A digital magazine on sexuality in the Global South: We are working towards cultivating safe, inclusive, and self-affirming spaces in which all individuals can express themselves without fear, judgement or shame
Ageing and SexualityCategoriesहिन्दी

उम्मीद न छोड़ें? उम्र के बढ़ने और उम्र संबंधित पक्षपात की ओर भारतीय क्वीयर आंदोलनों का रवैया 

पवन ढल   

सैद्धांतिक रूप से यौनिकता को अक्सर पूरी तरह से परिवर्तनशील बता कर परिभाषित किया जाता रहा है। इसका अर्थ यह हुआ कि अलगअलग समय में एक ही व्यक्ति को अपनी यौनिकता से अलग अनुभव हो सकते हैं, या फिर एक सामाजिक समूह के लोग अपनी यौनिकता को जीवन के विभिन्न चरणों में अलगअलग तरह से अनुभव कर सकते हैं। इस संदर्भ में यह उचित जान पड़ता है कि भारत के क्वीयर समुदायों में उम्र बढ़ने और उम्र संबंधित पक्षपात को लेकर धारणाओं के बारे में विचार किया जाये। मुझे जादवपुर विश्वविद्यालय द्वारा कोलकाता में Ageing, Ageism and Culture विषय पर आयोजित राष्ट्रीय कॉन्फ़्रेंस में इस विषय पर अपने विचार रखने का अवसर मिला था। वहाँ मैंनेउम्मीद छोड़ें? उम्र के बढ़ने और उम्र संबंधित पक्षपात की ओर भारतीय क्वीयर आंदोलनों का रवैया शीर्षक से इस विषय पर अपना आरंभिक लेख प्रस्तुत किया था और यह प्रस्तुत लेख उसी पर आधारित है। 

क्वीयर संदर्भ पर ध्यान दें तो मुझे ऐसा लगता है कि यह एक बड़ा विस्तृत विषय है। इसलिए मुझे लगता है कि मैं यहाँ इस संदर्भ में केवल भारत में समलैंगिक या गे कहे जाने वाले (और कुछ हद तक बाईसेक्सुयल) पुरुषों के बारे में ही चर्चा करूँ, हालांकि यहाँ मेरा यह कहना भी अतिशयोक्ति ही माना जाएगा कि मैं भारत के सभी समलैंगिक पुरुषों की स्थिति का प्रतिनिधित्व कर रहा हूँ। मैं खुद को बहुत लंबे समय सेसमलैंगिकयागेसमझता रहा हूँ और आज भी खुद को समलैंगिक ही मानता हूँ, इसलिए मैं यहाँ केवल समलैंगिक पुरुषों में उम्र बढ़ने और उम्र संबंधित पक्षपात पर बात करने की स्वतंत्रता ले रहा हूँ। यहाँ मैं मुख्य रूप से शहरों में रहने वाले समलैंगिक पुरुषों पर बात करूंगा, लेकिन ज़रूरी नहीं है कि वे सभी अँग्रेजी बोलने वाले समलैंगिक पुरुष ही हों। 

प्रस्तुत किए गए अपने इस आरंभिक लेख में मैंने त्रिकोण, प्रवर्तक और बॉम्बे दोस्त जैसी पत्रिकाओं में छपे लेखों के विश्लेषण को आधार बना कर यह बताने का प्रयास किया है कि बीसवीं शताब्दी के आखिरी और इक्कीसवीं शताब्दी के पहले दशक में कोलकाता में (और भारत में भी) क्वीयर आंदोलन ने उम्र बढ़ने और उम्र संबंधित पक्षपात पर किस तरह से प्रतिक्रिया की। 20 वर्षों के दौरान इस विषय पर लिखे गए और प्रकाशित हुए कुछ ही लेख मुझे मिल पाये।[1] फिर भी अगर हम इनमें लिखी गयी जानकारी पर ध्यान दें तो हमें ज़रूर कुछ नया सोचने को मिलेगा। 

