A digital magazine on sexuality in the Global South: We are working towards cultivating safe, inclusive, and self-affirming spaces in which all individuals can express themselves without fear, judgement or shame
Children going to or returning from school. The focus is on four girls in grey and white school uniforms, wearing two braided plaits, and school bags on their shoulders, walking with their backs to us.
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“अपना पैर न फिसलने देना!”- उपयुक्त स्त्रित्व पर मुम्बई के शिक्षकों का संदेश

“हालांकि हिन्दी में रेप के लिए शब्द है (बलात्कार) फिर भी महिलाओं द्वारा इसका प्रयोग कदाचित ही होता है। इसके बदले वे ‘इज़्ज़त लूटना’ शब्द का प्रयोग करती हैं जिसका मतलब मान का नष्ट होना है।” विश्वनाथ (1997:323)

ऊपर दिए गए उध्दरण में भारतीय समाज में इज़्ज़त की संकल्पना का महत्व उजागर होता है। अत्यावश्यक रूप से इज़्ज़त एक जेन्डर आधारित संकल्पना है क्योंकि “महिलाएँ पूरे परिवार की इज़्ज़त की तिज़ोरी हैं, बेटी के रूप में अपने परिवार की इज़्ज़त, माँ और पत्नि के रूप में पति के परिवार की इज़्ज़त” (चक्रवर्ती 2003:151)। और तो और, जाति, समुदाय और धर्म का मान बनाए रखने की ज़िम्मेदारी भी मुख्यत: महिला पर ही होती है। रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में, मान सम्मान की संकल्पना महिला के शरीर एवं यौनिकता के नियंत्रण एवं प्रतिबन्ध में परिवर्तित हो जाती है।

विगत वर्षों में, भारत के शोधकर्ताओं ने पाया है कि ऐसा नियंत्रण एवं प्रतिबन्ध महिलाओं पर एक अथक निगरानी से किया जाता है, विशेषकर अविवाहित महिलाओं पर। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया है कि यह निगरानी महिलाओं के सार्वजनिक व्यवहार एवं आचरण को एक ख़ास तरह से ढालती है। खास तौर पर अधिकतर महिलाएँ, जो इस निगरानी से अवगत हैं, इस विनम्र स्त्रीत्व के इस प्रदर्शन में बंधी रहती हैं (फडके इत्यादि, 2011; खान 2007)। अपने शोध में फडके एवं खान ने उन विविध तरीकों का अवलोकन किया जिनमें शहरी समुदाय सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के पहनावे, आचरण एवं व्यवहार को निरिक्षित एवं अनुशासित करता है।

समुदायों की भुमिका का यह अन्वेषण शहरी भारत में यौनिकता की प्रचलित संस्कृति पर दिलचस्प सीख प्रदान करता है। हालांकि युवा लड़कियों की यौनिकता को आकार देने में स्कूल और शिक्षकों की भूमिका के बारे में बहुत कम जानकारी है। जैसा कि केहिली ने अनुभव किया है, स्कुल के संदर्भ में जेन्डर और यौनिकता से जुड़े विषयों पर अनौपचारिक सीख की बहुतायत है, युवा पुरुषों में समलैंगिकता को लेकर आशंका, युवा महिलाओं में यौनिक प्रतिष्ठा और एक आदर्श के रुप में ‘विषमलैंगिकता’ की उपस्थिति एवं उसका अभ्यास जेन्डर एवं कामुक पहचानों के उत्पादन के क्षेत्र की निशानदेही करता है। वो फिर असंबद्ध अभ्यास के ऐसे तीन क्षेत्रों की पहचान कराता है जो स्कुल के परिपेक्ष में यौनिकता को आकार देने का काम करते हैं – आधिकारिक पाठ्यक्रम, शिक्षण अभ्यास एवं छात्र संस्कृतियाँ।

मेरी डाक्टरेट थीसिस जो मुम्बई की एक झुग्गी बस्ती में रहने वाली किशोरियों (उम्र 15 से 22 वर्ष) की यौनिकता की एक नृवंशविज्ञान अन्वेषण थी, उसमें स्कुल की शिक्षिकाओं द्वारा दिए जाने वाले अनौपचारिक संदेशों की भी जाँच की गई थी। मैंने साक्षात्कार एवं संकेद्रित समूह चर्चा, दोनों में यौनिकता संबंधि संदेशों के बारे में लड़कियों एवं शिक्षकों से गहराई में जांच की। मेरे अध्ययन में लड़कियों ने बताया कि शिक्षकों द्वारा उन्हें लड़कों से दूर रहने और हर समय सतर्क रहने के निर्देश निरंतर दिए जाते थे। शादी से पहले यौन संयम के महत्व पर ज़ोर देने के लिए शिक्षक सामान्यत (लड़कों का विरोध करने के लिए) “अपनी शक्ति का प्रयोग करो” और “अपना पैर मत फिसलने दो” जैसे वाक्यांशों का प्रयोग करते हैं। इसके अलावा लड़कियों को उन लड़कों को प्रोत्साहित न करने का आग्रह किया जाता है जो उन्हें छेड़ते हैं या परेशान करते हैं।

सारिका (15 वर्ष), मानसी (19 वर्ष) एवं आराधना (17 वर्ष) ने स्कूल की शिक्षकों द्वारा लड़कियों को दिए जाने वाले संदेशोंपर प्रकाश डाला।

सारिका
हमारी शिक्षक/ शिक्षिका हमें बताती हैं कि लड़कियों के पास लड़कों से अधिक शक्ति होती है। लड़िकयों को उनकी तरफ़ आ रहे लड़के की नीयत का पता चल जाता है। उदाहरण के लिए, मैंने आपको एक घटना के बारे में बताया था जब एक लड़की ने एक लड़के को उसकी तरफ़ आते देखा। उसे एहसास हो गया था कि वह लड़का उस लड़की से टकराने वाला था पर वो ऐसा करता इससे पहले ही लड़की एक तरफ़ हो गई।

मानसी
शिक्षक/ शिक्षिका हमें इस बारे में भी बताते हैं कि एक अच्छी लड़की कैसी होती है। वे हमें स्कूल के बाहर की संस्कृति एवं बाहर के पुरुषों के बारे में बताती हैं। लड़कियों को सुरक्षित रहना चाहिए…अभी एचआईवी का खतरा है और एचआईवी से अपनी रक्षा करनी चाहिए। वे हमें यह भी बताती हैं कि एक लड़की को लड़कों से कैसे बात करनी चाहिए, उन्हें लड़कों से मेलजोल रखना चाहिए पर उन्हें अपनी सीमाओं का पता होना चाहिए। लड़कों और लड़कियों दोनों को अपनी सीमा के भीतर रहना चाहिए। वे हमें बताती हैं कि आजकल लड़के और लड़कियों में मेलजोल इतना अधिक हो गया है कि इसका परिणाम कुछ और ही होता है…इसीलिए (हंसते हुए) …ये मत करो (सेक्स) क्योंकि तुम अपनी इज़्ज़त खो दोगी और तुम्हारा परिवार अपना मान।

आराधना
वे (शिक्षक/ शिक्षिका) हमें ठीक से कपड़े पहनने को, दुपट्टे को पिन करने को कहती हैं। वे हमें लड़कों के सामने झुकने से, लड़कों को छूने से, उनके साथ बातचीत करने से और लड़कों को हमें छूने देने की इज़ाज़त देने से मना करती हैं।

ऊपर दिए गए व्याख्यों से पता चलता है कि स्कूल के शिक्षक सक्रीय रूप से यौनीकता के एक सुरक्षात्मक संवाद का समर्थन करते हैं। किशोर यौन संस्कृति पर प्रकाश डालते हुए सैम्पल में शिक्षकों ने उन लड़िकयों के विषय में नाराज़गी व्यक्त की जो ‘बिंदास’, ‘साहसी’ या ‘बेशर्म’ थीं। वे महसूस करती हैं कि लड़कियों में सही मूल्य डालने की आवश्यकता है जिससे वे शादी से पहले सेक्स से बच सकें।

जैसा कि एक माध्यमिक स्तर की शिक्षिका का कहना था “इन लड़कियों को यह बताया जाना चाहिए कि ये (शारीरिक/यौन अंग) भी आपके जेवर हैं। इन्हें सुरक्षित रखें, किसी को दिखाएँ नहीं। हमारा शरीर कितना पवित्र है। पर इन लड़िकयों के (यह) समझ में नहीं आता।” यह शायद आश्चर्य की बात नहीं है कि इन शिक्षिकाओं ने लड़कों के लिए ऐसे कोई निर्देश नहीं पारित किए। शिक्षकों के अनुसार इस तरह के संदेश एक लड़के को देने से ज़्यादा महत्वपूर्ण है लड़िकयों को देना, क्योंकि “यदि लड़कियाँ लड़कों को मौका नहीं देंगी तो लड़के कुछ नहीं कर सकते।” दिलचस्प बात यह है कि लड़िकयों को भी लगता है कि लड़कों को इस तरह के संदेश देना निरर्थक है क्योंकि वे इतने ‘बेवकूफ़’ हैं कि वे इस विषय पर शिक्षकों की बात ‘कभी सुनते ही नहीं’ हैं।

पवित्रता और शुद्धता के साथ उचित स्त्रीत्व जोड़कर, स्कूल के शिक्षक हानिकारक जेन्डर रूढ़ीद्धताओं को मजबूत कर रहे हैं। इसके अलावा, शिक्षकों द्वारा दिए गए ये संदेश अप्रभावी होने के साथ ही खतरनाक भी हैं। वे अप्रभावी इसलिए हैं, और मेरे अध्ययन में भी पाया गया है, कि स्कूल की लड़कियाँ शादी से पहले प्यार और आत्मीयता का पता लगाने के लिए प्रमुख मानदंडों को झुका रही हैं। और वे खतरनाक इसलिए हैं क्योंकि यौन शोषण या उत्पीड़न की किसी घटना में, लड़कियों के प्रति स्कूल स्टाफ से कोई समानुभूति या समर्थन प्राप्त करने की संभावना नहीं होती। इसके विपरीत, लड़कियों को ‘उत्तेजक’ कपड़े, भाषण या आचरण के माध्यम से उत्पीड़न आमंत्रित करने के लिए दोषी माना जाता है और उन्हें आलोचना का सामना करना पड़ता है। भविष्य में, नीति निर्माताओं को स्कूल में यौन शिक्षा के कार्यक्रम की योजना से पहले स्कूलों में यौनिकता पर हो रही चर्चा के बारे में जानकारी की जरूरत है। विशेषज्ञों के लिए एक महत्वपूर्ण पहला कदम विद्यालय के शिक्षकों के साथ काम करना है और उन्हें यौनिकता के सुरक्षात्मक संवाद के खतरों पर चिंतन करने में मदद करने की आवश्यकता होगी।

TARSHI कि दीपिका श्रीवास्तव द्वारा अनुवादित

रेफरेन्स
रेफरेन्स (वे शोध जिनका ज़िक्र इस लेख में है) के अंग्रेज़ी में होने के कारण उन्हें वैसे ही दिया गया है –

Chakravarti, U. (2003). Gendering Caste; through a feminist lens, Calcutta:Stree.
Kehily, M.J. (2002). Sexuality, gender and schooling: shifting agendas in social learning, London: Routledge Farmer.
Khan, S. (2007). Negotiating the Mohalla: Exclusion, Identity and Muslim Women in Mumbai.Economic and Political Weekly, Vol xlii, No.17.
Phadke, S., Khan, S. & Ranade, S. (2011). Why Loiter? Women and Risk on Mumbai Streets. New Delhi: Penguin Books.
Viswanath, K. (1997). Shame and Control: Sexuality and power in feminist discourse in India in Thapan, M. Embodiment: Essays on Gender and Identity, Oxford: Oxford University Press.

Pic source: Sandra Cohen-Rose and Colin Rose via Wikimedia Commons/Flickr

To read this article in English, please click here

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Article written by:

Juhi has engaged with issues of gender and sexuality in her academic and professional life for the past ten years. Her recently completed doctoral thesis from the University of Cambridge, UK focused on the everyday lived experiences of sexuality among adolescent girls in a slum community in Mumbai. She has a passion for photography, cinema and exploring new cities and cultures. At present, she works as a sexuality educator in the schools of Gujarat.

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