पिछले दिनों की बात है, मेरे बड़े भाई की ससुराल में उनके सबसे छोटे साले की शादी हो रही थी। बारात गई, स्वागत हुआ। पर गारी नहीं गाई गई। उसकी जगह पूरे समय डीजे बजता रहा। बारात के साथ गई एक औरत बोली, “जो कैसो स्वागत है, कोई गारी नहीं गा रओ है।” गारी बारातियों को ही सुनाई जाती है, इसलिए कमी सबसे पहले उन्हीं को खली।
मैं देर तक सोचता रहा कि जो अनिवार्य था, वह कब छूट गया। हमारे यहाँ गारी के बिना ब्याह पूरा नहीं माना जाता। पर मेरे लिए गारी सिर्फ़ रस्म कभी नहीं रही। वह पहली जगह थी जहाँ मैंने औरतों को अपनी बात कहते सुना। इसलिए बात रस्म के छूटने की नहीं, उस आवाज़ की है जो उसके साथ छूट रही है। उसे समझने के लिए मुझे बचपन में लौटना पड़ता है, सिंदूरी के किनारे।
गारी वह गीत है जो ब्याह में औरतें गाती हैं। बारातियों, समधियों और दूल्हे के रिश्तेदारों के नाम लेकर उसमें ऐसी ठिठोली होती है, जो सीधे कही जाए तो गाली कहलाए। महाकौशल और बुंदेलखंड के इस अंचल में उसका कोई बुरा नहीं मानता, क्योंकि वह रस्म का हिस्सा है। मज़े की बात यह कि जिस बात को बाक़ी समय कहने की इजाज़त नहीं थी, ब्याह के दिनों में वही पूरे गाँव के सामने, बाक़ायदा, गाई जाती थी।
मैंने पहली बार सिंदूरी के किनारे किसी औरत को ऐसी बात ज़ोर से कहते सुना, जो उसके घर की चौखट के भीतर कभी नहीं कही जा सकती थी। तब ब्याह नहीं था। शायद किसी आने वाले ब्याह का अभ्यास चल रहा था, या औरतें यूँ ही मज़े ले रही थीं। पूरा मौक़ा अब याद नहीं, पर नदी का किनारा, औरतों की मिली-जुली आवाज़ें और उनके बीच उठती हँसी याद हैं।
मदनपुर के पास बहने वाली सिंदूरी नर्मदा की सहायक नदी है। औरतें वहाँ पानी भरने, नहाने और कपड़े धोने आती थीं। हम बच्चे आसपास खेलते रहते और उन्हें हमारी ज़्यादा परवाह नहीं होती थी। हमें छोटा समझकर वे बेफ़िक्र थीं। बच्चों की आँखों में वे उस दिन घर की मर्यादा वाली औरतें नहीं थीं। इसी बेफ़िक्री में मैंने वह सुन लिया, जो बड़ा होकर शायद नहीं सुन पाता।
कोई पंक्ति आज पूरी याद नहीं है, लेकिन उसका ढंग अब भी स्मृति में है। बात अक्सर किसी रिश्ते या देह से शुरू होती, किसी पुरुष पर तंज़ तक जाती और फिर सबकी हँसी में घुल जाती। बचपन में वह मेरे लिए बस हँसी थी। बाद में समझ आया कि वह गाँव की उन गिनी-चुनी जगहों में से थी, जहाँ औरतें अपने विवाह, अपने पतियों और अपनी देह के बारे में सबके सामने बोल सकती थीं। वे बातें किसी और संदर्भ में अश्लील या अनुचित मानी जातीं, पर गारी के भीतर आते ही उनका अर्थ बदल जाता था। गीत उन्हें ऐसी जगह दे देता था, जहाँ सुनने वाले भी जानते थे कि यह बोलने का समय है।
ब्याह की गारी की अगुआ एक नहीं, कई हुआ करती थीं। बरेठन बऊ हो या पुजारन काकी, सब एक साथ बैठतीं और पंक्तियाँ जोड़ती जातीं। कोई एक पंक्ति उठाती, दूसरी उसमें कुछ जोड़ देती, तीसरी उसे आगे ले जाती। गीत पहले से लिखा हुआ नहीं होता था। वह उसी समय बनता और उसी समय सबका हो जाता था। उस घड़ी ऊँच-नीच पीछे रह जाती थी। पर सिंदूरी के घाट पर सबसे ऊँची आवाज़ नई-नवेली बहुओं की होती थी। घर में उन्हें बोलते मैंने कम सुना था। बचपन में यह फ़र्क़ मुझे अजीब नहीं लगता था। मैं समझ ही नहीं सकता था कि एक ही औरत अलग-अलग जगहों पर इतनी अलग क्यों हो जाती है।
यह छूट क्यों थी? एक कारण हँसी थी। जो बात सीधे कहने पर झगड़ा बन जाती, वह गीत में मज़ाक़ बनकर निकल जाती। दूसरा कारण यह कि गारी किसी अकेली की नहीं होती थी। सब गाती थीं, इसलिए ज़िम्मेदारी किसी एक पर नहीं आती थी। पर इसे पूरी आज़ादी कहना ग़लत होगा। वही औरतें जो घाट पर बेधड़क गाती थीं, घर लौटकर अपनी रोज़मर्रा की चुप्पियों में लौट जाती थीं। किसके सामने कितना बोलना है, किस बात पर हँसना है और किसे भीतर रखना है, इसकी अपनी मर्यादाएँ थीं। समाज ने बोलने की एक तंग खिड़की खोल रखी थी, ताकि दरवाज़ा बंद रह सके।
