Skip to main content Scroll Top

प्रतिबद्धता का बदलता स्वरूप

grafitti on a wall dripping colours with "TOGETHER" written in bold

हमारी ज़िंदगी में प्रतिबद्धता एक ऐसा मूल्य है जो लगातार बदलता और विकसित होता रहता है। सच्चाई, वफ़ादारी और समानुभूति की तरह ही, प्रतिबद्धता के साथ भी ‘ज़िम्मेदारी’ जुड़ी होती है। प्रतिबद्धता एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। समाजशास्त्र में मैंने सीखा है कि जाति और वर्ग अलग-अलग या एक-दूसरे से पूरी तरह कटे हुए अमूर्त विचार नहीं हैं। यह ठीक वैसे ही है जैसे ग्रामीण-शहरी विभाजन में होता है; यहाँ भी सब कुछ एक निरंतरता (कन्टिन्यूम) में रहता है। रिश्ते में प्रतिबद्धता की शुरुआत किसी पुराने रिश्ते के ख़त्म  होने के साथ हो सकती है, और रिश्ता ख़त्म  होने के बाद भी यह कायम रह सकता है। क्योंकि हमारे अंदर कहीं न कहीं ‘ज़िम्मेदारी’ या ‘फ़र्ज़’ की भावना होती है। जब हम किसी चीज़ या किन्हीं लोगों के प्रति समर्पित होते हैं, तो हमें मकसद, अर्थ और महत्व मिलता है। यहाँ तक कि हमारे छोटे-छोटे काम भी, जब उन्हें ध्यान और प्यार से किया जाता है, तो वे अर्थपूर्ण और प्यार भरे बन जाते हैं।

किन्हीं लोगों या किसी काम के प्रति प्रतिबद्धता हो सकती है। हम उससे किसी ख़ास उम्मीद करते हैं। यह ज़रूरी नहीं है कि यह उम्मीद उद्देश्यपूर्ण या भौतिक हो, लेकिन यह वाजिब होना चाहिए। कोई प्यार, त्याग, अपनापन और परवाह  जैसी अमूर्त मूल्यों को भी एक ऐसे आपसी प्रतिफल के रूप में देख सकते हैं, जिसे वह किसी के साथ प्रतिबद्ध रिश्ते में रहते हुए पाना चाहते हैं। वहीं, किसी ऐसे काम को पूरा करने के बाद, जिसके प्रति उन्होंने प्रतिबद्धता दिखाई हो, उन्हें लग सकता है कि वह नकद धन, ट्रॉफी या किसी कीमती वस्तु जैसे पुरस्कार के हक़दार हैं।

किसी भी रिश्ते में, हम चाहते हैं कि हमें मान्यता मिले। हम स्वीकृति, प्यार, प्रतिफल, खुशी और जश्न की चाह रखते हैं। यहाँ तक कि अगर कोई मतभेद हो भी जाए, तो हम उम्मीद करते हैं कि बचपन की दोस्ती की तरह, सब कुछ एक ‘पिंकी प्रॉमिस’ के साथ ठीक हो जाएगा। यहाँ पर फिर प्रतिबद्धता आ जाती है, जहाँ हम एक-दूसरे से वादा करते हैं कि हम दोस्त, साथी, जीवनसाथी, या जो भी और हमें उस रिश्ते को नाम देना हो, हम वह रहेंगे। हम दूसरे को यक़ीन दिलाते हैं कि हमारे कामों में अर्थ, ईमानदारी और पारदर्शिता होगी। हम जो कुछ भी अनुभव करेंगे, उसे साझा किया जाएगा और उस पर चर्चा की जाएगी। फिर हम एक-दूसरे पर निर्भर होने लगते हैं। ऐसा इसलिए नहीं होता कि हम स्वभाव से ही ‘निर्भर’ होते हैं, बल्कि इसलिए कि प्रतिबद्धता हमें एक-दूसरे के साथ चीज़ें साझा करना, साथ रहना और परस्पर रूप से एक-दूसरे पर निर्भर होना सिखाती है। प्रतिबद्धता हमारे अंदर एक नया व्यक्तित्व उभारती है।

