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खुद से तो रोमांस कर लो

पिछले कुछ समय से, मैं स्वयं की देखभाल के बारे में बहुत नियमित और अनुशासित रही हूँ और यह सुनिश्चित कर रही हूँ कि मैं अपनी दिनचर्या में इसके लिए अलग से समय रखूँ। मेरे कैलेंडर पर अलग-अलग तरीकों से खुद का ख्याल रखने का रिमाइंडर मुझे इसकी याद दिलाता रहता है। कभी-कभी, यह मुझे कविता पढ़ने के लिए कहता है। और दिनों में, यह मुझे किसी ऐसे व्यक्ति को पत्र लिखने के लिए कहता है जिनसे मैं प्यार करती हूँ (जिन दिनों में मैं विशेष रूप से सकारात्मक महसूस करती हूँ, तब मैं खुद को पत्र लिखती हूँ)। लेकिन विशेष रूप से एक चीज है जिस पर मैं तब से काम कर रही हूँ, जब मुझे स्वयं की देखभाल, स्वयं से प्रेम और शारीरिक छवि के महत्व की समझ भी नहीं थी और यह चीज है – स्वयं को निखारना।

निजी तौर पर, मैं इसे, बढ़ती कीमतों और सौंदर्य मानकों की उपभोक्तावादी दुनिया में, स्वयं की देखभाल का एक खास तरीका मानती हूँ। एक नए तरीके से बाल कटवाना, नए डिज़ाइन की बालियाँ पहनना, होंठों पर एक चटकीले रंग की लिपस्टिक लगाना, या फिर पैरों के बाल साफ किए बिना स्कर्ट पहनना और सड़क पर आत्मविश्वास से चलना – ये स्वयं की देखभाल और स्वयं से प्रेम के क्राँतिकारी तरीके हैं।

बेशक, हम स्वयं को निखारने के लिए जो तरीके अपनाते हैं उन्हें हमारा वर्ग, जाति, धर्म, यौनिकता और बहुत सारे अन्य कारक आकार देते हैं। एक बार मुझे एक सहपाठी ने बताया था कि उन्हें 15 साल की उम्र में अपनी भौहें बनाने (थ्रेडिंग) के लिए मज़बूर होना पड़ा था। ऐसा इसलिए था क्योंकि “अच्छे आकार वाली भौहें”  बुर्का पहनने के बाद देखी जा सकने वाली एकमात्र चीज़ है। तब मुझे यह समझ में नहीं आया और जब तक कि हाई स्कूल में उन्होंने मुझे यह नहीं बताया कि पार्लर से बाहर निकलने पर वह सुंदर महसूस करती हैं, मैंने यही सोचा कि वह निश्चित रूप सेउत्पीड़न का शिकारहैं। उस वक़्त मैं एक 17 साल की लड़की थी जो अपनी भौहें नहीं बनवाती थी; उनके ऐसा कहने पर उनके उत्पीड़न के लिए मेरी करुणा अचानक उनकी आकार वाली भौहें  के बारे में मेरी ईर्ष्या में बदल गई। मुझे तब समझ आया कि एक ही काम एक व्यक्ति को एक ही समय पर कैसे आज़ाद महसूस कराने के साथसाथ शर्मिंदा महसूस करा सकता है।

मैं शायद कॉलेज में थी, जब मैंने एक परिचित व्यक्ति के साथ बातचीत की थी जो नियमित रूप से पुरुषों के पार्लर में जाते थे। उन्होंने मुझे उत्तरी दिल्ली में एक छोटी सी अच्छी जगह के बारे में बताया जहाँ वे अपनी दाढ़ी और मूंछों की सही लंबाई रखने के लिए, हर दो महीने में कम से कम एक बार चेहरे का चॉकलेट फेशियल कराने, और अपनी भौहें बनवाने के लिए नियमित रूप से जाते थे। उन्होंने मुझसे कहा था, “मुझे गलत मत समझो। मैं समलैंगिक नहीं हूँ। मुझे बस अच्छा दिखना पसंद है। और मैं एक ही समय में दंग भी रह गई और उलझन में भी पड़ गई। अच्छा दिखना किसी की यौनिकता से कबसे जुड़ गया? ज़ाहिर है, लाखों और चीजों के साथ, स्वयं को निखारने की ना केवल जेंडर पहचान बल्कि यौनिक पहचान भी थी। उस समय, मैंने मेट्रोसेक्शुअलशब्द सुनना शुरू किया था, जो मुझे साफ़ तौर पर, समलैंगिकता के डर (होमोफोबिया) को किसी भी तरह से छिपाने की एक कोशिश की तरह लगता था।

