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क्या विवाह ही प्रतिबद्धता का एकमात्र प्रमाण है?

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प्रेम, साझेदारी और सामाजिक मान्यताओं के बीच प्रतिबद्धता की नई परिभाषाएँ

भारतीय समाज में विवाह को केवल दो लोगों के साथ रहने का फैसला नहीं माना जाता, बल्कि इसे परिवार, परंपरा, संस्कृति और सामाजिक जीवन की एक महत्वपूर्ण संस्था के रूप में देखा जाता है। बचपन से ही हम कहानियों, फिल्मों और परिवार की बातों के ज़रिए यह सुनते और सीखते हैं कि प्रेम का सबसे “सही” और “पूर्ण” रूप विवाह है। अक्सर यह मान लिया जाता है कि अगर दो लोग सचमुच एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, तो उनका रिश्ता अंततः विवाह तक पहुँचना ही चाहिए, और अगर ऐसा न हो, तो उस रिश्ते को अधूरा या कम गंभीर समझ लिया जाता है।

हमारे समाज में किसी रिश्ते की गंभीरता का आकलन अक्सर इस बात से किया जाता है कि वह विवाह में बदलता है या नहीं। लेकिन क्या किसी रिश्ते की गहराई केवल एक कानूनी या सामाजिक बंधन से तय की जा सकती है? क्या दो लोग बिना विवाह किए भी जीवनभर एक-दूसरे के प्रति ईमानदार और ज़िम्मेदार नहीं हो सकते? और क्या केवल विवाह कर लेने से यह तय हो जाता है कि उस रिश्ते में हमेशा प्रेम, सम्मान, बराबरी और भरोसा बना रहेगा?

आज समाज तेज़ी से बदल रहा है। कुछ लोग विवाह को अपने रिश्ते का स्वाभाविक विस्तार मानते हैं, जबकि कुछ विवाह किए बिना भी लंबे समय तक साथ रहने का निर्णय लेते हैं। क्वीयर समुदाय, लिव-इन संबंध, चुने हुए परिवार (Chosen Families) और स्वतंत्र जीवन जीने वाले लोगों के अनुभव बताते हैं कि प्रतिबद्धता के कई रूप हो सकते हैं। ऐसे में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या विवाह ही प्रतिबद्धता का एकमात्र प्रमाण है, या इसका अर्थ इस से कहीं अधिक व्यापक और गहरा है?

प्रतिबद्धता क्या है?

प्रतिबद्धता (Commitment) केवल किसी रिश्ते में बने रहने का वादा नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति ज़िम्मेदारी, विश्वास और सम्मान निभाने का निरंतर प्रयास है। मनोवैज्ञानिक रॉबर्ट जे. स्टर्नबर्ग ने अपनी Triangular Theory of Love (1986) में बताया कि प्रेम तीन तत्वों अंतरंगता (Intimacy), जुनून (Passion) और प्रतिबद्धता (Commitment) से मिलकर बनता है। उनके अनुसार, प्रतिबद्धता वह सचेत निर्णय है जिसमें लोग हर परिस्थिति में रिश्ते को ईमानदारी और ज़िम्मेदारी के साथ निभाने का प्रयास करते है।

वहीं, मनोवैज्ञानिक जॉन गॉटमैन के दशकों लंबे शोध बताते हैं कि सफ़ल रिश्ते केवल प्रेम से नहीं, बल्कि विश्वास, संवाद, सम्मान और भावनात्मक सहयोग से टिकते हैं। इसलिए प्रतिबद्धता का अर्थ केवल विवाह करना नहीं है यह रोज़मर्रा के व्यवहार, एक-दूसरे की भावनाओं को समझने और कठिन समय में साथ खड़े रहने की एक सतत प्रक्रिया है, जो विवाह के भीतर भी हो सकती है और उसके बाहर भी।

विवाह – एक सामाजिक संस्था

विवाह समाज की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक संस्थाओं में से एक है। यह केवल दो लोगों का निजी संबंध नहीं, बल्कि परिवार, उत्तराधिकार, सामाजिक व्यवस्था और बच्चों के पालन-पोषण को संगठित करने का माध्यम भी है। पहले विवाह मुख्यतः सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक आवश्यकताओं पर आधारित था, जबकि आज अधिक लोग प्रेम, समानता, भावनात्मक अंतरंगता और व्यक्तिगत संतुष्टि को इसका आधार मानते हैं।

