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इंटरव्यू – रत्नाबोली रे 

रत्नाबोली रे – रत्नाबोली मानसिक स्वास्थ्य विषय पर काम करने वाली ऐक्टिविस्ट, एक प्रशिक्षित मनोविज्ञानी, और अंजलि मानसिक स्वास्थ्य अधिकार संस्था की संस्थापिका हैं। अंजलि मानसिक स्वास्थ्य अधिकार संस्था सरकार के साथ मिलकर मानसिक रोग और मनो:सामाजिक विकलांगताओं के साथ रह रहे लोगों के पुनर्वास और पुनर्स्थापन के लिए कार्य करती है। रत्नाबोली कहती हैं कि उन्हें यह समझ में आ गया था कि “सिविल सोसाइटी में लोगों के मन में मनो:सामाजिक विकलांगता के साथ रह रहे लोगों के प्रति व्याप्त दुविधा को चुनौती दिए बिना, और समाज में इन लोगों को उनके अधिकार दिलाए बिना किसी भी तरह के व्यवस्थात्मक सुधारों को वास्तविक रूप में लागू कर पाना संभव नहीं हो पाएगा”। शिखा आलेया ने रत्नाबोली से मानसिक रोग और मनो:सामाजिक विकलांगता के संदर्भ में भलाई और यौनिकता के विषय पर बातचीत की। उनकी इस बातचीत के दौरान यौनिक रुझानो को सकारात्म्क रूप से व्यक्त कर पाने के अनेक उदाहरणों का पता चला और यह भी मालूम हुआ कि मानसिक रोग के साथ रह रहे लोगों के प्रति हमारे पाखंडपूर्ण व्यवहार, दोहरे मानदंडों और भेदभाव का उनपर क्या असर होता है। 

शिखा आलेया – विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा मानसिक स्वास्थ्य को परिभाषित करते हुए इस परिभाषा में भले-चंगे होने या वेलबीइंग के सिद्धान्त को महत्वपूर्ण माना गया है। आप हमें बताएँ कि आपके अनुसार मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में ‘भले-चंगे‘ होने की स्थिति किसे कहते हैं? मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति पर चर्चा करते हुए इसमें यौनिकता की क्या भूमिका रहती है? 

रत्नाबोली रे – सबसे पहली बात तो यह है कि भले-चंगे होने की कोई एक निश्चित परिभाषा नहीं है; यह इस स्थिति को परिभाषित कर रहे व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह इसे किस तरह से परिभाषित करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति के मन में भले-चंगे होने को लेकर अपने अलग विचार होते हैं जो कुछ नया जानने, सीखने या पहले सीखी हुई बातों को नकार देने की लगातार चलती प्रक्रिया के कारण और समय के अनुसार बदल भी सकते हैं। इसलिए, भले-चंगे होने की परिभाषा आप स्वयं ही तय करते हैं। कोई दूसरा व्यक्ति आपको यह नहीं बता सकता है कि आप खुद को किस परिस्थिति में सबसे अधिक बेहतर और भला महसूस करते हैं। मानसिक स्वास्थ्य और भले-चंगे होने या बने रहने में यौनिकता की बड़ी और प्रमुख भूमिका रहती है। यौनिकता और अपने यौनिक रुझानो को व्यक्त कर पाना किसी भी व्यक्ति की अपनी इच्छा के अनुसार ही होना चाहिए। मैं अपनी यौनिकता को व्यक्त करना चाहूँ या न करना चाहूँ, अथवा उसके अनुभव पाना चाहूँ या न चाहूँ, यह पूरी तरह से मेरे खुद का फैसला होना चाहिए। मेरा यौनिक व्यवहार कैसा हो, यह इस पर निर्भर हो कि मैं खुद को किस तरह से देखती हूँ न कि कोई दूसरा मुझसे किस तरह के व्यवहार की उम्मीद रखता है। समाज को या किसी दूसरे व्यक्ति को मेरे यौनिक व्यवहार के बारे में फैसले नहीं लेने चाहिए। मुझसे कुछ ऐसा करने के लिए कहा जाए जो मुझे स्वीकार्य न हो, तो यह तो मेरे अधिकारों का सीधा-सीधा हनन होगा, और निश्चित तौर पर इससे मेरी भलाई भी प्रभावित होगी।   

