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Poster for the Bengali film, 'Dahan', showing a woman's face enlarged and facing the camera, and the smaller figure of a man dressed in a chequered shirt looking at her
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एकजुटता असंभव सी : रितुपर्णो घोष की फिल्म दहन (1997) की समीक्षा

1 जून, 2014

त्रिना निलीना बनर्जी

1997 में रितुपर्णो घोष द्वारा उपन्यासकार सुचित्रा भट्टाचार्य के उपन्यास ‘दहन’ पर आधारित इसी नाम से बनी फिल्म में मध्यमवर्गीय नवविवाहिता रोमिता चौधरी ससुराल में अपने घर की बालकनी में खड़ी, घंटों नीचे सड़क की ओर देखती रहती हैं। विवाह के बाद कनाडा में रहने वाली अपनी बड़ी बहन को पहला पत्र लिखते हुए (फिल्म इसी सीन से शुरू होती है) वह अपने इस नए घर और ससुराल के लोगों के बारे में बताती हैं, ख़ास तौर पर, अपने घर में इस खुली जगह के बारे में जहाँ से, वह घंटों तक, अपने जन्म-स्थान, अपने शहर को देख सकती हैं। लेकिन, फिल्म में आगे चलकर, बालकनी की यही छोटी सी जगह – जो घर के बाहर और भीतर, निजी और सार्वजनिक तथा स्वतंत्रता व् घुटन की अनिश्चितता के बीचों-बीच टिकी है – रोमिता और उनके पति पलाश के बीच घरेलु कलह में, विवाद का एक मुद्दा बन जाती है।

माता-पिता द्वारा तय किए गए इस विवाह में पति-पत्नी एक दुसरे को भली-भाँती नहीं जानते। विवाह के कारण रिश्ते में बंधे इन दो परिवारों के बीच वर्ग और संस्कृति के अंतर को शुरू में तो रोमिता साफ़-साफ़ नहीं समझ पातीं, उन्हें अपने ससुराल में होने वाले धार्मिक अनुष्ठान ‘दिलचस्प’ और पुराने लगते हैं। विवाह के बाद के उनके रोमांस की लय और गति उस दिन थरथरा उठती है जब एक वह शाम को अपने पति पलाश के साथ न्यू मार्किट जाती हैं और पति-पत्नी अपने घर के पास ही मेट्रो स्टेशन के बाहर बारिश में फँस जाते हैं और घर लौटने के लिए कोई सवारी भी नहीं मिल रही होती है। इसी समय जब पलाश सड़क के दूसरी ओर सिगेरेट खरीद रहे होते हैं तभी कुछ लड़के रोमिता हो परेशान करना शुरू करते हैं। जब पलाश वहाँ पहुँचते हैं तो वे उनकी बुरी तरह से पिटाई करते हैं और रोमिता को जबरन अपने साथ ले जाने की कोशिश करने लगते हैं। इस समय पर, फिल्म में काफ़ी देर तक वहाँ से अपनी कारों या टैक्सी में गुज़र रहे लोगों की प्रतिक्रिया दिखाई गयी है जो कौतूहल से स्तब्ध होकर यह दृश्य देखते तो हैं लेकिन इस हिंसक और खतरनाक लड़ाई में उलझने से बचने के लिए बीच में नहीं पड़ते।

