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हाथ से बने चित्र में काली और नारंगी पृष्ठभूमि पर रंगबिरंगी औरत अपने घुटनो को मोड़ कर उन्हें पकड़ कर बैठी है
CategoriesDisability and Sexualityहिन्दी

प्रेम विकलांग नहीं होता 

राजवीर (बदला हुआ नाम) से दोबारा मुलाक़ात होने से पहले मेरे जीवन में प्रेम करने की स्वतंत्रता को लेकर कभी किसी तरह का द्वंद नहीं था। सच कहूँ तो मैंने कभी इस बारे में सोचा भी नहीं था, आखिर मुझे क्या फर्क पड़ता है अगर लोग सड़कों पर मार्च कर रहे हो, प्रेम होने का उत्सव मना रहे हो या सोशल मीडिया पर प्रेम करने की स्वतंत्रता को लेकर पोस्ट डाल रहे हों? उनके ऐसा करने से कम से कम मेरे जीवन पर तो किसी तरह का कोई असर नहीं पड़ रहा था। 

पहले पहल राजवीर से मेरी मुलाक़ात अपने दफ्तर में हुई थी। उस समय उनकी उम्र 9 बरस की थी और जब मैंने वो काम छोड़ा तो उस समय वो 12 वर्ष के हो गए थे। मैं राजवीर की कौंसलर थी। आज 17 बरस से ज़्यादा उम्र में राजवीर 6 फुट लंबे सजीले नौजवान है। उन्हें दोबारा देखकर मुझे खुशी के साथ-साथ हैरानी भी हुई थी। राजवीर का बात करने का अंदाज़ अपनी उम्र के दूसरे नौजवानों से थोड़ा हटकर है। वो पैर पर पैर रख कर बैठते है, बात करते समय बड़ी-बड़ी आँखों को खोल कर घुमाते रहते है और वे कोई भी ज़रूरी या महत्वपूर्ण लगने वाली बात हमेशा अपनी तर्जनी उंगली उठा कर करते है। वो धीमे कोमल स्वर में बात करते है और अक्सर एक ही बात को बार-बार दोहराते रहते है। कभी कभी वो खुद से कुछ सोच कर ऐसे ही ज़ोर-ज़ोर से हंसने या मुस्कुराने भी लगते है। राजवीर को ऐस्पर्गर सिंड्रोम (Asperger’s Syndrome) है। 

राजवीर की माँ चाहती थीं कि मैं राजवीर को महिलाओं के साथ बात करने के तौर-तरीके सिखाऊँ क्योंकि कभी-कभी बात करते समय वे बिलकुल बचकानी हरकतें करने लगते है जो कि उनकी उम्र के युवाओं के लिए उपयुक्त नहीं समझी जातीं। उनकी अध्यापिका का कहना था कि उनके बात करने का तरीका सेक्शुअल लगता है और ऐसा जान पड़ता है कि महिला अध्यापिकाओं या दूसरे महिला कर्मचारियों के साथ बात करते समय उनके मन के भाव और इच्छाएँ, उनके बात करने के तरीके में दिखाई देने लगते हैं। राजवीर की माँ नताशा (बदला हुआ नाम) नें मुझे बताया कि राजवीर नें कभी भी अपनी सीमाएं नहीं लांघी थीं। वे कभी भी किसी के साथ बहुत ज़्यादा व्यक्तिगत नहीं होते लेकिन बड़ी-बड़ी आँखें निकालकर बात करने का उनका तरीका ही ऐसा है कि देखने वाले को वो नागवार गुज़रता है।   

