‘बीमार’ होने को विवश

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लम्बे समय तक, हमारे समाज के एक बड़े हिस्से द्वारा यौनिक ‘अल्पसंख्यकों’ को मानसिक रोगी माना जाता था। यह माना जाता था कि उनकी यौनिकता का थेरेपी, मनोरोग चिकित्सीय सलाह, दवाइयों एवं काउन्सलिंग द्वारा ‘इलाज’ किया जा सकता है। आज भी कई लोग इन बातों को मानते हैं और इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि अभी हमें लम्बा सफ़र तय करना है। पर कुछ सफलताएँ भी यकीनन मिली हैं, आज हमारे पास ऐसे बहुत सारे अध्ययन हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि समलैंगिक, द्वीलैंगिक या ट्रान्सजेन्डर होना अपने आप में कोई मानसिक बीमारी नहीं है। हालांकि कुछ यौनिकताओं और मानसिक बीमारी में कभी-कभी संबंध देखे सकते हैं। हाल ही में किए गए अध्ययन दर्शाते हैं कि लेस्बियन, गे, बाइसेक्शुअल, ट्रान्सजेन्डर, इन्टरसेक्स एवं क्वियर (एलजीबीटीआइक्यु) लोगों में डिप्रेशन (अवसाद), नशा (सब्स्टेंस अब्यूज़) एवं आत्महत्या की दरें अन्य लोगों से ज़्यादा होती हैं। मानसिक स्वास्थ्य एवं यौनिक पहचान के बीच इतने और इतने गहरे संबंध हैं कि इसको समझने की कोशिश करना मकड़ी के जाल को सुलझाने जैसा है।

यदि यह कहा जाय कि व्यक्ति का स्वास्थ्य उस समाज से प्रभावित होता है जिसमें वे रहते हैं तो यह कोई अनोखी बात नहीं होगी। यह भी कोई ताज़ा समाचार नहीं है कि कई अन्य देशों की तरह भारत भी एलजीबीटीआइक्यु समुदाय के लिए कोई दोस्ताना व्यवहार नहीं रखता है।  इस साल की शुरुआत में एलजीबीटीआइक्यु समुदाय की ओर एक और ‘गैर-दोस्ताना’ व्यवहार के रुप में सेन्सर बोर्ड द्वारा ‘दम लगा के हईशा’ फिल्म में लेस्बियन शब्द को मूक या म्यूट कर दिया गया और इसे निषिद्ध शब्दों की फ़हरिस्त में डाल दिया गया।

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए, विशेषकर ऐसे देश में जहाँ समलैंगिकता एक अपराध है। एक ऐसे समय में जब इतने लोग धारा 377 को गैर-अपराधिक करवाने के प्रयास में लगे हैं, सेन्सर बोर्ड द्वारा लिया गया यह कदम  प्रतिगामी माना गया है। लेस्बियन शब्द को एक गाली के रूप में चिंहित करके सरकार ने यह स्पष्ट संदेश दिया है – कि समलैंगिकता न केवल कानूनन अपराध है, इसे समाज द्वारा स्वीकार भी नहीं किया जाता है, इतनी अस्वीकृति कि इसे फ़िल्मों से हटा देना पड़ा!  यह कदम समलैंगिकता के लिए समाज में पहले से व्याप्त घृणा को बढ़ावा दे सकता है और इसके अनर्थकारी परिणाम हो सकते हैं। एलजीबीटीआइक्यु के रूप में पहचान करने वाले लोगों के बारे में खुलकर बात करना भारत में अभी भी स्वीकार्य नहीं है, भले ही एलजीबीटीआइक्यु के रूप में पहचान करने वाले व्यक्ति किसी भी ‘परम्परागत’ यौनिक एवं जेन्डर पहचान के प्रति सहज महसूस करने वाले व्यक्ति से अलग नहीं होते हैं। लेकिन एक विषमलैंगिक मानदंड वाले समाज में एलजीबीटीआइक्यु समुदाय के लोगों को निरन्तर हाशिए की ओर धकेला जाता है और इन्हें स्दीकृति पाने के लिए हमेशा ही संघर्षरत रहना पड़ता है – जो जैसे हैं उन्हें वैसे ही रहने की स्वीकृति, जिनसे वे प्यार करते हैं उन्हें प्यार करने की स्वीकृति, और उस समाज का हिस्सा बनने की स्वीकृति जिसमें वे रहते हैं।  और इसी स्वीकृति का अभाव तनाव व मानसिक रोग का भी कारण हो सकता है।

यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि बड़े होते समय अपने दोस्तों, चचेरे, ममेरे भाई-बहनों से अलग महसूस करना परेशान करने वाला एवं कठिन हो सकता है। इसके ऊपर, समाज के प्रतिभाशाली लोग निरन्तर यह संदेश देते रहते हैं कि कैसे कुछ यौनिकताएँ अन्य से ज़्यादा पापग्रस्त हैं। किशोरावस्था के दौरान एलजीबीटीआइक्यु समुदाय के लोगों को इस बात का कम ही अंदाज़ा होता है कि वे किससे बात करें या उन भावनाओं को कैसे संभालें जो स्पष्ट रूप से मीडिया द्वारा तैयार की गई समाज की इस विषमलैंगिक तस्वीर से अलग है। यौनिकता शिक्षा सामान्य रूप से वह क्षेत्र है जिसका रुख कम ही माता-पिता करते हैं, विभिन्न यौनिकताओं के बारे में बात करने का तो कोई सवाल ही नहीं है। माता-पिता एवं शिक्षकों से इन विषयों पर खुल कर बात न कर पाने के कारण ये सभी भावनाएँ, डिप्रेशन एवं उत्कंठा दिल में भरी रह जाती हैं। इन्हीं युवा लोगों को वयस्क होने पर उन ज़िम्मेदारियों का सामना करना पड़ता है जिसके बारे में उन्हें कोई अंदाज़ा नहीं होता है।

समाज के इस दबाव के कारण, विषमलैंगिकता से अलग यौनिक पहचान वाले व्यक्ति अपनी पहचान को कभी भी उजागर न करने का फ़ैसला कर सकते हैं। समाज एवं परिवार द्वारा दी जाने वाली शर्मिंदगी एवं एकाकीपन के डर से वे परम्परा के अनुसार चलने का निर्णय ले सकते हैं – शादी एवं बच्चे पैदा कर सकते हैं – इस सारे समय में एक छिपी हुई पहचान का बोझ एवं सालों साल एक सहमति-जन्य विषमलैंगिक संबंध से होने वाले मानसिक आघात का भार उठाते हुए। ऐसे में सहमति अपनेआप में एक मज़ाक बन कर रह जाती है। मीडिया में हमने ऐसी कई ‘शादियों’ के समाचार पढ़े हैं जिनका अन्त तलाक पर हुआ है और जिसने एक नहीं दो लोगों को मानसिक स्तर पर आघात पहुँचाया है।

