A digital magazine on sexuality in the Global South: We are working towards cultivating safe, inclusive, and self-affirming spaces in which all individuals can express themselves without fear, judgement or shame
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सामान्य, पर फिर भी सामान्य नहीं 

जाति और यौनिकता के बीच सामाजिक तौर पर स्वीकृत प्रथाओं के माध्यम से निभाए जाने वाले संबंध हमेशा से ही बहुत जटिल रहे हैं और इन प्रथाओं के चलते जहाँ समाज के प्रभावी वर्ग को इनका लाभ मिलता है, वहीं कमजोर वर्ग इनसे और अधिक वंचित किया जाता है। भारत में, दमन करने की ब्राह्मणवादी प्रथाएँ अनेक रूपों में लागू की जाती हैं। सामाजिक समावेश और अलगाव के आधुनिक तरीकों से पहचान को कैसे दबाया जाता है, यह समझने के लिए हमें बहुत दूर जाने की ज़रूरत नहीं होती। 

“समाज में विभाजन बहुत ही प्राकृतिक सी बात है। लेकिन इन उप-विभाजनों के बारे में अप्राकृतिक बात यह है कि ये वर्ग प्रणाली के ‘खुले’ चरित्र को खो चुके हैं और जाति नामक स्व-संलग्न इकाइयाँ बन गए हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या इन जाति समूहों को इस तरह से अपने दरवाजे बंद कर देना और अंतर्विवाही बन जाना उनकी कोई मजबूरी रही थी या उन्होंने जानबूझकर ऐसा किया है? यहाँ मेरा कहना यह है कि इस प्रश्न के उत्तर में दोनों ही बातें लागू होती हैं – कुछ ने दरवाजा खुद बंद किया – कुछ को यह दरवाजा बंद मिला। इन दोनों पंक्तियों में से एक मनोवैज्ञानिक व्याख्या है तो दूसरी नितांत मशीनी, लेकिन दोनों ही व्याख्याएँ एक दूसरे की पूरक हैं और दोनों इस जाति-व्यवस्था स्थापित होने को पूरी तरह से समझाने के लिए ज़रूरी हैं” – डॉ. भीम राव अंबेडकर, कास्ट इन इंडिया – देयर मेकनिस्म्स, जेनेसिस एंड डेवलपमेंट (Castes in India : Their Mechanisms, Genesis and Development, 1916). [1]

निरंतर संस्था में, हमारा मानना है कि जीवन के वास्तविक अनुभवों और वास्तविकताओं को समझने और इनके हल खोजने के लिए ज़रूरी है कि जेंडर और यौनिकता तथा जाति, धर्म और क्षमता / विकलांगता के साथ जेंडर व यौनिकता के अंतरसंबंधों को गहराई में जाकर समझा जाए। हम जेंडर और यौनिकता के विषय पर गैर सरकारी संगठनों, सरकारी कार्यक्रमों और दूसरी एजेंसियों और संस्थाओं के लिए प्रशिक्षण और कार्यशालाएँ आयोजित करते हैं। यौनिकता के बारे में हमारा नज़रिया बहुत ही सकारात्म्क और राजनैतिक है और इसके कारण हम व्यवस्थात्म्क मुद्दों पर भी विचार करते हुए इच्छा और आनंद की अनुभूतियों को स्वीकार कर पाते हैं। 

निरंतर का कार्यकारी दल थिएटर की विधा को माध्यम बनाकर सहभागिता पूर्ण शोधकार्यों द्वारा जेंडर और यौनिकता विषय पर चर्चाओं का आयोजन करता है।[2] अनेक थिएटर गतिविधियों को प्रयोग में लाते हुए हम जेंडर और यौनिकता विषय पर तथा छोटी उम्र में विवाह और बाल-विवाह जैसे प्रथाओं से इनके सम्बन्धों पर चर्चा करते हैं। हम विवाह के संबंध में लिए गए ऐसे निर्णयों को समझने और इनका विश्लेषण करने की कोशिश करते हैं जो जेंडर, वर्ग, जाति, धर्म और पितृसत्ता की व्यवस्था को मजबूती देते हैं और आगे बढ़ाते हैं। इन व्यवस्थाओं के द्वारा ही परिवार, समुदाय और सरकार युवाओं की यौनिकता, उनकी इच्छाओं और आकांक्षाओं को नियमित और नियंत्रित करती है। हमारे शोध प्रयासों का मुख्य उद्देश्य यह समझना होता है कि युवा लोग किस तरह से जाति, धर्म, वर्ग, जेंडर, यौनिकता आदि जैसी सत्ता की विभिन्न व्यवस्थाओं में अपने जीवन के अनुभवों को समझ पाते हैं और किस तरह से ये व्यवस्थाएँ युवाओं के जीवन पर प्रभाव डालती हैं। अपनी इस परियोजना के अंतर्गत, हम उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली की छ: संस्थाओं के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।     