आजकल यह माना जाने लगा है कि जीवन से संतुष्टि का भाव ही किसी व्यक्ति की भलाई या कुशलता की स्थिति का प्रमुख संकेतक होता है। जीवन में संतुष्टि का भाव व्यक्ति की प्रसन्नता के स्तर को बढ़ा देता है और यह मन की भावनाओं और विचारों के आधार पर सकारात्म्क जीवन जीने का एक तरीका है। कुशलता या व्यक्ति की भलाई के इस सिद्धान्त के 6 पहलू हैं जो किसी व्यक्ति में सकारात्मकता के स्तर का बोध कराते हैं: 

  • आत्म-स्वीकृति – एक व्यक्ति के रूप में लगातार वृद्धि एवं विकास करने का भाव 
  • व्यक्तिगत वृद्धि – अपने जीवन को सार्थक व अर्थपूर्ण समझने का भाव 
  • जीवन में उद्देश्य – दूसरे लोगों के साथ घनिष्ठ संबंध बना पाने की क्षमता  
  • दूसरों के साथ सम्बन्धों में सकारात्मकता – अपने खुद के जीवन और दुनिया में औरों के साथ तालमेल बैठा पाने की क्षमता
  • अपने माहौल, परिस्थितियों को स्वीकार कर पाना 
  • स्वायत्तता या खुद निर्णय ले पाना   

मुझे ऐसा लगता है कि परिस्थितियों और भावों का यह वर्गीकरण पूरी तरह से सही नहीं है। एक तो यह विस्तृत नहीं है, साथ ही इसमें लोगों के जीवन के उन व्यक्तिगत, चेतना से जुड़े भाव भी शामिल नहीं हैं, जैसे कि क्या उनका जीवन उद्देश्यपूर्ण है, क्या अपने जीवन के इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए वे अपने निर्णय खुद लेने के लिए स्वतंत्र हैं, क्या उन्हें अपनी इच्छाओं को पूरा कर पाने और क्षमताओं को सिद्ध करने के पर्याप्त अवसर मिल पाते हैं, दूसरों के साथ उनके संबंध किस तरह के हैं और क्या वे समझते हैं कि उनके जीवन में परिस्थितियाँ उनके वश में हैं।  

अगर हम कमियाँ ढूँढने की बजाय यौनिकता में निहित सकारात्मक पहलुओं पर गौर करें तो पाएंगे कि लोगों की यौनिकता कई तरह से विशिष्ट है। मनो:सामाजिक विकलांगताओं के साथ रह रही महिलाएं भी अपनी भावनात्मक शक्तियों के बल पर अपनी समस्याओं को सुलझा कर प्रसन्न रहने और अर्थपूर्ण जीवन जी पाने में सक्षम होती हैं। इस तरह अर्थपूर्ण जीवन जीने में उनके द्वारा अपनी यौनिक पहचान को विकसित कर पाने और अपनी यौनिकता को व्यक्त कर पाने की क्षमता शामिल है। इसलिए, यौनिकता का संबंध इस बात से है कि लोग कैसे अपनी विशिष्ट यौनिकता या यौनिक रुझानो से संतुष्ट होते हैं या हो सकते हैं और इसका सीधा प्रभाव उनके कुशल होने की समग्र स्थिति पर होता है। 

शिखा – यदि इस दृष्टिकोण के देखा जाए, तो वर्जनाओं, कलंक और अधिकार विषयों पर लोगों के साथ विचार-विमर्श करने, उनके साथ काम करने के आपके अनुभव किस तरह के हैं। आपके विचार से इन विषयों पर चर्चा करना शुरू करने पर, जब यौनिकता का विषय उठता है तो लोगों के किस तरह के दृष्टिकोण या नज़रिए आमतौर पर आपको देखने को मिलते हैं?

