पांच साल पहले, मैंने कोविड-19 के दौरान ऑनलाइन टीचरों के साथ हुए बुरे अनुभवों की जांच शुरू की थी क्योंकि मैंने देखा कि जो टीचर ऑनलाइन पढ़ा रहे थे, उनके साथ साइबर-बुलिंग की घटनाओं के बारे में न्यूज़ और सोशल मीडिया पर बहुत ज़्यादा चर्चा हो रही है (इफ़्तिख़ार, 2020)। ज़्यादातर टीचरों को पहले से ज़्यादा तैयारी का अनुभव नहीं था और उनकी डिजिटल समझ भी सीमित थी। जब पढ़ाई ऑनलाइन होने लगी, तो कई टीचर पहली बार स्क्रीन पर पढ़ाते हुए नज़र आए। मैंने अपने अध्ययन के ज़रिये यह देखा कि जब पढ़ाई ऑनलाइन हुई और चूंकि उनकी डिजिटल समझ सीमित थी, तो कई बार उनके वीडियो बिना अनुमति रिकॉर्ड करके यूट्यूब या इंस्टाग्राम पर ट्रेंडिंग वीडियो के रूप में डाल दिए गए। इसके बाद उन्हें बार-बार जानबूझकर नुकसान और परेशानियों का सामना करना पड़ा। कई लोगों ने क्लास में कमेंट्स या मैसेज को ब्लॉक करके सभी मौजूद लोगों को म्यूट करने जैसी रणनीतियां अपनाईं, जो कि इस बदलती दुनिया में ढलने की एक धीमी प्रक्रिया को दर्शा रहा था। मैंने समझा कि ये सशक्त होकर लिए गए फैसले नहीं थे, बल्कि थकान और डर से उपजी चुप और सावधानी भरी दूरियाँ थीं।
उस समय मैंने इन घटनाओं को साइबर-बुलिंग के रूप में देखा, बिना यह समझे कि ये सिर्फ़ अलग-अलग लोगों द्वारा पहली बार तकनीक इस्तेमाल करने की अकेली घटनाएँ नहीं थीं, बल्कि एक बड़े तकनीकी बदलाव के दौर में हो रही व्यापक स्थितियों का हिस्सा थीं (हिंदुजा और पैचिन, व पैचिन और हिंदुजा, 2006)। समय के साथ-साथ जब मैंने महिलाओं की कहानियाँ और उनके मोबाइल मीडिया से जुड़े अनुभव सुने, तो यह साफ़ हुआ कि ये स्थितियाँ हर महिला उपयोगकर्ता किसी न किसी नए रूप और तरीके में अनुभव करती है।
जनवरी 2026 की बात है, जब मेरी मुलाकात पूर्वी भारत के राज्य झारखण्ड के बड़े औद्योगिक ज़िले धनबाद के एक ग्रामीण इलाके में रहने वाली सोलह वर्ष की एक लड़की से हुई। एक साल से भी कम समय पहले उसे मोबाइल फोन मिला था, और वह भी उन्हीं चुनौतियों से जूझ रही थी जिनका सामना बाकी शिक्षिकाएँ कर रही थीं। लेकिन उसकी स्थिति दो कारणों से अलग थी – वह नाबालिग थी, और उसे नुकसान पहुँचाने वाले अजनबी नहीं, बल्कि उसके अपने ही आसपास के हमउम्र साथी थे।
ग्रामीण परिवेश में, जहाँ समाज की सामूहिक सोच के कारण निजी जीवन बनाए रखना ख़ुद में एक चुनौती होता है, वहाँ महिलाओं की डिजिटल मौजूदगी को सिर्फ संचार का ज़रिया नहीं माना जाता, बल्कि उसे ऐसी गतिविधि के रूप में देखा जाता है, जिसके आधार पर उनकी नज़दीकियों और यौनिकता के बारे में अनुमान लगाए जाते हैं, उन पर नज़र रखी जाती है और पूरे समुदाय के भीतर नैतिक कसौटी पर परखा जाता है। डिजिटल मौजूदगी पर साथियों की यह निगरानी एक तरह के नैतिक नियंत्रण की तरह काम करती है। यह तय करती है कि कोई महिला ऑनलाइन क्या करे, और वह किस तरह की नज़दीकियों के बारे में सोच सकती है या उनमें शामिल होने की उसे कितनी “इजाज़त” है।