ऐसा लगता है कि क्वीयर जगत के सामाजिक परिवेश में बड़ी उम्र के समलैंगिक पुरुषों को बढ़ती उम्र के कारण होने वाले भेदभाव का अधिक सामना करना पड़ता है, और यह बात क्वीयर लोगों की सामाजिक सहायता के लिए बने समूहों पर भी लागू होती है। उदाहरण के लिए, भारत के सबसे पुराने क्वीयर सहायता समूह में से एक, काउंसेल क्लब में 1993 से 1998 के बीच पाँच वर्षों की अवधि में, इसके कोर ग्रुप में 40 वर्ष से ज़्यादा आयु के सदस्यों की संख्या कभी भी 15 प्रतिशत से अधिक नहीं रही थी (जबकि इसके अधिकांश सभी सदस्य पुरुष ही थे)[2] 

यह संभव है कि क्वीयर प्रकाशनों में बढ़ती उम्र के कारण होने वाले भेदभाव का एक कारण यह भी रहा हो कि व्यक्ति केआकर्षक दिखने’, ‘चुस्तहोने औरसक्षमहोने को अच्छा समझा जाता है। ऐसा नहीं है कि इन २० वर्षों की अवधि में प्रकाशित हुए लेखों में 40 वर्ष से ज़्यादा उम्र के समलैंगिक पुरुषों का उल्लेख नहीं मिलता है। लेकिन अगर प्रकाशित हुए चित्रों के आधार पर तुलना करें तो हम देखते हैं कि  बड़ी उम्र के समलैंगिक पुरुषों को लेखों में इसलिए स्थान मिला था क्योंकि उन्होनें अपने जीवन में बहुत कुछ अर्जित किया था। वहीं कम उम्र के पुरुष इन लेखों में छपे चित्रों में, अन्य कारणों के साथसाथ, अपने सजीव और जवान दिखाई देने के कारण भी आसानी से जगह बना पाये थे। वैसे भी पुरुषों के बीच सेक्स और प्रेम को दर्शाने के लिए आमतौर पर आकर्षक और बलिष्ठ पुरुष शरीर को ही दर्शाया जाता रहा है। 

काउंसेल क्लब के कोर ग्रुप की सदस्यता के इन आंकड़ों का एक कारण यह भी हो सकता है कि इस समूह में 40 वर्ष से ज़्यादा उम्र के समलैंगिक पुरुषों की संख्या बहुत कम थी। लेकिन फिर सवाल यह भी उठता है कि आखिर ऐसा क्यों, क्यों समूह में 40 से अधिक उम्र के सदस्यों की संख्या इतनी कम रही थी। क्या इसका कारण यह रहा होगा कि बड़ी उम्र के समलैंगिक पुरुषों को सहायता और समर्थन की उतनी आवश्यकता महसूस नहीं होती जितनी कि कम उम्र के पुरुषों को थी? बड़ी उम्र के समलैंगिक पुरुषों के विवाहित होने की संभावना भी अधिक थी। क्या इसका अर्थ यह था कि उन्हे अधिक सामाजिक समर्थन मिल रहा था या फिर वे एकाकीपन की समस्या से उतना अधिक प्रभावित नहीं थे? हम निश्चित तौर पर कुछ नहीं कह सकते, लेकिन इतना तो साफ था कि विवाहित समलैंगिक पुरुषों को भी क्वीयर जगत में भेदभाव का सामना करना पड़ रहा था। 

मैंने जिन प्रकाशित लेखों को पढ़ा और समीक्षा की, उनमें विषमलैंगिक विवाह संबंधित सामाजिक दबाब को माना गया था। इसके अलावा इन लेखों में समलैंगिक संबंध रखने वाले विवाहित पुरुषों द्वारा यह कहे जाने की भी तीखी आलोचना हुई थी कि, ‘मेरी पत्नी को मेरे संबंधों पर कोई ऐतराज इसलिए नहीं होना चाहिए क्योंकि मैं उसे किसी तरह की कोई कमी नहीं रहने देता हूँ लेकिन साथ ही साथ इन लेखों में ऐसी अनुचित अपेक्षा भी दिखाई पड़ी कि समलैंगिक पुरुष तो विवाह बंधन का विरोध आसानी से कर सकते हैं सिर्फ़ इसलिए कि वे पुरुष हैं। इसलिए यह तो स्पष्ट था कि बढ़ती उम्र और विवाह के इस मेल में उम्र संबंधित पक्षपात भी दिखाई दे रहा था। यहाँ हम यह भी जोड़ सकते हैं कि समलैंगिक पुरुष किस तरह से बाईसेक्सुयल लोगों को नकारात्मक और संदेह भरी नज़रों से देखते हैं क्योंकि उन्हें ऐसा लगता है कि बाईसेक्सुयल लोगों पर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए (विषमलैंगिक विवाह सम्बन्धों में बंधे समलैंगिक पुरुषों के प्रति भी ऐसी ही धारणा होती है क्योंकि अपनी सामाजिक स्थिति के कारण ये लोग व्यवहार में बाईसेक्सुयल हो सकते हैं), लेकिन संभवत: इस विचार का अलग से विश्लेषण किया जाना चाहिए। 