रत्नाबोली – मैंने लोगों में उनके नज़रिए के अनेक सूक्ष्म किन्तु पेचीदे पहलू भी देखे हैं। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि आपकी बातचीत किस व्यक्ति के साथ हो रही है। अगर आप लोगों की देखभाल करने वालों या उनके परिवार के सदस्यों से बात करें, तो आमतौर पर यही सुनने को मिलता है, “पहले उनको कुछ दिनों के लिए अस्पताल में रहकर ठीक होने दीजिए, फिर इसके बारे में सोचेंगे”……..(कुछ देर की चुप्पी के बाद)….. “ओह आपका मतलब है शादी? अरे, यह सब बेमतलब की बातें है। उनका ऐसा व्यवहार तो पहले भी था, इसलिए तो हमने उन्हें अस्पताल में भर्ती किया था…..बस एक बार शादी हो जाने दीजिए, फिर यह सब ठीक हो जाएगा”। 

अगर कोई महिला अपनी खुद की इच्छा और स्वतन्त्रता से अपनी यौनिकता को व्यक्त करें, तो इसे भी उनके मानसिक रोग का ही एक लक्षण समझ लिया जाएगा। अंजलि संस्था के सहभागियों के साथ, यौनिकता के बारे में होने वाली हमारी ज़्यादातर चर्चाएँ इसी बात से शुरू  होती हैं। हमारा प्रयास रहता है कि अपनी यौनिकता के मामले में ये लोग स्वतंत्र हो सके, अपने फैसले खुद ले सकें। लेकिन, हम जहाँ उन्हें स्वतंत्र होने और खुद निर्णय लेने के लिए प्रेरित करते रहते हैं, उनके मन में हमेशा यह डर बना रहता है कि कहीं फिर से उन्हें बंद न कर दिया जाए और इसलिए वे एक ‘एक अच्छी पत्नी‘, ‘अच्छी बेटी’ या ‘अच्छी बहू’ बनी रहकर अपने पति, माता-पिता या ससुराल वालों की जरूरतों को पूरा करती रहने को बाध्य बनी रहती हैं, भले ही इसमें उनकी खुद की कोई इच्छा या सहमति न हो। जब मैं यह कहती हूँ कि हम इन महिला सहभागियों को यौनिकता के मामले में स्वतंत्र होने के लिए तैयार करते हैं, तो मेरे यह तात्पर्य बिलकुल नहीं है कि  हमारे पास उनके हर प्रश्न, उनकी हर समस्या के लिए पहले से तैयार हल होते हैं। मुझे याद है कि अंजलि संस्था की एक सहभागी महिला दो वर्ष के अंतराल के बाद अपने पति के पास वापिस गयी थीं और पति के साथ तटीय शहर दीघा अपने दूसरे हनीमून के लिए गयी थीं। वापिस आने पर वह बहुत खुश थीं और जल्दी ही गर्भवती हो गयीं। इसके बार उन्हें दी जा रही दवाइयाँ बंद करनी पड़ी थीं और हमने उनके प्रति और ज़्यादा सहायता और सहयोग शुरू कर दिया था। 

इसके अलावा कई तरह के अलग मुद्दे भी उठ खड़े होते हैं। अगर वे कहती हैं कि उन्हें सेक्स करना अच्छा नहीं लगता, या उन्हें जिस तरह से कोई छूता है वह उन्हें पसंद नहीं आता, या उन्हें अपने साथी(यों) पर से शराब की बू आती है – तो ऐसे में कोई किस तरह से जवाब दे? ऐसी बातों का कोई सीधा सटीक जवाब नहीं होता! ऐसे में हमें चुप ही रह जाना पड़ता है; हम बस उन महिला के साथ रह कर उनकी बात सुनते हैं। ऐसी बातों के कोई बने-बनाए समाधान नहीं होते।  