केवल एक महिला स्कूल टीचर, श्रोबोना सरकार जो उस समय एक ऑटोरिक्शा से अपने घर वापिस जा रही हैं, अकेली ऑटो से उतर कर इस युवा दम्पति की मदद के लिए रूकती हैं। रोमिता को परेशान कर रहे लड़के श्रोबोना के आने से परेशान हो जाते हैं और जबरदस्ती रोमिता को मोटरसाइकिल पर बिठाने की कोशिश करते हैं, लेकिन श्रोबोना रोमिता को पकड़े रहती है। अंत में लड़के रोमिता को अगुवा करने का विचार त्याग, बुरी तरह से घायल उन दो महिलाओं और पलाश को छोड़ वहाँ से भाग निकलते हैं। इस घटना – जिसे फिल्म में कई चरित्रों ने समय-समय पर दुर्घटना कहा है – के फलस्वरूप आने वाले कुछ महीनों के लिए एक दुसरे से अनजान इन दोनों महिलाओं के जीवन मानों एक-दुसरे के जीवन से जुड़ से जाते हैं। समाचारपत्रों में इस युवा लड़की के साहस की खबरें छपती हैं और झिनुक (श्रोबोना का उपनाम) पर उनके परिवार, दोस्तों और दफ्तर के सहयोगियों की वाह-वाह बरसने लगती है। उनकी छात्राएँ उनका अभिनन्दन करना चाहती हैं, उनके रिश्तेदार बधाई देने घर पहुँचने लगते हैं, अनेक महिला संगठन उन्हें ट्राफी प्रदान कर सम्मानित और पुरुस्कृत करते हैं, यहाँ तक कि रोमिता के ससुर भी उनके घर मिठाई लेकर जाते हैं और उन्हें आशीर्वाद देकर आते हैं। लेकिन रोमिता के जीवन में घटनाक्रम कुछ दूसरा मोड़ लेता है। परिवार की इज्ज़त को लेकर और अनेक लोगों द्वारा एक महिला के साथ जबरदस्ती किए जाने के स्कैंडल की शुरूआती सहानुभूति के बाद अब उनके ससुराल वालों और उनके पति का रवैया उनके प्रति बदलने लगता है और रोमिता पर दबाब लगातार बढ़ने लगता है। यहाँ रोमिता इस आघात से उबरने के कोशिश कर रही होती हैं, वहाँ पलाश को लगातार अपने दफ्तर में लोगों के तीखे सवालों का सामना करना पड़ता है कि क्या रोमिता के साथ केवल छेड़छाड़ ही हुई थी या असल में उनका बलात्कार हुआ था, क्या पलाश की नव-विवाहिता पत्नी के शादी से पहले इनमें से किसी एक या सभी लड़कों के साथ सम्बन्ध रहे थे? रोमिता का एकमात्र सहारा घर में केवल उनकी ननद हैं जो बिना कुछ कहे उनकी देखभाल और ज़ख्मों की मरहम-पट्टी करती हैं। रोमिता भी यह महसूस करती है कि उनकी ननद बिलकुल चुप रहती हैं और घर में बिलकुल कैद रहने जैसी स्थिति में रहती हैं। शुरू में जो परिवार का ननद के प्रति प्रेम लगता था, अब रोमिता को उसमें भी दमन की झलक दिखने लगती है। झिनुक के परिवार से शुरू-शरू में मिला समर्थन भी अब कोर्ट में इस मामले के आगे बढ़ने पर आने वाली कठिनायों के कारण कम होने लगता है। बाद में पता चलता है कि इस घटना में शामिल एक लड़का शहर के नामी व्यवसायी और प्रोमोटर का बेटा है और झिनुक के बॉयफ्रेंड के बॉस का दोस्त है। तुणीर, जिनसे झिनुक का विवाह होना बहुत पहले ही तय हो चुका है वह झिनुक पर दबाब डालते हैं कि अपने वैवाहिक जीवन की भलाई को ध्यान में रखते हुए वह अदालत में पेश न हों। तुणीर के विदेश में तबादला झिनुक के इस फैसले पर ही निर्भर करता दिखाई पड़ता है। रोमिता और झिनुक, दोनों को ही, अब यह लगने लगता है कि उनका नैतिक जीवन जिन भ्रमों पर टिका था वे भ्रम, और उनके निजी सम्बन्ध, दोनों ही अब बिखरने लगे हैं। वे अपने लिए कोई सहारा, किसी तरह की समानुभूति ढूँढने का भरसक प्रयत्न करती हैं जिसके सहारे वे इस दुनिया में, जो अब उन्हें पराई लगने लगी थी, स्थिर खड़ी रह सकें। रोमिता के अपनी बड़ी बहन को लिखे जा रहे ख़त और भी लम्बे हो जाते हैं, और पलाश द्वारा उस रात उन्हें उनके मेट्रो स्टेशन वाले प्रेमियों का उलाहना देने के बाद उनके साथ मार-पीट और जबरन बलात्कार करने के बाद रोमिता ख़त में तलाक लेने का विचार भी लिखती हैं।