इसके बाद मैं बताना चाहूँगा कि इन लेखों में और क्या विशेष बात नज़र आई। इनमें से कम से कम एक लेख में यह बताया गया था कि बड़ी उम्र के समलैंगिक पुरुषों को युवा समलैंगिक पुरुषों की तुलना में अधिक अनुभव होता है, वे अधिक दूरदर्शी होते हैं और संसाधनों तक उनकी पहुँच भी अधिक होती है और इन सबका लाभ उन्हें, खास कर दो पीढ़ियों के बीच के समलैंगिक सम्बन्धों के संदर्भ में मिलता है। यहाँ पर, बॉलीवुड के फिल्म जगत के कुछ उदाहरण देना ठीक रहेगा। बड़ी उम्र के समलैंगिक पुरुषों पर किसीचाकलेट बॉयके प्रभाव की तुलना में, अपनी शक्लसूरत और शारीरिक बनावट के कारण बॉलीवुड के मार्क ज़ुबैर और विनोद खन्ना जैसे सरीखे लोगों का युवा समलैंगिक पुरुषों पर कहीं अधिक प्रभाव रहा। इसीलिए ऐसा नहीं कह सकते कि इस तरह के सम्बन्धों में असमान शक्ति संतुलन और शोषण की संभावना केवल एक ही दिशा में, या युवाओं के ही पक्ष में थी।    

इन लेखों में यह भी बताया गया था कि समलैंगिक पुरुषों के मन मेंबढ़ती उम्र को लेकर चिंतारहती हैउनकी यह चिंता केवल आने वाले समय में क्या होगा को लेकर होती है, बल्कि वर्तमान में भी अपनी बढ़ती उम्र के कारणप्रभावहीनहो जाने का भय उन्हे सताता रहता है। इन लेखों में हालांकि विस्तार से यह चर्चा नहीं की गयी थी कि इस तरह की चिंता का इन युवा समलैंगिक पुरुषों के मानसिक और यौन स्वास्थ्य पर किस तरह का असर होता है। लेकिन अगर यह बताया भी गया होता तो निश्चित तौर पर एचआईवी रोग के प्रसार के कारण यह प्रभाव सकारात्मक तो बिलकुल नहीं होता। इन लेखों में समलैंगिक पुरुषों द्वारा आत्महत्या करने या आत्महत्या की कोशिश की बात ज़रूर की गयी थी, और आत्महत्या करना या इसकी कोशिश करना केवल किसी खास उम्र के पुरुषों तक ही सीमित नहीं था। 

अब सवाल यह उठता है कि बड़ी उम्र के (और युवा भी) समलैंगिक पुरुषों की भलाई सुनिश्चित करने के लिए इन समस्याओं के संदर्भ में सिविल सोसाइटी संस्थाओं (एनजीओ और सीबीओ) और सरकार द्वारा क्या कोई कोशिश की गयी है? जहां तक सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की बात है तो नीतियाँ बनाकर कुछ करने की दिशा में तो कुछ ज़्यादा काम नहीं हुआ है, और कानून की धारा 377* द्वारा उत्पन्न बाधा तो ज़ाहिर है ही। धारा 377 के होते हुए भी, पुरुषों के साथ सेक्स करने वाले पुरुषों (males who have sex with males or MSM) के बीच चलाये जा रहे राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम और सिविल सोसाइटी के दूसरे कामों में 40 वर्ष से बड़ी उम्र के समलैंगिक पुरुषों की ओर विशेष रूप से कोई ध्यान नहीं गया है। राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम की एचआईवी पर नयी कार्यकारी योजना[3] में पुरुषों के साथ सेक्स करने वाले पुरुषों (MSM) में युवाओं और दूसरे जनसंख्या समूहों के जोखिम पर ध्यान दिया जा रहा है, हालांकि ऐसा भी अभी हाल ही में शुरू हुआ है।[4] बड़ी उम्र के आयु वर्ग के पुरुषों के लिए इस योजना में कोई उल्लेख नहीं मिलता, बस सामान्य रूप से यह ज़िक्र है कि 15 से 49 वर्ष के यौन रूप से सक्रिय लोगों में एचआईवी संक्रमण की आशंका अधिक होती है।   