अस्पताल के अधिकारियों के साथ इस विषय पर बात करना एक बिलकुल ही अलग अनुभव होता है। अस्पताल वालों को लगता है कि हम बदलाव लाने के इच्छुक ऐसे लोग हैं जो उनके अस्पताल के मरीजों को ‘बिगाड़ने’ पर तुले हैं। वे लोग महिला का विवाह कर दिए जाने पर ही ज़ोर देते हैं, उन्हें लगता है कि शादी के अलावा किसी भी तरह का यौनिक व्यवहार मानसिक रोग का ही ‘लक्षण’ होता है और ऐसे व्यवहार को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। समलैंगिक सम्बन्धों के बारे में तो वे सोच भी नहीं सकते। उनकी यह सोच अधिकतर महिलाओं के लिए ही होती है। पुरुषों के मामले में तो अत्यधिक मर्दानगी जताना तो एक “’सामान्य’“ सी बात समझी जाती है और इसे रोग के बाद ठीक होने का लक्षण समझा जाता है। 

शिखा – तो इसका मतलब तो यह हुआ परिवारों के साथ-साथ अस्पतालों में और उनके बाहर भी इस बारे में जेंडर भेद देखा जा सकता है। अपने एक ऑनलाइन लेख में, आपने कहा है कि अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद, ‘ठीक हो चुके’ पुरुष की तुलना में एक  ‘ठीक हो चुकी’ महिला के प्रति लोगों की प्रतिक्रिया और उनका बर्ताव अलग होता है। हमें बताइये कि आपने इस बारे में किस तरह के भेदभाव देखे हैं। 

रत्नाबोली – ठीक हो जाने के बाद सबसे पहले तो महिला के इर्द-गिर्द नियम-कायदों की एक लक्ष्मण-रेखा खींच दी जाती है कि उन्हें अब क्या करना चाहिए और क्या नहीं। जीवन के हर क्षेत्र में इन महिलाओं को हर तरफ़ से बचा कर रखने की कोशिश की जाती है। मुझे यहाँ यह बताने कि ज़रूरत नहीं कि महिलाओं को इस तरह से सुरक्षा घेरे में ले लेने के ये सभी तरीके पितृसत्ता से जुड़े हैं – महिलाओं पर इतना नियंत्रण रखा जाए कि वे कहीं ‘गलत राह’ पर न निकाल जाएँ। उन्हें कुछ भी व्यक्त करने की छूट नहीं होती, फिर चाहे ये विचारों को व्यक्त करने की बात हो या फिर यौनिक इच्छाओं को। मैं संसाधन विहीन लोगों के बीच काम करती हूँ, जो उपेक्षित और दरकिनार कर दिए गए लोगों का एक वर्ग है। उन्हें जीवन में हर समय, हर कदम पर अपने व्यवहार पर प्रतिबंधों और नियमों का सामना करना पड़ता है। यहाँ यह समझना महत्वपूर्ण है कि इस तरह के व्यवहार से त्रस्त लोग एक तरह के कुचक्र में फंस सकते हैं और फिर इस तरह से प्रतिबंधों से घिरा उनका यह व्यवहार धीरे-धीरे उनकी आदत बन जाता है। अक्सर इन महिलाओं के ठीक होने के बाद समाज में उनके नियत दायित्वों को जारी रखा जाता है और उनके पूर्व के रोग या इलाज को लोगों से छिपा कर रखा जाता है। यह भी देखा गया है कि मानसिक रोग से पूरी तरह ठीक हो चुके पुरुषों और महिलाओं के जीवन की गुणवत्ता में भी बहुत अधिक अंतर होता है। उनके जीवन की गुणवत्ता, इस बात पर निर्भर करती है कि अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद लोग उन्हें किस नज़र से देखते हैं और उनके प्रति कैसा व्यवहार रखते हैं। जीवन की गुणवत्ता से मेरे मतलब इन लोगों के अपने जीवन में खुश होने भर से बिलकुल नहीं है, क्योंकि मैंने देखा है कि लोग अक्सर जीवन में प्रसन्न होने को जीवन की गुणवत्ता समझ लेते हैं। जीवन की गुणवत्ता केवल खुश हो पाने से कहीं अधिक कुछ है और मनो:सामाजिक विकलांगता के साथ रह रहे लोगों के लिए जीवन की गुणवत्ता का विशेष महत्व है क्योंकि इस तरह के लोग सामाजिक रूप से अलग-थलग पड़ जाते हैं। जीवन की गुणवत्ता का एक संकेतक चिन्ह यह होता है कि आप सामाजिक जीवन में दूसरे लोगों – अपने दोस्तों, परिवार, पड़ोसियों या दफ्तर के सहकर्मियों के साथ किस निर्वाह कर पाते हैं, आपके उन लोगों के साथ कैसे संबंध बनते हैं। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद महिलाओं में प्राय: इसका अभाव बना रहता है। इन महिलाओं को दया की नज़र से देखा जाता है मानो इन्हें अपने जीवन में वापिस स्थान देकर इन पर कोई मेहरबानी की जा रही हो। अब ऐसा व्यवहार होने पर यह महिलाएँ किस तरह से दूसरों के साथ मधुर, सौहार्दपूर्ण संबंध बना सकती हैं? 

