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क्वीयर और ट्रांस पहचान का डिजिटल निर्माण – अवसर और जोख़िम

multicolored abstract painting

मोबाइल की एक छोटी-सी स्क्रीन, मानो चार इंच की खिड़की, जिसके भीतर एक पूरी ज़िंदगी धड़कती है। बाहर की दुनिया जहाँ चुप्पी और डर हावी रहते हैं, वहीं इस स्क्रीन के भीतर पहली बार खुलकर सांस लेने की जगह मिलती है। किसी के लिए यह इंस्टाग्राम पर अपनी पहचान को शब्द देने का पहला साहस होता है, किसी के लिए ग्राइंडर पर बिना हिचक “मैं ट्रांस हूँ” लिख पाने की आज़ादी, और किसी के लिए ट्विटर/एक्स पर एक हैशटैग, जो उसे दुनिया भर के क्वीयर लोगों से जोड़ देता है।

डिजिटल स्पेस ने क्वीयर और ट्रांस समुदाय को वह दिया है, जो अक्सर घर, स्कूल और समाज नहीं दे पाए। देखे जाने का हक़, बोले जाने की जगह और चुने हुए रिश्ते। कई लोगों के लिए यह महज़ ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म नहीं, बल्कि पहला सुरक्षित ठिकाना बना, जहाँ पहचान को छिपाना नहीं, बल्कि जीना संभव हुआ।

लेकिन यही स्क्रीन धीरे-धीरे ख़तरे का चेहरा भी दिखाती है। यही डिजिटल स्पेस डॉक्सिंग का औज़ार बनता है, ट्रोलिंग और धमकियों का मैदान बनता है, और एल्गोरिदम के ज़रिये नफ़रत को सामान्य करता है। इसलिए सवाल यह नहीं कि डिजिटल स्पेस ज़रूरी है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या यह सच में सुरक्षित है, या एक ऐसा नया ख़तरा बन चुका है, जिसे रोज़मर्रा की क़ीमत मान लिया गया है। यही द्वंद्व आज क्वीयर और ट्रांस लोगों के डिजिटल अनुभव के केंद्र में खड़ा है।

क्वीयर और ट्रांस पहचान का डिजिटल निर्माण

भारत जैसे समाज में, जहाँ अब भी बड़ी संख्या में लोग अपनी यौनिकता और जेंडर पहचान को परिवार, स्कूल, दफ़्तर और मोहल्ले से छिपाकर रखते हैं, इंटरनेट ने एक ऐसा दरवाज़ा खोला जिसने चुप्पी को भाषा दी। कई लोगों के लिए यह पहला स्थान था जहाँ “मैं गे हूँ”, “मैं लेस्बियन हूँ”, “मैं ट्रांस हूँ” या “मैं नॉन-बाइनरी हूँ” कहना अपराध या मज़ाक नहीं बना। एक क्लिक में बनी यह दुनिया क्वीयर और ट्रांस लोगों के लिए सुरक्षित ठिकाने की तरह महसूस हुई। कम से कम शुरुआत में।

डेटा भी इस अनुभव की पुष्टि करता है। 2023 में किए गए एक अंतरराष्ट्रीय सर्वे और उपलब्ध शोधों से यह स्पष्ट होता है कि डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म LGBTQIA+ युवाओं के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण संसाधन हैं, ख़ासकर उन समुदायों में जहाँ ऑफ़लाइन समर्थन सीमित है।

GLSEN की Out Online रिपोर्ट के अनुसार, एलजीबीटीक्यूए (LGBTQA) युवा गैर-एलजीबीटीक्यूए युवा की तुलना में अपनी यौनिकता या यौन आकर्षण के बारे में ऑनलाइन जानकारी खोजने की संभावना लगभग पांच गुना अधिक थी। 62% एलजीबीटीक्यूए युवाओं ने ऐसे विषयों पर जानकारी खोजी, जबकि यह सिर्फ 12% गैर-एलजीबीटीक्यूए युवाओं में पाया गया।

