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क्या ‘धंधा’ (सेक्स वर्क) भी काम होता है? – भाग १

किसी व्यस्क व्यक्ति द्वारा अपनी इच्छा से पैसों के भुगतान के बदले दी जाने वाली यौन सेवाओं को सेक्स वर्क (यौन कर्म या आम बोलचाल की भाषा में धंधा करना) कहते हैं। सेक्स वर्क की इस परिभाषा का कौन सा भाग ‘काम’ के बारे में हमारी सोच का उल्लंघन करता है? क्या पैसे के बदले दी जाने वाली सेवाएं? या फिर किसी व्यस्क व्यक्ति द्वारा पैसे के बदले दी जाने वाली सेवा? या, वयस्कों द्वारा आपसी सहमति से पैसे के बदले दी जाने वाली सेवा?उपरोक्त में से कोई भी तर्क सही नहीं है। असल में जैसे ही किसी सेवा के साथ ‘सेक्स’ शब्द जुड़ता है,उसी क्षण उस सेवा को काम के रूप में देखने की हमारी यह सोच बदल जाती है। इस लेख में धंधा या सेक्स वर्क में किये जाने वाले ‘काम’ को समझ पाने करने का प्रयास किया गया है।

सेक्स वर्क में भी किसी एक साथी या एक से अधिक यौन साथियों के साथ यौन सम्बन्ध कायम किये जाते हैं लेकिन, इसके साथ पैसे का लेन-देन जुड़ा होता है। पैसे के बदले यौन सेवाएं देना और पैसे के लिए ही यौन सम्बन्ध कायम करना, इन दोनों व्यवस्थाओं पर अक्सर सवाल उठाए जाते हैं क्योंकि ऐसा माना जाता है कि पुरुष की वासनाओं की पूर्ती के लिए महिलाएं ‘आसानी से उपलब्ध’ हो जाती हैं। इस विचारधारा में मुख्यत: यह माना जाता है कि सेक्स वर्क पर बाज़ार व्यवस्था का प्रभुत्व रहता है और प्रभावशाली पुरुषों द्वारा गरीब महिलायों के आर्थिक और सामाजिक शोषण का मुख्य कारण भी इन पुरुषों और महिलायों के परस्पर सामाजिक सत्ता सम्बन्ध ही होते हैं।

नैतिकतावादियों को प्राय: यह आपत्ति होती है कि एक से अधिक साथियों के साथ बनाए जाने वाले यौन सम्बन्ध केवल शारीरिक सुख के लिए होते हैं जिनमे भावनाओं का कोई स्थान नहीं होता, इन संबंधों की शुरुआत महिलाओं द्वारा भी की जा सकती है, इन्हें व्यापार के रूप में प्रयोग किया जा सकता है और फिर भी इनमें आनंद की अनुभूति भी संभव हो सकती है। सेक्स वर्क को अपराध मानने वाले समाज द्वारा अक्सर सेक्स वर्क कर रही महिलाओं को अनैतिक वेश्या करार कर बहिष्कृत कर दिया जाता है।

भारत में दलित आन्दोलन में प्राय: यह विचार रहा है कि सवर्ण या ऊंची जाति के पुरुष, अपनी जाति के प्रभुत्व को साबित करने के लिए नीची जाति की महिलाओं का ‘इस्तेमाल’ कर अपनी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ती करते हैं। इस विश्लेषण को सिद्द करने के लिए भारत के अनेक भागों में प्रचलित ‘देवदासी प्रथा’ और ‘बेदिया जनजाति’ को उदहारण के रूप में प्रयोग किया गया है। देवदासियों के जबरन पुनर्वास और कर्णाटक राज्य में देवदासी विरोधी कानून[1] के कारण बड़ी संख्या में देवदासियों को कर्णाटक में अपने पुश्तैनी घरों को छोड़ काम की तलाश में महाराष्ट्र राज्य में प्रवास करना पड़ा है।

