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जब ज़मीन सूखती है, तो हमारी ज़िंदगी जल उठती है

Dried earth wall

2022 में, मैंने एक बड़े, अच्छी तरह से वित्त पोषित एनजीओ द्वारा आयोजित जलवायु परामर्श में भाग लिया। कमरा कार्बन क्रेडिट, हरित बुनियादी ढाँचा, जल संरक्षण जैसे चर्चित शब्दों से भरा हुआ था। मैंने हाथ उठाकर पूछा, “आपकी जलवायु न्याय योजना में सेक्स वर्करों के लिए कहाँ जगह है?”

पैनल विनम्रता से मुस्कुराया। किसी ने धीरे से कहा। “समावेशन महत्वपूर्ण है”। फिर वे आगे बढ़ गए।

यह क्षण एक पैटर्न को दर्शाता है। भारत और दुनिया भर में जलवायु नीति अक्सर जाति, वर्ग, जेंडर और श्रम के अंतर्संबंधों (इंटरसेक्शन्स) पर रहने वालों को नज़रअंदाज़ कर देती है। यह हाशिये को भूल जाती है। या इससे भी बदतर – यह तो कभी उन्हें जानती ही नहीं थी।

हाल के वर्षों में, जलवायु परिवर्तन ने भारत में कई ग़रीब परिवारों के जीवन को और भी कठिन बना दिया है। ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाले लोग सूखे, बाढ़, बढ़ते तापमान और अनिश्चित मौसम की मार झेल रहे हैं। इन परिस्थितियों ने खेती से होने वाली आमदनी को कम कर दिया है, फसलों को नष्ट कर दिया है और रोज़मर्रा के जीवन को असुरक्षित बना दिया है। परिणाम स्वरूप, कई परिवार, ख़ासकर महिलाएं, काम और आजीविका की तलाश में अपना घर छोड़कर शहरों की ओर पलायन करने के लिए मज़बूर हो गए हैं।

इन प्रवासियों में ग़रीब और सूखा प्रभावित इलाक़ो की महिलाएं भी शामिल हैं, जिन्होंने कई विकल्प आज़माने के बाद, अपना और अपने परिवार का पेट पालने के लिए सेक्स वर्क में कदम रखा है। जलवायु परिवर्तन और ग़रीबी पर बातचीत में इस हक़ीक़त को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

सेक्स वर्क को जलवायु परिवर्तन के नज़रिए से कम ही देखा जाता है, लेकिन इस संबंध को समझना ज़रूरी है। जलवायु आपदाओं से होने वाले आर्थिक और सामाजिक झटके अक्सर कमज़ोर महिलाओं को अनिश्चित और अनौपचारिक कामों में धकेल देते हैं, जिनमें सेक्स वर्क भी शामिल है, जो जब कोई और अवसर उपलब्ध न हो, तब जीवित रहने का एक ज़रिया बन जाता है।

महाराष्ट्र के लातूर की एक महिला ने अपनी कहानी साझा की, जो कई अन्य लोगों के अनुभवों को दर्शाती है। उन्होंने कहा –

“मेरे पास ज़मीन का एक छोटा सा टुकड़ा था। लेकिन बारिश बंद हो गई। सूखे के उन तीन सालों में, हमने सब कुछ बेच दिया – अपनी गायें, अपना सोना, यहाँ तक कि ज़मीन भी। बीमारी के कारण मेरे पति की मृत्यु हो गई। उनके परिवार ने मुझे दोषी ठहराया और मुझे घर से निकाल दिया। मैं छोटे-छोटे दो बच्चों के साथ पुणे आ गई। मैंने तीन घरों में घरेलू कामगार के तौर पर काम किया, लेकिन मैं मुश्किल से अपने बच्चों का पेट भर पाती थी। एक दिन मेरी बस्ती की एक महिला ने मुझसे पूछा, “तुम भूखी क्यों मर रही हो? तुम बुधवार पेठ में ज़्यादा कमा सकती हो।” मुझे समझ नहीं आया कि उसका मतलब क्या था। लेकिन मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। मैंने गुज़ारा करने के लिए सेक्स वर्क में कदम रखा।”

उनकी कहानी अनोखी नहीं है। कई महिलाएं जो सेक्स वर्क में आती हैं, वे महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त ज़िलों जैसे बीड, उस्मानाबाद, जालना, और यहाँ तक कि मध्य प्रदेश और कर्नाटक के कुछ हिस्सों से भी आती हैं। कई महिलाएं अकेली हैं, विधवा हैं, या हिंसक घरों से भागकर आई हैं। जलवायु आपदाएं, बढ़ता कर्ज़, सुरक्षित और स्थिर रोज़गार का अभाव, और सरकार या सामाजिक व्यवस्था से कोई मदद न मिलना, अक्सर उन्हें असुरक्षित परिस्थितियों में शहरों की ओर पलायन करने के लिए मज़बूर कर देता है।

जब ज़मीन से भोजन नहीं मिलता, तो शहर उम्मीद और जाल दोनों बन जाता है।

पुणे स्थित सेक्स वर्करों के साथ काम करने वाली संस्था, सहेली संघ, ने पिछले पाँच सालों में सेक्स वर्क में शामिल होने वाली महिलाओं की संख्या में 20% की बढ़ोतरी देखी है। इनमें से ज़्यादातर महिलाएं जलवायु परिवर्तन से प्रभावित ग्रामीण इलाकों से आती हैं। संस्था के आँकड़े बताते हैं कि 2019 और 2024 के बीच, पुणे के सिर्फ़ दो इलाकों में 600 से ज़्यादा नई महिलाओं ने सेक्स वर्क शुरू किया है, और उनमें से ज़्यादातर सूखाग्रस्त इलाकों से पलायन कर आई हैं।