फिर इसके अलावा, स्वतन्त्रता और स्वायत्तता, इन महिलाओं के जीवन से जुड़ा दूसरा मुख्य पहलू है। नारिवाद आंदोलन में हमें बताया जाता है कि महिलाओं के लिए स्वतंत्र होना और स्वायत्तता पा लेना ही नारिवाद का ध्येय है – लेकिन मानसिक रोग के साथ रह रही महिलाओं के लिए, स्वतंत्र होना या अपने निर्णय खुद ले पाना, धीरे-धीरे पाया जाने वाला लक्ष्य होता है जो धीरे-धीरे ही हासिल हो पाता है। पुरुषों के लिए हालांकि हालात बिलकुल अलग होते हैं। उनके ठीक हो जाने के बाद, उन्हें घर से बाहर आने-जाने की पूरी आज़ादी मिल जाती है, वे ज़िंदगी को अपने तरीके, अपनी मर्ज़ी से जीना शुरू कर देते हैं। इन पुरुषों में हल्का सा लक्षण दिखाई देने पर भी कोई उनके व्यवहार पर सवाल नहीं करता या उनकी ओर शक भरी निगाह से नहीं देखता कि इन्हें शायद फिर इलाज़ की ज़रूरत है। पुरुषों पर किसी भी तरह की ज़िम्मेदारी नहीं डाली जाती और न ही उनसे बहुत अधिक अपेक्षा की जाती है। उन्हें घर से बाहर कहीं जाते हुए किसी को बताना भी नहीं पड़ता। भले ही पुरुष घर से बाहर निकल कर किसी सेक्स वर्कर के पास चले जाएँ, उनसे कोई कुछ नहीं कहता। लेकिन महिलाओं के लिए घर से बाहर निकल किसी पुरुष से बात भी कर लेने पर उन्हें ‘दुश:चरित्र’ करार दिया जाता है और नैतिकताहीन कहा जाता है! पुरुलिया (पुरुलिया बंगाल के पश्चिमी छोर पर स्थित एक अल्प-विकसित, बंजर धरती वाला, संसाधन विहीन ज़िला है जहाँ बहुत अधिक गर्मी पड़ती है) में, जहाँ हमने एक नया कार्यक्रम शुरू किया है – वहाँ एक सहभागी महिला के परिवार के लोगों ने हमसे बात करते हुए बताया कि वे उन्हें वापिस घर पर इसलिए नहीं ला सकते क्योंकि वह आवारा घूमती हैं, आदमियों से मिलती हैं और शराब पीती हैं। हमने जब उनसे यह पूछा कि इस व्यवहार को वे ‘मानसिक रोग’ क्यों मानते हैं, तो उनका जवाब यही था कि शराब पीना उनके समाज में स्वीकार नहीं किया जाता और महिलाओं द्वारा इस नैतिक मूल्य के माने जाने पर ज़ोर देते हुए उन्होंने कहा कि उन महिला को यह बात समझनी चाहिए। महिलाओं की यौनिकता के साथ इज्ज़त और आदर को जोड़कर देखे जाने के इसी विचार को हमें चुनौती देनी होगी और बदलना होगा। पुरुषों में यौनिकता को आदर की निगाह से देखने और महिलाओं में उसे बुरा समझने के ये दोहरे मानदंड नहीं होने चाहिए। 