भारत में विवाह का सामाजिक और कानूनी महत्व आज भी अत्यधिक है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019–21) के अनुसार अधिकांश भारतीय वयस्क विवाह संस्था के भीतर ही पारिवारिक जीवन शुरू करते हैं, और इसके ज़रिए दंपति को सामाजिक स्वीकृति, कानूनी सुरक्षा, उत्तराधिकार के अधिकार तथा बच्चों की वैधानिक मान्यता प्राप्त होती है। यही कारण है कि भारतीय समाज में विवाह को अक्सर प्रतिबद्धता का सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है। हालांकि समकालीन समाजशास्त्रीय शोध यह भी स्पष्ट करते हैं कि सामाजिक मान्यता और भावनात्मक प्रतिबद्धता हमेशा एक-दूसरे के समान नहीं होतीं। एक वैवाहिक संबंध कानूनी रूप से मान्य हो सकता है, लेकिन उसमें विश्वास, सम्मान और भावनात्मक सहयोग का अभाव भी हो सकता है।

क्या हर विवाह प्रतिबद्ध होता है?

अक्सर यह माना जाता है कि विवाह हो गया, तो रिश्ता अपने-आप मज़बूत और प्रतिबद्ध हो गया। लेकिन वास्तविकता हमेशा ऐसी नहीं होती – विवाह एक कानूनी और सामाजिक संस्था है, जबकि प्रतिबद्धता एक भावनात्मक और नैतिक ज़िम्मेदारी है। दोनों जुड़े हो सकते हैं, पर हमेशा एक जैसे नहीं होते।

NFHS-5 (2019–21) के अनुसार, बड़ी संख्या में विवाहित महिलाओं ने अपने जीवन में शारीरिक, भावनात्मक या यौन हिंसा का अनुभव होने की बात कही है, और कई महिलाएं आर्थिक नियंत्रण, अपमान व निर्णय लेने की स्वतंत्रता की कमी जैसी समस्याओं का भी सामना करती हैं। अगर केवल विवाह ही प्रतिबद्धता का प्रमाण होता, तो ऐसे रिश्तों में हिंसा, उपेक्षा और असमानता इतनी व्यापक नहीं होती।

सच्ची प्रतिबद्धता का मतलब केवल साथ रहना नहीं, बल्कि एक-दूसरे का सम्मान करना, विश्वास बनाए रखना, मुश्किल समय में साथ खड़ा होना और बराबरी का व्यवहार करना है। विवाह का प्रमाणपत्र इन मूल्यों की गारंटी नहीं देता यह केवल रिश्ते को कानूनी और सामाजिक मान्यता देता है। किसी रिश्ते की मज़बूती इस बात से तय होती है कि उसमें दोनों लोग एक-दूसरे की भावनाओं, अधिकारों और गरिमा का कितना सम्मान करते हैं। इसलिए यह कहना अधिक सही होगा कि इसलिए यह ज़रूरी नहीं है कि हर प्रतिबद्ध रिश्ता विवाह के अंतर्गत ही हो,या हर विवाह वास्तव में प्रतिबद्धता हो।

विवाह के बाहर भी प्रतिबद्ध रिश्ते

प्रतिबद्धता केवल विवाह तक सीमित नहीं होती। आज ऐसे कई रिश्ते हैं जिनमें लोग बिना शादी किए भी वर्षों तक साथ रहते हैं, एक-दूसरे की जिम्मेदारियां निभाते हैं और हर सुख-दुख में साथ खड़े रहते हैं, जैसे लिव-इन पार्टनर, जीवन के स्वर्णिम वर्षों में साथ रहने वाले साथी, समलैंगिक और ट्रांस जोड़े, तथा चुने हुए परिवार (Chosen Families)। ऐसे रिश्तों की नींव किसी कानूनी दस्तावेज़ पर नहीं, बल्कि भरोसे, सम्मान और आपसी ज़िम्मेदारी पर टिकी होती है।

विशेष रूप से LGBTQIA+ समुदाय के कई लोगों के लिए विवाह का अधिकार अभी भी सभी देशों में उपलब्ध नहीं है, फिर भी वे अपने साथी के साथ वर्षों तक जीवन बिताते हैं, जिम्मेदारियां साझा करते हैं और बीमारी में एक-दूसरे की देखभाल करते हैं। इसी तरह कई बुज़ुर्ग, जो किसी कारणवश दोबारा विवाह नहीं करना चाहते, बिना शादी के भी गहरे और ज़िम्मेदार रिश्ते निभाते हैं। ये उदाहरण बताते हैं कि विवाह प्रतिबद्धता का एक माध्यम हो सकता है, लेकिन यह प्रतिबद्धता का एकमात्र प्रमाण नहीं।