मैं उनके स्कूल के लोगों की इस चिंता को पूरी तरह से समझ नहीं पाई, क्योंकि मुझे तो ऐसा लगता था जैसे राजवीर में बौद्धिक विकास आम लोगों की तुलना में थोड़ा देर से हो रहा था और उन्हें अभी तक यौनिक भावनाओं का अनुभव होना शुरू नहीं हुआ था। मैंने नताशा से कहा, “कितनी विचित्र बात है कि सिर्फ उनके एक अलग तरीके से बात करने को ही सेक्शुअल मान लिया जाता है? भारत में लोग जो विकलांग है उन्हें या तो “सेक्सविहीन” (non-sexual) अथवा ज़रूरत से “ज़्यादा कामुक” (over-sexed) समझा जाता है। मुझे नहीं लगता कि राजवीर के व्यवहार को किसी भी तरह से सेक्शुअल कहा जा सकता है”। मैंने राजवीर की माँ से कहा कि, ‘ऐसा भी संभव है कि शायद उन्हें महिलाएं नापसंद हों या फिर उन्हें सभी जेंडर के लोग ही अच्छे लगते हों’। हमनें देखा था कि वे हर जेंडर के गोरी शक्ल वाले या सुंदर दिखने वाले लोगों को देखकर खुश होते थे। मेरी बात सुनकर नताशा नें मुझसे आग्रह किया कि मैं राजवीर के बात करने के तरीकों, उनकी भाव-भंगिमाओं पर काम कर कुछ सुधार लाने की कोशिश करूँ। राजवीर के यौनिक विकास और रुझानों के बारे में मेरी कही हुई बात को उन्होने अनसुना सा कर दिया। राजवीर के साथ मैंने कुछ सेशन किए जिनके बाद यह सिलसिला खत्म हो गया।     

कुछ पाँच महीनों के बाद एक दिन मुझे नताशा का फोन आया और उन्होंने मुझे राजवीर और उनके एक अध्यापक के बीच की व्हाट्सऐप चैट के बारे में बताया। “राजवीर अपने सर को मिस कर रहा है और रो रहा है। वो बहुत परेशान है। राजवीर नें अपने सर को व्हाट्सऐप पर गुलाब भेजे हैं और लिखा है कि वो हमेशा सर के साथ रहेगा और उन्हें छोड़ कर नहीं जाएगा”। नताशा नें फ़ोन पर कहा कि वे बहुत चिंतित हैं। उनके पति को इस बात की जानकारी नहीं है और वो उन्हें बताना भी नहीं चाहतीं। नताशा नें मुझसे राजवीर की मदद करने को कहा।     

मैं राजवीर से मिली और मैंने उनसे उनके हाल ही की यात्रा और फोन के इस्तेमाल के बारे में जानना चाहा। जब मैंने उनके सर से हुई बातचीत के बारे में पूछा, तो राजवीर फिर से खिसियाने  लगे और शरमा से गए। उन्हें संभलने में दो मिनट लगे और फिर उन्होंने अपने ‘सर’ के बारे में बोलना शुरू किया। “देखो न मेम, सर कितने सुंदर दिखते हैं, नहीं?” अपना मुँह ढककर मुसकुराते हुए राजवीर नें पूछा। 

नताशा, राजवीर अपने सर के प्रति आकर्षण महसूस करने लगे है। इस समय उनके साथ जो कुछ हो रहा है, वो आम बात है। हम शायद ऐसी कुछ व्यवस्था कर सकते हैं जहां राजवीर अपनी उम्र के लोगों के साथ मेलजोल करे न कि अपने सर की उम्र के लोगों के साथ। इसके साथ-साथ हम उन्हे प्रेम और आकर्षण के अलग-अलग स्वरूपों के बारे में बताने की कोशिश भी कर सकते हैं, क्योंकि आकर्षण के हर भाव में प्रेम हो ऐसा ज़रूरी नहीं होता। औटिज़्म के साथ रहने वाले लोगों की तरह ही राजवीर भी कभी-कभी उन्हे पसंद आने वाले व्यक्ति की ओर आसक्त हो जाते है। हमें उन्हे यह सिखाना होगा कि वे किसी के इतने करीब ना जाए कि सामने वाले व्यक्ति को असहज महसूस होने लगे। आकर्षण, प्रेम और सम्बन्धों के अनेक ऐसे पहलू हैं जिनके बारे में राजवीर को जानना होगा और हमें इस काम में भावनात्मक रूप से उनकी मदद करनी होगी”। मैं नताशा को यह सब समझाने की कोशिश कर ही रही थी कि उन्होंने मुझे बीच में ही टोक दिया और कहने लगी, “मैंने उसे खुद अपने से बातें करते हुए भी देखा है जब वो किसी धारावाहिक की नायिका बनकर नायक से बातें करता है, लेकिन मैं इन सब बातों से बहुत ज़्यादा खुश नहीं हूँ। वो चाहे तो किसी लड़की से मेलजोल बढ़ा सकता है और मैं इसकी व्यवस्था भी कर दूँगी, लेकिन आपकी यह रिसर्च कुछ भी कहती हो, मैं नहीं चाहती कि राजवीर इस तरह से बर्ताव करे। प्लीज़ कुछ करो और उसके दिमाग से ये सब बातें निकालने की कोशिश करो”, नताशा ने ज़ोर देते हुए आग्रह किया।  