सिर्फ अपनी पहचान ज़ाहिर कर देने  (कमिंग आउट) से राहत नहीं मिल जाती। उन लोगों के सामने अपनी पहचान ज़ाहिर करना अपनेआप में एक बड़ा काम है, जो मानव यौनिकता को केवल काले-सफेद या सिक्के के दो ही पहलू के रूप में देखते हों और ‘सामान्य’ एवं ‘असामान्य’ के द्वीभाजन के रूप को ही मानते हों। पर इसके अलावा जो होता है, वह स्थिति को और भी बदतर बना देता है। ‘शादी से मानसिक बीमारी का इलाज हो जाता है’ और ‘अपारम्परिक यौनिकता एक मानसिक बीमारी है’, इन दोनों मिथकों का मिलाजुला रूप कई परिवारों को अपने समलैंगिक या ट्रान्सजेन्डर परिवारजनों को विषमलैंगिक शादी नामक ‘इलाज’ को आजमाने के लिए मजबूर कर देते हैं। अगर किसी तरह इस जबरदस्ती की शादी से बचा भी जा सके तो भेदभाव हमेशा ही दरवाजे पर दस्तक देता रहता है जो किसी को भी अवसाद की दुनिया में हमेशा हमेशा के लिए धकेलने के लिए काफ़ी है। अपनी पहचान ज़ाहिर करने पर अधिकतर एलजीबीटीआइक्यु समुदाय के लोगों को मज़ाक, एकाकीपन, तानों, यौन शोषण एवं ‘इलाज’ करवाने के दबाव का निरन्तर सामना करना पड़ता है। समाज द्वारा दिए गए इस कलंक को अंतर्निहित कर लेना, अक्सर ऐसी गहरी सुरंग में डाल देता है जिससे बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता अपनी जान देना ही दिखाई देता है। अन्य कुछ लोग शराब एवं ड्रग्स में अपनी शांति तलाश करते हैं, जो आगे जाकर उनकी सेहत पर असर करता है।

अत: एलजीबीटीआइक्यु के रूप में अपनी पहचान करने वाले व्यक्ति के कमज़ोर मानसिक स्वास्थ्य का कारण उनकी यौनिकता में निहित नहीं है बल्कि यह उस विषमलैंगिकता प्रधान समाज की अस्वीकृति का नतीजा है जिसमें वे रहते हैं; यह एक ऐसी ‘बीमारी’ है जो उन्हें दी गई है।  यदि हम एलजीबीटीआइक्यु या एसेक्शुअल लोगों के लिए स्थिति को कुछ भी बेहतर करना चाहते हैं तो लोगों में यौनिकता के विस्तार या स्पेक्ट्रम के प्रति जागरुकता पैदा करने की कड़ी आवश्यकता है। एक ऐसे बहुव्यापी प्रयत्न की आवश्यकता है जो शिक्षण एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में सभी यौनिकताओं को समाविष्ट करे। लोगों को अपनी यौनिक पहचान को स्वीकार करने के लिए, अपने दोस्तों एवं परिवार के साथ अपनी पहचान के बारे में बिना किसी आलोचना या भेदभाव किए जाने के डर के साथ बातचीत करने के लिए, समर्थन की आवश्यकता है।

हालांकि, एक ऐसे देश में जहाँ समलैंगिकता एक अपराध हो, वहाँ भेदभाव एवं यौन शोषण के खिलाफ न्याय मिलना असंभव है। एलजीबीटीआइक्यु समुदाय के मानसिक स्वास्थ्य को समर्थन देने के लिए समलैंगिकता का गैर-आपराधिक होना आवश्यक है। एक ऐसा समाज जो अपनी सांस्कृतिक विविधता पर इतना नाज़ करता है और फिर भी यौनिक विविधता को स्वीकार नहीं कर सकता, वो एक गम्भीर इनकार की स्थिति में है और ऐसा देश अपने लोगों के मानसिक स्वास्थ्य की बेहतरी में कोई मदद नहीं कर सकता है। अभी भी जब यहाँ हम समुदाय पर मानसिक स्वास्थ्य के बढ़ते हुए बोझ के बारे में चर्चा कर रहे हैं, भारत की सरकार ने एक और राष्ट्रीय बजट की घोषणा कर दी है जिसमें हमने मानसिक स्वास्थ्य पर कोई निवेश नहीं किया है। सरकार की ओर से न के बराबर समर्थन मिलने के बाद एलजीबीटीआइक्यु समुदाय एवं पूरे समाज के मानसिक स्वास्थ्य का भार समाज पर ही आ जाता है।

This article was translated by Dipika Srivastava for TARSHI.

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Pic Source: Thesite.org