नींद रोमिता की आँखों से कोसों दूर है और रोमिता पूरी रात उसी बालकनी में खड़ी रहती हैं। वह पलाश के इन तानों को नज़र-अंदाज़ करती हैं कि यह भी अपनी तरफ ध्यान आकृष्ट करने का उनका एक तरीका है। छेड़खानी की इस घटना के बाद रोमिता के बाहर कहीं भी जाने पर एक तरह का अनकहा लेकिन कड़ा प्रतिबन्ध लग गया है। केवल डॉक्टर के पास जाने के अलावा उन्हें घर से बाहर जाने की मनाही है। अब ऐसा लगने लगा है कि बेडरूम, जहाँ उन्हें चुपचाप वैवाहिक बलात्कार झेलना पड़ता है, और घर के बाहर, जहाँ लगातार हमला होने कर डर है, के बीच बालकनी की यह छोटी सी जगह ही उनके लिए एकमात्र स्थान रह गया है।

दूसरी ओर, झिनुक को भी लगने लगता है कि वह अपने परिवार और अपने प्रेमी, दोनों से ही धीरे-धीरे दूर होती जा रही हैं। ऐसे में वह अपने लिए एक और सहारा ढूँढती हैं – यह एक वृद्धाश्रम है जहाँ उनकी बूढी दादी आपनी मर्ज़ी से जाकर रहती हैं मानों उन्होंने खुद को इस मध्यवर्गीय जीवन की रोज़मर्रा की कुंठाओं से दूर कर लिया हो। पहले तो झिनुक दादी के इस कथन के बहुत नाराज़ हो जाती हैं कि उनके द्वारा दिखाए गए साहस को केवल इसलिए बहुत अच्छा या अनूठा नहीं कह सकते क्योंकि उनके इर्द-गिर्द की दुनिया ऐसा लोगों से भरी पड़ी है जिनमें सही काम कर पाने का साहस नहीं है। दादी का यह कथन पूरी फिल्म के कथानक का नैतिक आधार दिखाई पड़ता है।

शुरू में झिनुक को जो वृद्धाश्रम अलगाव और एकाकीपन से भरा स्थान लगा था, जहाँ बूढ़े लोग मरने की राह तकते थे, अब वही वृद्धाश्रम एक ऐसी जगह लगने लगता है जहाँ वह खुल कर सांस ले सकती हैं और अपनी बात कह सकती हैं। फिल्म के आगे बढ़ने के साथ-साथ, निजी और सार्वजनिक स्थानों में सुरक्षित और असुरक्षित जगहों को लेकर असमन्जस बढ़ता जाता है – मध्य वर्ग के घर अब केवल अपनापन लिए घर न रहकर शक्ति-संबंधों का ऐसा जंजाल बन गए हैं जहाँ संबंधों के क्रम भावनात्मक शोषण से लेकर प्रत्यक्ष शारीरिक/यौन हिंसा के रूप में दिखाई पड़ते हैं।

फिल्म के अंतिम सीन में रोमिता का कोर्ट में सच्चाई से इनकार वाले सीन – उनके साथ की गयी छेड़छाड़ की घटना के दिन के बाद यह पहली बार है कि दोनों नायक प्रतिपक्षी आमने सामने होते हैं (लेकिन बात नहीं करते) – में अनेक तरह की चुप्पी छिपी है। रोमिता के ससुराल वालों ने उन्हें आरोपी को पहचानने से मना कर दिया – लेकिन उनकी इस लगभग चुप्पी भरी गवाही के पीछे रोमिता के मन में हिंसा का एक और मामला चल रहा होता है जो कभी दर्ज नहीं होता और इस देश के कानून में कभी अपराध की तरह दर्ज हो भी नहीं सकता – वह है अपने ही बेडरूम में अपने पति पलाश द्वारा उनके साथ बेरहमी से किया गया बलात्कार।

फिल्म के अंत में, दोनों ही महिलाओं को शायद बाहर निकलकर थोड़ी आजादी मिल पाती है – वे एक असंभव आश्रयस्थल से दुसरे की ओर, जो शायद कहीं है ही नहीं, चल देती हैं।

