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डीपफेक और डिजिटल पितृसत्ता – महिलाओं पर बढ़ते हमले

Illustration of two human profiles connected by digital data, binary code, and network nodes, representing artificial intelligence and the flow of information.

आज इंटरनेट और सोशल मीडिया हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। हम इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप और यूट्यूब के ज़रिए हर दिन ढेर सारी जानकारी देखते और साझा करते हैं। इंटरनेट ने जानकारी तक पहुँच आसान बनाई है, लेकिन इसके साथ नकली ख़बरें और झूठी डिजिटल सामग्री भी तेज़ी से बढ़ी हैं। कई बार लोग बिना जाँच किए ऐसी चीज़ों पर भरोसा कर लेते हैं जो सच नहीं होतीं।

इसी में “डीपफेक” तकनीक एक बड़ा ख़तरा बनकर उभरी है। लेकिन इस ख़तरे को समझने के लिए दो चीज़ों के बीच का रिश्ता समझना ज़रूरी है। जानकारी और यौनिकता – जब किसी महिला को यह नहीं पता कि उसकी तस्वीरों का AI से किस तरह दुरुपयोग हो सकता है, तो वह ख़ुद को बचा नहीं पाती। और जब समाज को यह नहीं पता कि किसी की यौनिकता उसकी निजी पहचान का हिस्सा है, जिसे बिना अनुमति इस्तेमाल करना हिंसा है, तो यह अज्ञानता ही अपराध की ज़मीन तैयार करती है। AI की मदद से बनाए गए डीपफेक वीडियो और तस्वीरें देखने में बिल्कुल असली लगते हैं, जबकि वे नकली होते हैं। इसका सबसे ज़्यादा दुरुपयोग महिलाओं के ख़िलाफ़ हो रहा है। जहाँ उनकी यौन छवि को हथियार बनाकर उन्हें बदनाम किया या डराया जाता है। यह केवल ऑनलाइन मज़ाक नहीं, बल्कि महिलाओं की गरिमा, मानसिक स्वास्थ्य और सुरक्षा पर सीधा हमला है।

डीपफेक क्या होता है?

डीपफेक एक ऐसी तकनीक है जिसमें AI की मदद से किसी का चेहरा, आवाज़ या हाव-भाव बदल दिए जाते हैं। इसका मतलब यह है कि किसी की तस्वीर या वीडियो लेकर उसे किसी दूसरी वीडियो में इस तरह जोड़ दिया जाता है कि वह असली लगे। जैसे किसी महिला की फोटो लेकर उसे अश्लील वीडियो में डाल देना, किसी की आवाज़ की नक़ल करके झूठी बातें कहलवाना, किसी को ऐसी जगह या स्थिति में दिखाना जहाँ वह कभी थे ही नहीं

महिलाएं सबसे ज़्यादा निशाना क्यों बनती हैं?

ऑनलाइन हिंसा में महिलाओं को अक्सर उनकी यौनिकता और शरीर के ज़रिये निशाना बनाया जाता है। इसकी वजह सिर्फ़ तकनीक नहीं, बल्कि समाज की वह सोच है जिसमें आज भी महिलाओं की “इज़्ज़त” को उनके शरीर, कपड़ों और यौन छवि से जोड़कर देखा जाता है। इसी मानसिकता का फायदा उठाकर लोग डीपफेक जैसी तकनीकों का इस्तेमाल उन्हें बदनाम करने, डराने या चुप कराने के लिए करते हैं। कई मामलों में यह देखा गया कि, किसी लड़की से बदला लेने या उसे अपमानित करने के लिए उसकी नकली अश्लील तस्वीरें या वीडियो बनाए जाते हैं या पूर्व प्रेमिका या साथी को परेशान करने के लिए फेक वीडियो फैलाए जाते हैं।

समस्या यह भी है कि इंटरनेट पर महिलाओं की तस्वीरें बिना अनुमति के आसानी से शेयर और सेव कर ली जाती हैं। सोशल मीडिया प्रोफाइल, रील्स या सामान्य तस्वीरों को उठाकर AI टूल्स से नकली कंटेंट बना दिया जाता है। कई महिलाएं जिनके साथ ऐसा हुआ है, डर, शर्म या बदनामी के कारण शिकायत भी नहीं कर पातीं, क्योंकि समाज अक्सर सवाल अपराधी से ज़्यादा महिला पर उठाता है।

इस तरह डीपफेक सिर्फ़ एक तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि महिलाओं के खिलाफ़ पहले से मौजूद यौन हिंसा और नियंत्रण की संस्कृति का नया डिजिटल रूप बनता जा रहा है।

वीडियो नकली है लेकिन नुकसान असली होता है

बहुत लोग सोचते हैं कि अगर वीडियो नकली है तो उससे इतना फ़र्क क्यों पड़ता है। लेकिन सच यह है कि डीपफेक का असर बहुत ग़हरा होता है।