मैं समझ सकती हूँ कि खास तरह की जरूरतों वाले बच्चों के माता पिता को इस तरह की चिंता सताती है कि कहीं उनका बच्चा दुनिया में शोषणकरियों का शिकार न हो जाये | लेकिन नताशा के मन की यह चिंता उनका डर नहीं था, बल्कि वो इसे लेकर सहज नहीं हो पा रही थी और वे खुद को वास्तविकता से दूर रखे हुए थी और मुझसे ऐसा कुछ करने को कह रही थी जो शायद मेरे लिए कर पाना संभव नहीं था – मैं राजवीर की यौनिक पसंद या रुझानों को बदल नहीं सकती थी, आखिर उनके लिए किसी तरह का फैसला लेने वाली मैं कौन हूँ? या फिर देखा जाए तो इस बारे में उनके अपने माता-पिता भी कुछ नहीं कर सकते थे कि राजवीर किसकी ओर आकर्षित होते है। पहले, मेरा भी यही मानना था कि समलैंगिकता सामाजिक कारकों से प्रभावित होती है क्योंकि मुझे कुछ लोगों नें बताया था कि उन्होने सोशल मीडिया में डाली गयी पोस्ट्स और समूहों में होने वाले विचार-विमर्श से प्रेरित होकर बाइसेक्शुअल बन जाने का “फैसला” किया था। लेकिन राजवीर के मामले में, ऐसा नहीं लग रहा था कि उन पर बाहर से किसी तरह का कोई प्रभाव पड़ा था। यह तो उनके अंदर, उनके व्यक्तित्व का एक पहलू था जो अब उजागर होने या दिखाई देने लग पड़ा था। ऐसा भी हो सकता है कि राजवीर नें अभी अपनी यौनिकता को पहचानना शुरू किया हो और शायद जीवन में पहली बार उन्हे किसी के प्रति आकर्षण या प्रेम का अनुभव हुआ हो। हम इस विषय की बातचीत को पक्षपात से दूर रखेंगे ताकि राजवीर को एक स्वछंद, स्वतंत्र और स्वस्थ यौन जीवन जीने में मदद मिल सके।     