रोमिता कानूनन औपचारिक रूप से अपना विवाह समाप्त नहीं करती लेकिन अपनी बहन के पास कनाडा चले जाने का फैसला करती हैं। उनका भविष्य अनिश्चित है – शायद वो एक नौकरी ढूँढ लेंगी, या कोई कोर्स करेंगी, शायद वो वहाँ रहती रहेंगी या फिर वापिस आ जाएंगी। वो लिखती हैं कि अब उन्हें कोई परवाह नहीं कि उनका विवाह कायम रहता है या टूट जाता है, लेकिन अब वो अपनी आजादी पाने को तत्पर हैं और उसे गंवाना नहीं चाहती। एक तरह से वो अपनी समस्या के कानूनी हल को ठुकरा देती हैं, शायद उन्हें यह आभास हो गया है कि कानून के पास किसी महिला को ऐसी दुनिया में आज़ाद करने या आदर दे पाने की क्षमता नहीं है जहाँ उन्हें हमेशा ही आधे मनुष्य का जीवन जीना होगा – जहाँ उन्हें बच्चे की तरह माना जाएगा, शक्तिहीन रखा जाएगा और वही सम्बन्ध जो उन्हें सबसे प्रिय हैं, चुप रहने पर मजबूर कर देंगे। झिनुक भी, खुद से जूझ रही हैं लेकिन अंत में पूरी तरह हताश होकर सच पर से भरोसा उठने और आदर ख़त्म होने पर भी तुणीर के साथ विवाह करने को राज़ी हो जाती है। ऐसा लगता है कि फिल्म में यही दर्शाया गया है कि सभी भावनायों के ख़त्म हो जाने पर भी प्रेम जीवित रहता है और चूंकि कहीं और नहीं जा सकते, इसलिए इसे ही हल मानकर स्वीकार कर लिया जाए।

झिनुक अकेली ही वृद्धाश्रम से निकल आती हैं। उधर रोमिता की आवाज़ में उनके ख़त को पढ़ने की आवाज़ आती है : ‘हम सभी अकेले हैं। फिर इन संबंधों को, जैसे भी ये हैं, क्यों छेड़ना? उन्हें वैसे ही रहते दो। शायद इनके भरोसे रहना अब ठीक नहीं।‘ एक आदरणीय मध्यमवर्गीय परिवार की मजबूरियों को देखते हुए, फिल्म में दुखद रूप से ही सही लेकिन शायद यही वास्तविकता दिखाई गयी है कि पूरी स्वतंत्रता महज़ एक भ्रम है – शायद विषमलैंगिक पितृसत्ता की जकड़ से बचने की कोई जगह नहीं है। यह सवाल निश्चय ही उठता है, कि ‘गुड़ियों के घर’ से निकलने के बाद वास्तव में नोरा कहाँ गयी?

इस दुनिया में अपनी आजादी को खोकर महिलाओं को अगर कुछ मिल सकता है तो वह है वो बालकनी, घरों के बीच की वो सुनसान सड़क या फिर वृद्धाश्रम की वो रुकी हुई दुनिया।

फिल्म का अंत यात्राओं की शुरुआत से होता है। पहले से ही दुखी झिनुक घर जाने की जिद करती हैं (तुणीर के बिना), वो कहती हैं कि अकेले सफ़र करने की अपनी आदत छोड़ना नहीं चाहती और अपनी शादी के कार्ड का नमूना अपनी दादी को देती हैं। रोमिता विदेश यात्रा पर निकलने वाली हैं, शायद एक नया जीवन आरम्भ करने के लिए या फिर समझौता कर लेना सीख लेने के बाद फिर उसी जीवन में लौट आने के लिए। लेकिन बदलाव आने का समय ही वो समय है जब लगता है कि इन महिलाओं को थोड़ी बहुत स्वतंत्रता मिल पाती है।

लेकिन मेरे विचार से किसी भी फिल्म में मास्टरस्ट्रोक तब होता है (हालांकि इस बारे में भिन्न मत हो सकते हैं और यह तर्क दिया जा सकता है कि घोष की अधिकाँश फिल्मों की तरह इस कहानी का कथानक भी स्वतंत्रता या हिंसा को मध्यम वर्ग की इच्छाओं और नैतिकताओं से अलग कर नहीं देख पाता) जब फिल्म उस असंभव दिखने वाले लक्ष्य को पा लेने की निशानदेही करती रहे जो इस फिल्म के कथानक में प्रमुख रूप से दर्शाया गया है और जिसके लिए वह कथानक प्रेरित है।