मानसिक असर

जब किसी महिला को पता चलता है कि उसकी नकली अश्लील तस्वीरें या वीडियो इंटरनेट पर घूम रहे हैं, तो उसे बहुत बड़ा मानसिक झटका लगता है। उसे डर लगने लगता है कि लोग उसके बारे में क्या सोचेंगे। कई महिलाएं शर्म, चिंता, डर और तनाव का सामना करती हैं।

कुछ महिलाएं सोशल मीडिया छोड़ देती हैं। कुछ लोगों से मिलना-जुलना कम कर देती हैं। कई बार यह स्थिति अवसाद तक पहुँचा देती है।

परिवार और समाज का दबाव

हमारे समाज में आज भी बहुत लोग बिना सच जाने किसी महिला को ही दोषी मान लेते हैं। अगर किसी लड़की का फेक वीडियो वायरल हो जाए, तो कई लोग यह नहीं सोचते कि वीडियो नकली भी हो सकता है। वे लड़की के चरित्र पर सवाल उठाने लगते हैं। यानी वीडियो नकली होता है, लेकिन उसका असर पूरी तरह असली होता है।

महिलाओं की यौनिकता पर नियंत्रण का नया तरीका

समाज में महिलाओं की यौनिकता को हमेशा नियंत्रित करने की कोशिश की गई है। कभी कपड़ों के नाम पर, कभी “संस्कार” के नाम पर, और अब डिजिटल दुनिया में नकली कंटेंट के ज़रिए। इस नए दौर में नियंत्रण का हथियार बदल गया है, अब वह हथियार है जानकारी का असंतुलन। जो लोग डीपफेक बनाते हैं, वे जानते हैं कि यह तकनीक कैसे काम करती है। और जो महिलाएं इसका शिकार होती हैं, उन्हें अक्सर यह भी नहीं पता होता कि उनकी एक सामान्य तस्वीर से कुछ ही मिनटों में नकली यौन सामग्री बनाई जा सकती है। यही जानकारी की खाई अपराधी और पीड़ित के बीच की यह असमानता इस हिंसा को और आसान बना देती है।

डीपफेक महिलाओं को यह डर महसूस कराता है कि उनकी तस्वीरें सुरक्षित नहीं हैं, उनकी ऑनलाइन मौजूदगी ख़तरे में है, और कभी भी उनकी यौन पहचान को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा सकता है। और यह डर अकारण नहीं है क्योंकि हमारे समाज में आज भी महिला की यौनिकता को उसकी “इज़्ज़त” से जोड़ा जाता है। इसीलिए नकली यौन सामग्री इतनी कारगर “सज़ा” बन जाती है। भले ही वीडियो झूठा हो, समाज का फ़ैसला अक्सर सच होता है।

यह डर महिलाओं की आज़ादी को गहराई से प्रभावित करता है। कई महिलाएं अपनी तस्वीरें पोस्ट करने से डरने लगती हैं। कुछ अपनी राय खुलकर कहना बंद कर देती हैं। कुछ पूरी तरह सोशल मीडिया छोड़ देती हैं। यानी डीपफेक सिर्फ़ एक वीडियो या फोटो नहीं है। यह एक संदेश है जो महिलाओं को बताता है कि “अगर तुम दिखोगी, तो तुम्हें इसकी कीमत चुकानी होगी।” जब तक महिलाओं को उनके डिजिटल और अन्य अधिकारों की जानकारी नहीं होगी, और जब तक समाज यौनिकता को शर्म की नज़र से देखता रहेगा तब तक यह नियंत्रण का खेल जारी रहेगा।

आंकड़े, तकनीक और समाज – डीपफेक हिंसा का बढ़ता दायरा

पहले डीपफेक जैसी नकली तस्वीरें या वीडियो बनाना आसान नहीं था। इसके लिए महंगे सॉफ्टवेयर, एडिटिंग स्किल और ग़हरी तकनीकी जानकारी चाहिए होती थी। लेकिन अब AI आधारित टूल्स ने यह काम बेहद आसान बना दिया है। 2026 तक उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार इंटरनेट पर हज़ारों face-swap ऐप और voice-cloning टूल मौजूद हैं, जिनकी मदद से कोई भी कुछ ही मिनटों में नकली वीडियो या ऑडियो तैयार कर सकते है।

आंकड़े बताते हैं कि डीपफेक तकनीक का सबसे ज़्यादा असर महिलाओं पर पड़ रहा है। वैश्विक स्तर पर 96–98% डीपफेक वीडियो यौन प्रकृति के पाए गए हैं और लगभग 93% पीड़ित महिलाएं हैं। हाल के वर्षों में महिलाओं को निशाना बनाने वाले नकली यौन कंटेंट में 900% तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

भारत में भी साइबर अपराधों का दायरा लगातार बढ़ रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आँकड़ों के अनुसार, 2023 में देशभर में 86,420 साइबर अपराध दर्ज किए गए, जबकि 2024 में यह संख्या बढ़कर 1,01,928 हो गई, यानी एक वर्ष में लगभग 18% की वृद्धि हुई। इसी अवधि में महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराधों के कुल मामलों की संख्या 4.48 लाख से घटकर 4.41 लाख रही, लेकिन ऑनलाइन उत्पीड़न, फ़र्ज़ी प्रोफाइल, पहचान की चोरी और यौन शोषण से जुड़े डिजिटल अपराध लगातार चिंता का विषय बने हुए हैं।

कानून क्या कहते हैं?

