मोबाइल फ़ोन की छोटी-सी स्क्रीन आज हमारी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा बन चुकी है। हम दोस्त बनाते हैं, रिश्ते निभाते हैं, प्यार जताते हैं, टूटते हैं और संभलते हैं। सब कुछ अब किसी न किसी रूप में ऑनलाइन होता है। व्हाट्सऐप की चैट, इंस्टाग्राम के मैसेज, डेटिंग ऐप्स की प्रोफ़ाइल और वीडियो कॉल। इन सबके ज़रिए आज रिश्ते बन और बिगड़ रहे हैं।
क्वीयर समुदाय के लिए डिजिटल स्पेस हमेशा से थोड़ा ख़ास रहा है। यह वह जगह बनी जहां लोग पहली बार बिना डर के अपने जैसे लोगों से जुड़ पाए। कई लोगों ने यहीं पहली बार अपने जेंडर और यौनिक पहचान को समझा, नाम दिया और साझा किया। लेकिन इस डिजिटल दुनिया में भी हर पहचान को बराबर जगह नहीं मिलती। कुछ अनुभव ऐसे हैं जो अक्सर चुपचाप किनारे कर दिए जाते हैं। एसेक्सुअलिटी या अलैंगिकता उन्हीं में से एक है।
एसेक्सुअलिटी क्या है?
एसेक्सुअलिटी एक यौनिक पहचान है। असेक्सुअल लोगों में किसी दूसरे के लिए यौन आकर्षण का न होना या बहुत कम होना सामान्य है। इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि एसेक्सुअल लोग रिश्ते नहीं चाहते, प्यार नहीं करते या भावनात्मक जुड़ाव नहीं महसूस करते। बहुत से एसेक्सुअल लोग रोमांटिक होते हैं, गहरी दोस्ती चाहते हैं और अपने रिश्तों में भरोसा, साथ और समझ को सबसे ज़्यादा अहम मानते हैं। फ़र्क बस इतना है कि उनके लिए सेक्स रिश्ते का ज़रूरी हिस्सा नहीं होता। फिर भी, समाज और ख़ासकर डिजिटल स्पेस में रिश्तों को अक्सर एक ही चश्मे से देखा जाता है। जहाँ प्यार, नज़दीकी और अंतरंगता का मतलब सीधे सेक्स से जोड़ दिया जाता है। यही सोच एसेक्सुअल लोगों को सबसे ज़्यादा अदृश्य बना देती है।
पहचान की पहली झलक – इंटरनेट और एसेक्सुअल लोग
भारत जैसे समाज में, जहाँ आज भी सेक्स पर खुलकर बात करना मुश्किल माना जाता है, वहाँ एसेक्सुअल लोगों के लिए ख़ुद को समझना और भी कठिन हो जाता है। बहुत से लोग बचपन से यह महसूस करते हैं कि वे दूसरों से अलग हैं। उन्हें वही इच्छाएँ नहीं होतीं, वही उत्सुकता नहीं होती। लेकिन इसके लिए कोई भाषा नहीं मिलती। कोई यह नहीं बताता कि “इच्छा न होना” भी एक सामान्य अनुभव हो सकता है। नतीजा यह होता है कि लोग ख़ुद को ही दोष देने लगते हैं। उन्हें लगता है कि उनके भीतर कुछ ग़लत है, जिसे ठीक करने की ज़रूरत है। ऐसे में इंटरनेट कई एसेक्सुअल लोगों के लिए पहला सहारा बनता है। कोई देर रात गूगल पर सवाल टाइप करते है, कोई ब्लॉग पढ़ते हुए या किसी यूट्यूब वीडियो में पहली बार “asexual” शब्द सुनते है। अचानक यह एहसास होता है कि यह अनुभव अकेले का नहीं है।
AVEN (Asexual Visibility and Education Network) के अनुसार, दुनिया की लगभग 1% आबादी एसेक्सुअलिटी पहचान के भीतर आती है। यह संख्या छोटी लग सकती है, लेकिन इसका मतलब है कि दुनिया भर में लाखों लोग ऐसे हैं जिनकी पहचान और अनुभव अक्सर अनदेखे रह जाते हैं।
