरी लोगों को हिंदी भाषा से विमुख कर देती है। इसकी एक बड़ी वजह यह है की हिंदी भाषा में हर आत्म-संदर्भित वाक्य में वक्ता को अपने जेंडर का खुलासा करना पड़ता है – ऐसी स्थिति जेंडरक्वियर और नॉन-बाइनरी लोगों को हर समय यह निर्णय लेने पे मजबूर करती है कि क्या वे स्वयं को ‘आउट’ करेंगे या वाक्य दर वाक्य अपने जेंडर को छिपाते हुए किसी द्विलिंगी ढांचे में पुनः स्थापित कराएंगे। ऐसी ही कुछ चुनौतियों से गुज़रने के कारणवश, व्याकरणिक नियमों को तोड़ती हुई यह एक लेखनी है। भूल चूक माफ़ करें।

“हम-हम कर के बात करना”

मेरा नाम प्रेरणा है – हम झारखण्ड-बिहार के रहने वाले हैं। मेरे ‘हम-हम’ कर के ख़ुद को सम्भोधित करने की पहली वजह यह है जिससे की बहुत से लोग जो बिहार-झारखण्ड में बोली जाने वाली हिंदी की विविधताओं से परिचित होंगे वो इस बात से वाकिफ़ होंगे। इन कुछ राज्यों में रहने वाले या बचपन बिताने वाले लोगों ने ख़ास कर के अनुभव किया होगा। उदाहरण के तौर पर, बिहार-झारखण्ड की हिंदी में अक्सर लोग ‘मैं’ की जगह ‘हम’ बोलते हैं, जो वहाँ की बोलचाल का एक खास अंदाज़ है। ऐसे बात करना भले ही कुछ हद तक देहाती या असंसोधित प्रतीत हों पर हम जैसे जेंडरक्वीयर और नॉन-बाइनरी लोगों को ऐसी बोली एक संभावित विकल्प प्रदान करती है।

मेरा काम कानून और जेंडर थ्योरी के ऊपर है। हालाँकि मेरा काम और रीसर्च एक बड़ी वजह है हिंदी भाषा से जुडी इस चुनौती के प्रसंग में लिखना, पर हिंदी से जुडी इन चुनौतीयों से निजि जीवन में गुज़रना भी एक वजह है। तरशी के इस संपादन में लिखने की बड़ी वजह यह दर्शाना है की हिंदी भाषा किस हद्द तक हमारे बोलने व सोचने का तरीका सीमित करती हैं।

आज एक शिक्षक की हैसियत से लिखते हुए, यह मेरा मानना है की कानूनी नियमों और हिंदी भाषा के व्याकरणिक नियमों में एक ऐसी समानता है जो द्विलिंगी ढांचों अर्थात जेंडर बाइनरी में न आने वाले लोगों को बहिष्कृत करती है। कानून की नींव परिभाषाओं पर आधारित होती है। कानूनी परिभाषाों में इतनी ताकत होती है की वे यह तक तय करती है की किन लोगों को विधिक व्यक्तित्व (लीगल पर्सनालिटी) प्राप्त होगी और किन्हें नहीं। इन्ही कानूनी परिभाषाओं के प्रसंग में एक दिन कक्षा में चर्चा हुई की “क्या हिंदू विवाह अधिनियम (हिन्दू मैरिज एक्ट, १९५५) की धारा ५ में उल्लिखित ‘दुल्हन’ (‘ब्राइड’) शब्द का अर्थ केवल महिलाओं तक सीमित है, या इसमें ट्रांसजेंडर लोगों को भी शामिल किया जा सकता है?”

अरुण कुमार बनाम इंस्पेक्टर जनरल ऑफ रजिस्ट्रेशन (२०१९) में इस सवाल का जवाब देते हुए माननीय न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि यदि कोई पुरुष और ट्रांसवुमन, जहाँ दोनों ही हिंदू धर्म का पालन करते हों, तो उनके मध्य संपन्न विवाह हिंदू विवाह अधिनियम, १९५५ के तहत वैद्य होगा। न्यायालय ने यह भी कहा कि ट्रांसजेंडर लोगों को अपने स्वयं-चयनित जेंडर (सेल्फ आयडेंटिफ़िएड जेंडर) को मान्यता दिलाने का अधिकार प्राप्त है, जिसकी पुष्टि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) बनाम भारत संघ (२०१४) के निर्णय में की जा चुकी है। गौर कीजियेगा की २०२३ में भारत के उच्चतम न्यायालय ने सुप्रियो बनाम भारत संघ के निर्णय में क्वीयर लोगों को शादी के अधिकार से वंचित रखा। माननीय न्यायालय ने कहा कि समलैंगिक जोड़ों को शादी का मौलिक अधिकार नहीं है और शादी सिर्फ पुरुष और महिला के बीच हो सकती है। हालाँकि अरुण कुमार बनाम इंस्पेक्टर जनरल ऑफ रजिस्ट्रेशन में मद्रास उच्च न्यायालय ने ट्रांस महिला को ‘दुल्हन’ मानकर उसकी शादी को वैध माना था, सुप्रियो केस में न्यायालय इस सोच से पीछे हट गई। अब सिर्फ वही ट्रांस लोग शादी कर सकते हैं जो महिला-पुरुष की परिभाषा में फिट होते हैं, जैसे ट्रांस पुरुष और सिस महिला, या ट्रांस महिला और सिस पुरुष। लेकिन ट्रांस महिला और एक दूसरी महिला (ट्रांस या सिस) के बीच शादी को न्यायालय ने मान्यता नहीं दी। यह सीमित स्वीकृति दिखाती है कि कानून कैसे धीरे-धीरे, चुपचाप, और शर्तों के साथ क्वीयर लोगों को अधिकार देता है। जेंडर थ्योरी के विद्वान, एंड्रयू शार्प ऎसी स्तिथियों को “कानून की होमोफोबिया” कहकर व्याख्यायित करते हैं । यह एक ऐसा तरीका है जिसमें कानून सीधे मना नहीं करता, बल्कि कुछ शर्तों के साथ ही पहचान और अधिकार देता है – और बाकी को बाहर कर देता है। न्यायालय की इस सीमित व्याख्या के कारण, कोई भी जो नॉन-बाइनरी पहचान रखते है और विवाह करना चाहते है, उन्हें कानूनी मान्यता प्राप्त करने के लिए जेंडर बाइनरी (स्त्री-पुरुष) ढांचे में ख़ुद को ढालना पड़ेगा। उन्हें पुरुष या महिला के रूप में ही सामने आना होगा। हिंदी व्याकरण के नियमों में भी इसी तरह की तर्क प्रणाली कार्य करती है जहाँ भाषा की संरचना भी हर किसी को किसी एक जेंडर में बांधने के लिए बाध्य करती है।

Cover image by Nicolas COMTE on Unsplash