बचपन में, मेरे कुछ ‘ख़ास’ दोस्त थे, जिनके प्रति मुझे बहुत प्रतिबद्धता महसूस होती थी और मेरे लिए यह दोस्त बहुत विशेष थे। मुझे एक ख़ास समूह चाहिए था इसलिए हम कह सकते हैं कि प्रतिबद्धता भी ‘अनन्य’ है, और यह हमें वाक़ई में ख़ास महसूस कराती है। यह हमें याद दिलाती है बीते हुए कल की, उस मूल की, कि उस दिन, उस पल, उन लोगों के साथ मुझे एक गहरा रिश्ता बनाना था और इसलिए मैं आज भी प्रतिबद्ध हूँ। जब कोई किसी रिश्ते या दोस्ती में प्रतिबद्ध होते हैं, वे सिर्फ़ एक अतीत ही नहीं बल्कि भविष्य के लिए एक साझा दृष्टिकोण भी रखते हैं। उनकी यादें भी उनकी पहचान का हिस्सा बन जाती हैं, जिससे उन्हें न सिर्फ़ अपने मौजूदा रिश्ते को याद रखने में मदद मिलती है, बल्कि यह भी पता चलता है कि उस रिश्ते की वजह से वे अब कैसे हैं। प्रतिबद्धता एक अदृश्य गोंद की तरह होती है जो बुरे समय में भी रिश्ते को जोड़े रखती है। अगर दोस्तों के किसी समूह में रिश्ता टूटने का ख़तरा हो, तो ‘प्रतिबद्धता’ का यह मूल्य हमें याद दिलाता है कि हम साथ हैं, और इसलिए हमें दो बार सोचना चाहिए कि हम क्या कर रहे हैं या क्या करने वाले हैं। रिश्तों में भी ऐसा ही होता है। मेरे भी एक ऐसे ही रिश्ते में, हर दिन, हर पल, ख़ास तौर पर मतभेद के समय, ‘प्रतिबद्धता’ ही थी जिसने मुझे उस अतीत, मूल और उस दिन के बारे में याद दिलाया जब वह रिश्ता शुरू हुआ था। इसने मुझे सोच-समझकर और भावनाओं के आधार पर फ़ैसला लेने में मदद की, और साथ ही मुझे चीज़ों को थोड़ा और समय तक थामे रखने में भी मदद की। इससे मुझे आने वाले कल की कल्पना करने में मदद मिली कि अच्छी संभावनाएँ हो सकती हैं, इसलिए मुझे इस मुद्दे पर सोच-विचार करना चाहिए, न कि परेशानी या चिंता में आकर कोई प्रतिक्रिया देनी चाहिए।

लेकिन यह याद रखना आसान नहीं है। कभी-कभी हम थक जाते हैं। एक नॉन-बाइनरी व्यक्ति के तौर पर, मुझे याद है कि आठवीं कक्षा में मुझे अपनी कक्षा के एक लड़के के लिए भावनाएँ महसूस हुईं और मुझे वह पसंद आने लगा। वह पसंद समय के साथ ‘प्यार’ में बदल गई और यह 10 साल तक यह सिलसिला जारी रहा। उस लड़के को बस इतना पता था कि मुझे दोस्ती चाहिए थी और उसे यह नहीं पता था कि मेरा दिल तो उससे कहीं ज़्यादा चाहता था। उसके मुक़ाबले मुझे उसके प्रति ज़्यादा प्रतिबद्धता थी। प्यार में प्रतिबद्धता दोस्ती की तुलना में ज़्यादा गहरा होती है। आप दूसरों के लिए इतना करने लगते हो कि अपने-आपके लिए कहीं-न-कहीं बहुत काम बच जाता है। बाद में, उसने मुझसे दोस्ती ख़त्म कर ली और मैंने भी उसे थोड़ा वक़्त देने का फ़ैसला किया। मैंने उसे कभी नहीं बताया कि मुझे उससे दोस्ती के दायरे से भी आगे बढ़कर प्यार था। उसके प्रति मेरी प्रतिबद्धता ने मुझे उसकी परवाह करने और हर पल उसके बारे में चिंता करने के लिए प्रेरित किया, और मेरे अंदर एक ऐसी ज़बरदस्त ज़ोर पैदा किया कि मैं हर समय उसके साथ रह सकूँ। मेरे साथियों ने इसे मेरा मूल्य का फायदा उठाया जाना कहा, लेकिन मेरी प्रतिबद्धता की भावना सच्ची थी और यह ख़ुद को पहचानने का एक ज़रिया थी।