शिखा – ये दोहरे मानदंड जेंडर के आधार पर लोगों के प्रति बर्ताव में दिखाई पड़ते हैं। क्या लोगों में भले चंगे ना हो पाने के जेंडर से जुड़े कुछ गैर-चिकित्सीय या मनोवैज्ञानिक अथवा सामाजिक कारण भी हैं जिनके कारण किसी व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति प्रभावित होती हो? आपके विचार से समाज के प्रमुख वर्गों और श्रेणियों में मानसिक स्वास्थ्य और कुशलता के बारे में इस चर्चा को कहाँ और कैसे शुरू किया जा सकता है? 

रत्नाबोली – मेरा मानना है कि सबसे पहले हमें अपने घरों में इस बारे में बात करना शुरू करना चाहिए, उससे बहुत ज़्यादा फर्क पड़ सकता है। और यहाँ इससे मेरा मतलब केवल यह नहीं है कि माता-पिता अपने बच्चों से बात करें, बल्कि यह चर्चा बच्चों की ओर से भी शुरू की जा सकती है और की जानी चाहिए, बशर्ते कि यह चर्चा एक सकरात्म्क परिणाम की ओर ले जाने वाली हो। बच्चों द्वारा भी यह चर्चा शुरू किए जाने या इस तरह के सवाल पूछने के लिए उन्हें घरों में अवसर मिलने चाहिए, उन्हें यह विश्वास होना चाहिए कि इस तरह की बात कहने पर उनके विचारों को हल्के से नहीं लिया जाएगा। यहाँ बच्चों में बचपना होने के अपने विचार को हमें बदलना होगा – हमें खुद से यह पूछना होगा और सोचना पड़ेगा कि हम बचपन किसी कहते है और ‘बच्चे‘ की अपनी परिभाषा को हमने किस तरह से अपने मन में विकसित किया है। बच्चों में यौनिकता की जानकारी होने या उन्हें इसका अनुभव होने तथा उनकी मासूमियत में कोई विरोधाभास नहीं होता; इसका यह मतलब बिलकुल नहीं होता कि कोई बच्चा अब मासूम नहीं रहा। 

ऐक्टिविस्ट्स और विकास प्रक्रिया से जुड़े विशेषज्ञ होने के नाते हमें अपने काम करने की जगह पर भी खुद कुशल रहने और दूसरों की कुशलता सुनिश्चित करने के महत्व को लोगों को बताना होगा। हमें चाहिए कि हम अपने सहकर्मियों, उनके परिजनो, उनके समुदायों को बार-बार जीवन में कुशलता के महत्व के बारे में जानकारी दें और देखें कि ये सभी लोग एक दूसरे से इस बारे में बात करते रहें और कुशलता बनाए रखने के इस विचार को आगे बढ़ाएँ। हमें ऐसी सहयोगी परिस्थितियाँ तैयार करने में अपना सहयोग देना होगा जहाँ महिलाएँ खुल कर बात कर पाने में सहजता महसूस करें, आपस में विचारों को बांटें और खुद को सशक्त महसूस करें। सहयोगी परिस्थितियों से मेरा मतलब घर परिवार में खुल कर चर्चा कर पाने के अवसर से है। यह बातचीत किसी चचेरे या मौसेरे भाई-बहन से हो सकती है, किसी बुआ, मौसी या फूफी से हो सकती है – ऐसा कोई भी व्यक्ति जो इस बारे में समान व खुली सोच रखता हो। हमें ज़रूरत है कि हम सोच-समझकर अपने परिवारों, अपने दफ्तरों, अपने संगठनों, अपने समुदायों में बातचीत कर पाने की इस तरह की सहयोगी परिस्थितियाँ विकसित करें। मुझे नहीं पता कि क्यों हम इस तरह खुल कर बातचीत कर पाने के अवसर तैयार करने में कोताही कर लेते हैं। शायद हम इस पर ज़्यादा ध्यान नहीं देते, पता नहीं! 