मैं एक समन्वयक के तौर पर एक प्रशिक्षण कार्यक्रम के बारे में अपने अनुभव और विचार आपके साथ साझा करना चाहती हूँ। हमने राजस्थान के फतेहनगर स्थान पर फील्ड में काम कर रही एक संस्था के सहयोग से सशक्तिकरण, शिक्षा और जेंडर विषय पर चर्चा आरंभ करने के उद्देश्य से यह प्रशिक्षण कार्यक्रम, 16 से 21 वर्ष आयु की 35 युवतियों के लिए आयोजित किया था। 

प्रशिक्षण के पहले दिन, कुछ आरंभिक वार्म-अप गतिविधियां करने के बाद, हमने लड़कियों से कहा कि वे दो-दो के जोड़ों में बंट जाएँ और एक दूसरे को कोई कहानी सुनाएँ। कहानी सुनने के बाद एक लड़की को दूसरी द्वारा बताई गयी कहानी पूरे समूह को इस तरह से सुनानी थी मानों यह उसकी अपनी कहानी हो। इस गतिविधि का उद्देश्य यह था कि सभी प्रतिभागी आपस में एक दूसरे को जान जाएँ। प्रशिक्षार्थियों का यह एक बड़ा समूह था और सभी के लिए अपनी कहानी बता पाना संभव नहीं था, इसलिए हमने प्रतिभागियों से कहा कि वे कहानी सुनाने के लिए स्वेच्छा से आगे आएँ। फिर प्रतिभागियों ने मोबाइल फोन, गतिशीलता, जेंडर के आधार पर भेदभाव और दूसरे विषयों पर अनेक रोचक कहानियाँ सुनाईं। मोबाइल फोन पर चर्चा के दौरान प्रतिभागियों ने बताया कि उनमें से लगभग सभी के पास एक ऐसा मोबाइल फोन भी था जिसकी जानकारी उनके माता-पिता को नहीं थी। हमने लड़कियों से पूछा कि वे इस फोन का क्या करती हैं तो अधिकांश ने बताया कि वे इस मोबाइल फोन से अपने मित्रों से बात करती हैं। जब हमने कुछ अधिक जानने की इच्छा से ज़ोर देकर पूछा कि क्या इस फोन से वे अपने सभी मित्रों से बात करती हैं या केवल कुछ खास मित्रों से बात करने के लिए अलग से यह फोन रखा हुआ है। इस पर प्रतिभागियों ने बताया कि वे किसी से भी बात कर सकती थीं और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह मित्र लड़का है या लड़की। इसके बाद चर्चा का रुख दोस्ती पर बात करने कि ओर मुड़ गया और जल्दी ही बात जाति की चल निकली और तब मेरी सहयोगी ने उनसे पूछा कि क्या उन्हें अपनी जाति से बाहर, किसी दूसरी जाति के मित्र बनाने की आज़ादी होती है। कुछ प्रतिभागियों ने तुरंत इसका उत्तर देते हुए कहा कि उनके घर में जाति आदि को लेकर किसी तरह कि कोई समस्या नहीं होती। दूसरी कुछ लडकियाँ जो शुरू में तो खामोश रहीं फिर धीरे-धीरे उन्होंने अपनी बात कहने के लिए हाथ खड़े करने शुरू किए और बताया कि उनके परिवारों में जाति के आधार पर किसी तरह का फर्क या भेदभाव नहीं किया जाता और उनके माता-पिता को उनके द्वारा दूसरी जाति के मित्र बनाने पर कोई दिक्कत नहीं होती।  