अब क्या मैं सेक्स और यौनिकता के मामलों की विशेषज्ञ हूँ? नहीं, मैं कोई विशेषज्ञ नहीं हूँ, लेकिन आज एक आम व्यक्ति के रूप में और एक व्यावसायिक काउन्सलर के रूप में, मेरे मन में हम सभी के लिए एक सवाल उठ रहा है। एक समय ऐसा था, और मुझे लगता है कि आज भी ऐसा ही होता है कि विकलांगता के साथ रह रहीं महिलाओं का जबरन, उनकी सहमति लिए बिना ही ऑपरेशन करके गर्भाशय निकाल दिया जाता था। कुछ लोगों को उनकी देखभाल में रहने वाली विकलांग महिलाओं और लड़कियों को उनके माहवारी के समय में संभाल पाना कठिन लगता था जबकि दूसरे कुछ लोग गर्भाशय हटा दिये जाने के ऑपरेशन के समर्थन में इसलिए थे कि अनचाहा गर्भ न ठहरे। और यह सब कुछ उन विकलांग महिला से बिना पूछे, उनकी सहमति के बिना ही होता है क्योंकि इसमें सुविधा महिला का ध्यान रखने वाले देखभाल कर्ता की होती है। अब इस संदर्भ में, आम औसत बौद्धिक स्तर के एक नव युवक है, जो संभवत: औटिज़्म के साथ रह रहे है और उनके व्यवहार से साफ दिखाई देता है कि वो पुरुषों के प्रति यौनिक रूप से आकर्षित हो रहे है, लेकिन हम, बिना उनकी इच्छा के, उनसे यह स्वतंत्रता, यह विकल्प छीन रहे हैं। इस समय वो जीवन के एक अंधेरे समय की ओर बढ़ रहे है, जल्दी ही उन्हे भी दिल टूटने, प्रेम किए जाने और स्वीकार किए जाने आदि भावनाओं का एहसास होने लगेगा। ऐसे में अगर किसी को बदलना है, तो वह बदलाव शायद नताशा और उनके पति में लाना होगा। उन्हे राजवीर की इच्छाओं को स्वीकार करते हुए उन्हे अपना समर्थन देना ही होगा। 

मैंने इस बारे में नताशा से बात की और बताया कि कैसे शुरुआत से ही हम औटिज़्म से प्रभावित बच्चों को निजता, स्वतन्त्रता, सुरक्षित और असुरक्षित छुहन और यौनिक विकास के बारे में बताते रहते हैं और आमतौर पर शारीरिक विकास की जानकारी देते हैं। जहां तक भावनात्मक विकास और यौनिक परिपक्वता का सवाल है, बहुत से विशेषज्ञ और अविभावक बच्चों को यह बताने में चूक कर जाते हैं कि अपने मन के भावों को समझ कर उन्हे सही और स्वीकार्य तरीके से व्यक्त किस तरह किया जाना चाहिए।  

टीनएजर्स या नवयुवाओं के लिए इस स्थिति में और बड़ी चुनौती उठ खड़ी होती है क्योंकि इस उम्र में उनके मन में रोमांस, प्रेम और आकर्षण के भाव उत्पन्न हो रहे होते हैं या फिर वे किसी को पसंद करने लगते हैं। प्रेम, आकर्षण या सम्मोहन जैसे भावों को किसी निश्चित परिभाषा के अनुसार बताया नहीं जा सकता। मन के भाव या इनकी गहराई अलग-अलग लोगों में उनकी परिस्थितियों के अनुसार अलग हो सकती है। प्रेम के लिए कोई ‘नियम पुस्तक’ तैयार नहीं हो पाई है और इन भावों को जानने और समझने के लिए बहुत सोच विचार और दिमागी ज़ोर लगाने की ज़रूरत होती है। इससे भी ज़्यादा कठिन होता है अपने प्रेम, पसंद या आकर्षण के प्रदर्शन के बाद सामने वाले व्यक्ति के भावों, उनकी प्रतिक्रियाओं को समझना। अब सामने वाला व्यक्ति मेरे बारे में क्या सोचता है? क्या उनके मन में भी मेरे प्रति वैसे ही भाव हैं जैसे मेरे मन में उनके प्रति हैं? अब इस बात का पता मुझे कैसे हो? 