पूरी फिल्म के दौरान दोनों महिलाएं (और तृण भी, आक्रमणकारियों में से एक की मंगेतर) एक दुसरे से फ़ोन पर बात करने की कोशिश करती रहती हैं लेकिन कभी भी इसमें सफल नहीं हो पातीं। फ़ोन घर के कोई दूसरे सदस्य उठाते हैं; रोमिता घबरा कर फ़ोन काट देती हैं; रोमिता के ससुर झिनुक को उनसे बात नहीं करने देते; झिनुक बीमार हो जाने के कारण तृण का फ़ोन नहीं ले पातीं। यह महिलाएं अपने-अपने परिवारों में रहते हुए अकेले ही अपनी लड़ाई लड़ती हैं और बीच-बीच में (राजनीतिक?) संगठन के रूप में (ऐसी एकजुटता जो कभी संभव नहीं हो पाती) अपने-अपने व्यक्तिगत दुखों के अर्थ ढूँढने की कोशिश करती हैं। फिल्म में हमें एक साथ, झिनुक और रोमिता को अलग-अलग अपने ज़ख्मों को सहलाने के दृश्य देखने को मिलते हैं; दृश्य के पाशर्व में एक लय है; क्या इन दोनों के ज़ख्मों को सही मायने में साझा किया जा सकता है? फिल्म हमें कुछ नहीं बताती।

वास्तव में इस फिल्म में जो त्रासदी हमें देखने को मिलती है वह है इस असंभव एकजुटता की, इन रोमांचक संभावनाओं की, समानुभूति और एकता उस उपद्रवी ‘समलिंगी अबाध क्रम’ की जिसके बारे में नारीवादी कवी आड्रेन रिच ने कई दशक पहले कहा था। [1] वो क्या सम्भावना हो सकती है जिसके बारे में फिल्म दहन में ज़िक्र नहीं किया गया है? यह अपनेआप में एक मौलिक नारीवादी प्रश्न हो सकता है जो समालोचना के किसी भी लेख को क्रान्ति में परिवर्तित करने में सक्षम है।

[1] समलिंगी आबाद क्रम के बारे में आड्रेन रिच लिखती है : “चूंकि पित्रिसत्तात्मक परिभाषाओं में ‘लेस्बियन’ शब्द को सिमित करने वाली या कारण विशेष के साथ माना गया है, महिला मित्रता और कामरेडशिप को कामुकता से अलग समझा गया है, इस तरह कामुकता स्वयं ही सिमित हो जाती है। लेकिन जब हम लेस्बियन संबंधों को गहराई से समझने की कोशिश करते हैं तो हमें नारी सन्दर्भ में कामुकता का पता चलता है : वह जो शरीर से या शरीर के किसी एक अंग से जुड़ा हुआ नहीं है, यह एक उर्जा है जो न केवल शान्त है बल्कि जैसा ऑड्रे लार्ड ने कहा, ‘हर तरह की ख़ुशी, भौतिक, भावनात्मक, मानसिक को बांटने, काम को बांटने में हर समय जगह मौजूद है; यह वो शक्तिदायक ख़ुशी है जो मुझे शक्तिहीनता स्वीकार नहीं करने देती या वो नहीं होने देती जो मैं नहीं हूँ जैसे दुखी, चिंतित, तनाव ग्रस्त, खुद को नकारने वाली’। Adrienne Rich, ‘Compulsory Heterosexuality and Lesbian Existence’, Signs, Vol. 5, No. 4, Women: Sex and Sexuality. (Summer, 1980), pp. 631-660. [Stable URL: http://links.jstor.org/sici?sici=0097-9740%28198022%295%3A4%3C631%3ACHALE%3E2.0.CO%3B2-2]

सोमेन्द्र कुमार द्वारा अनुवादित

To read this article in English, please click here.

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Currently Assistant Professor in Cultural Studies at the Centre for Studies in Social Sciences, Calcutta, Trina has a Masters in English Literature from Jadavpur University and a Masters of Studies in English from Oxford University. For her PhD she worked on a history of women in the group theater movement in Bengal between 1950 and 1980. She has also been a theater and film actress, as well as a journalist and fiction writer/poet.

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