यही नहीं, एलजीबीटीक्यूए युवा स्वास्थ्य और चिकित्सा जानकारी के लिए भी कहीं अधिक इंटरनेट का उपयोग करते हैं और वे ऑनलाइन समुदायों में समर्थन और पहचान पाते हैं, जिनके माध्यम से वे अपने अनुभव साझा कर सकते हैं। इन खोजों से पता चलता है कि विशेषकर ग्रामीण व सेमी-अर्बन इलाकों के क्वीयर युवा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर ज़्यादा निर्भर हैं क्योंकि वहीं उन्हें पहचान, समर्थन और सुरक्षित जानकारी मिल पाती है।

यूट्यूब वीडियो, इंस्टाग्राम रील्स, रेडिट थ्रेड्स और टेलीग्राम ग्रुप्स – ये सब मिलकर एक वैकल्पिक स्कूल बन जाते हैं, जहाँ जेंडर और सेक्सुअलिटी पढ़ाई जाती है।

लेकिन डिजिटल स्पेस केवल ज्ञान का स्रोत नहीं रहा। यह भावनात्मक सहारा भी बना। देर रात के मैसेज, अजनबियों के साथ साझा किया गया दर्द, और “हम भी ऐसा ही महसूस करते हैं” जैसे जवाब। इन सबने एक तरह की चुनी हुई रिश्तेदारी बनाई। कई ट्रांस लोगों के लिए, जिन्हें घर से निकाला गया या जिन्हें पहचान के कारण हिंसा झेलनी पड़ी, ऑनलाइन कम्युनिटी ने जीने की वजह दी।

एक ट्रांस महिला, जो उत्तर भारत के एक छोटे शहर से है, ऑनलाइन सपोर्ट ग्रुप में लिखती हैं, “अगर इंटरनेट नहीं होता, तो शायद मैं आज ज़िंदा नहीं होती। किसी ने पहली बार मुझसे कहा था कि मेरा अस्तित्व ग़लत नहीं है।”

यह सिर्फ़ एक भावनात्मक बयान नहीं है; यह डिजिटल स्पेस की जीवनरक्षक भूमिका की गवाही है। लेकिन कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती। जिस डिजिटल स्पेस ने सुरक्षित ठिकाने का वादा किया, वही धीरे-धीरे नए ख़तरों का मैदान भी बनता गया। जैसे-जैसे क्वीयर और ट्रांस लोग ज़्यादा दिखने लगे, वैसे-वैसे नफ़रत भी संगठित होने लगी। एल्गोरिदम, जो “एंगेजमेंट” को इनाम देता है, अक्सर घृणास्पद कंटेंट को और फैलाता है।

ट्रोलिंग, मिसजेंडरिंग, रेप थ्रेट्स और डॉक्सिंग। ये सब क्वीयर और ट्रांस लोगों के डिजिटल अनुभव का हिस्सा बन गए। 2022 की एक रिपोर्ट के अनुसार, आयरलैंड में लगभग 87% LGBTQ+ युवा ने ऑनलाइन नफरत और उत्पीड़न (hate and harassment) देखा या अनुभव किया। इसमें लगभग 87% ट्रांस और जेंडर नॉन-कन्फॉर्मिंग इंटरनेट प्रयोगी ने ऑनलाइन उत्पीड़न का सामना किया। इनमें से कई मामलों में उत्पीड़न सिर्फ़ शब्दों तक सीमित नहीं रहा। लोगों की निजी जानकारी लीक की गई, परिवार वालों को फोन किए गए, और ऑफ़लाइन हिंसा की धमकियां दी गईं। डिजिटल और भौतिक दुनिया के बीच की दीवार बहुत पतली साबित हुई।

