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छोटी उम्र में ‘प्रेम विवाह’ – इंटरनेट प्रयोग के दुष्प्रभाव

नेपाल में छोटी उम्र में विवाह हो जाने का प्रचलन है। यूनिसेफ़ की रिपोर्ट के मुताबिक नेपाल में 37% लड़कियों की 18 वर्ष की उम्र से पहले ही शादी कर दी जाती है, और इनमें से 10% का विवाह तो 15 साल की उम्र तक ही हो जाता है।

2016 में ह्यूमन राइट्स वॉच (HRW) ने नेपाल में बाल-विवाह के प्रचलन पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की। बाल विवाह के प्रमुख कारण यहाँ गरीबी और सामाजिक दबाब हैं और इसके अलावा लड़कियों के साथ जेंडर के आधार पर होने वाले भेदभाव के कारण भी कम उम्र में लड़कियों के विवाह की घटनाएँ बढ़ जाती हैं। कम उम्र में विवाह के अनेक दीर्घकालिक दुष्परिणाम होते हैं और लड़कियों के लिए तो यह बात विशेष रूप से सही है। विवाह होने के कारण वे पढ़ाई पूरी किए बिना ही स्कूल जाना छोड़ देती हैं, और इस कारण वे शिक्षा और जीवन कौशल पाने के अवसरों से चूक जाती हैं। देर से विवाह करने वाली लड़कियों की तुलना में छोटी उम्र में विवाह करने वाली लड़कियों के साथ घरेलू हिंसा होने की आशंका भी ज़्यादा होती है।

ह्यूमन राइट्स वॉच की इस रिपोर्ट और अन्य दूसरी रिपोर्टों से एक और घटना की जानकारी मिलती है जो प्रेम विवाह किए जाने के बारे में है और बाल विवाह की श्रेणी में ही शामिल है। लोगों द्वारा प्रेम विवाह किए जाने (साथियों द्वारा खुद एक दूसरे को चुन कर विवाह करने का फैसला करना) के कारणों को जानने की कोशिश में ह्यूमन राइट्स वॉच की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि, “बहुत से लोग इसके लिए नई तकनीक को दोष देते हैं – इनमें मोबाइल फोन और फ़ेसबुक भी शामिल हैं – वे कहते हैं कि इस नई तकनीक के कारण बच्चों में रोमांटिक संबंध बनना अधिक प्रचलित हुआ है जो शायद पहले नहीं होता था”।

दूसरे कई अध्यन्नों से भी इन तकनीकों के प्रति माता-पिता के मन में इस डर की पुष्टि हुई है। 2012 में Save the Children द्वारा बाल-विवाह की घटनाओं पर किए गए अध्ययन से भी इसी तरह की जानकारी मिली और यह भी पता चला कि आजकल के युवाओं के मन में भी नई तकनीकों के प्रति यही राय थी। नेपाल में अंतर्राष्ट्रीय विकास विभाग द्वारा किशोर उम्र की लड़कियों पर किए गए एक विस्तृत अध्ययन के बाद यह बताया गया कि अविभावकों का मानना था कि फ़ेसबुक का युवा लड़कियों के मन पर बुरा असर पड़ता है, और यह कि इसके माध्यम से वे ऐसे पुरुषों के संपर्क में आती हैं जो उन्हें बहला फुसला कर ‘गलत’ काम करने के लिए उकसाते हैं।

माता-पिता और अविभावकों का इस तरह से संचार के इन नए माध्यमों को लेकर चिंता करना और हमारे वर्तमान नैतिक मूल्यों और जीवन जीने के तरीकों पर बुरा असर डाल पाने से आशंकित होना आम बात है। अपनी पुस्तक इनविटेशन टू लव – लिटरेसी, लव लेटर्स एंड सोशल चेंज Invitations to Love: Literacy, Love Letters and Social Change in Nepal (2001) में मानव विज्ञानी लॉरा एम. अहेर्न (Laura M. Ahearn) ने शिक्षा के प्रसार से नेपाल में हुए बदलावों के बारे में लिखा है कि किस तरह शिक्षा के प्रसार से नेपाल के ग्रामीण अंचलों में प्रेम-प्रसंगों के बनने और पनपने को आकर दिया। उन्होंने लिखा है कि किस तरह ‘शिक्षित युवा अब अपने इस नए कौशल” का इस्तेमाल लव लेटर लिखने में कर रहे हैं, जिससे कि युवाओं के प्रेम में घर छोड़कर भाग जाने की घटनाओं में वृद्धि हुई है। अहेर्न ने अपनी किताब में यह भी ज़िक्र किया है कि शिक्षा के प्रसार के जिस संदर्भ का अध्ययन उन्होंने किया है, उसमें उन्होंने यह पाया है कि युवा लोगों के मन में प्रेम एक विडम्बना बन गया है क्योंकि शिक्षा के प्रसार से युवा लोगों में बाकी सब कुछ करने की समझ तो आई है लेकिन प्रेम की समझ उन्हें अभी भी नहीं है। सांस्कृतिक बदलाव की ऐसी परिस्थितियों में, इन युवाओं के अविभावक गलत नतीजों पर पहुँचने लगे हैं और उस ‘“माध्यम’” पर ही नियंत्रण करने को उत्सुक दिखाई पड़ते हैं जिसके कारण उन्हें लगता है कि युवाओं के मन में यह सब विचार आने लगे हैं।