जहाँ उसकी कम उम्र के कारण अभिभावकों और बाकी बड़ों की ओर से उस पर निगरानी और अनुशासन था, वहीं उसके हमउम्र साथियों ने उसे ‘माहिर’ कहकर पुकारा। यह शब्द विडंबना से भरा था, क्योंकि इसका मतलब उसकी तकनीकी कुशलता से नहीं था, बल्कि उसकी ऑनलाइन मौजूदगी और ‘हमेशा ऑनलाइन रहने’ की बनी हुई छवि से जुड़ा था। इसके साथ-साथ उसे ऑफलाइन भी खुले तौर पर आलोचना का सामना करना पड़ता था – उसके मोबाइल इस्तेमाल को लेकर अनचाही टिप्पणियाँ की जाती थीं, और जब वह कुछ ऐसा पोस्ट कर देती जिसे उसके साथी पसंद नहीं करते थे, तो वे उसके माता-पिता से शिकायत तक कर देते थे।
मुझे जो बात सबसे ज़्यादा चौंकाने वाली लगी, वह यह थी कि उसकी कहानी उन सैकड़ों महिलाओं की कहानियों से अलग नहीं थी, जिनसे मैं पिछले कुछ वर्षों में पंजाब और झारखंड के ग्रामीण समुदायों में मिलती रही हूँ। उसने बताया कि उसने न केवल अपना सार्वजनिक इंस्टाग्राम अकाउंट प्राइवेट कर लिया और व्हाट्सऐप पर अपना ‘लास्ट सीन’ छिपा दिया, बल्कि वह अपने कंटेंट पर नकारात्मक टिप्पणी करने वाले लोगों को ब्लॉक करने में भी समय लगाती है। उसकी ये रणनीतियाँ, ठीक वैसे ही जैसे 2021 में शिक्षिकाओं की थीं, हालात से निपटने के लिए समय के साथ ढाली गई हैं।
उसने जो अनुभव साझा किए, वे सिर्फ़ प्लेटफ़ॉर्म या मोबाइल तक सीमित नहीं थे; उसे ऑफलाइन भी उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा था, जो दोस्तों, परिवार और हमउम्र साथियों द्वारा लागू किया जा रहा था। जब हम डिजिटल आत्मीयता और यौनिकताओं की बात करते हैं, तो यहीं पर ‘साइबर-बुलिंग’ या ‘ऑनलाइन उत्पीड़न’ जैसी भाषा कम पड़ जाती है। उसके साथ जो हुआ, और उसके जैसी बाकी कई लड़कियों के साथ जो सामूहिक सोच वाले समाजों में रहती हैं, उसे बेहतर ढंग से “डिजिटल पहुँच से उपलब्ध संभावनाओं और सुविधाओं का हथियारकरण” के रूप में समझा जा सकता है । यह ऐसा तंत्र है जिसमें लगातार नज़र रखकर निगरानी को नियम और नैतिक बर्ताव की अपेक्षाएँ लागू करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है (चड्ढा और देब, 2006)।
निगरानी पर लिखे गए ज़्यादातर प्रमुख शोध इसे एक ऊपर से नीचे चलने वाली प्रक्रिया के रूप में देखते हैं। यानी देश अपने नागरिकों पर नज़र रखते हैं, कंपनियाँ हमारा डेटा इकट्ठा करती हैं, एल्गोरिदम लोगों की गतिविधियों को देखते हैं, और संस्थाएँ पूरी आबादी पर निगरानी रखती हैं (Marwick & Boyd, 2014; Nissenbaum, n.d.)। लेकिन सामूहिक सोच वाले समाजों में, जहाँ निजी जगह या शारीरिक गोपनीयता लगभग नहीं के बराबर होती है, यह निगरानी एक समान स्तर पर, यानी क्षैतिज प्रक्रिया बन जाती है। यह साथियों, परिवार के सदस्यों, जीवनसाथियों और यहाँ तक कि पड़ोसियों के ज़रिये लागू होती है। ऐसे माहौल में लगातार देखे जाने और निगरानी में होने का अनुभव बना रहता है। यह उस तरह के रहन-सहन और सामाजिक ढाँचे का स्वाभाविक हिस्सा है, जो गाँवों में पाया जाता है – जहाँ दरवाज़े अक्सर बंद नहीं होते और घरों के भीतर और बाहर सामूहिक जगहें अब भी बनी मिलती हैं। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि यही शारीरिक नज़दीकी और आपसी अंतरंगता अब ऑनलाइन दुनिया में भी चली जाती है, जहाँ यह अक्सर एक नैतिक ज़िम्मेदारी या सामाजिक फ़र्ज़ का रूप ले लेती है।