चेरिल ओवेर्स की व्याख्या के अनुसार नारीवाद की रूढ़िवादी विचारधारा में सेक्स वर्क को दासता के रूप में देखा जाता है – क्योंकि दासता की तरह ही इसमें भी अपनी इच्छा का कोई स्थान नहीं होता और ये प्राय: हिंसक भी होते हैं – और यह माना जाता है कि सेक्स वर्क ही महिला को वस्तु के रूप में देखे जाने और इनका शोषण किए जाने का मुख्य कारण है[2]। रूढ़िवादी विचारधारा में यह विचार भी बहुत पुष्ट है कि कोई भी महिला अपनी इच्छा से सेक्स वर्क करना आरम्भ नहीं करती और सेक्स वर्क से जुड़ी सभी महिलाओं को जबरन, धोखे से, बहला-फुसला कर, लालच देकर या क़र्ज़ के बोझ में जकड़कर यह काम करने के लिए मजबूर किया जाता है।

1980 के दशक में एचआईवी एवं एड्स के फैलाव के बाद इस संक्रमण को रोकने की वैश्विक और राष्ट्रीय रणनीति के तहत सरकार नें सेक्स वर्कर को निशाना बनाया। सेक्स वर्क से जुड़े लोगों को एचआईवी के प्रसार का कारण समझा गया और सरकार अपनी पुरुष जनसँख्या को सुरक्षित रखने के लिए कटिबद्ध दिखाई दीं। सेक्स वर्क से जुड़े अन्तःक्षेप केवल समाज की ‘प्रतिष्ठित’ महिला जनसँख्या को एचआईवी से सुरक्षित रखने के लिए किये गए। दुनिया के कुछ भागों में सेक्स वर्कर लेकिन इस रणनीति को पलट दिया और इस अवसर का लाभ उठा पूरी दुनिया का ध्यान सेक्स वर्कर के स्वास्थय, सुरक्षा और अधिकारों की ओर आकर्षित कर पाने में सफलता पाई। हालांकि, जैसा कि जोआन्न सेटे ने कहा कि इस पूरे परिदृश्य को राजनीतिक रूप से प्रभावशाली और प्रबल धार्मिक विश्वासों पर आधारित मान्यताओं, ट्रैफिकिंग (इसे मानव तस्करी भी कहते हैं, हालाँकि सभी इस परिभाषा से सहमत नहीं हैं और इस पर मतविभाजन है) विरोधी आन्दोलन, जो सेक्स वर्कर के अधिकारों का विरोधी था, और शक्तिशाली धनदाताओं ने धूमिल कर दिया। संक्रमण फैलने के आरंभिक वर्षों में संयुक्त राष्ट्र द्वारा सेक्स वर्कर को अधिकार दिए जाने पर कुछ पहल अवश्य दिखाई दी लेकिन बाद में ऐसा लगा मानो इस संगठन ने भी निषेद्यवादी विचारों को स्वीकार कर लिया हो[3]

कट्टरवादी नारीवादियों से समर्थन पाने वाले ट्रैफिकिंग विरोधी कार्यकर्ताओं का मानना है कि सेक्स वर्क अपने आप में ही हिंसा है क्योंकि महिलायों को इस काम में उनकी इच्छा के विरुद्ध, जबरदस्ती या धोखेधड़ी से धकेला जाता है और फिर ट्रैफिकिंग करने वाले उनका यौन शोषण करते हैं। छोटी उम्र की लड़कियों के बारे में उनके यह विचार मान्य हैं लेकिन उनका यह विचार से कि सेक्स वर्क को समाप्त कर दिया जाना चाहिए, उनके ध्यान को ट्रैफिकिंग करने वालों को खोज कर उन्हें दण्डित करने की बजाए सेक्स वर्कर को उनकी इच्छा के बिना मुक्त करा कर पुनर्वासित करने की ओर कर देता है। इस तरह सेक्स वर्कर को मुक्त कराने के पीछे यह विचार है कि सभी सेर वर्कर को ट्रैफिकिंग करने वालों द्वारा इस काम में लगाया जाता है इसलिए उन्हें मुक्त कराने और उनका पुनर्वास करने से पहले इनकी सहमती लेनी आवश्यक नहीं है। हालांकि ट्रैफिकिंग का मुकाबला करने के लिए सेक्स वर्कर ही सबसे उपयुक्त साधन हो सकते हैं लेकिन ट्रैफिकिंग और सेक्स वर्क विरोधी संगठनो द्वारा उन्हें सशक्त करने के लिए कोई कार्यक्रम नहीं चलाए जाते हैं।