मीडिया में बार-बार नई टेक्नालजी के गलत इस्तेमाल और इंटरनेट के माध्यम से प्रेम-प्रसंगों के बढ़ने की खबर आते रहने के कारण भी अविभावकों के मन में यह डर अधिक घर कर गया है। नेपाल के चितवन ज़िले में, अनेक माताओं ने स्थानीय प्रशासन से फ़ेसबुक पर अंकुश कसने की मांग रखी थी ताकि इस सोशल नेटवर्किंग साइट के गलत इस्तेमाल पर रोक लगाई जा सके। भारत के कुछ भागों में भी महिलाओं और लड़कियों को उनकी ‘अपनी ही इच्छाओं और फैसलों से सुरक्षित रखने के लिए’ उनके मोबाइल फोन के प्रयोग पर पाबंदी लगा दी गयी है।

जहाँ माता-पिता और अविभावकों को इंटरनेट एक ऐसा खतरा नज़र आता है जिसके कारण युवा लोगों के घर से भाग जाने को बढ़ावा मिल रहा है, वहीं किशोर उम्र के युवा इंटरनेट को जानकारी पाने, एक दूसरे के संपर्क में बने रहने और अपने जीवन के विभिन्न पहलुओं के बारे में ऑनलाइन जानकारी पाने के माध्यम के रूप में देखते हैं। नेपाल में किए गए अध्ययन, जिसका ज़िक्र ऊपर दिए लेख में किया गया है, में यह पाया गया कि काठमाण्डू के आसपास के इलाकों में किशोर उम्र की लडकियाँ मेकअप आदि का समान खरीदने की बजाए अपने मोबाइल फोन को रीचार्ज करवाने को अधिक प्राथमिकता देती थीं। वे ऐसा इसलिए करती थीं ताकि वे मोबाइल पर कॉल कर सकें, सेलफ़ी ले सकें, स्कूल के काम के लिए इंटरनेट पर रिसर्च कर सकें, संगीत सुन सकें, मोबाइल पर गेम खेल सकें और सोशल मीडिया तथा मोबाइल ऐप का इस्तेमाल कर सकें।

सांस्कृतिक रूप से और प्रथानुसार भी, नेपाल में लड़कियों और महिलाओं की यौनिकता को हमेशा नियंत्रण में रखा जाता रहा है, और इसके लिए उनके कहीं भी आने-जाने की स्वतन्त्रता को सीमित रखा जाता है। आज की इस नई टेक्नालजी के आ जाने से उन पर इस नियंत्रण को चुनौती मिल रही है क्योंकि अब उनके माता-पिता या अविभावक अथवा इनके नेटवर्क अब अपनी लड़कियों द्वारा फोन पर और ऑनलाइन की जाने वाली प्रत्येक गतिविधि पर नज़र नहीं रख सकते। लेकिन अविभावक अब भी नियंत्रण को बनाए रखने के लिए कोशिश करते रहते हैं। उनकी गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए और उनके द्वारा किसी भी तरह के गलत काम को रोक पाने के लिए लड़कियों और महिलाओं द्वारा इंटरनेट पर की जा रही हर गतिविधि की जांच करते रहना इसका एक आम तरीका है। परिवार की इज्ज़त को ‘सुरक्षित’ रखने के नाम पर महिलाओं और लड़कियों पर नैतिक निगरानी करने की प्रक्रिया में अब बदलाव किए गए हैं ताकि यह प्रक्रिया भी आज की डिजिटल रूप से एकीकृत दुनिया के अनुरूप बन सके।