धीरे-धीरे, मेरी ज़िंदगी में हुई कई अनचाही घटनाओं के कारण मेरा प्यार और ध्यान कम होता गया। एक ऐसे स्कूल से निकलने से, जहाँ का माहौल अजीब और नकारात्मक था, अपनी पहचान को समझने, किताबें पढ़ने, सार्थक फिल्में देखने, समुदाय के लोगों से जुड़ने और नए लोगों से मिलने तक – जैसे सभी अनुभवों के साथ मैंने नए मूल्य और अनुभव अर्जित किए, जिन्होंने आख़िरकार मेरे उस लड़के के प्रति भावनाएं बदल दिए| पता है, प्यार में हम अपने साथी पर सवाल नहीं उठाते, इसलिए हमें उनमें कम ही कमियां दिखती हैं। उसके बर्ताव में भी बदलाव आया, लेकिन मुझे उसे दोष नहीं देना चाहिए, क्योंकि उसके प्रति मेरा लगाव स्वाभाविक था। जैसा कि मैगी स्मिथ (आंट वायलेट) ने ‘डाउनटन ऐबी’ सीरीज़ में सही कहा है, “जब कोई त्रासदी होती है, तो किसी न किसी को तो दोषी ठहराना ही पड़ता है।” इसलिए, मैंने तय किया कि मुझे उसके लिए इस जुनूनीयत को और आगे नहीं बढ़ाना चाहिए। कहीं न कहीं मुझे रुकना ही था, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उसके प्रति मेरी प्रतिबद्धता ख़त्म हो गई है। 

मुझे याद है कि उसके बाद, मैंने अपनी ज़िंदगी में किसी और मर्द से प्यार करने का फ़ैसला किया। इस बार बात अलग थी क्योंकि यह शुरू से ही एक रोमांटिक रिश्ता था। वे ऐसा व्यक्ति है जो बहुत वफ़ादार और प्रतिबद्ध है, और रिश्ते को बनाने और उसे बनाए रखने में पूरी तरह से समर्पित है। इस दौरान, देवी नाम के एक के साथ भी मेरी ग़हरी दोस्ती हो गई थी। हम दोनों की जेंडर पहचान एक ही थी और अलग-अलग तरह की हिंसा के अनुभवों के कारण, हम दोस्त से भी बढ़कर हो गए। हम ‘बहनें’, रिश्तेदार, एक परिवार बन गए। पहले, मुझे यह लगता था कि प्रतिबद्धता भी एक ऐसे क्रम में बंटी होती है जिसमें कुछ रिश्तों को दूसरों से ऊपर रखा जाता है, यानी यह भी किसी अन्य सामाजिक संरचना से अलग नहीं है, जिसके तहत प्यार या रोमांटिक रिश्ते में प्रतिबद्धता को और भी गहरा और तीव्र माना जाता है। लेकिन अब मेरा मानना है कि ‘प्रतिबद्धता का मूल्य’ लोगों के अपने अनुभव और नज़रिए पर निर्भर करता है। यह पैसे की तरह निश्चित, मात्रात्मक या मापा हुआ नहीं है। यह अर्थ पर आधारित है और भावनाओं, मूल्यों, साझा अनुभवों और मानसिक तालमेल पर टिका है। साझा अतीत जितना लंबा होता है और अनुभवों और सफर का साझा इतिहास जितना बढ़ता है, प्रतिबद्धता भी उतनी ही ग़हरी होती जाती है। 