अगर हम पीछे मुड़ के देखें तो 1990 में और 2000 के दशक में काउंसेल क्लब और हमसफर ट्रस्ट जैसे क्वीयर सहायता समूहों द्वारा किए गए कामों में युवा समूह की विशेष ज़रूरतों को पूरा किए जाने की आवश्यकता साफ महसूस होती है। 1996 में, काउंसेल क्लब को अखबार में यौन स्वास्थ्य पर छपने वाले एक कॉलम के माध्यम से, 18 से 25 आयु वर्ग के क्वीयर युवाओं से बड़ी संख्या में पत्र मिलने के बाद, युवाओं की समस्याओं पर विचार करने के लिए अलग से एक मंच स्थापित किया गया था।[5] यह प्रयोग बहुत लंबे समय तक नहीं चला लेकिन 40 वर्ष से ऊपर की उम्र के लोगों की समस्याओं पर खास तौर पर विचार करने के लिए ऐसे किसी मंच की स्थापना पर कभी भी विचार नहीं किया गया। 

क्या बड़ी उम्र के समलैंगिक (और बाईसेक्सुयल) पुरुषों के सामने बेहतर सामाजिक जीवन व्यतीत करने के लिए आज कुछ विकल्प मौजूद हैं? जिम और फ़िटनेस सेंटरों में आने वाले लोगों की संख्या को देखें तो इनमें बड़ी उम्र के पुरुषों (क्वीयर पुरुषों सहित) की तादाद बहुत अधिक दिखाई पड़ती है। सोश्ल मीडिया पर भी बड़ी उम्र के क्वीयर पुरुष भी ज़्यादा दिखाई देते हैं, लेकिन फेसबूक पर जिन दो क्वीयर समर्थक समूहों से मैं जुड़ा हूँ, वहाँ बड़ी उम्र के सदस्यों की गिनती करने पर पता चलता है कि इन लोगों की संख्या युवा आयु (नवयुवा उम्र से 35 वर्ष के बीच) के क्वीयर पुरुषों की संख्या की आधी भी नहीं है। ऐसा भी देखा गया है कि क्वीयर लोगों के रेनबो आयोजनों में भी बड़ी उम्र के क्वीयर पुरुष ज़्यादा देखने को नहीं मिलते। मेरे एक 60 वर्षीय बाईसेक्सुयल मित्र का तो कहना है कि इन क्वीयर पार्टियों में युवाओं की संख्या इतनी अधिक होती है कि ऐसी पार्टियों में भाग लेना ही ज़्यादा बेहतर महसूस होने लगा है। 

यह सही है कि इन तथ्यों पर विस्तार से शोध कर जांच किए जाने की ज़रूरत है। लेकिन फिर भी, जो कुछ दिखाई दे रहा है उससे यह तो पता चलता है कि बड़ी उम्र के लोगों को बेहतर मानसिक और सामाजिक सहयोग देने के लिए कोशिश किए जाने की ज़रूरत है, और यह सहयोग सभी उम्र के लोगों को उनकी आयु वर्ग के अनुरूप होना चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य पर हाल ही में आए कानून[6] में भी जेंडर पहचान और यौनिक रुझानों से जुड़े मुद्दों को स्वीकार किया गया है और स्वास्थ्य के अधिकार और भेदभाव से मुक्ति पर ज़ोर दिया गया है। सुनने में यह भले ही बहुत बड़ी कल्पना की उड़ान, ज़रूरत से ज़्यादा विश्वास और व्यावहारिकता से परे की बात लगती हो, लेकिन यह कानून कम से कम हमारे लिए एक ऐसा दायरा, एक खाका प्रस्तुत करता है जिसके तहत हम विभिन्न जनसंख्या समूहों की ख़ास ज़रूरतों पर ध्यान दे सकते हैं, और समलैंगिक पुरुषों में बढ़ती उम्र और उम्र संबंधित पक्षपात के कारण मानसिक स्वास्थ्य पर होने वाले असर भी ऐसी ही कुछ ख़ास ज़रूरतें हैं।