लेकिन, केवल डिजिटल मीडिया को ही दोष देते रहने से छोटी उम्र में ‘प्रेम विवाह’ किए जाने के वास्तविक कारणों पर पर्दा पड़ा रहता है। छोटी उम्र में प्रेम विवाह किए जाने के अनेक और विविध कारण होते हैं। मोबाइल फोन या इंटरनेट के प्रयोग पर पाबंदी लगा कर छोटी उम्र में विवाह के होने की समस्या का हल खोजने की कोशिश करना दरअसल इस कोशिश को सही साबित करने का एक सरल तरीका है। यह बिलकुल वैसा ही है जैसे किशोर आयु की लड़कियों में गर्भधारण होने से रोकने के लिए उनके लिए सेक्स से दूर रहने के ही कार्यक्रम चलाये जाएँ। (जबकि इस तरह के कार्यक्रमों से किशोर आयु की लड़कियों में गर्भधारण की घटनाएँ नहीं रुक पाती)।

इंटरनेट पर की जाने वाली गतिविधियों पर निगरानी रखने की कोशिश करने या इंटरनेट के प्रयोग पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा देने से, लाभ की बजाय हानी होने की संभावना अधिक होती है। वास्तविकता तो यह है कि इंटरनेट के प्रयोग पर रोक-टोक करने का परिणाम यह हो सकता है कि किशोरों को जब मदद की सबसे अधिक ज़रुरत होगी तो उन्हें ये मदद नहीं मिल सकेगी। अगर इंटरनेट और टेक्नालजी के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा हो तो युवा लोगों द्वारा उन्हें ऑनलाइन हिंसा होने पर उनके द्वारा इसकी खबर देने या मदद मांगने की संभावना बहुत कम होती है। [1] रिसर्च से यह भी पता चला है कि “21वीं शताब्दी में मीडिया को अपनाने में और इसके साथ सामंजस्य बैठा पाने में युवा लोग सफल रहे हैं”।

वास्तविकता तो यह है कि इंटरनेट के प्रयोग से दरअसल किशोरों को अनेक तरह की जानकारी आसानी से मिल पाती है और इनमें यौन स्वास्थ्य पर मिलने वाली जानकारी भी शामिल है। 2015 में मारी स्टोप्स इंटरनेशनल[2] (यह गर्भनिरोध और सुरक्षित गर्भसमापन सेवाएँ देने वाली संस्था है) द्वारा किए गए एक अध्ययन से यह पता चला है कि किशोरों को यौन स्वास्थ्य पर जानकारी मिलने का प्रमुख स्रोत इंटरनेट ही है।

नेपाल में अभी तक इस मुद्दे पर विचार नहीं हो पाया है कि क्या किशोरों द्वारा घर से भाग जाना इस बात का संकेत देता है कि माता-पिता द्वारा अपने बच्चों के विवाह तय किए जाने की बजाए, किशोर अब खुद अपनी मर्ज़ी से अपना जीवन साथी चुनना चाहते हैं। इसके अलावा नेपाल जैसे रूदीवादी समाज में, जहाँ महिलाओं द्वारा विवाह से पहले या विवाह के बाद अपने पति के अलावा किसी और से, सेक्स किए जाने को स्वीकार नहीं किया जाता, हमें यह भी देखना होगा कि अंतरंगता, यौनिक नज़दीकी और यौनिकता किस तरह से छोटी उम्र में विवाह किए जाने के फैसलों को प्रभावित कर रही हैं, खासकर तब जब कि केवल अविभावकों की सहमति होने पर ही 18 वर्ष की उम्र में विवाह हो सकता है अन्यथा यहाँ विवाह की न्यूनतम कानूनी आयु 20 वर्ष है।

[1] Ruth Lewis, Michael Rowe, Clare Wiper; Online Abuse of Feminists as An Emerging form of Violence Against Women and Girls. Br J Criminol 2016 azw073.doi: 10.1093/bjc/azw073.

[2]Sunaulo Pariwar and Marie Stopes International. Let’s Talk about Sex: Young Adult Sex Survey 2015.

सोमेन्द्र कुमार द्वारा अनुवादित

To read this article in English, please click here.

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Shubha Kayastha (@shubha_a) is a feminist and a sexual rights activist. Indu Nepal (@inepal) is a media trainer, producer and researcher. They are both founders of body & data (@body&data), an organisation that works at the intersection of gender and technology.

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