सत्र के बाद फतेहनगर से वापिस लौटते समय, मेरी सहकर्मी और मैंने आपस में चर्चा की कि उस सत्र में लड़कियों का व्यवहार कुछ अजीब था। हमने यह महसूस किया कि लडकियाँ जाति के विषय पर बोलने में हिचकिचा रही थीं। ऐसा लगा कि शायद कुछेक प्रतिभागियों की मौजूदगी के कारण सभी लड़कियों ने एक सी ही बात कही थी और उन्होंने जाति के बारे में अपने विचार खुलकर नहीं रखे थे। हमें यह निर्णय लिया कि अगले दिन से सत्र मिएँ हम परस्पर विश्वास कायम करने की कुछ अधिक गतिविधियां करेंगे ताकि लडकियाँ खुल कर अपनी बात कह सकें और पूरी सच्चाई से अपने विचार सबके सामने रखें। फिर हमने एक दूसरे के व्यवहार और भाव-भंगिमाओं को आईने कि तरह नक़ल कर के दिखाने की गतिविधि की जिसमें लडकियाँ दो-दो के जोड़ों में साथ काम करती हैं। इस गतिविधि में एक लड़की कुछ शारीरिक भंगिमा बनाती है और फिर दूसरी बिलकुल उसी कि नक़ल करने कि कोशिश करती है; बाद में वे दोनों अपनी भूमिका बदल लेती हैं। इस गतिविधि से यह लाभ हुआ कि प्रतिभागी एक दूसरे से घुलमिल सकीं, अपने द्वारा किए जाने वाले काम के बारे में सोच सकीं, और फिर अपने साथी के साथ मिलकर अपने विचार दर्शाने के लिए अपनी शारीरिक भंगिमा सही तरीके से दर्शा सकीं। 

प्रशिक्षण के आखिरी दिन, हमने फिर लड़कियों को दो-दो के जोड़ों में बाँटा और उनसे कहा कि वे अपनी साथी को एक ‘अच्छी लड़की’ और ‘बुरी लड़की’ की मूर्ति की तरह बनाएँ। इस गतिविधि के द्वारा हम यह दिखाना चाहते थे कि अच्छी और बुरी लड़की के बारे में हमारे विचार किस तरह जाति और महिलाओं के बारे में हमारे मन के पूर्वाग्रहों से प्रभावित होते हैं। समन्वयकों के रूप में हमें यह लगता था कि एक दूसरे के साथ काम करते हुए लड़कियों के व्यवहार से इस बारे में उनकी समझ और जानकारी का पता चल सकेगा। इस गतिविधि को करने से प्रतिभागियों को इस सोच से दूरी बनाने में मदद मिल जाती है कि समाज में जाति को किस नज़र से देखा जाता है और साथ ही लडकियाँ खुद यह जान पाती हैं कि खुद उनके मन में जाति को लेकर किस तरह के विचार हैं। इस गतिविधि में अधिकांश लड़कियों ने खुल कर हिस्सा लिया; लेकिन उनमें से कुछ लडकियाँ अपनी बात कहने में हिचक महसूस कर रही थीं क्योंकि ऐसा करने पर उन्हें ‘अच्छी लड़की’ और ‘बुरी लड़की’ के बारे में अपने खुद के विचारों के बारे में भी सोचना पड़ रहा था। कुछ लडकियाँ इस गतिविधि को कर पाने में बहुत ही ज़्यादा असहज लग रही थीं क्योंकि इस गतिविधि में अपने शरीर को संवाद करने के माध्यम के रूप में प्रयोग किया जाना था। कुछ अपने साथी द्वारा कर के दिखाई गयी शारीरिक भंगिमा को दोहराने में शर्म महसूस कर रही थीं। ‘बुरी लड़की’ की मूर्ति बनते समय वे एक दूसरे की ओर देख रही थीं कि उनके साथ वाली लड़की क्या कर रही है। इसका परिणाम यह हुआ कि बहुत सी एक-समान मूर्तियाँ देखने को मिलीं।   