जब एल्गोरिदम भी पक्षपाती हो जाता है

सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स की नीतियां भी अक्सर क्वीयर और ट्रांस लोगों के ख़िलाफ़ काम करती दिखीं। कई बार नफ़रत फैलाने वाली पोस्ट्स “कम्युनिटी गाइडलाइंस” के भीतर सुरक्षित रहती हैं, जबकि ट्रांस लोगों की अपनी तस्वीरें, ट्रांज़िशन से जुड़ी जानकारी या देह से जुड़े अनुभव “आपत्तिजनक” कहकर हटा दिए जाते हैं। यह सेंसरशिप सिर्फ़ तकनीकी नहीं, बल्कि गहराई से राजनीतिक है।

एक नॉन-बाइनरी कंटेंट क्रिएटर का कहना है – “मेरे शरीर पर हमला करने वाले लोग कम ख़तरनाक हैं; असली डर तो उस प्लेटफ़ॉर्म से है जो मेरी पहचान को ख़तरा मानता है।”

यह बाइट उस असमानता को उजागर करती है, जहाँ एल्गोरिदम न्यूट्रल होने का दावा करता है, लेकिन समाज के पूर्वाग्रहों को ही दोहराता है।

डेटिंग ऐप्स का अनुभव भी विरोधाभासी रहा है। एक ओर ये ऐप्स क्वीयर लोगों को रोमांटिक और यौनिक रिश्तों की आज़ादी देते हैं, वहीं दूसरी ओर यहाँ भी ट्रांसफ़ोबिया, फ़ेटिशाइज़ेशन और हिंसा आम है। “नो ट्रांस”, “ओनली रियल वुमन”, “टॉप ओनली” जैसे डिस्क्रिप्शन सिर्फ़ व्यक्तिगत पसंद नहीं, बल्कि डिजिटल भेदभाव के रूप हैं। कई ट्रांस पुरुषों और महिलाओं ने बताया है कि डेटिंग ऐप्स पर उन्हें या तो अपमानित किया गया या ख़तरनाक परिस्थितियों में फँसाया गया।

मिताली (एक ट्रांसवुमन) बताती हैं कि “डेटिंग ऐप्स मेरे लिए कभी सुरक्षित जगह नहीं रहे। एक बार ऐप के ज़रिये एक लड़का मेरे घर आया। उसने कहा कि उसे मेरी ट्रांस पहचान से कोई समस्या नहीं है। शुरू में वह ठीक लगा, लेकिन थोड़ी देर बाद उसके शब्द और व्यवहार बदलने लगे। उसने अजीब सवाल पूछे और मुझे असहज महसूस हुआ।

जब वह चला गया, तब मुझे पता चला कि वह घर से ज़रूरी सामान कुछ पैसे और चीज़ें चुरा कर ले गया था। मैं पुलिस के पास भी नहीं जा पाई, क्योंकि डर था कि मेरी पहचान की वजह से मुझे ही दोषी ठहरा दिया जाएगा। उस दिन समझ आया कि डेटिंग ऐप्स पर मिलने वाली आज़ादी कई बार हमारे लिए ख़तरे में बदल जाती है।”

यह भी ज़रूरी है कि हम यह समझें कि डिजिटल स्पेस सबके लिए एक जैसा नहीं होता। जाति, वर्ग, भाषा, जेंडर और भूगोल – ये सभी कारक तय करते हैं कि कोई इंटरनेट पर कितना सुरक्षित है। शहरी, अंग्रेज़ी बोलने वाले क्वीयर लोगों के पास अक्सर ज़्यादा संसाधन और विज़िबिलिटी होती है, जबकि दलित, आदिवासी, मुस्लिम, ग्रामीण या विकलांग क्वीयर लोगों के अनुभव कहीं ज़्यादा असुरक्षित और अदृश्य रहते हैं। उनके लिए ऑनलाइन हिंसा के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराना भी एक जोख़िम भरा काम हो सकता है।