मैंने नताशा को इसके लिए कुछ तरीके अपनाने के बारे में सुझाव दिये और अब हमनें राजवीर के साथ इन तरीकों से काम करते हुए अपनी कोशिशें शुरू की हैं:

1. औटिज़्म के साथ रह रहे लोगों को – फिर चाहे यह औटिज़्म कम गंभीर हो या हो या ज़्यादा गंभीर हो – अपरिभाषित क्षेत्रों (“grey areas”) के बारे में सोच पाने में कठिनाई होती है। 

औटिज़्म के साथ रह रहे लोग चीज़ो को केवल ‘ब्लैक एंड व्हाइट” या ‘सही अथवा गलत’ के रूप में ही देखते हैं और उन्हें लगता है कि हर काम उनकी उम्मीद के मुताबिक ही होना चाहिए। उन्हें ब्लैक एंड व्हाइट, इन दो सिरों के अलावा बीच का रास्ता चुनने में कठिनाई होती है। उनके लिए “काम चलाऊ”, “शायद हो सकता हो”, “संभव है कि हो पाये”, “हमारे पास जो है, उसी से काम चलाना चाहिए” आदि बातों का कोई मतलब नहीं होता। इस तरह से समझौते न कर पाने के कारण ही उनका सामाजिक जीवन बहुत अधिक प्रभावित होने लगता है, क्योंकि हम सब जानते ही हैं कि सामाजिक जीवन का दूसरा नाम ही समझौते करना है। औटिज़्म के साथ रह रहे बच्चों के माता-पिता उन्हे जीवन की वास्तविकताओं के बीच इस मध्य मार्ग पर चलने और सोचने के बारे में बता सकते हैं। इसके अलावा ऐसे माता-पिता अपने बच्चों को दूसरों के नज़रिये से भी सोचने के बारे में बता और सिखा सकते हैं, जैसे कि, “हो सकता है जो तुम सोच रहे हो वो सामने वाले व्यक्ति को सही न लगे” आदि या फिर जैसे कि, “अगर मैं किसी को पसंद करता या करती हूँ, तो यह ज़रूरी नहीं है कि वो भी मेरे बारे में ऐसे ही विचार रखता या रखती हो”। 

2. हम सामाजिक व्यवहार करने के लिए मान्यताएँ तो अपना सकते हैं, लेकिन इसके लिए निश्चित नियम बनाना संभव नहीं होता, खासकर हम दूसरों के व्यवहार के लिए नियम निर्धारित नहीं कर सकते। जैसे कि, अगर हम पार्क में किसी व्यक्ति का अभिवादन करते हैं, तो उनसे यही अपेक्षा की जाती है कि वो भी हमारे अभिवादन का जवाब मुस्कुरा कर देंगे। लेकिन इसका कोई निश्चित नियम नहीं है। अगर सामने वाले व्यक्ति का ध्यान कहीं और है या फिर उनका मूड ठीक नहीं है, तो संभव है कि वो हमारे अभिवादन का जवाब ही न दे। अब औटिज़्म के साथ रह रहे लोगों को यही सब समझने में दिक्कत आती है, क्योंकि इसके लिए एक निश्चित ब्लैक एंड व्हाइट से हट कर सोचने की ज़रूरत होती है।

3.  इसके साथ-साथ औटिज़्म के साथ रह रहे बच्चों के माता-पिता और अध्यापक अपने बच्चों और छात्रों को जीवन में अनेक परिस्थितियों से निबटने के लिए कुछ ज़रूरी मार्गदर्शन या दिशानिर्देश दे सकते हैं। ये निर्देश इस तरह के हो सकते हैं:   

याद रखो कि किसी को पसंद करना या किसी से प्रेम करना व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करता है। 

ये भी याद रहे कि हो सकता है जिस व्यक्ति को आप पसंद करते हों, वो आपको पसंद न करे। आप ये बिलकुल नहीं सोच सकते कि वो भी आपको सिर्फ इसलिए पसंद करने लगेंगे क्योंकि आप उन्हें पसंद करते हैं।   

अगर सामने वाले व्यक्ति आपकी भावनाओं को नहीं समझते या आपके प्रेम को स्वीकार नहीं करते तो कोई बात नहीं, उन्हें छोड़े और आगे बढे। 

हमेशा दूसरों के साथ विनम्र और आदरपूर्ण व्यवहार बनाए रखे । 

किसी भी दूसरे व्यक्ति को छूने से पहले उनसे पूछ लें |

किसी से पहचान होने पर, शुरुआत में ही उनसे बहुत व्यक्तिगत बातें न करें और न ही पूछें। 

किसी पर ज़ोर मत डालो कि वो भी तुम्हें पसंद करे। 

4. इन सुझावों को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए ज़रूरी होगा कि खुल कर बातचीत और चर्चा होती रहे। बच्चों से बात करना शुरू करने के लिए पहले आप कुछ ऐसा बोल सकते हैं, जैसे, “मैंने देखा है कि आजकल तुम फलां-फलां का फेसबुक प्रोफ़ाइल बहुत देखते हो”। “मुझे लगता है कि फलां तुम्हें बहुत पसंद है”। बच्चों से सीधे-सीधे सवाल पूछने की बजाए उनसे जानकारी पाने की कोशिश की जाए तो बेहतर होगा। आप बातचीत से उन्हें प्रेरित करें कि वो खुद से आपको उन व्यक्ति के बारे में बताएं कि उनमें उन्हें क्या अच्छा लगता है। कभी-कभी उन्हे उनके जवाब के विकल्प सुझा देना भी सहायक होता है। जैसे, ‘अच्छा ये बताओ कि फलां में तुम्हें क्या अच्छा लगता है? उनकी मुस्कान या फिर आँखें’? तुम्हें उनका बात करना पसंद है या फिर वो जिस तरह से तैयार होते है, वो पसंद है’? इस तरह की बातचीत से इन बच्चों को अपने मनोभावों को जानने में मदद मिलेगी और वे अपने सामाजिक जीवन में उपयुक्त व्यवहार कर पाने में सफल रहेंगे। 

औटिज़्म या फिर किसी भी दूसरी विकलांगता के साथ जी रहे लोगों को भी अपने यौन जीवन के विभिन्न पहलुओं के बारे में सोच विचार करने, इसके बारे में सवाल पूछने का अधिकार है। उन्हें ये भी अधिकार है कि वे उन खास व्यक्ति, जिन्हे वे पसंद करते हों, के प्रति अपने प्रेम की अभिव्यक्ति उचित तरीकों से कर पाएँ। अब मैं समझ सकती हूँ कि क्यों लोग हमेशा प्रेम कर पाने की स्वतंत्रता की बात किया करते हैं। 

लेखिका : प्राची श्रीवास्तव 

दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलत राम कॉलेज से मनोविज्ञान (आनर्स) में स्नातक की डिग्री लेने के बाद मैंने जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से क्लिनिकल साईकोलोजी में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की। बच्चों और किशोरों के बीच काम करने में रुचि थी और इसीलिए मैंने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक कोओपरेशन एंड चाइल्ड डेव्लपमेंट (NIPCCD) से चाइल्ड  एंड अड़ोलसेंट गाइडेंस एंड काउंसिलिंग  में स्नातकोत्तर डिप्लोमा भी किया। इसके अतिरिक्त मैंने ग्रीनस्पैन की फ्लोरटाइम अप्रोच का प्रशिक्षण भी लिया है और पुणे की WCCL फ़ाउंडेशन से आर्ट बेस्ड थेरेपीज़ का प्रशिक्षण भी पाया है। मैंने स्टापू (www.stapoo.in) नाम से अपना खुद का एक स्टार्ट-अप शुरू किया है और इसी का संचालन करती हूँ। 

सोमेंद्र कुमार द्वारा अनुवादित।   

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A graduate in Psychology (Hons.) from Delhi University, Daulat Ram College, I pursued my Masters in Clinical Psychology from Jamia Milia Islamia University. A keen interest in working with children and adolescents encouraged me to study the postgraduate diploma in child and adolescent guidance and counseling from National Institute of public cooperation and child development (NIPCCD). I have received training in the Greenspan's Floortime Approach. I am also a trained in Arts-Based Therapies from WCCL Foundation (Pune). I run my small start-up which is in the name of STAPOO (www.stapoo.in)

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