जैसा कि हमें पंजाब के ग्रामीण समुदायों में रहने वाली महिलाओं के साथ किए गए अपने शोध में मिला, महिलाएँ आमतौर पर अपने फोन के पासवर्ड पति, बच्चों और ससुराल के सदस्यों के साथ साझा करती थीं। बंद या लॉक किया हुआ फोन तब तक स्वीकार्य माना जाता था, जब वह बाहर के लोगों से बचाव के लिए हो, न कि परिवार के सदस्यों से। अगर कोई महिला अपने फोन तक पहुँच रोकती, तो उस पर शक किया जाता। लॉक किया हुआ फोन इस बात का संकेत माना जाता है कि उसके पास ‘कुछ छिपाने लायक’ है (चक्रबोर्ती और गर्ग, 2025)।
ऐसे सामाजिक परिवेश में निजता को न तो व्यक्तिगत अधिकार के रूप में समझा जाता है और न ही एक सीमा के रूप में। सही कहें तो यह एक तरह का नैतिक प्रदर्शन बन जाती है, जो सामाजिक ढाँचों और हमउम्र साथियों के प्रति जवाबदेही पर केंद्रित होता है। निजता पर काम करने वाले शागिर्दों ने इस बात को रेखांकित किया है कि संदर्भ के आधार पर यह समझना कि हमें कौन देख या सुन सकता है, निजता से जुड़े फैसलों को प्रभावित करने वाला एक ज़रूरी कारण होता है (ट्रेप्टे और अन्य ., 2020)। मेरे अवलोकन में यह सामने आया कि सामूहिक सोच वाले समाजों में यह ‘दर्शक’ शायद ही कभी कोई एक है। यह बल्कि पूरा समुदाय और हमउम्र साथियों का नेटवर्क होता है। साझा फोन, सबको दिखने वाली स्क्रीनें और मिलकर चलाए जाने वाले अकाउंट इस स्थिति को और भी जटिल बना देते हैं। हर बात में खुलेपन की उम्मीद होती है – निजी और सार्वजनिक के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है, ख़ासकर हमउम्र साथियों के संबंधों में।
इसलिए जो कुछ ऑनलाइन होता है, वह शायद ही कभी सिर्फ़ ऑनलाइन तक सीमित रहता है। उस युवा लड़की की तरह, जिसे उसके फोन के इस्तेमाल के लिए डाँटा और सवालों के घेरे में रखा गया, ऑनलाइन होना केवल निगरानी के दायरे में नहीं आता, बल्कि जब वह ख़ुद को इस निगरानी से बचाने की कोशिश करती है, तो उसकी उस कोशिश की भी आलोचना की जाती है। उसे ‘माहिर’ कहकर उसका मज़ाक बनाया जाता है, क्योंकि वह निजता चुनती है। उसके साथी उसकी इस पसंद को इस तरह समझते हैं मानो उसके पास ‘कुछ छिपाने लायक’ हो (सोलोवे, 2007, 2008)। उसके लिए निगरानी का अनुभव कोई बाहरी दखल नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन की एक मूल प्रक्रिया है। इसे अक्सर देखभाल के रूप में पेश किया जाता है – मानो साथियों का यह नैतिक कर्तव्य हो कि वे एक ऐसी लड़की पर नज़र रखें जो ‘बहुत ज़्यादा’ ऑनलाइन रहती है। ऐसे परिवेश में आत्मीयता ही निगरानी की संरचना बन जाती है। हालाँकि मोबाइल फोन और ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म निजी जुड़ाव का वादा करते हैं, लेकिन उपयोगकर्ता की वास्तविक ज़िंदगी और उसका सामाजिक संदर्भ अक्सर निजता के लिए जगह नहीं छोड़ते। इसके बजाय, ऑनलाइन दिखने वाला स्टेटस, पोस्ट और स्टेटस के समय की जानकारी, और यहाँ तक कि ‘लास्ट ऑनलाइन’ जैसी सुविधाएँ भी उस पर नज़र रखने का माध्यम बन जाती हैं – यहाँ तक कि तब भी, जब वह कुछ पोस्ट नहीं कर रही होती।