जेंडर, यौनिकता और मानसिक स्वास्थ्य पर अपने काम में हमें एक मिला-जुला साझा दृष्टिकोण अपनाना होगा। हम चाहे जेंडर से जुड़े मुद्दों पर काम कर रहे हों या फिर यौनिकता के, हमें यह ध्यान देना होगा कि इन का मानसिक स्वास्थ्य पर किस तरह का असर होने वाला है। इसका परिणाम यह होगा कि मानसिक स्वास्थ्य के विषय को एक चिकित्सीय विषय न समझते हुए सामान्य विषय के रूप में देखा जाना संभव हो पाएगा। हम नहीं चाहते कि मानसिक स्वास्थ्य को केवल एक मेडिकल चिकित्सा से जुड़ा विषय समझा जाए। अब आप देखिए कि अपने जीवन के रोज़मर्रा के मुद्दों, अपनी छोटी-बड़ी तकलीफ़ों, सभी को तो हम चिकित्सा के दृष्टिकोण से एक बीमारी के रूप में नहीं देख सकते, क्योंकि ऐसा करने से उनके साथ जुड़ा कलंक और भेदभाव जस का तस बना रहेगा। यह ज़रूरी है कि मानसिक स्वास्थ्य के साथ जुड़े डर, भेदभाव और कलंक से बाहर निकला जाए। और मानसिक स्वास्थ्य पर इस तरह के दृष्टिकोण को केवल महिलाओं से साथ जोड़ कर देखा जाना भी ठीक नहीं है, क्योंकि इससे तो उनको ठीक होने के बाद घर वापिस जाने के बाद भी बार-बार उन्हीं कठिन परिस्थितियों का सामना करते रहना होगा। इसीलिए इस समय सामुदायिक स्तर पर कुछ कोशिशें करना ज़रूरी है। 

मुद्दों के बीच परस्पर जुड़ाव के बारे में बात करते हुए, हमें यौनिकता को इसके सभी आयामों, सभी पहलुओं में याद रखना होगा। यौनिकता मनुष्य जीवन का एक अभिन्न अंग है। यहाँ मैं यह भी कहना चाहूंगी कि यौनिकता अनेक रूपों में प्रकट की जा सकती है और यह सब व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है। चूंकि हम यौनिकता की केवल विषमलैंगिक परिभाषाओं से अलग हटकर कुछ सोचने की कोशिश कर रहे हैं, इसलिए यह हमारा दायित्व बन जाता है कि हम यौनिकता के दूसरे रूपों के इर्द-गिर्द अपनी चर्चा को केन्द्रित कर अपनी कार्य-योजनाएँ तैयार करें और अपनी नैतिक मान्यताओं और मूल्यों के आधार पर उन लोगों पर अपनी राय थोपना छोड़ दें, जिनके साथ हम काम करते हैं। 

शिखा इन विषयों पर व्याप्त खामोशी को तोड़कर इनपर बातचीत शुरू करना वाकई बहुत ज़रूरी है। इसीलिए अभी पिछले ही साल, यौनिकता, अधिकार और मनो:सामाजिक विकलांगता के विषय पर अंजलि संस्था तथा ARROW द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तर की कॉन्फ्रेंस, ‘Pleasure, