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महिला मानवाधिकार रक्षकों के स्वयं की देखभाल और स्वास्थ्य रक्षा को सक्रियतावाद में राजनीतिक मुद्दे के रूप में देखना

वेरोनिका विडाल व् सुज़न टोलमे द्वारा

संपादकीय नोट – इन प्लेनस्पीक के इस अंक में हम ‘समुदाय एवं यौनिकता’ के विभिन्न आयामों को देख रहे हैं। जहाँ अपने समुदायों की पहचान करना और उनमें अपने लिए जगह बनाना एक विशिष्ट आयाम है, वहीँ इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इन समुदायों की सामूहिक खुशहाली सुनिश्चित करना भी ज़रूरी है। इस लेख में जेसिका हॉर्न महिला मानवाधिकार रक्षकों के समुदाय और उनकी खुशहाली और मानसिक स्वास्थ्य की एहमियत पर ज़ोर देती हैं। इस लेख का इन प्लेनस्पीक पर सबसे पहले प्रकाशन ‘स्वयं की देखभाल एवं यौनिकता’ (Self-care and Sexuality) अंक में हुआ था और इस अंक में इसका पुनः प्रकाशन किया जा रहा है।  

दुनिया भर में मानवाधिकारों की रक्षा में जुटी महिला मानवाधिकार रक्षकों को अपने काम में प्राय: तनाव, बर्नआउट, बेकाबू भावनात्मक आवेग, अवसाद, चिंता, माइग्रेन के सिरदर्द और कैंसर जैसे प्रभावों का सामना करना पड़ता है। ये कुछ ऐसे कारण हैं जिनकी वजह से कई बार इन महिला मानवधिकार रक्षकों को अपना इतना महत्वपूर्ण काम छोड़ना भी पड़ सकता है। AWID ने महिलाओं के विरुद्ध हिंसा और एचआईवी/एड्स के विरुद्ध एकीकृत कार्यवाही (अफ्रीकन इंस्टिट्यूट फॉर इंटीग्रेटेड रेस्पोंसेस टू वायलेंस अगेंस्ट वीमेन एंड एचआईवी/एड्स (AIR) की वरिष्ठ सलाहकार जेसिका हॉर्न से महिला मानवाधिकार रक्षकों (WHRDs)  के स्वास्थ्य, खुशहाली और स्वयं की देखभाल कर पाने में निहित राजनीति के बारे में बातचीत की।*

AWID: अपने अनुभव के आधार पर, क्या आप हमें बता सकती हैं कि महिला मानवाधिकार रक्षकों के जीवन में, खुशहाली और स्वयं की देखभाल करने का राजनीतिक महत्व क्या है? आपके विचार से इसमें सबसे अधिक ध्यान आकर्षित करने वाली बात क्या है?

जेसिका हॉर्न (JH): हमारा काम ऐसी सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करने का प्रयास करना है जहाँ लोगों का व्यवहार न्यायोचित हो, वे स्वस्थ, संतुलित और बेहतर जीवन निर्वाह कर सकें और हिंसा के भय के बिना अपने दायित्व निभा सकें। सामाजिक दायित्वों को पूरा कर पाने और समाज में अपना योगदान दे पाने के लिए ज़रूरी है कि व्यक्ति का भावनात्मक स्वास्थ्य भी अच्छा हो। मुझे जो बात सबसे ज्यादा अचंभित करती है वह यह है कि मानव जीवन, ख़ासकर इन महिला मानवाधिकार रक्षकों के जीवन के इतने महत्वपूर्ण पहलु को हम कितनी आसानी से इतने लम्बे समय से नज़रंदाज़ करते रहे हैं। बहुत से नारीवादियों (ऑड्रे लार्ड जिनमें से एक हैं) का तर्क है कि हम एक ऐसी सत्ता व्यवस्था का हिस्सा हैं जो हमें दुखी रखने के लिए ही बनी है – ये व्यवस्था समाज के कुछ विशेष समूह की ख़ुशी एवं खुशहाली को मिटाने के उद्देश्य से ही तैयार की गयी है। इस नज़रिए से देखा जाए तो एक पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं की ख़ुशी को समर्थन देना भी अपने-आप में एक तरह का राजनीतिक कृत्य है।

मुझे ऐसा भी लगता है कि हम इस बात का सही अंदाजा नहीं लगा पाते कि दमन और अन्याय से कितना भावनात्मक और मानसिक तनाव पैदा हो सकता है, और यह कि ये तनाव किसी एक व्यक्ति को नहीं असर करता बल्कि यह सामूहिक तनाव होता है। हम ये भूल जाते हैं कि जब भी कोई एक व्यक्ति आहत होता है तो उनकी पीड़ा सभी को प्रभावित करती है। दमन और अत्याचार या अन्याय के शिकार व्यक्ति को प्रत्यक्ष रूप से मदद की आवश्यकता होती है लेकिन उनका साथ देने वाले व्यक्ति भी इस अत्याचार और दमन से परोक्ष रूप से प्रभावित होते हैं। सक्रिय कार्यकर्ताओं के रूप में, लगातार होने वाले अत्याचार और दमन का प्रभाव, कार्यकर्ताओं के पूरे समुदाय पर पड़ता है। इसलिए इस सामूहिक प्रभाव का कोई हल तलाश किया जाना ज़रूरी है क्योंकि कहीं न कहीं यह हम सबके काम और कार्यकुशलता को प्रभावित करता है।

अगर हम विशेष रूप से महिला अधिकारों के लिए संघर्ष को देखें तो मुझे लगता है कि यह कहना सही होगा कि हम कार्यकर्ताओं के अभाव से जूझ रहे हैं। महिलाओं के अधिकारों को प्राप्त करने के संघर्ष में लगे लोगों की संख्या पूरी दुनिया में भी बहुत अधिक नहीं है। अगर हम अन्य कार्य-क्षेत्रों, मान लीजिए तकनीकी क्षेत्र से तुलना करें तो पाएँगे कि कार्य क्षमता तब और कम हो जाती है जब बर्नआउट के कारण कार्यकर्ता उदासीन हो जाते हैं और किसी और काम की ओर मुड़ जाते हैं या फिर इस संघर्ष का असर उनके अपने भावनात्मक और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। ऐसे में महिला अधिकारों के लिए संघर्ष को लगातार जारी रखने के बारे में विचार करना, उसके लिए कोशिश करना और इन कार्यकर्ताओं के हितों पर ध्यान देना भी एक बेहतर राजनीतिक निर्णय होगा।

AWID: आपके विचार से महिला मानवाधिकार रक्षकों, कार्यकर्ताओं और सामजिक आंदोलनों के समक्ष वे कौन सी चुनौतियाँ हैं जिनके कारण वे स्वयं की देखभाल और खुशहाली जैसे महत्वपूर्ण विषयों को अपनी राजनीतिक कार्यसूची में शामिल करने के बारे में गंभीरता से विचार नहीं कर पाते?

JH: महिला अधिकारों के लिए कार्यरत संस्थाओं और आंदोलनों में हम पूरी तरह से इस सत्य को स्वीकार नहीं करते कि हमारे इस काम के दौरान हमें लगातार हिंसा, अत्याचार और दमन देखने को मिलता है, और हिंसा व् दमन की ये घटनाएं हमारे आसपास ही घटती हैं – या तो हमारा ही कोई परिचित व्यक्ति इसका शिकार हो रहा होता है, या फिर हमारे जैसे ही लोग इसका सामना कर रहे होते हैं। ऐसा कब तक नहीं होगा कि आप लगातार दूसरों पर हो रहे अत्याचारों के बारे में सुनते रहें और खुद उन से प्रभावित न हों? संस्थाओं में ऐसी स्थिथि का सामना करने के लिए उचित व्यवस्था के आभाव के कारण अधिकाँश कार्यकर्ताओं को कोई मदद नहीं मिल पाती।

आज आवश्यकता है कि हम अपने संगठनों की मानव संसाधन कार्यप्रणाली में, कार्यकारी खुशहाली और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने के उपयुक्त उपायों को भी शामिल करें। कई अन्य क्षेत्रों जैसे मनोवैज्ञानिक परामर्श और काउन्स्लिंग देने की व्यवस्था में ये उपाय पहले से मौजूद हैं लेकिन महिला अधिकार के कार्यक्षेत्र में ऐसी कोई व्यवस्था लागू करना अभी तक आरम्भ नहीं हो पाया है। इस काम के लिए धन की व्यवस्था हो पाना भी एक बड़ी चुनौती है, और हम अपने संगठन (AIR) में इस विषय पर बहुत बार चर्चा भी करते हैं। हम यह जानते हैं कि महिला अधिकार संगठनों के लिए बहुत कम आर्थिक समर्थन (कोर फंड – जो संस्था की व्यवस्था एवं रख-रखाव पर खर्च किया जा सके) मिल पाता है और व्यावसायिक खुशहाली एक ऐसा कार्य है जिसके लिए धन की व्यवस्था तभी हो पाएगी जब हमें कोर फंडिंग प्राप्त हो। जब आप अपनी परियोजनाओं को लागू करने के लिए ही धन के अभाव से जूझ रहे हों तो ऐसे में भावनात्मक खुशहाली और मानसिक स्वास्थ्य के लिए अतिरिक्त धन और समय जुटा पाना बहुत ही कठिन हो जाता है। इसके लिए ज़रूरी है कि धनदाता इस आवश्यकता को संजीदगी से लें और इससे पहले की बहुत देर जो जाए, इनके लिए अलग से धन और संसाधन उपलब्ध करवाएं। सीमा पर तैनात प्रहरियों से बिना अपनी रक्षा किए लगातार संघर्ष करते रहने की अपेक्षा करना शायद ठीक नहीं होगा। मुझे लगता है कि धनदाता, जो असमानता और हिंसा से भरे इस समाज में बदलाव लाने वाले जिन लोगों का समर्थन करते हैं, का यह नैतिक कर्तव्य भी बनता है कि बदलाव लाने वाले इन लोगों की खुशहाली के लिए भी कुछ करें। इस आन्दोलन को लम्बे समय तक जारी रखने के लिए ज़रूरी है कि इन रक्षकों की भी रक्षा की जाए।

अपने कार्य के दौरान हमें काम करने के तरीकों को लेकर भी कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अपने अनुभव से मैं यह जानती हूँ कि अफ़्रीकी क्षेत्रों में जब हम LGBTI  कार्यकर्ताओं (लेस्बियन, गे, बाईसेक्शुअल, ट्रांसजेंडर, इंटरसेक्स) और समाज में भेदभाव का सामना कर रहे लोगों के साथ संघटन कार्य करते हैं तो हमें ऐसे कुशल चिकित्सक/ व्यवसायिओं को ढूँढने में बहुत कठिनाई होती है जो खुद भेदभाव का व्यवहार न करते हों। हमारी मूल समस्या यही है कि ज़रुरत पड़ने पर हम किसी पर मदद के लिए निर्भर नहीं हो पाते। ऐसा कहने के साथ, मुझे ऐसा भी लगता है कि हम भावनात्मक खुशहाली बनाए रखने के अपने तरीकों में रचनात्मक फेरबदल भी कर सकते हैं, ख़ासकर ‘पश्चिमी मनोविज्ञान’ द्वारा दिए जा रहे इस सुझाव पर निर्भर ना रहने के लिए कि ‘केवल बातचीत’ करने से ही सभी समस्याओं का समाधान निकल सकता है। अभी मौजूद तरीकों के अलावा, भावनात्मक खुशहाली और मानसिक स्वास्थय रक्षा के अन्य कई तरीके भी हो सकते हैं – हमें यह ध्यान रखना होगा कि अलग-अलग लोगों के लिए अलग तरीके कारगर हो सकते हैं।

AWID: क्या आप हमें बताएंगी कि मानवाधिकारों के उल्लंघन से निबटने के लिए ‘समग्र एकीकृत तरीके’ की आपके काम में क्या उपयोगिता है? इस तरीके के विशिष्ट आयाम कौन से हैं? 

JH: AIR की यह समग्र एकीकृत समाधान प्रक्रिया उन अनेक स्वास्थ्य कर्मियों और कार्यकर्ताओं के अनुभव के आधार पर विकसित की गयी है जिन्होंने मिलकर AIR की स्थापना की थी। महिलाओं के विरूद्ध हिंसा और HIV/AIDS  पर हमारे काम के भिन्न-भिन्न पहलुओं जैसे मनोविज्ञान, पैरवी कार्य, सामुदायिक संघठन और रोकथाम, स्वस्थ्य सेवा प्रदान करना और शोधकार्य से प्राप्त अनुभवों और जानकारियों को काम में लाया गया। मानवाधिकारों के उल्लंघन पर काम और पुरुषों के विरुद्ध मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में ऐतिहासिक रूप से समझ बहुत कानूनी पेचीदगियों से भरी थी। लेकिन जहाँ तक महिला अधिकारों का प्रश्न है, इसमें कानून पर आधारित न्याय तो महत्वपूर्ण है लेकिन इसके और भी कई आयाम होते हैं। उदहारण के लिए स्वास्थय – किसी महिला के विरुद्ध होने वाला उल्लंघन उनपर कई तरह के शारीरिक प्रभाव छोड़ सकता है – और यहाँ मन को भी शरीर के अंग के रूप में लिया जा रहा है। इसलिए हमें इस बारे में भी विचार करते हुए अधिकारों के उल्लंघन के सामाजिक स्वरुप को भी ध्यान में रखना होगा। हम यह तो जानते हैं कि महिला मानवाधिकार रक्षकों को सामाजिक मुख्यधारा से अलग करने में सामाजिक कलंक की भावना महत्वपूर्ण होती है – महिलाओं को ‘बुरी महिला’ या ‘बुरी माँ’ के रूप में परिभाषित कर उन्हें समाज में अस्वीकार्य कर दिया जाता है – और यह सब तरीके हैं हमारी सामाजिक स्थिति और हमारी राजनीतिक शक्ति को कम करके आंकने की।

इसका अलावा इसका एक आर्थिक पहलु भी जिसके बारे में हम बहुत कम ध्यान देते हैं। हमें अपने काम में एक ऐसी कार्य विधि को अपनाना होगा जिसमे सबसे पहले तो यह स्वीकार्य हो कि महिलाओं के अधिकारों के हनन का आर्थिक प्रभाव भी पड़ता है। ऐसे में पहले से ही आर्थिक तंगहाली में रहने वाली महिलाओं को अगर आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में समर्थन मिले तो यह अपने आप में उपचारात्मक हो सकता है। खुद अपनी या अपने पर आश्रित लोगों की ज़रूरतों को पूरा न कर पाने पर एक शर्म का भाव उत्पन्न होता है। अगर लोगों की मदद कर उन्हें फिर से अपनी ज़रूरतों को पूरा कर पाने में स्वाबलंबी बनाया जा सके तो यह उनके मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक खुशहाली के लिए बहुत लाभप्रद होगा। रोज़गार सुरक्षा के बारे में यह समझ AIR के कार्यकर्ताओं को उनके अनुभव से मिली है। और उनकी यह जानकारी हिंसात्मक संघर्षों, HIV से प्रभावित समुदायों, जबरन एक स्थान से दुसरे स्थान प्रवास के लिए मजबूर समुदायों में महिलाओं के अधिकारों के हनन के विरुद्ध प्रभावी कदम उठाने में सहायक होती है।

AWID: कृपया हमें AIR संगठन की पहल के बारे में विस्तार से बताएं कि कैसे महिला मानवाधिकार रक्षक, विभिन्न संगठन और समूह इस कार्य में मिलकर काम कर सकते हैं?

JH: एक पहले कदम के रूप में AIR की नींव अफ्रीकी कार्यकर्ताओं ने खुद के लिए रखी थी। इस पहल में यह स्वीकार किया गया था कि अफ्रीका में महिलाओं और लड़कियों के विरुद्ध हिंसा और HIV/AIDS से जुड़े कार्यों और भावनात्मक खुशहाली व् मानसिक स्वास्थय सुनिश्चित करने के लिए बहुत सी जानकारी, समझ और तकनीकी ज्ञान उपलब्ध था जिसे अभी तक अभिलिखित नहीं किया गया था। हम यह भी मानते हैं कि इन परिस्थितियों में काम करने वाले लोगों को ही इसकी बेहतर समझ होती है और उनकी इन जानकारियों को अफ्रीका के अन्य देशों और परिस्थितियों में भी वहाँ के कार्यकर्ताओं के साथ साझा इसलिए किया जा सकता है क्योंकि उन्हें उन विशिष्ट चुनौतियों का हल करने के लिए विकसित किया गया है, और ये चुनौतियाँ अन्य देशों में भी सामान हैं – इन चुनौतियों में मुख्यत: मूलभूत सुविधाओं का अभाव, बार-बार प्रवास करने वाले लोगों के समूह, सामूहिक हिंसा का सामना करते रहे लोग, राज्य द्वारा सुविधाओं की उपलब्धता लगभग न के बराबर होना और बड़े पैमाने पर आर्थिक दमन शामिल था।  

AIR में हमारा ध्यान रहता है कि हम विशेष रूप से अफ्रीका के लिए प्रासंगिक तरीके अपनाए और इसके माध्यम से नारीवादी परिप्रेक्ष्य में बदलाव हासिल कर सकें। इस बदलाव का अर्थ यहाँ उस नारीवादी सोच से है जिसके अंतर्गत हम यह जानने का प्रयास करें कि आखिर जेंडर आधार पर भेदभाव कहाँ से शुरू होता है और साथ ही हम इन मूल कारणों को हल करने का प्रयास करें न कि केवल सतही तौर पर इन कारणों से पैदा होने वाली समस्याओं का। इसमें रोकथाम कार्यों के लिए संघटन करना शामिल है जिससे कि सत्ता संतुलनों को बदला जा सके और समस्या को उसकी जड़ पर ही समाप्त किया जा सके।

AIR द्वारा विकसित सभी टूल और सहायक सामग्री ऑनलाइन उपलब्ध है और कोई भी, कहीं भी इनका निशुल्क प्रयोग कर सकते हैं। हालांकि इनमें परिप्रेक्ष्य अफ्रीका से सम्बंधित है लेकिन ये पूरी दुनिया में समान परिस्थितियों में कहीं भी प्रयोग में लाए जा सकते हैं – जैसे व्यवस्थागत हिंसा का सामना कर रहे समुदाय, जटिल और जवाबदेही के पूर्ण अभाव वाले देश, और मूलभूत सुविधाओं और संसाधनों की कमी को पूरा कर पाने की चुनौती। इस दिशा में AIR पूरे दक्षिणी भूगोल में न्याय, स्वास्थ्य रक्षा, महिला मानवाधिकार रक्षकों के स्वयं के अधिकारों की रक्षा जैसे विषयों पर चर्चा में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। इस दिशा में मानसिक आघात (ट्रामा) को फिर से परिभाषित करने में AIR का योगदान प्रमुख है।

AIR की नई फिल्म देखने के लिए यहाँ जाएँ: Working on trauma creatively: African practitioners rethink the field 

AIR की नवीनतम रिपोर्ट यहाँ पढ़ें: Report: (Re) Conceptualizing Trauma. An AIR Convening

*इस लेख में महत्वपूर्ण योगदान के लिए मे अबू जबर का हार्दिक आभार

सबसे पहले यह लेख AWID पर प्रकाशित हुआ था।

सोमेन्द्र कुमार द्वारा अनुवादित

To read this article in English, please click here.

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