रीगा, जो एक आर्टिस्ट हैं और दिल्ली से हैं, बताती हैं – “जब मैंने पहली बार एसेक्सुअलिटी के बारे में पढ़ा, तो लगा जैसे किसी ने मेरे मन की उलझन को नाम दे दिया हो।”
डिजिटल रिश्ते और यौनिक उम्मीदें
डिजिटल स्पेस में रिश्ते बनाने के तरीके अपने आप में बहुत सीमित हैं। ख़ासकर डेटिंग ऐप्स पर एक तय सोच काम करती है कि हर बातचीत किसी न किसी मोड़ पर सेक्स की ओर जाएगी। प्रोफ़ाइल की तस्वीरों से लेकर चैट के सवालों तक, सब कुछ इसी उम्मीद से भरा होता है। एसेक्सुअल लोगों के लिए यह माहौल अक्सर असहज और थकाने वाला बन जाता है। कई बार वे अपनी प्रोफ़ाइल में साफ़ लिखते हैं कि वे एसेक्सुअल हैं, फिर भी लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते। कुछ लोग इसे “डर”, “पिछला ट्रॉमा” या “सही साथी न मिलने” का नतीजा मान लेते हैं।
डिजिटल बातचीत में यह सवाल बार-बार उभरता है – “तो तुम डेटिंग ऐप पर क्यों हो?”
यह सिर्फ़ जिज्ञासा नहीं, बल्कि उस सोच को दिखाता है जिसमें रिश्तों को बहुत संकीर्ण नज़र से देखा जाता है।
मीरा, गुरुग्राम कि एक मल्टीनेशनल कंपनी में प्रोग्राम मैनेजर हैं और हंसते हुए शायरी भरे अंदाज में कहती हैं…. “राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा…..”
बात को जारी रखते हुए बताती हैं कि, “जैसे बिना सेक्स के रिश्ता चाहना कोई ग़लत या बेवकूफ़ी भरी बात हो।”
क्वीयर स्पेस में भी अदृश्यता
अक्सर यह माना जाता है कि क्वीयर डिजिटल स्पेस सभी के लिए सुरक्षित और समावेशी होता है। लेकिन हकीकत थोड़ी जटिल है। क्वीयर बातचीत में भी ज़्यादातर ज़ोर यौनिक आज़ादी, डेटिंग, हुक-अप कल्चर और सेक्स-पॉज़िटिविटी पर रहता है।
ये बातें ज़रूरी हैं, लेकिन इनके बीच एसेक्सुअल अनुभव अक्सर जगह नहीं बना पाते। कई एसेक्सुअल लोग बताते हैं कि उन्हें क्वीयर स्पेस में भी अपनी पहचान को बार-बार समझाना पड़ता है। जैसे वे “कम क्वीयर” हों। यह अदृश्यता धीरे-धीरे अकेलेपन में बदल जाती है। जब कोई हर जगह ख़ुद को साबित करते रहे, तो मानसिक थकान बढ़ती है।
अंतरंगता के अलग मायने
एसेक्सुअल लोग अंतरंगता को अलग तरह से महसूस करते और जीते हैं। उनके लिए अंतरंगता का मतलब हो सकता है, लंबी और ईमानदार बातचीत, किसी के साथ सुरक्षित महसूस करना, साथ में चुपचाप समय बिताना, या मुश्किल वक्त में एक-दूसरे का सहारा बनना।
यह अंतरंगता अक्सर धीमी, लेकिन बहुत ग़हरी होती है। डिजिटल स्पेस में ऐसे रिश्ते ज़्यादातर निजी चैट्स, छोटे ऑनलाइन ग्रुप्स और सुरक्षित कम्युनिटीज़ में बनते हैं। रेडिट, डिस्कॉर्ड और टेलीग्राम जैसे प्लेटफ़ॉर्म्स पर एसेक्सुअल लोग बिना दबाव के जुड़ पाते हैं।
