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स्वयं (सेल्फ) परिभाषित

limitless

“लोगों को केवल एक प्रमुख ‘पहचान’ के आधार पर देखने की बढ़ती प्रवृत्ति न सिर्फ़ बाहर से थोपी गई और मनमानी प्राथमिकता है, बल्कि यह उन लोगों की एक अहम आज़ादी को भी छीनती है जिससे वह ख़ुद तय करते हैं कि वह किन-किन समूहों से कितना जुड़ाव रखते हैं, जबकि वे ख़ुद भी कहीं-न-कहीं उन सभी का हिस्सा होते हैं।”

-अमर्त्य सेन, न्याय का विचार (दी आइडिया ऑफ जस्टिस)

मैं अपने लैपटॉप के सामने एक कुर्सी पर बैठती हूँ, टाइप करती हूँ। मैं अपने मन की सीमाओं के बारे में लिखने की कोशिश कर रही हूँ, वे सीमाएँ जो मेरी संस्कृति, मेरी दुनिया और इन दोनों के बीच मौजूद हर चीज़ द्वारा बनाई गई सीमाओं से गहराई से जुड़ी हुई हैं। यह एक परेशान करने वाला विचार है – यह सोचना कि मेरे मन की भी कोई सीमाएँ हैं। मैं चाहती हूँ कि मेरा मन एक ख़ुला मैदान हो, जिसमें कोई ऐसी लकीरें न हों जो मुझे सीमित करें या उस दुनिया से दूर रखें जो बाहर मौजूद हैं। लेकिन, बदकिस्मती से, ये लकीरें मौजूद हैं। ख़ुशकिस्मती से, ये लकीरें मुझे उन संभावनाओं की याद दिलाती हैं जो इनके पार मौजूद हैं। ये मुझे चुनौती देती हैं कि मैं इन पर क़दम रखूँ, इन्हें लाँघ जाऊँ, इन्हें तोड़कर आगे बढ़ूँ, या इन्हें और दूर धकेल दूँ। लेकिन, जो लकीरें हमें अपने दायरे में रखती हैं, वे ही हमारी पहचान भी बनाती हैं।

मैं बचपन में बहुत शर्मीली बच्ची थी – मैं सिर्फ़ घर पर अपनी बहन के साथ ही ख़ुलकर रह पाती थी। मुझे सामाजिक समारोहों में जाना बिल्कुल पसंद नहीं था – अपने हमउम्र लोगों या परिवार के बड़े समूहों के बीच मैं और भी ज़्यादा सिमट जाती थी। मैंने कभी नहीं सोचा था कि यह सब कभी बदलेगा, लेकिन बाकी सब चीज़ों की तरह, यह भी बदल गया। मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि मैं बहुत मिलनसार बनती जा रही थी, रचनात्मक रुचियों वाली, और हर महफ़िल की जान बन जाती थी। मुझे नए लोगों से मिलना और उनकी ज़िन्दगी के बारे में जानना बहुत अच्छा लगता था, और मैं इसी में खिल उठती थी। मुझे एहसास हुआ कि अचानक दोस्त बनाने की यह मेरी क्षमता दरअसल मुझसे अलग लोगों में मेरी रुचि की वजह से विकसित हुई थी। मुझे यह अच्छा लगता था कि उनके ज़रिये मुझे अपनी ज़िन्दगी के अनुभवों की सीमाएँ समझ में आती थीं और उनसे आगे बढ़ने का मौका मिलता था।मैं अपने आरामदायक दायरे से बाहर निकलकर दुनिया को अपने नज़रिए के अलावा दूसरे नज़रियों से देखने के लिए उत्सुक रहती थी।

मुझे उन पहचानों का एहसास था जिनके साथ मैं पैदा हुई थी और जो मुझे मेरे परिवार और परवरिश से मिली थीं, लेकिन किसी तरह मुझे कभी नहीं लगा कि मैं सच में उनमें से किसी से जुड़ी हूँ। मैं एक महिला थी, और लगातार यह साबित करने की कोशिश करती रहती थी कि मैं भी पुरुष के बराबर सक्षम हूँ। मैं एक हिन्दू थी, लेकिन लगातार उस धर्म से ख़ुद को अलग करने की कोशिश करती रहती थी जो सांप्रदायिकता और ख़ून-ख़राबे से दागदार हो चुका था।मैं एक भारतीय थी, और मुझे देशभक्ति, विदेशियों के प्रति घृणा, या किसी भी समूह के प्रति अंधी निष्ठा जैसे विचारों से स्वाभाविक रूप से असहजता होती थी।

इसी दौरान मैंने अमर्त्य सेन के लेख पढ़े, और उन्होंने मुझे यह समझने में मदद की कि मैं कौन हूँ और मैं क्या बन सकती हूँ। मुझे एहसास हुआ कि मैं सिर्फ़ एक उत्तर भारतीय हिन्दू महिला से कहीं ज़्यादा हूँ, और अपनी पहचानें चुनने के लिए मैं आज़ाद हूँ।मैं राजनीति विज्ञान की छात्रा थी, क्रिकेट की शौकीन, किताबें पढ़ने वाली, फोटोग्राफी करने वाली, जल्दी उठने वाली, मांसाहार पसंद करने वाली, ख़यालो में खोई रहने वाली, काम टालने वाली – और भी बहुत कुछ! अचानक मैं एक बहुआयामी, जीवंत इंसान बन गई थी, जिससे मैं ख़ुद को जोड़कर देख पा रही थी। अपनी एक नई परिभाषा मिलने के साथ मुझे अपनी ज़िंदगी पर ज़्यादा नियंत्रण महसूस होने लगा।