भारत में साइबर अपराध और ऑनलाइन उत्पीड़न से जुड़े कई कानून मौजूद हैं, जिनके तहत बिना अनुमति किसी की तस्वीर, वीडियो या अश्लील सामग्री बनाना, साझा करना या प्रसारित करना अपराध माना जाता है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के अंतर्गत डीपफेक, मॉर्फ्ड इमेज, ऑनलाइन यौन उत्पीड़न, साइबर स्टॉकिंग और निजी तस्वीरों के दुरुपयोग जैसे मामलों में कार्रवाई की जा सकती है। यदि कोई AI या किसी डिजिटल टूल की मदद से किसी महिला की नकली अश्लील तस्वीर या वीडियो बनाकर उसे सोशल मीडिया, वेबसाइट या मैसेजिंग ऐप्स पर फैलाते है, तो उसके ख़िलाफ़ कानूनी शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।

हालांकि, व्यवहारिक स्तर पर स्थिति इतनी आसान नहीं है। बड़ी संख्या में लोगों को अब भी यह जानकारी नहीं होती कि डीपफेक और ऑनलाइन यौन हिंसा भी दंडनीय अपराध हैं। कई महिलाएं बदनामी, सामाजिक शर्म, परिवार के डर या ऑनलाइन ट्रोलिंग की आशंका के कारण शिकायत दर्ज कराने से हिचकती हैं। कई मामलों में पुलिस या आसपास के लोग इसे “ऑनलाइन मज़ाक” या “सिर्फ़ इंटरनेट की बात” कहकर गंभीरता से नहीं लेते, जिससे न्याय मिलने में मुश्किल होती है।

यही वजह है कि केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं है। डिजिटल सुरक्षा, सहमति और ऑनलाइन हिंसा को लेकर समाज में जागरूकता बढ़ाना भी उतना ही ज़रूरी है। लोगों को यह समझना होगा कि किसी की तस्वीर या आवाज़ का बिना अनुमति इस्तेमाल करना केवल तकनीकी शरारत नहीं, बल्कि मानसिक, सामाजिक और यौन हिंसा का एक रूप है।

हमें क्या करना चाहिए?

डीपफेक और नकली यौन सामग्री के बढ़ते मामलों के बीच सबसे पहली ज़रूरत सतर्कता की है। इंटरनेट पर दिखने वाली हर तस्वीर, ऑडियो या वीडियो सच नहीं होती। AI तकनीक इतनी तेज़ी से विकसित हुई है कि कई बार नकली और असली में फ़र्क करना मुश्किल हो जाता है। इसलिए किसी भी वायरल वीडियो या निजी सामग्री को बिना जांचे-परखे आगे शेयर करना नुकसानदायक हो सकता है। एक ज़िम्मेदार डिजिटल व्यवहार का मतलब है कि हम सनसनी या मनोरंजन के लिए किसी की निजी छवि को वायरल करने का हिस्सा न बनें।

ज़रूरत इस बात की है कि दोष अपराधी पर तय हो, न कि उस पर जिसकी तस्वीर या पहचान का गलत इस्तेमाल हुआ है। साथ ही स्कूलों, कॉलेजों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर डिजिटल साक्षरता बढ़ानी होगी ताकि लोग समझ सकें कि नकली कंटेंट को कैसे पहचानें, रिपोर्ट करें और उससे बचें।

सबसे अहम बात सहमति (consent) और जानकारी को समझने की है। यौनिकता किसी की निजी पहचान है और इस पहचान का बिना अनुमति इस्तेमाल करना तब और आसान हो जाता है जब समाज में जानकारी की कमी हो। जब लोगों को यह नहीं पता कि डीपफेक क्या है, कैसे बनता है और इसे कैसे पहचानें, तो वे न सिर्फ़ इसके शिकार होते हैं, बल्कि अनजाने में इसे फैलाने में भी हिस्सेदार बन जाते हैं। इसीलिए सही जानकारी ही सबसे बड़ा हथियार है।

जब कोई महिला अपने डिजिटल अधिकार जानती है, जब परिवार और समाज यह समझता है कि किसी की यौन छवि का दुरुपयोग हिंसा है तभी इस हिंसा को रोका जा सकता है। डीपफेक और नकली यौन सामग्री केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि जानकारी की कमी और पितृसत्तावादी सोच के मेल से जन्मी हिंसा है। इंटरनेट के इस दौर में सबसे ज़रूरी है सही जानकारी, सहमति की समझ।

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