महिलाओं के लिए यह सिर्फ़ नियंत्रण या अनुशासन का तरीका नहीं है, बल्कि आत्मीयता की किसी भी संभावना पर पहले से ही पहरा बिठा देने जैसा है। यदि कोई महिला, ख़ासकर कोई युवा लड़की, अपनी डिजिटल मौजूदगी पर नज़र रखने और उसे नियंत्रित करने वाली सामाजिक व्यवस्थाओं से दूरी बनाने के लिए कोई सीमा तय करती है, तो इसे अक्सर उसकी नैतिक कमी या गलती के रूप में देखा जाता है। ऐसे माहौल में ‘बहुत ज़्यादा जानना’ का मतलब है साफ़ तौर पर निपुण दिखाई देना – यह समझना कि तकनीक कैसे काम करती है, कब कौन ऑनलाइन है यह जानना, और अकाउंट की पहुँच सीमित करके या किसी को ब्लॉक करके ख़ुद को नज़र से कैसे हटाया जाए, यह आना।
जिन साधारण कामों को हम डिजिटल समझ या कौशल मानते हैं, वही काम सामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप न होने के कारण ग़लत कदम या मर्यादा तोड़ने के रूप में देखे जाते हैं। वे किसी महिला की अपनी इच्छा और निर्णय लेने की क्षमता का संकेत देते हैं, और ऐसी नज़दीकियों की संभावना भी दिखाते हैं जो समाज की तय सीमाओं से बाहर मानी जाती हैं। इस तरह, लगातार साथियों की निगरानी के बावजूद ऑनलाइन मौजूद रहना ऐसी चीज़ बन जाता है जिसे समझाना पड़ता है, जिस पर नज़र रखी जाती है, और जिसे “ठीक” करने की कोशिश की जाती है। हमें यह समझने की ज़रूरत है कि सामूहिक सोच वाले समाजों में डिजिटल आत्मीयता व्यक्तिगत पसंद से कम और साथियों की निगरानी से ज़्यादा नियंत्रित होती हैं। इसका असर किसी भी तरह की यौन अभिव्यक्ति पर पड़ता है, जिस पर समुदाय के भीतर पहले से ही पहरा लगाया जाता है – और कई बार महिलाएँ खुद भी इस पहरेदारी का हिस्सा बन जाती हैं। डिजिटल आत्मीयता की संभावनाएँ काफ़ी हद तक सीमित हो जाती हैं। ऐसे माहौल में युवा महिलाओं के लिए ‘बहुत ज़्यादा’ ऑनलाइन रहना उनकी यौनिकता के आधार पर उन्हें परखने और अनुशासित करने का एक तरीका बन जाता है। इस समझ के बिना ऑनलाइन सुरक्षा और सशक्तिकरण पर हमारी बातचीत अधूरी रह जाएगी, क्योंकि ऐसी किसी भी चर्चा की शुरुआत सबसे पहले पहुँच और इस्तेमाल के सवाल से होनी चाहिए। समाज के हिसाब से सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि लड़कियों को ऑनलाइन कैसे सुरक्षित रखा जाए, बल्कि यह भी है कि उन्हें किस तरह की नज़दीकियाँ रखने की अनुमति है और किसकी निगरानी में।
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प्रांजलि शर्मा द्वारा अनुवादित
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