सेक्स वर्क पर अधिकाँश कानूनों और नीतियों में यह माना जाता है कि यद्यपि भारत में सेक्स वर्क गैर-कानूनी नहीं है लेकिन ‘अनैतिक देह-व्यापार (रोकथाम) कानून’ के चलते सेक्स वर्क से जुड़ी महिलाओं और उनकी सहायता करने वाले तृतीय पक्षकारों को अपराधी समझा जाता । 1956 में लागू ‘अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम’ को आरम्भ में सप्रेशन ऑफ़इम्मोरल ट्रैफिक एक्ट (SITASITA[4]) कहा गया था, और 1986 में इसका नाम बदल कर ‘अनैतिक मानव व्यापार (रोकथाम) अधिनियम या इम्मोरल ट्रैफिक प्रिवेंशन एक्ट’ या ITPAITPA[5] कर दिया गया। इस कानून (ITPAITPA) के तहत कोठा चलाने[6], सार्वजनिक स्थान पर ग्राहक खोजने[7], वेश्यावृति की कमाई से जीवनयापन करने और किसी वेश्या के साथ रहने या अक्सर उसके साथ होने वाले व्यक्ति को दण्डित किया जाता है [8]

आपराधिक न्यायिक विद्वत्ता से परे, ‘अनैतिक मानव व्यापार (रोकथाम) अधिनियम’ में अनेक ऐसे अपराध शामिल किये गए हैं जिनसे सेक्स वर्कर को कलंकित किया जाना साफ़ झलकता है, जैसे कि किसी व्यक्ति[9] को किसी ऐसे स्थान पर उनकी इच्छा से या इच्छा के बिना रोका जाना जहाँ सेक्स वर्क किया जाता है[10], या फिर किसी व्यक्ति को उनकी इच्छा से या इच्छा के बिना सेक्स वर्क[11] के लिए ऐसी जगह ले जाना। इसके अलावा कानून में दबिश कर मुक्त कराने से सम्बंधित अनुबंध में ‘व्यस्क’ और ‘बच्चों’[12] में कोई अंतर नहीं किया गया है। आमतौर पर, किसी व्यस्क व्यक्ति को अगुवा करने या जबरन रोककर रखने के मामले में, उस व्यक्ति की सहमति का विशेष महत्व होता है यह निर्धारित करने के लिए कि इस कार्य को आपराधिक समझा जाए अथवा नहीं। इस कानून में मजिस्ट्रेट को यह अधिकार दिया गया है कि वह अपने अधिकार क्षेत्र में रहने वाली किसी वेश्या को वहाँ से हटाये जाने का आदेश पारित कर सकता है[13],[14]

सेक्स वर्क को समाप्त कर दिए जाने का समर्थन करने वालों का, जिन्हें सेक्स वर्क के बारे में उपरोक्त सभी या कुछ विचार स्वीकार्य हैं, यह तर्क है कि सेक्स वर्क सभी महिलायों के विरुद्ध हिंसा है और इसे पूरी तरह समाप्त कर दिया जाना चाहिए। इन सभी में सबसे प्रबल तर्क वह है जिसमे गरीबी, जातिवाद, संपूर्ण नारीत्व, पवित्रता, परिस्थतियों के बल और विवेकहीन ट्रैफिकिंग करने वालों को एक साथ जोड़ कर देखा जाता है और सेक्स वर्क को समाप्त करने व् असहाय निरीह पीड़ित को बेपरवाह सरकार और असंवेदी समाज के चंगुल से छुड़ाने की बात कही जाती है।