इसी गाँव में औरतों को उनके नाम से कम, मायके के गाँव से ज़्यादा पुकारा जाता था। “पीपरपानी वाली।” किसी को उसके पति या घर से जोड़कर बुलाना भी आम था, जैसे “खूंटा की लुगाई”। शादी के बाद घर बदलता था, पर पहचान उस जगह या उस रिश्ते से बँधी रहती थी। घर में वह किसी की बहू थी, गाँव में किसी जगह की। नाम धीरे-धीरे उसका नहीं, उसके रिश्ते का हो जाता था। वह कौन है, यह पूछने से पहले तय हो जाता था कि वह किसकी है। शायद घाट पर, गारी में, वह पहली बार बस एक औरत थी, जिसकी अपनी आवाज़ थी।
इन्हीं आवाज़ों और नामों को मैंने बाद में अपनी किताब नदी सिंदूरी में रखने की कोशिश की। कुछ नाम बचपन की स्मृति में इतने गहरे बसे थे कि उन्हें लिखते समय लगा, मैं किसी पात्र का नाम नहीं चुन रहा, बल्कि गाँव की वह पुकार वापस लिख रहा हूँ जो कभी सामान्य लगती थी। किताब छपने के बाद भी सवाल साथ चलता रहा – जिसका नाम गाँव ने रख लिया, उसकी अपनी बात कहाँ गई?
लड़कियों के साथ यह और चुपचाप हुआ। बचपन में मोड़ियाँ रास्तों पर खुली दिखती थीं, स्कूल जाते हुए, सहेलियों के साथ, नदी की तरफ़। वे लड़कों की तरह ही रास्तों को जानती थीं। फिर वे बड़ी होने लगीं। गाँव वही रहा, पर उनके रास्ते बदल गए। “कहाँ जा रही हो”, “किसके साथ”, “कितनी देर में लौटोगी?” किसी दिन गाँव ने ऐलान नहीं किया कि लड़की का रास्ता अब छोटा है। यह वैसे ही हुआ जैसे गर्मियों में सिंदूरी का पानी पीछे हटता था। पहले कुछ पता नहीं चलता, फिर एक दिन जहाँ पानी था, वहाँ रेत मिलती है। कहाँ जाना है, किससे मिलना है, किससे ब्याह होगा, ये सवाल एक-एक करके उनके हाथ से जाते रहे।
फिर समय बदला। मशीनें आईं, सामूहिक काम घटे, लोग बाहर गए, मोबाइल और डीजे आए, और नदी पर जुटने की वजहें कम होती गईं। गारी की जगह भी सिकुड़ी। उसी बदलाव का एक रूप मैंने उस ब्याह में देखा। बारात गई, स्वागत हुआ, खाना-पीना हुआ, लेकिन औरतों की सामूहिक आवाज़ नहीं थी। उसकी जगह तेज़ डीजे था।
मैं नहीं कह सकता कि यह अच्छा हुआ या बुरा। समय बदलता है और उसके साथ रस्में भी बदलती हैं। नई पीढ़ी की अपनी पसंद है, मनोरंजन के अपने साधन हैं। गारी में शामिल बहुत-सी बातें आज शायद असहज भी लगें। लेकिन जब यह तंग खिड़की भी बंद होने लगी, तो औरतों के पास अपनी बात कहने की जगह कहाँ बची? इसका आसान जवाब मेरे पास नहीं है।
किसी समाज में औरतों को अपनी देह, इच्छा और रिश्तों के बारे में कितना बोलने दिया जाता है, इसका एक संकेत उसके गीतों में भी मिलता है। सिंदूरी के किनारे की गारी में मैंने पहली बार सुना कि एक समाज कितना सुनने को तैयार है, और कितना नहीं।
मैंने इन औरतों को बचाने के लिए अपनी किताब नहीं लिखी। बस देर से समझा कि उनकी आवाज़ें मेरी स्मृति में पहले से लिखी हुई थीं। उस दिन शादी में डीजे बज रहा था और एक औरत कह रही थी, “कोई गारी नहीं गा रओ है।” मुझे लगा, वह सिर्फ़ एक रस्म के छूट जाने की शिकायत नहीं कर रही थी। शायद वह उस छोटी-सी जगह को याद कर रही थी जहाँ औरतें कुछ देर के लिए घर से बाहर होकर अपने ढंग से बोल सकती थीं।
और मुझे फिर सिंदूरी याद आई। उसका पानी, घाट पर बैठी औरतें और वह हँसी, जिसे घर की चौखट के भीतर जगह नहीं मिली थी।
To read this article in English, please click here.
Cover image: The Practice Grounds for ‘Gaari’ by Shirish Khare.