अब आखिर में, मुझे एक सवाल का जवाब देने की चाह है – क्या वादे समय के साथ बदलते हैं? और क्या वे सच्चे बने रहते हैं? मेरा निजी तौर पर पक्का मानना ​​है कि ऐसा होता है।

सच्चे बने रहना दूसरों पर निर्भर नहीं करता। यह अनुभवों से स्वाभाविक रूप से आता है। दूसरे लड़के से ब्रेकअप के बाद भी, मैंने उसके साथ दूरस्थ दोस्ती जारी रखी। हमारे बातचीत करने का तरीका बदल गया, हमारी भविष्य की आकांक्षाएं बदल गईं। लेकिन उसके प्रति मेरी प्रतिबद्धता कम नहीं हुई। हम (यानी मै) अभी भी उससे पूछते हैं कि उसका दिन कैसा रहा, क्या वह परेशान है, या वह अपनी ज़िंदगी में क्या नया कर रहा है। मेरी कोशिश रहती है कि मैं उसे अपनी ज़िंदगी, अपने वाकयों और अपनी ज़िन्दगी के सफर में शामिल करूँ, ठीक वैसे ही जैसे मैं अपनी बहन देवी को करूँ’। अपने पहले प्यार के प्रति मेरी प्रतिबद्धताएँ भी बनी हुई हैं। समय के साथ प्रतिबद्धता कमज़ोर पड़ जाती है या ख़त्म हो जाती है। उलफन कम होने के कारण यह सारी प्रतिबद्धता घट तो जाती हैं, लेकिन वे हमेशा एक सुप्त ज्वालामुखी की तरह वहीं बनी रहती हैं। वे हमारे अवचेतन में बहुत गहराई में सोए रहती हैं। मुझे याद है कि तीन साल तक लंबी बातचीत न होने के बावजूद, मैंने अपने पहले प्यार के जन्मदिन में शामिल होने का फ़ैसला किया। मैंने उसे शुभकामनाएँ और अच्छे स्वास्थ्य की बधाई दी और उसे एक अच्छी टी-शर्ट तोहफ़े में दी। हम (यानी मैं) किसी और के साथ रिश्ते में थे, फिर भी अपने बॉयफ्रेंड को बताकर हम (मैं) वहां गए। क्योंकि असल में, मेरा असली रूप मेरी प्रतिबद्धता की सच्चाई से जुड़ा हुआ है। 

अंत में मेरे पास आउटलैंडर सीरीज़ का एक उद्धरण है, जिसमें क्लेयर एक सीज़न में दर्शकों के साथ अपनी बात साझा करती है – “अगर समय ईश्वर है, तो स्मृति शैतान है। जो हम जानते हैं, उसे कोई और नहीं जानता होगा, और वह हमेशा के लिए बना रहेगा।” इसी तरह, हमें यह नहीं मानना ​​चाहिए कि प्रतिबद्धता हमेशा दोनों तरफ़ से या आपसी ही होने चाहिए। हमें हमारी अंतरात्मा को ही तय करने देना चाहिए कि हम दूसरों को कैसे और क्या समझते हैं। हमें लोगों के साथ अपने अनुभवों को इतना गहरा बनाना चाहिए कि भले ही समय के साथ हमारी प्रतिबद्धता का स्वरूप बदल जाए, फिर भी वे हमारी अपनी पहचान की तरह ही सच्ची और असली बनी रहे। आख़िरकार, ‘समय’ और ‘यादें’ ही यह तय करेंगी कि हम अपनी ‘प्रतिबद्धताओं’ को कैसे आकार देंगे।

To read this article in English, please click here.

Cover image by Nicole Baster on Unsplash