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टेलीफोन के दूसरी ओर उम्मीद की किरण : आत्महत्या रोकने के लिए आसरा की हेल्पलाइन सेवा के अनुभव

जॉनसन थॉमस

[संपादक की ओर से: स्वयं की देखभाल करने का सीधा मतलब है अपनी मर्ज़ी से कोई भी ऐसा फैसला करना या कदम उठाना जो हमारी शारीरिक, भावनात्मक और मानसिक सेहत की देखभाल के लिए हो पर स्वयं के लिए मदद माँगना एक बहुत ही कठिन काम हो सकता है क्योंकि ज़्यादातर इसे कमज़ोरी की निशानी माना जाता है, उन लोगों के लिए मदद माँगना कठिन हो जाता है जो पोषणकर्ता, देखभाल प्रदाता या सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका निभाते हैं

मदद माँगना तब और भी अधिक कठिन हो जाता है जब व्यक्ति डिप्रेशन से गुज़र रहे हों डिप्रेशन या मानसिक अवसाद की स्थिति में मदद के लिए पुकार करना डरावना हो सकता है, और जब तक आप ये कदम नहीं उठाते आपको कोई अंदाज़ा नहीं होता कि सामने वाले की प्रतिक्रिया क्या होगी इस स्थिति में हेल्पलाइन एक बड़ी भूमिका निभाते हैं इस लेख में डिप्रेशन के शिकार और आत्महत्या करने की  इच्छा रखने वाले लोगों की मदद करने वाली हेल्पलाइन आसरा के बारे में चर्चा की गई है

ऐसी ही एक और हेल्पलाइन है आईकॉल (iCALL) जो साइकोसोशल डिस्ट्रेस (मानसिक व् सामाजिक कष्ट/ दुःख) झेल रहे लोगों की मदद करती है यह हेल्पलाइन हाशिए पर रहने वाले लोगों को विशेष प्रमुखता देती है, जैसे हिंसा सहती महिलाएँ, हिंसा के शिकार बच्चे, एलजीबीटी समुदाए के लोग, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े लोग, एवं मानसिक बीमारी के साथ रह रहे लोग यदि आप या आपके कोई जानने वाले हेल्पलाइन की मदद चाहते हों तो आप हमारी वेबसाइट के इस पेज पर जा सकते हैं याद रखें, स्वयं की देखभाल करना या मदद माँगना किसी कमजोरी या स्वार्थी होने की निशानी नहीं है]

मैं आसरा नामक एक एनजीओ का संचालन करता हूँ जो डिप्रेशन के शिकार और आत्महत्या करने की  इच्छा रखने वाले लोगों को इस संकट से उबारने के लिए सप्ताह के सातों दिन और 24 घंटे काम करती है। हर दिन हमें अनेक लोगों के टेलीफोन कॉल आते हैं जो अपनी उन समस्याओं और तकलीफों से निजात पाने के लिए हमसे निष्पक्ष सलाह की उम्मीद रखते हैं, जिनका हल वह खुद नहीं निकाल पा रहे हों। आसरा एनजीओ पिछले 16 वर्षों से लगातार सफलतापूर्वक काम कर रहा है और इन 16 वर्षों में आसरा ने खुद भी अनेक संकटों का सामना किया है। इनमे अपने काम के लिए उपयुक्त वालंटियर ढूंढ पाना, काम कर पाने की जगह तलाश करने से लेकर इस काम के लिए आर्थिक रूप से सहयोग करने वाले धनदातायों की तलाश करना शामिल है। बारबार सामने आने वाली इन तकलीफों के बाद भी हम अपनी पूरी क्षमता और दक्षता से इस कार्य को सफलतापूर्वक करते रहे हैं। इसके श्रेय पूरी तरह से हमारे उन कुछ वालंटियर्स को जाता है जो अपनी व्यक्तिगत व्यस्तताओं में से समय निकाल कर हमारे कार्य के विभिन्न पहलुओं जैसे केंद्र की संचालन व्यवस्था करना, जानकारी का प्रसार करना, प्रचार कार्य करना, धन की व्यवस्था करना और केंद्र की टेलीफोन हेल्पलाइन का संचालन करने आदि में सहयोग देते रहे हैं।

आसरा केंद्र में हमारी कोशिश रहती है कि आत्महत्या और किसी व्यक्ति के मन में अपना जीवन समाप्त कर देने की इच्छा जागने के कारणों के बारे में सामान्य जानकारी विकसित की जाए। युवाओं और वयस्कों की सहायता के लिए उन्हें ऐसा प्रशिक्षण दिया जाए जिससे कि वे जीवन में डिप्रेशन और मानसिक दबाब का सामना बेहतर ढंग से कर पाएं। हमारा यह भी प्रयास रहता है कि मुसीबत का सामना कर रहे व्यक्ति को निराशा और उम्मीद के बीच का रास्ता दिखा सकें जिससे कि उनके जीवन कि परिस्थितियाँ सुधर पाएं। अपनी टेलीफोन हेल्पलाइन के माध्यम से हम कॉल करने वाले व्यक्ति के हालात पर बिना कोई भी पक्ष लिए, बिना उन्हें सही या गलत ठहराते हुए उनके लाभ के लिए सलाह देने की कोशिश करते हैं ताकि कॉल करने वाला व्यक्ति अपना आत्माविश्वास पुनः प्राप्त कर सकें और ठीक होने की दिशा में अगला कदम उठा सके।

यह टेलीफोन हेल्पलाइन आसरा के कार्य को परिभाषित करती है। यह हमारी मुख्य गतिविधि है और इसके माध्यम से पीढित, हताश, डिप्रेशन के शिकार और आत्महत्या करने के लिए तैयार लोग हमसे संपर्क कर पाते हैं। देश में आत्महत्या करने वाले लोगों की संख्या में ही बढ़ोत्तरी इस बात की परिचायक है कि इस तरह की सेवाओं की बहुत आवश्यकता है जो कठिन परिस्थितियों का सामना कर रहे लोगों के मन से उनकेकिसी भी लायक होनेके भाव को समाप्त करने में सहायता करती हैं। हमसे बात करने वाले 90% से अधिक लोग टेलीफोन हेल्पलाइन के माध्यम से हमारे संपर्क में आए हैं। देश की सार्वजनिक स्वास्थय सेवाओं के तहत मानसिक स्वास्थ्य पर कभी भी बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया गया और इसका परिणाम यह हुआ है कि मानसिक परेशानियों से जूझ रहे लोगों पर ध्यान देने और उनकी सहायता करने की जिम्मेदारी गैर सरकारी संस्थाओं पर पड़ी है जिनके दिल तो सहानुभूति से भरे हैं लेकिन जिनके पास संसाधनों की अत्यधिक कमी है।

हमारे आधुनिक जीवन की तेज़ गति और शहरों की जीवनधारा में परस्पर सहयोग कर पाने की प्रणालियों में कमी होने के कारण मानसिक रोग से पीड़ित लोगों विशेषकर डिप्रेशन के शिकार होने वाले लोगों की संख्या लगातार बढती जा रही है। इसके साथ अलगअलग यौनिक पहचान के बारे में जानकारी बढ़ने के उपरान्त, बड़ी संख्या में एलजीबीटीक्यूआई (LGBTQI) वर्ग के लोग भी हमारी इन सेवाओं से जुड़ रहे हैं। वास्तव में उपलब्ध साक्ष्यों से पता चलता है LGBTQI एलजीबीटीक्यूआई वर्ग के लोगों को आत्महत्या करने की इच्छा होने, स्वयं को नुक्सान पहुंचाने, नशीली दवायों या शराब के सेवन करने की और डिप्रेशन या चिंता करते रहने जैसे मानसिक रोग होने की आशंका कहीं अधिक होती है। LGBTQI एलजीबीटीक्यूआई लोगों में इस तरह की भावनाएं होने के अनेक जटिल कारण हो सकते हैं जिनका अभी तक पूरी तरह पता नहीं चल पाया है लेकिन इसका सम्बन्ध कहीं कहीं इन लोगों के भेदभाव के अनुभवों, समलैंगिकता के प्रति रोष या इसका विरोध और समाज में इनके प्रति समझ और सहयोग की कमी है। गे, लेस्बियन, बाईसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर, इंटरसेक्सड, क्वीअर, ट्रांससेक्सुअल अथवा ट्रांसहोने कोई मानसिक रोग नहीं है। 1992 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के इस वक्तव्य के बाद किसमलैंगिकता को मानसिक रोग की स्थिति नहीं समझा जाना चाहिएअब बड़ी संख्या में लोग अपने अधिकारों के दमन के विरोध में आवाज़ उठाने लगे हैं।

लेकिन अपने स्वयं की या अपने आसपास अधिकतर लोगों की यौनिक पहचान से अलग तरह की पहचान को स्वीकार कर पाना या फिर लोगों के मन में इस पहचान के प्रति दुर्भावना, भेदभाव आदि का सामना का पाना केवल कठिन बल्कि बहुत परेशानी और असमंजस पैदा करने वाला होता है।

यौनिकता केवल हमें एक पुरुष, नारी या एलजीबीटीक्यूआई (LGBTQI) व्यक्ति के रूप में परिभाषित करती है बलिक इसका सीधा असर हमारे स्वाभिमान और आत्मसम्मान की भावना पर भी पड़ता है। हम दूसरों की नज़र में कितना आकर्षक दिखते हैं या हम दूसरों को और खुद को कितना संतुष्ट कर पाते हैं, इसका सीधा असर हमारे व्यक्तित्व पर पड़ता है। हमारी यौनिकता एक अत्यंत व्यक्तिगत स्तर पर दुसरे लोगों से जुड़ पाने का माध्यम बनती है। यौनिकता एक अत्यंत ही व्यक्तिगत विषय है; आपसी सम्बन्ध चुनौतीपूर्ण और जटिल हो सकते हैं, और ये बात विषमलैंगिक संबंधों पर भी लागु होती है।

LGBTQI लोगों के लिए यह स्थिति और भी कठिनाई भरी हो सकती है। यह सही है कि दुसरे लोगों की तुलना में एलजीबीटीक्यूआई LGBTQI लोगों से हमें कम संख्या में कॉल आती हैं लेकिन यह संख्या भी हमारे लिए अर्थपूर्ण है।मैं दक्षिण प्रान्तों में से एक में रहने वाला समलैंगिक व्यक्ति हूँ जिसने अपनी सही पहचान के बारे में लोगों को नहीं बताया है। मेरे सभी मित्र और साथी शादीशुदा हैं और अब मेरे मातापिता मुझ पर शादी कर लेने के दबाब डाल रहे हैं। मुझे कुछ समझ नहीं रहा कि मुझे क्या करना चाहिए। क्या मैं केवल इसलिए एक विषमलैंगिक सम्बन्ध को स्वीकार कर लूं क्योंकि मैं पारिवारिक जीवन व्यतीत करने की इच्छा रखता हूँ और इस एकाकी जीवन से दूर हटना चाहता हूँ?’ यह एक ऐसा प्रश्न है जो हमारे सामने बारबार आता है और इसका उत्तर ढूँढने की हमसे प्रार्थना की जाती रही है। लेस्बियन महिलायों के लिए भी समस्या आमतौर पर इसी तरह की होती है। ट्रांसजेंडर लोगों की समस्या इससे कुछ अलग होती है, उन्हें दुनिया के सामने अपने वज़ूद को साबित करना पड़ता है क्योंकि दुनिया उन्हें किसी अन्य ग्रह का वासी समझती है। भारत में भारतीय दंड विधान की धारा 377 के कारण स्थिति और भी जटिल हो जाती है क्यों कि इस धारा में अन्य यौन व्यवहारों के साथसाथ समलैंगिकता को भी अपराध माना जाता है। दशकों तक भेदभाव का सामना करने के बाद, भारत के एक उच्च न्यायालय नें वर्ष 2009 में इस कानून की गंभीरता को कम कर दिया था। लेकिन समलैंगिक समुदाय के लिए यह प्रसन्नता अधिक समय तक नहीं रह सकी। लगभग 1 वर्ष पूर्व उच्चतम न्यायालय ने निचले न्यायालय के इस निर्णय को पलट दिया। अब एक बार फिर से एलजीबीटीक्यूआई (LGBTQI) समुदाय को डर का सामना करना पड़ रहा है।

लेकिन अभी भी उम्मीद बाकी है। अभी पिछले ही महीने (16 फरवरी 2015) को विधि आयोग के अध्यक्ष, न्यायमूर्ती .पी. शाह ने ऑस्ट्रेलिया के उच्च न्यायलय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति माइकल किर्बी द्वारा लिखित पुस्तकयौन प्रवित्तियां और जेंडर पहचाननामक पुस्तक के विमोचन के अवसर पर मत व्यक्त किया किधारा 377 को लागू किये जाने का तरीका भेदभावपूर्ण है, इस कानून में निहित विचारधारा न्यायोचित नहीं है और यह एक विशेष समुदाय की व्यक्तिगत स्वायतता का हनन करता है और उनकी गोपनीयता व् उनके प्रति मानवीय आदर की भावना का उल्लंघन करता है। इसका परिणाम यह होता है कि समलैंगिक लोगों  के मानसिक सम्मान की भावना को ठेस पहुंचती है और एलजीबीटी समुदाय के विरुद्ध हिंसा जागृत होती है और पुलिस की बर्बरता और भेदभाव बढ़ जाता है। इस अवसर पर वरिष्ठ अधिवक्ता फाली एस नरीमन भी मौजूद थे और उन्होंने दिसम्बर 2013 में उच्चतम न्यायलय द्वारा समलैंगिक पुरुषों के बीच संबंधों को आपराधिक घोषित किये जाने के निर्णय की यह कहते हुए भर्त्सना की, कियौनिक अल्पसंख्यक लोग न्यायिक सेवायों की ओर से समर्थन की आशा रखे हुए थे लेकिन ऐसा कुछ भी होता हुआ नहीं दिख रहा है

आपकी यौनिक पहचान कुछ भी हो लेकिन जीवन सरल नहीं होता। जीवन और भी अधिक कठिन तब हो जाता है जब आप सामान्य व्यवहार से अलग व्यवहार करते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर लेस्बियन, गे, बाईसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर लोगों के मानसिक स्वास्थ्य और खुशहाली के बारे में कोई भी जानकारी इक्कठी नहीं की जाती और इस समुदाय को आमतौर पर स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त करने में बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

महिलाओं को भी उनके लिए आवश्यक देखभाल नहीं मिल पाती है। आजकल दैनिक समाचारपत्रों और टीवी समाचारों में बलात्कार की घटनाओं के बारे में सुनना और पढना आम बात हो गयी है। हम जानते हैं कि महिलाएं ज्यादा असुरक्षित और पीड़ित होती हैं। फिर भी एक के बाद एक सरकार नें यौन अपराधों के लिए कानूनों में सुधार करने के या महिलाओं को इनके बारे में शिक्षित करने और जानकार बनाने के कोई प्रयास नहीं किये हैं। हाल ही में हमें भारत के एक पूर्वोत्तर राज्य से एक लड़की का फ़ोन आया जिसका कहना था कि उसे बहुत छोटी आयु से ही यौन हिंसा का सामना करना पड़ा था। मैं 14 वर्ष कि आयु में गर्भवती हो गयी थी। मेरे परिवार के लोगों नें ही मामले को रफादफा करवा दिया और मेरे गर्भपात करवाया गया। मेरी इस स्थिति के लिए मेरा 21 वर्षीय चचेरा भाई जिम्मेदार था लेकिन उसे किसी नें कुछ भी नहीं कहा। मेरे परिवार नें मुझे ही पूरा दोष दिया। उसके बाद से ही मेरे जीवन कठिन हो गया। मैं बारबार यौन संबंधों के कुचक्र में फँस जाती हूँ, ऐसे सम्बन्ध जिसमे मुझे कोई भावनात्मक सुख नहीं मिलता और मुझे बहुत अधिक दर्द का सामना करना पड़ता है। मैं चाह कर भी इस कुचक्र को तोड़ नहीं पा रही हूँ आज वह लड़की अपने बीते जीवन को स्वीकार कर पाने में असमर्थ है अपने जीवन को पुन; व्यवस्थित कर पाने का हौसला नहीं रखती। वह आत्महत्या करने का मन बना चुकी थी और उसे अपने जीने में कोई अर्थ नहीं दिखाई पड़ रहा था। जिनको बलात्कार का सामना करना पड़ा हो, उन्हें विशेष देखभाल और सहयोग की आवशयकता होती है। लम्बी काउंसलिंग थेरेपी के बाद भी उनके लिए वास्तविक जीवन में सामान्य तरह से जीवनयापन कर पाना आसान नहीं होता विशेष रूप से जब उन्हें ही उनकी स्थिति के लिए दोषी ठहराया जाता है और किसी से कोई सहयोग नहीं मिल पाता।

हमारी परिवार व्यवस्था भी इतनी पितृसत्तात्मक या पुरुषों के पक्ष में है कि किसी महिला के लिए खुल कर किसी पुरुष के विरुद्ध आवाज़ उठा पाना असंभव सा हो जाता है। लेस्ली उडविन की फिल्म India’s Daughter  में उस क्रूर पितृसत्तात्मक मानसिकता का वर्णन है जो आमतौर पर पुरुषों के सामान्य व्यवहार को प्रभावित करती है। इस डाक्यूमेंट्री फिल्म में दिखाई गयी समस्या को दूर करने के लिए व्यवस्थात्मक बदलाव लाकर इसे ठीक करने की बजाए सरकार नें इसे भारतीय संस्कृति का भाग बताया और डाक्यूमेंट्री पर ही रोक लगा दी। रोक लगने के बाद भी भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में लाखों लोगों नें इसे देखा। सत्ता के दरुपयोग से संभव है कि मनचाहे परिणाम हासिल किये जा सकें लेकिन इन्टरनेट के इस युग में सत्य को अधिक समय तक दबा पाना आसान नहीं होगा। अंततः सत्य तो उभर कर सामने आएगा ही।

आसरा में हमारी कोशिश रहती है कि आत्महत्या और आत्महत्या करने की इच्छा जागने के कारणों के बारे में सामान्य जानकारी विकसित की जाए और युवाओं और वयस्कों की सहायता के लिए उन्हें ऐसा प्रशिक्षण दिया जाए जिससे कि वे जीवन में डिप्रेशन और मानसिक दबाब का सामना बेहतर ढंग से कर पाएं। हमारा यह भी प्रयास रहता है कि कठिन समय का सामना कर रहे व्यक्ति को निराशा और उम्मीद के बीच का रास्ता दिखा सकें जिससे कि उनके जीवन की परिस्थितियाँ सुधर पाएं। अपनी टेलीफोन हेल्पलाइन के माध्यम से हम कॉल करने वाले व्यक्ति के हालात पर बिना कोई भी पक्ष लिए, बिना उन्हें सही या गलत ठहराते हुए उनको भावनात्मक समर्थन  देने की कोशिश करते हैं ताकि कॉल करने वाले व्यक्ति अपना आत्माविश्वास पुन; प्राप्त कर सकें और ठीक होने कि दिशा में अगला कदम उठा सके।

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चित्र सौजन्य : जॉनसन थॉमस, आसरा

सोमेन्द्र कुमार द्वारा अनुवादित

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Johnson Thomas is a social worker, film-critic, journalist, writer, biographer, Suicide, Depression and Substance abuse Counsellor, Hypnotherapst, Soft-Skills trainer based in Mumbai. He is the founder/director of AASRA , an NGO working in the field of suicide & depression for the past 14 years, and the co-ordinator of the NGO forum of Navi Mumbai consisting of 70 NGOs working in diverse fields of social welfare. He has worked as a freelance journalist and film critic for the past 17 years, writing for various Indian publications.

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