सम्पादकीय नोट : इस लेख का अगला भाग इस महीने के दूसरे संस्करण में जारी रहेगा जिसमे सेक्स वर्कर के अधिकारआन्दोलन से प्राप्त सीख शामिल होगी

लेखिकाओं के बारे में: मीना सरस्वती सेषु व् आरती पई

सोमेन्द्र कुमार द्वारा अनुवादित

चित्र श्रेय – संग्राम

[1] कर्णाटकका देवदासी (प्रिवेंशन ऑफ़ डेडीकेशन) एक्ट

[2] ओवेर्स, सी : सेक्स वर्कर्स एंड फेमिनिस्ट्स : पर्सनल रिफ्लेक्शन्स इन द बिज़नस ऑफ़ सेक्स, ईडी. लक्ष्मी मूर्ति एंड मीना सरस्वती सेषु, २०१३, जुबां बुक्स

[3] सेटे जे. विक्टिम्हुड एंड व्ल्नेराबिलिटी: सेक्स वर्क एंड दी रहेटोरिक एंड दी रियलिटी ऑफ़ दी ग्लोबल रिस्पांस टू HIV/AIDS इन दी बिज़नस ऑफ़ सेक्स, ईडी. लक्ष्मी मूर्ति एंड मीना सरस्वती सेषु, जुबां बुक्स, 2013

[4] भारतीय समाज में पवित्रता और सदाचार का वैकल्पिक रूप

[5] ‘प्रस्तावित किया जाता है कि इस कानून का नाम बदलकर ‘अनैतिक मानव व्यापार (रोकथाम) अधिनियम” कर दिया जाए …. 1986 में प्रस्तावित संशोधन – गजट ऑफ़ इंडिया, अगस्त 20, 1986, भाग II, S2, एक्स्ट पृष्ठ 9 (क्रम 38)

[6] सेक्शन ३ ऑफ़ [द] इम्मोरल ट्रैफिक प्रिवेंशन एक्ट, १९५६

[7] सेक्शन ८ ऑफ़ [द] इम्मोरल ट्रैफिक प्रिवेंशन एक्ट, १९५६

[8] सेक्शन ४ ऑफ़ [द] इम्मोरल ट्रैफिक प्रिवेंशन एक्ट, १९५६

[9]सप्रेशन ऑफ़ इम्मोरल ट्रैफिक इन वीमेन एंड गर्ल्स (अमेंडमेंट) एक्ट (1986 का 44) द्वारा ‘व्यक्ति’ शब्द को बदल कर इसके स्थान पर ‘महिला या लड़की’ प्रयोग किया गया और साथ ही अन्य आवश्यक बदलाव भी किये गए

[10] सेक्शन ६ ऑफ़ [द] इम्मोरल ट्रैफिक प्रिवेंशन एक्ट, १९५६

[11] सेक्शन ५ ऑफ़ [द] इम्मोरल ट्रैफिक प्रिवेंशन एक्ट, १९५६

[12] सेक्शन १६ ऑफ़ [द] इम्मोरल ट्रैफिक प्रिवेंशन एक्ट, १९५६

[13] सेक्शन २० ऑफ़ [द] इम्मोरल ट्रैफिक प्रिवेंशन एक्ट, १९५६

[14] अ वाक थ्रू द लाब्य्रिन्थ ऑफ़ सेक्स वर्क लॉ, दी बिज़नस ऑफ़ सेक्स, ईडी. लक्ष्मी मूर्थी एंड मीना सरस्वती सेषु 

To read this article in English, please click here.

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Article written by:

Meena Saraswathi Seshu is the general secretary of Sampada Gramin Mahila Sanstha (SANGRAM), an HIV/AIDS prevention, treatment and support organisation working with marginalised people in Maharashtra. Aarthi Pai is a lawyer and currently working as the Director of the Centre for Advocacy on Stigma and Marginalisation (CASAM) in SANGRAM.

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