* * *

[1] Sunset or Sunrise?, Sanjay, Naya Pravartak, August 1997 to May 1998 (9th issue of Counsel Club’s house journal); also in the same issue Seasons of Loneliness, Puppee

[2] Data published in Sunset or Sunrise?, Sanjay, Naya Pravartak, August 1997 to May 1998

[3] National Strategic Plan for HIV/AIDS and STI, 2017/18 – 2023/24, NACO, Ministry of Health & Family Welfare, Government of India

[4] The ground reality is that MSM below 18 years (minors) are officially not part of the targeted HIV interventions supported by NACO; nor are their specific needs addressed by most youth organizations. So their sexual health needs often tend to remain unaddressed from both sides.

[5] ASK Task in Cityscope column, Naya Pravartak, January 1996 to June 1996

[6] The Mental Healthcare Act, 2017, clauses on the right to equality and non-discrimination and right to access mental health care

लेखक : पवन ढल  

पवन ढल 1990 के दशक के आरंभ से ही भारत के पूर्वी और दूसरे भागों में क्वीयर समुदायों के संघटन में लगे रहे हैं। वे काउंसेल क्लब (1993-2002) तथाप्रवर्तक’ (1991-92, 1993-2000) के संस्थापक सदस्य भी रहे हैं। काउंसेल क्लब और प्रवर्तक भारत में क्वीयर समर्थन के सबसे पहले समूहों और प्रकाशनों के उदाहरण रहे हैं। कॉलेज में उन्होनें अर्थशास्त्र पढ़ा और अपने करियर के आरंभिक वर्षों में पत्रकारिता, कॉपीराइटिंग और सामाजिक संवाद का काम किया। 2002 से 2014 तक वे एचआईवी के बारे में क्षमता निर्माण करने वाले गैर सरकारी संगठन, ‘साथीमें शीर्ष प्रबंधन दल में काम करते रहे। इस समय वेवार्ता ट्रस्ट’ (www.vartagensex.org) की अगुवाई करते हैं। वार्ता ट्रस्ट कोलकाता में जेंडर और यौनिकता विषयों पर प्रकाशन करने और पैरवी कार्य करने वाली, लाभ कमाने वाली संस्था है। वार्ता ट्रस्ट की अपनी मासिक वेबज़ीन में उन्हें अपने सामाजिक शोध कार्य करने और क्वीयर स्वास्थ्य और विकास विषयों पररेनबो पत्रकारिताकरने के अवसर मिलते हैं। 

 

यह लेख 2017 में लिखा गया था जब की 2018 में नवतेज सिंह जौहर अन्य बनाम भारत सरकार के मामले में दिए गए फैसले में धारा 377 को निरस्त करते हुए सूप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा था किदंड विधान की धारा 377 के तहत समलैंगिक व्यसकों के बीच आपसी सहमति से बने यौन सम्बन्धों को अपराध घोषित किया जाना, असंवैधानिक है 

सोमेन्द्र कुमार द्वारा अनुवादित।

You can read this article in English here.

Cover Image: Pixabay

Comments

Article written by:

Pawan has been engaged with gay, lesbian, bisexual, transgender and other queer community mobilization in eastern and other parts of India since the early 1990s. He was a founder member of Counsel Club (1993-2002) and “Pravartak” (1991-92, 1993-2000), among the first queer support forums and publications in India. He has studied economics in college, and worked as a journalist, copywriter and social communicator in his early years as a professional. From 2002 to 2014, he was part of SAATHII, an HIV focussed capacity building NGO, at the top management level. He now leads Varta Trust, a Kolkata-based gender and sexuality publishing and advocacy non-profit agency (www.vartagensex.org), which affords him social research and “rainbow journalism” opportunities on queer health and development issues

x