यह ट्रेंड केवल महाराष्ट्र तक ही सीमित नहीं है। एक्शन एड की 2021 की एक रिपोर्ट बताती है कि पूरे एशिया और अफ्रीका में, जलवायु परिवर्तन ग़रीबी को गहरा कर रहा है और महिलाओं को अनौपचारिक और अक्सर जोख़िम भरे कामों में धकेल रहा है, जिनमें सेक्स वर्क भी शामिल है। इस वास्तविकता के बावजूद, सेक्स वर्कर आपदा और विकास नीतियों में लगभग अदृश्य हैं। चाहे कोविड-19 महामारी हो, बाढ़ हो या लू, उन्हें शायद ही कभी सरकारी सहायता, राहत पैकेज या पुनर्वास कार्यक्रमों में शामिल किया गया होगा। यहाँ तक कि कई सामाजिक कार्यकर्ता और विकास पेशेवर भी उन्हें नज़रअंदाज़ करते हैं, क्योंकि अक्सर सेक्स वर्क को ग़लत तरीके से अपराध या शर्म का स्रोत माना जाता है। यह कलंक सेक्स वर्करों को मदद, न्याय और आवश्यक सेवाओं तक पहुँचने से रोकता है।

यह याद रखना ज़रूरी है कि सेक्स वर्कर पहले इंसान हैं। वे इस देश की माताएं, बहनें और नागरिक हैं। उन्हें भी बाक़ी सभी लोगों की तरह संवैधानिक अधिकार और सम्मान प्राप्त हैं। फिर भी, कई सेक्स वर्कर सिर्फ़ अपने काम की वजह से राशन कार्ड, आवास योजनाओं, आपदा राहत और वित्तीय सहायता से वंचित रह जाते हैं।

सेक्स वर्कर बचाव या दया की मांग नहीं कर रहे हैं। वे सम्मान, अधिकार और मान्यता की मांग कर रहे हैं। वे कुशल श्रमिक हैं जो भावनात्मक और यौन सेवाएं प्रदान करते हैं। उनका काम वास्तविक है और श्रम कानूनों के तहत उन्हें मान्यता मिलनी चाहिए। वे भी अन्य श्रमिकों की तरह सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवा, वित्तीय समावेशन और सामाजिक सुरक्षा चाहते हैं।

जलवायु परिवर्तन और सेक्स वर्क के बीच का संबंध वास्तविक और ज़रूरी है। जब ज़मीन सूख जाती है, बारिश नहीं होती और फ़सलें बर्बाद हो जाती हैं, तो सबसे पहले ग़रीबों – ख़ासकर महिलाओं – को नुकसान होता है। वे अपनी आय, अपना घर और अक्सर अपनी गरिमा खो देती हैं। बिना किसी कौशल, सुरक्षा या अवसर के पलायन करने को मज़बूर कुछ महिलाएं, जीवनयापन के एकमात्र विकल्प के रूप में सेक्स वर्क में लग जाती हैं।

इस संबंध की अनदेखी करने से हम निष्पक्ष और समावेशी जलवायु नीतियाँ बनाने में असफल रहेंगे। किसी भी जलवायु कार्य योजना में सबसे कमज़ोर तबके पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए – जिसमें सेक्स वर्कर भी शामिल हैं। उन्हें आपदा राहत कार्यक्रमों, स्थायी आजीविका पहलों और सुरक्षित प्रवासन नीतियों में शामिल किया जाना चाहिए।

नीति निर्माताओं, नागरिक समाज और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों को उनकी आवाज़ सुननी चाहिए। उनके अनुभव बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन के मोर्चे पर जीवन-रक्षा वास्तव में कैसी होती है। सबसे ज़्यादा प्रभावित लोगों को शामिल किए बिना, जलवायु न्याय पहुँच से बाहर ही बना रहेगा।

यह सिर्फ़ विकास का मुद्दा नहीं है – यह न्याय का प्रश्न है।

न्याय का अर्थ है सुनना।

इसका अर्थ है “जलवायु-प्रभावित” की परिभाषा का विस्तार करके उन लोगों को भी इसमें शामिल करना जिनके जीवन पर पारिस्थितिक विनाश का अदृश्य प्रभाव पड़ता है। इसका अर्थ यह स्वीकार करना है कि पितृसत्ता, जाति, यौनिकता और वर्ग किस प्रकार यह तय करते हैं कि किसे संरक्षित किया जाए – और किसका बलिदान किया जाए।

इसलिए मैं नीति-निर्माताओं से आग्रह करती हूँ कि अगली जलवायु योजना लिखते समय वे ख़ुद से ये प्रश्न पूछें –

किसके नाम गायब हैं?
किसकी आवाज़ें दबा दी गई हैं?
और सबसे महत्वपूर्ण बात, उस चुप्पी से फ़ायदा किसे हो रहा है?

सुनीता भदौरिया द्वारा अनुवादित।

To read this article in English, please click here

Cover image by Fermoar.ro on Unsplash