प्रतिबद्धता का नारीवादी दृष्टिकोण

नारीवादी दृष्टिकोण विवाह का विरोध नहीं करता, बल्कि यह समझने का प्रयास करता है कि किसी रिश्ते में समानता, सम्मान और स्वतंत्रता कितनी मौजूद है। नारीवादी विद्वानों का मानना है कि इतिहास में विवाह की संस्था पितृसत्तात्मक व्यवस्था से प्रभावित रही है, जिसके चलते कई महिलाओं के लिए विवाह केवल प्रेम का रिश्ता नहीं रहा, बल्कि आर्थिक निर्भरता, घरेलू श्रम का असमान बोझ और सीमित निर्णय-स्वतंत्रता का अनुभव भी रहा है। आज भी कई महिलाएं घर की अधिकांश जिम्मेदारियां निभाती हैं, लेकिन उनके श्रम को अक्सर स्वाभाविक कर्तव्य मान लिया जाता है।

नारीवादी विचारधारा के अनुसार किसी रिश्ते की सफ़लता केवल इस बात से नहीं मापी जा सकती कि वह कितने वर्षों तक चला या विवाह के बंधन में बंधा है। अगर किसी संबंध में एक साथी लगातार दबाव, हिंसा या असमानता का सामना कर रहे हैं, तो केवल विवाह का अस्तित्व उसे स्वस्थ या प्रतिबद्ध रिश्ता नहीं बना देता। सच्ची प्रतिबद्धता तब दिखाई देती है जब दोनों साथी एक-दूसरे की गरिमा का सम्मान करें, बराबरी से निर्णय लें और एक-दूसरे की स्वतंत्रता व पहचान को स्वीकार करें।

बदलती पीढ़ी और रिश्तों की नई समझ

समय के साथ रिश्तों को देखने का नज़रिया भी बदल रहा है। विशेष रूप से शहरी भारत और शिक्षित युवाओं के बीच यह समझ विकसित हो रही है कि किसी रिश्ते की सफ़लता विवाह या उसके लंबे समय तक चलने से नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि उसमें दोनों लोग कितने सम्मान, विश्वास और समानता के साथ रहते हैं। पहले जहां विवाह को रिश्ते का अंतिम लक्ष्य माना जाता था, वहीं आज कई युवा रिश्ते की गुणवत्ता और भावनात्मक स्वास्थ्य को अधिक महत्व दे रहे हैं।

आज की पीढ़ी अपने रिश्तों से जुड़े ज़रूरी सवाल पूछ रही है क्या हम बराबरी से निर्णय लेते हैं? क्या हमारी सहमति (Consent) का सम्मान किया जाता है? क्या हम एक-दूसरे की व्यक्तिगत सीमाओं (Boundaries) को समझते और स्वीकार करते हैं? इसका अर्थ यह नहीं कि युवा विवाह को महत्व नहीं देते, बल्कि वे यह मानते हैं कि केवल विवाह किसी रिश्ते को सफ़ल नहीं बना सकता। एक स्वस्थ रिश्ता वही है जिसमें संवाद हो, विश्वास हो, और दोनों लोग अपनी पहचान व स्वतंत्रता बनाए रखते हुए साथ चल सकें।

निष्कर्ष – प्रतिबद्धता की असली पहचान

प्रतिबद्धता किसी रिश्ते का सबसे महत्वपूर्ण आधार है, लेकिन इसे केवल विवाह से नहीं मापा जा सकता। सच्ची प्रतिबद्धता में सहमति, खुला संवाद, विश्वास और भावनात्मक सुरक्षा का विशेष महत्व होता है – दोनों लोग एक-दूसरे की सीमाओं और स्वतंत्रता का सम्मान करते हैं, जिम्मेदारियां मिलकर साझा करते हैं, और निर्णय बराबरी के आधार पर लेते हैं।

ये सभी गुण केवल विवाह होने से अपने-आप पैदा नहीं होते। विवाह किसी रिश्ते को सामाजिक और कानूनी मान्यता दे सकता है, लेकिन सम्मान, विश्वास, समानता और ज़िम्मेदारी जैसे मूल्य दोनों लोगों के व्यवहार और निरंतर प्रयास से ही विकसित होते हैं। इसलिए किसी रिश्ते की असली पहचान उसके कानूनी दर्जे से नहीं, बल्कि उसमें मौजूद प्रतिबद्धता, समानता और पारस्परिक संबंध से होती है।

संदर्भ
  1. https://psycnet.apa.org/doiLanding?doi=10.1037%2F0033-295X.93.2.119
  2. https://www.gottman.com/about/research/couples
  3. https://www.iipsindia.ac.in/content/national-family-health-survey-nfhs-5-india-report
  4. https://www.unwomen.org/sites/default/files/Headquarters/Attachments/Sections/Library/Publications/2018/Discussion-paper-Evolution-of-marriage-and-relationship-recognition-in-western-jurisdictions-en.pdf