इस नए नज़रिए ने मुझे कई तरह की दीवारें तोड़ने में मदद की – सिर्फ़ अपने अंदर ही नहीं, बल्कि दूसरों के साथ भी। अब मैं समझ पा रही थी कि नए लोगों से मिलने की मेरी उत्सुकता भले ही उनकी ज़िन्दगी के बारे में जानने की जिज्ञासा से आती हो, लेकिन इन सभी बातचीतों की शुरुआत किसी न किसी साझी पहचान से ही होती है। इस पूरे समय मैं यह सब अनजाने में करती आ रही थी – पहले कोई समान आधार ढूँढ़ लेना और फिर वहाँ से अपनी-अपनी पसंद की दिशा में आगे बढ़ जाना। अब यह मेरे लिए एक दिलचस्प, लगभग खेल जैसा अभ्यास बन गया था कि हम ख़ुद को परिभाषित करने के तरीके, चाहे वे कितने ही ठोस हों या चंद पलों के – हमारी सामाजिक बातचीत में कैसे सामने आते हैं।

इस एक समझ के अलावा, बहुत पढ़ने और नई-नई जगहों पर जाने ने भी इस प्रक्रिया में योगदान दिया। हर नई किताब या बातचीत के साथ मेरा नज़रिया और व्यापक होता गया। हर नई जगह के साथ मैं देशों और महाद्वीपों के बीच जुड़ाव की कड़ियाँ जोड़ने लगी। एक युवा क्रोएशियाई महिला और मेरे बीच जुड़ाव इसलिए बना क्योंकि हम दोनों मानती थीं कि हमारे भतीजे पूरी दुनिया के सबसे प्यारे बच्चे हैं। न्यूयॉर्क शहर की एक आलीशान इमारत में काम करने वाले एक मध्यम आयु के पोर्टर और मेरे बीच इसलिए रिश्ता बना क्योंकि हम दोनों एक ही शहर में संघर्ष कर रहे प्रवासी थे। एक चीनी महिला और मैं, राजनीतिक मतभेदों के बावजूद, दोस्त बन गईं क्योंकि हम दोनों को घर की बहुत याद आती थी।

धीरे-धीरे मैं लोगों के कई आपस में जुड़े हुए नेटवर्क देखने लगी, जो अलग-अलग कारणों पर बने थे। कभी साझा इतिहास या एक ही भौगोलिक क्षेत्र लोगों को जोड़ता था, तो कभी खाने, कला, खेल, सिगार, यहाँ तक कि रियलिटी टीवी शो या ज़ॉम्बी फ़िल्मों के प्रति लगाव लोगों को एक-दूसरे की ओर खींचने वाली ताकत बन जाता था। पर अब तो कोई पारंपरिक ‘बातचीत’ के ज़रिये समान रुचियाँ स्वाभाविक रूप से ख़ोजने की प्रक्रिया को भी छोड़ सकते हैं, और उसकी जगह जटिल तरीकों पर बने ऐप्स का इस्तेमाल कर सकते हैं, जो यह काम आपके लिए ख़ुद ही कर देते हैं।

सेन लिखते हैं कि हम सभी अपने चुनावों का परिणाम होते हैं। ये चुनाव, हमारी पहचानों की तरह, लगातार बदलते रहते हैं। आज, जब मैं इन प्लेनस्पीक के लिए यह लेख लिख रही हूँ, तो मैं अपने उन अनुभवों से सीख ले रही हूँ जहाँ मैंने दूसरे लोगों से जुड़ाव बनाया है। मैंने सचेत रूप से यह चुनाव किया है कि अपनी ‘महिला’ वाली पहचान को कुछ समय के लिए एक तरफ रख दूँ, क्योंकि मुझे लगता है कि सिर्फ़ उसी नज़रिए से देखने पर मेरी दृष्टि सीमित हो जाती है। यह विचार कि मैं अपने नज़रिए ख़ुद चुन सकती हूँ, मुझे सशक्त बनाता है। मैं सिर्फ़ यह या वह नहीं हूँ – मैं एक साथ वही सब कुछ हो सकती हूँ जो मैं बनना चाहूँ, और मेरी संभावनाएँ असीमित हैं।

प्रांजलि शर्मा द्वारा अनुवादित। प्रांजलि एक अंतःविषय नारीवादी शोधकर्ता हैं, जिन्हें सामुदायिक वकालत, आउटरीच, जेंडर दृष्टिकोण, शिक्षा और विकास में अनुभव है। उनके शोध और अमल के क्षेत्रों में बच्चों और किशोरों के जेंडर और यौन व प्रजनन स्वास्थ्य अधिकार शामिल हैं और वह एक सामुदायिक पुस्तकालय स्थापित करना चाहती हैं जो समान विषयों पर बच्चों की किताबें उपलब्ध कराएगा।

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Cover illustration by Jeff Porter