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रुपसा मल्लिक द्वारा लिखित सोमिंदर कुमार द्वारा अनुवादित पिछले दो दशकों से प्रजनन प्रौद्योगिकी (रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी आरटी)[1] का उपयोग आम…
किसी व्यस्क व्यक्ति द्वारा अपनी इच्छा से पैसों के भुगतान के बदले दी जाने वाली यौन सेवाओं को सेक्स वर्क…
यूँ तो विवाह और उससे जुड़े महिलाओं के ‘स्थान परिवर्तन’ को ‘प्रवसन’ का दर्ज़ा दिया ही नहीं जाता है, इसको एक अपरिहार्य व्यवस्था की तरह देखा जाता है जिसमें पत्नी का स्थान पति के साथ ही है, चाहे वो जहाँ भी जाए। पूर्वी एशियाई देशों में, १९८० के दशक के बाद से एक बड़ी संख्या में महिलाओं के विवाह पश्चात् प्रवसन का चलन देखा गया है जिन्हें ‘फॉरेन ब्राइड’ या विदेशी वधु के नाम से जाना जाता है।
कम उम्र में विवाह और बाल विवाह एक बेहद विखंडित और असमान समाज का लक्षण है। जब भी यह पूछा गया कि लोग अपने बच्चों की कम उम्र में शादी क्यों करते हैं तो “दहेज़”, “गरीबी” और “यौन हिंसा का डर” आदि कारण सबसे ज़्यादा सुनाई दिए।
ऑड्रे लार्ड ने एक बार कहा था, “अपनी देखभाल करने का ये मतलब नहीं कि मैं स्वार्थी हूँ, देखभाल स्वयं…
जॉनसन थॉमस [संपादक की ओर से: स्वयं की देखभाल करने का सीधा मतलब है अपनी मर्ज़ी से कोई भी ऐसा…
अभी एक दिन, एक पुराना दोस्त और मैं व्हाट्सएप पर बात कर रहे थे। उन्होंने हाल ही में एक लड़की,…
सयद साद अहमद द्वारा लिखित “हम क्या वास्तव में सच जानना चाहते हैं? सत्य की क्या आवश्यकता है? उसके बदले…
गाने अक्सर फिल्मों से अधिक लोकप्रिय होते है और अपने अलग ही मतलब का निर्माण करते हैं। इनका मतलब उनता ही विविध है जितना इनको सुनने वाले लोग। मैं यह बिल्कुल नहीं मानता कि हम जो फिल्म और चित्र देखते है उसका हमारे जीवन पर सीधा असर पड़ता है। हिंसक या अन्यथा मूर्खतापूर्ण कार्यों के लिए दोषी वह ही हैं जो यह कार्य करते हैं और वे जो उन्हें बेहतर शिक्षा दे सकते थे पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। शिक्षा और बातचीत से हम युवाओं को सही समझ और बेहतर निर्णय लेने के लिए सक्षम बनाते हैं।
नोटिस: यह अंजोरा सारंगी के माया शर्मा के साथ साक्षात्कार का दूसरा भाग है, इस साक्षात्कार का पहला भाग यहाँ…
आज के महाराष्ट्र में महिलाओं की स्थिति और उन्नीसवीं सदी की महिलाओं की स्थिति में बहुत अंतर है और इस अंतर के लिए, आज के महाराष्ट्र के लिए, और महिलाओं की आज की बेहतर स्थिति के लिए सावित्रीबाई फुले जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं का योगदान अतुलनीय है। सावित्रीबाई फुले के जन्मदिवस (३ जनवरी) के अवसर पर उनके योगदान को याद करते हुए लेखक ने उन्नीसवीं सदी के महाराष्ट्र और उसकी महिलाओं की स्थिति पर प्रकाश डाला है।
संपादक की ओर से: जैसा कि इस अंक के सम्पादकीय में बिलकुल सही कहा गया है, जन आन्दोलनों की उपस्थिति…
माया शर्मा एक नारीवादी एक्टिविस्ट हैं जो भारत के महिला आन्दोलन में पूरे जोश के साथ जुड़ी रही हैं। उन्होंने…
निरंतर से ऐनी और नीलिमा द्वारा यह बात लगभग दो हफ्ते पहले गाँव पठा, ललितपुर जिला, महरौनी ब्लॉक के सूचना केंद्र की…
मैं एक लेखिका हूँ । बीडीएसएम (BDSM) के बारे में लिखती हूँ । एक दशक से ज़्यादा हो गया मुझे …