जब ‘बुरी लड़कियों’ की मूर्तियों को एक लाइन में खड़ा किया गया, तो अधिकांश के बाल बिखरे हुए थे, वे आदमियों की तरह से बैठी हुई थीं, हाथ में शराब की बोतल ली हुई दिखाई गयी थीं। इसके बाद हमने क्रोध, पास में शराब रखने और शराबखोरी की लत के बारे में भी बात की। ‘बुरी लड़कियों’ की मूर्तियों की भाव-भंगिमायों से साफ़ झलक रहा था कि उनमें लालसा और आदमियों की तरह से टाँगे फैला कर बैठने में उनकी यौनिकता दिखाई दे रही थी। जिस तरह से उनके कपड़े दिखाए गए थे, बालों को बिखरा दिया गया था और शरीर को खास तरह से मोड़ कर बिठाया गया था, इस सबसे यह साफ़ पता चल रहा था कि इन मूर्तियों में उस क्षेत्र की पिछड़ी जाति और वर्ग की लड़कियों का चित्रण किया गया था। प्रतिभागी लड़कियों के मुताबिक, टाँगे खोल कर बैठने और टाँगे समेट कर बैठने से ही एक “बुरी लड़की” और “अच्छी लड़की” के बीच का अंतर दिखाई दे जाता था। 

जब “अच्छी लड़की” बनी सभी मूर्तियों को एक लाइन में खड़ा किया गया, तो हमें पाया कि उनमें से अधिकांश पूजा करने की मुद्रा में थीं और उनके सर दुपट्टे से ढके हुए थे, कुछ को तो स्कूल जाते हुए या पढ़ाई करते हुए भी दिखाया गया था। रोचक बात यह थी कि एक मूर्ति को तो वीणा बजाते हुए भी दिखाया गया था। एक नज़र देखने पर ये सभी मूर्तियाँ ऐसे लग रही थीं जैसे कि वे सभी किसी ऊंची जाति से और उच्चवर्गीय घरानों से हों। इन अधिकांश “अच्छी लड़कियों” के नाम भी पूजा आदि रखे गए थे, जिससे उनके ऊंची जाति की होने का पता चलता था।  

“अच्छी लड़की” की मूर्ति बनी एक लड़की किसी मॉडल की तरह पोज़ बना कर खड़ी थी। उसके लंबे बाल बड़े ही करीने से बंधे थे और उसकी पैंट घुटनों तक मुड़ी हुई थी। जब हमें सबसे यह पूछना शुरू किया कि यह लड़की क्या हो सकती है या किस जगह से हो सकती है तो लड़कियों ने बड़ी जल्दी उत्तर दिया कि हो न हो, यह लड़की तो ज़रूर किसी बड़े घर से है जो घर का कोई कामकाज नहीं करती होगी। उनके उत्तर से पता चला कि उन्हें लगता था कि यह लड़की ऊंची जाति से होगी और काम इसलिए नहीं करती होगी क्योंकि उसके घर में काम करने के लिए दूसरे लोग होंगे। उन्होंने कहा कि यह लड़की देखने में बहुत ही फ़ैशनेबल लगती है और ऐसा लगता है कि यह अपना पूरा समय तैयार होने में ही लगाती होगी। कुछ लड़कियों ने यह भी माना कि यह कोई ‘शहर की लड़की’ लगती है। जब हमने उनसे यह पूछा कि क्या यह हो सकता है कि यह लड़की गाँव में रहती हो तो उन्होंने तुरंत उत्तर दिया कि नहीं, क्योंकि उनके गाँव में रहने वाली कोई भी लड़की इस लड़की की तरह के कपड़े नहीं पहनती।      

हमें सबसे ज़्यादा आश्चर्य यह हुआ कि जैसे ही हमने उस मूर्ति के बारे में विस्तार से बात करनी आरंभ की, सभी लडकियाँ आपस में यह बात करने लगीं कि यह लड़की किस तरह के परिवार से होगी, और फिर उन्होंने कहा कि हो न हो, यह लड़की ज़रूर एक “जनरल” लड़की है। यह सुनकर हमने उनसे दोबारा अपनी बात कहने के लिए कहा और पूछा कि क्या वे यकीन से कह सकती हैं कि यह लड़की किसी ऊंची जाति से ही है। इस पर उन्होंने उत्तर दिया कि “बिलकुल, यह लड़की जनरल वर्ग” की ही है, और उसकी तरफ़ एक नज़र देख कर कोई भी यह बता सकता है। लड़कियों ने यह भी कहा कि पिछड़ी जाति की लडकियाँ अपने बालों को इस तरह से नहीं बांधतीं और न ही वे गाँव में इस तरह के कपड़े पहनती हैं। 