एक आदमी की बनने-संवरने की ज़रूरतें उतनी ही असमान्य हैं जितनी कि एक औरत के न बनने-संवरने की ज़रूरतें। हर बार जब मैं पार्लर गई (अनियमित रूप से ही सही), तो मुझे अपनी बगल के बालों के “असामान्य” रूप से बढ़े होने या मेरे चेहरे पर सफेद धब्बों / मुहाँसों / झाइयों, पर भाषण दिया गया है, जो मुझे “बदसूरत” बना देते हैं। वो मुझे बताते हैं कि मेरे “साँवलेपन को हटाया जाना चाहिए” और मुझे “कम साँवला दिखने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी”। जैसे कि यह किसी तरह की छूत की बीमारी है जिससे निज़ाद पाना ज़रूरी है, कहीं, ऐसा न हो कि यह हर जगह फैल जाए।

मैंने समझ लिया है कि ब्यूटी पार्लर ऐसे स्थान हैं जहाँ उपभोक्तावाद, पूंजीवाद और पितृसत्ता सबसे क्रूरतापूर्ण तरीके से घुलमिल जाते हैं। एक बुराई न निकालने वाले, खुशनुमा और सकारात्मक जगह की तलाश में मैं एक पार्लर से दूसरे में जाती रही। एक जगह जो मुझे कम बदसूरत दिखने के लिए ज़्यादा पैसे खर्च करने की सलाह न दे। निस्संदेह, मुझे अपने पैसे खर्च करने या न खर्च करने का निर्णय लेने का उतना विशेषाधिकार तो प्राप्त है। लेकिन मुझे एहसास हुआ है कि ब्यूटी पार्लर एक ऐसी जगह है जो आपको आपके शरीर के लिए सबसे ज़्यादा शर्मिंदा करती है। यह अजीब बात है क्योंकि आप वहाँ अपने बारे में बेहतर महसूस करने के लिए जाते हैं, उम्मीद करते हैं कि आप अलग दिखते हुए, बेहतर महसूस करते हुए और आत्मविश्वास के भरे हुए बाहर निकलेंगे।

कुछ साल पहले (जब मैं एकल थी), बनारास में एक दोस्त की शादी से पहले, मैं साड़ी-पहनने और मेक-अप में मदद के लिए एक स्थानीय पार्लर गई। जब पार्लर की महिला मेरी मदद कर रही थीं, वह मेरे पेट पर बाल देखकर धक से रह गईं। उन्होंने मुझसे पूछा कि मैंने बाल साफ क्यों नहीं करवाए। एक सीधी बात “क्योंकि मैं नहीं चाहती थी” से उन्हें संतोष नहीं हुआ। उन्होंने और खोद कर पूछा।

मैंने उन्हें बताया,  मुझे वहाँ पर बाल पसंद हैं। जब मैं इन्हें देखती हूँ तो इससे मुझे खुशी होती है

वह उस जवाब से बहुत बेचैन और असहज लग रही थीं।

उन्होंने पूछा,और आपके बॉय फ्रेंड को इससे कोई परेशानी नहीं है?” । (ये तो निश्चित ही है कि एक महिला होने के नाते, मुझे विषमलैंगिक होना ही चाहिए और एक बॉय फ्रेंड, संभवतः एक पति की ज़रूरत होनी चाहिए।)

अम्म्म। मेरा कोई नहीं है।”

उन्होंने कहा, और अब आपको पता हैं क्यों” जैसे यही हकीकत है।

मैं वो वाकया कभी नहीं भूली। लेकिन मैंने सीखा कि मुझे छोड़कर कोई और नहीं है जो मुझे अपने बारे में अच्छा महसूस करा सकता है। वो लोग भी नहीं जिन्हें मैं अलग (यदि बेहतर नहीं तो) दिखने / महसूस करने के लिए पैसे देती हूँ। उसके बाद खुद को प्यार करना सीखना बहुत आसान हो गया। क्योंकि मुझे समझ आया कि अगर मैं खुद अपने शरीर के साथ – चाहे वह बिना बाल वाला है, साँवला है, बालों वाला, पतला, आकर्षक है, या झाइयों वाला है – सहज नहीं हूँ तो कोई और भी नहीं होगा। और मैं ऐसा नहीं होने दूंगी।

*यर्सा डेली-वार्ड ने कहा

कवर छवि मॉर्गन अमेलिया के सौजन्य से

सुनीता भदौरिया द्वारा अनुवादित

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Article written by:

Deepa Ranganathan is a brown, feminist storyteller and mother to a feline and a human. She is based out of Bangalore and is passionate about reading, writing, and telling untold stories of young feminist activists from around the world. She has recently discovered the magical world of children's literature, and has been spending most of her time immersed in it.

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