इसके बावजूद, डिजिटल स्पेस को सिर्फ़ ख़तरे की जगह कह देना अधूरा सच होगा। यही वह जगह है जहाँ क्वीयर आंदोलन ने नई भाषा, नए औज़ार और नए नेतृत्व गढ़े हैं। हैशटैग कैंपेन, ऑनलाइन पेटिशन, डिजिटल स्टोरीटेलिंग और वर्चुअल सपोर्ट सर्कल्स इन सबने क्वीयर राजनीति को नए रूप दिए हैं। महामारी के दौरान, जब ऑफ़लाइन स्पेस पूरी तरह बंद हो गए थे, तब डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स ही थे जिन्होंने कनेक्शन बनाए रखा।

डिजिटल स्पेस, सुरक्षा और ज़िम्मेदारी – संरचनात्मक विफलताओं का सवाल

असल सवाल यह नहीं है कि डिजिटल स्पेस अच्छा है या बुरा। सवाल यह है कि किसके लिए, किस शर्त पर और किस कीमत पर। जब सुरक्षा की ज़िम्मेदारी पूरी तरह व्यक्ति पर डाल दी जाती है – “ब्लॉक कर दो”, “रिपोर्ट कर दो”, “ऑफ़लाइन हो जाओ” – तो यह संरचनात्मक समस्या को निजी समस्या बना देता है। क्वीयर और ट्रांस लोगों से बार-बार यही कहा जाता है कि वे ख़ुद को कम दिखाएँ, कम बोलें, कम मौजूद रहें।

लेकिन समाधान चुप्पी नहीं हो सकता। ज़रूरत है ऐसे डिजिटल स्पेस की जो क्वीयर और ट्रांस लोगों को सिर्फ़ सहन न करें, बल्कि सक्रिय रूप से सुरक्षित रखें। प्लेटफ़ॉर्म्स को अपनी नीतियों में जेंडर-सेंसिटिव अप्रोच अपनानी होगी, कंटेंट मॉडरेशन में विविधता लानी होगी और ऑनलाइन हिंसा को गंभीरता से लेना होगा। साथ ही, डिजिटल साक्षरता और सामुदायिक देखभाल (community care) को मज़बूत करना भी उतना ही ज़रूरी है।

अंततः डिजिटल स्पेस क्वीयर और ट्रांस लोगों के लिए न तो पूरी तरह सुरक्षित ठिकाना है और न ही सिर्फ़ नया ख़तरा। यह एक संघर्षशील मैदान है, जहाँ हर दिन पहचान, गरिमा और सुरक्षा के लिए बातचीत होती है। स्क्रीन के उस पार बैठे कोई जब पहली बार लिखते हैं “हम ऐसे हैं”, तो वह सिर्फ़ शब्द नहीं टाइप करते बल्कि एक पूरी दुनिया को चुनौती देते हैं। और शायद, इसी चुनौती में उम्मीद छिपी है।

उम्मीद इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि डिजिटल स्पेस अब कोई वैकल्पिक दुनिया नहीं रहा, बल्कि वास्तविक जीवन का ही विस्तार बन चुका है। आज क्वीयर और ट्रांस लोगों की नौकरी, दोस्ती, प्रेम, राजनीति और सक्रियता सब कुछ किसी न किसी रूप में ऑनलाइन मौजूदगी से जुड़ा है। ऐसे में यह कहना कि “अगर असुरक्षित है तो इंटरनेट छोड़ दो” उतना ही अव्यावहारिक है जितना यह कहना कि “अगर सड़क पर हिंसा है तो घर से बाहर मत निकलो।” सवाल छोड़ने का नहीं, बदलने का है।

सर्वेलन्स, डेटा और असुरक्षा – क्वीयर-ट्रांस ऑनलाइन जीवन की संरचनायें

ख़ासतौर पर ट्रांस लोगों के लिए डिजिटल स्पेस पहचान निर्माण का एक जटिल लेकिन अनिवार्य मंच बन गया है। कई ट्रांस लोग अपनी ट्रांज़िशन के सफर को ऑनलाइन साझा करते हैं। कभी जानकारी के लिए, कभी अपने जैसे लोगों तक पहुँचने के लिए, और कभी इसलिए कि समाज उन्हें ऑफ़लाइन देखने को तैयार नहीं। मगर यही दृश्यता कई बार उनके लिए दोधारी तलवार बन जाती है।