फिर इन लड़कियों ने खुद से ही जाति के विषय पर बात करना शुरू कर दिया हालांकि हमने उनसे जाति आदि से संबन्धित कोई प्रश्न नहीं पूछा था। एक ‘अच्छी लड़की’ और एक ‘बुरी लड़की’ के बारे में लोगों के मन में उठने वाले विचारों में उस लड़की की जाति के बारे में अनुमान और विचार मौजूद रहते ही हैं। इन लड़कियों के लिए खुद से जाति के बारे में अपने विचार बता पाना और अपने विचारों पर चर्चा कर पाना कठिन होता है, लेकिन बात जब किसी अन्य व्यक्ति के बारे में हो रही हो तो उस समय उसकी जाति के बारे में इनके अनुमान, इनकी बातों में खुल कर सामने आते हैं। जाति जैसे विषय पर बात करते समय हर व्यक्ति हर समय सही समझी जाने वाली बातें ही बोलना चाहता है क्योंकि वो ऐसा करने के लिए खुद पर दबाब महसूस करता है और यही कारण है कि जाति जैसे विषय पर लोग खुलकर अपने विचार सामने नहीं रखते और न ही जाति से जुड़े अपने व्यवहारों के बारे में बताते हैं। न ही वे यह बताते हैं कि उन्हें क्या लगता है कि ऊंची जाति के लोगों में कितनी शक्ति और सामर्थ्य होता है। इसलिए एक समन्वयक होने के नाते मुझे लगता है कि हमें इस बारे में उनके मन की दुविधाओं को बाहर निकालने और जाति के विषय पर बात करते हुए जातिगत अंतरों के बारे में खुल कर बोल पाने के लिए अधिक मेहनत करनी होगी, खासकर के तब जब बात जेंडर और यौनिकता की हो रही हो। समुदाय के लोग जेंडर और यौनिकता के बारे में क्या सोचते हैं, इसके बारे में अपनी जानकारी को बढ़ाने में लगे समन्वयक और शोधकर्ता होने के नाते, हमारे लिए यह ज़रूरी हो जाता है कि हम जाति व्यवस्था के बारे में अपनी समझ को बढ़ाएँ और उन तरीकों के बारे में सोचे कि जाति व्यवस्था हमारे दैनिक जीवन में किन रूपों में दिखाई देती है और कैसे इसके कारण समावेश करने और अलगाव बढ़ाने के हमारे व्यवहार निर्धारित होते हैं। जाति पर चर्चा करते हुए हम प्राय: सत्ता और शक्ति के बाहरी केन्द्रों की बात तो करते हैं लेकिन अक्सर हम इस बात को नज़रअंदाज़ कर देते हैं कि किस तरह जाति और अलग-अलग जतियों के लोगों से जुड़े नज़रिए हमारे काम करने के तरीकों में जुड़े हुए हैं, कैसे जातिगत विचार हमारे रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा बन चुका है और यौनिकता के साथ इसके कितने गहरे संबंध हैं। 

[1] Para 40 of a paper presented at Columbia University. Available at: http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00ambedkar/txt_ambedkar_castes.html

[2]To know more about the programme, you can visit- http://www.nirantar.net/early-marriage-young-people-and-empowerment/

 

सोमेन्द्र कुमार द्वारा अनुवादित 

To read this article in English, please click here.

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Before joining Nirantar in 2016 , Aiman did her post-graduation in Women's Studies from Tata Institute of Social Sciences. Her master's thesis was ‘A Gendered Study on Access to Public Toilets in Mumbai’. As a part of Nirantar, she is a part of the action research team, which focusses on using theater as a tool, to instrument discussion on Gender and Sexuality. Her work here includes planning theater sessions with the team, documentation, and coordination with partner organisations for the research.

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