दिल्ली में रहने वाले एक क्वीयर आर्टिस्ट अपनी बात साझा करते हुए बताते हैं कि – “मेरे लिए अंतरंगता का मतलब है, कोई ऐसा इंसान जिससे मैं बिना डर के अपनी बात कह सकूँ।”
सीमाएं और सहमति का सवाल
डिजिटल रिश्तों में एसेक्सुअल लोगों को सबसे ज़्यादा संघर्ष अपनी सीमाओं को लेकर करना पड़ता है। “मुझे इसमें दिलचस्पी नहीं है” या “मैं ऐसा नहीं चाहता” जैसे वाक्य कई बार सामने वाले को अपमान या रिजेक्शन जैसे लग सकते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि एसेक्सुअल लोगों पर धीरे-धीरे अपनी सीमाएं बदलने का दबाव बनाया जाता है। कुछ अंतरराष्ट्रीय शोध बताते हैं कि एसेक्सुअल पहचान को समाज अक्सर गंभीरता से नहीं लेता, लोग इसे मज़ाक, भ्रम या “फेज़” समझ लेते हैं। इसी वजह से जब एसेक्सुअल लोग ऑनलाइन रिश्ते में अपनी सीमाओं और सहमति (कंसेंट) की बात करते है, तो अक्सर सामने वाले उन्हें समझने के बजाय उन्हें बदलने की कोशिश कर सकते है या उनकी बात को नज़रअंदाज़ कर सकते है।
ऐसे में एसेक्सुअल लोगों के लिए यह साफ़-साफ़ कहना कि वे क्या चाहते हैं और क्या नहीं चाहते, आसान नहीं होता। उन्हें बार-बार अपनी पहचान समझानी पड़ती है, और कई बार उन पर भावनात्मक या मानसिक दबाव भी डाला जाता है। इस कारण ऑनलाइन रिश्तों में अपनी सहमति तय करना और उसे बनाए रखना उनके लिए और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
भारत, भाषा और एसेक्सुअलिटी
भारत में एसेक्सुअलिटी पर बात करना इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि हमारी भाषाओं में इसके लिए सहज शब्द नहीं हैं। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में लोग अक्सर अंग्रेज़ी शब्दों का सहारा लेते हैं। परिवार और समाज में शादी और सेक्स को ज़रूरी कर्तव्य माना जाता है। ऐसे माहौल में “इच्छा न होना” बीमारी या कमी समझ ली जाती है।
मीरा आगे बात करते हुए बताती हैं कि “मेरे लिए एसेक्सुअल होना उतना मुश्किल नहीं, जितना इसे लोगों को समझाना।”
डिजिटल स्पेस यहाँ भी एक छोटी-सी राहत देता है। कम से कम बातचीत शुरू करने के लिए।
आगे की राह
एसेक्सुअल लोग डिजिटल स्पेस को छोड़ नहीं रहे।वे इसे धीरे-धीरे अपने हिसाब से बदल रहे हैं स्पष्ट सीमाओं के साथ, ईमानदार बातचीत के ज़रिए और ऐसे रिश्ते बनाकर जो सम्मान पर टिके हों।
एसेक्सुअलिटी हमें यह सिखाती है कि हर रिश्ता एक जैसा नहीं होता। अंतरंगता के कई रूप होते हैं, और हर एक को अपने रिश्तों को अपनी शर्तों पर जीने का हक़ है। डिजिटल स्पेस में एसेक्सुअलिटी की मौजूदगी एक सवाल बनकर खड़ी है। क्या हम रिश्तों को सिर्फ़ सेक्स से परिभाषित करेंगे, या इंसानी जुड़ाव को थोड़ा और खुले दिल से समझेंगे? शायद इसी सवाल में बदलाव की शुरुआत छिपी है।
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