जितनी ज़्यादा पहचान स्पष्ट होती है, उतनी ही ज़्यादा निगरानी और हमला भी।

एक अध्ययन बताता है कि ऑनलाइन ट्रांस्फोबिक कंटेंट का सीधा असर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। चिंता, अवसाद और आत्महत्या के विचार ये सब डिजिटल हिंसा से गहराई से जुड़े पाए गए हैं। भारत में काम कर रहे कुछ क्वीयर मानसिक स्वास्थ्य संगठनों के अनुसार, हेल्पलाइन पर आने वाली कॉल्स में एक बड़ा हिस्सा उन लोगों का होता है जिन्हें ऑनलाइन उत्पीड़न के बाद गंभीर मानसिक संकट का सामना करना पड़ा। यानी डिजिटल हिंसा “वर्चुअल” नहीं रहती, वह शरीर और मन दोनों पर असर डालती है।

सुरक्षा एक अभ्यास के रूप में – प्राइवेट नेटवर्क्स और कलेक्टिव नॉलेज

फिर भी, इन तमाम ख़तरों और असमानताओं के बीच, क्वीयर और ट्रांस समुदाय ने डिजिटल स्पेस को पूरी तरह छोड़ने से इनकार किया है। इसके बजाय, उन्होंने इसे अपने तरीक़े से फिर से गढ़ने की कोशिश की है। छोटे-छोटे प्राइवेट ग्रुप्स, एन्क्रिप्टेड चैट्स, कमर्शियल प्लेटफ़ॉर्म्स से बाहर बनी वेबसाइट्स और ज़ीन-कल्चर। ये सब प्रतिरोध के रूप हैं। यहाँ सुरक्षा कोई फीचर नहीं, बल्कि एक सामूहिक अभ्यास है।

कई युवा क्वीयर लोग आज डिजिटल सेफ़्टी को लेकर ख़ुद एक-दूसरे को सिखा रहे हैं कि कैसे अपनी पहचान छिपानी है, कैसे ट्रोल्स से निपटना है, कैसे सबूत इकट्ठा करने हैं और कब मदद माँगनी है। यह ज्ञान किसी सरकारी पाठ्यक्रम से नहीं, बल्कि साझा अनुभवों से पैदा हुआ है। यही वह जगह है जहाँ डिजिटल स्पेस सिर्फ़ ख़तरे की कहानी नहीं रहता, बल्कि सामूहिक साझेदारी और देखभाल की कहानी भी बनता है।

आख़िर में, डिजिटल स्पेस क्वीयर और ट्रांस लोगों के लिए एक सवाल की तरह है। एक ऐसा सवाल जिसका जवाब हर दिन बदलता है। कभी यह पहली मुस्कान देता है, कभी पहली चोट। कभी यह घर बनता है, कभी युद्धभूमि। लेकिन एक बात साफ़ है – क्वीयर और ट्रांस लोग इस स्पेस में सिर्फ़ उपभोक्ता नहीं हैं, वे इसके निर्माता भी हैं। अपनी मौजूदगी से, अपनी आवाज़ से, और अपने संघर्ष से वे लगातार यह तय कर रहे हैं कि इंटरनेट सिर्फ़ बहुसंख्यकों की जागीर नहीं है।

शायद भविष्य का डिजिटल स्पेस पूरी तरह सुरक्षित न हो, लेकिन अगर क्वीयर और ट्रांस लोग उसमें अपनी जगह बनाने की ज़िद छोड़ दें, तो वह और भी ख़तरनाक हो जाएगा। इसलिए यह लड़ाई सिर्फ़ ऑनलाइन सुरक्षा की नहीं है। यह दिखे जाने, सुने जाने और बराबर माने जाने की लड़ाई है। स्क्रीन के इस पार और उस पार, दोनों जगह।

Cover image by Steve Johnson on Unsplash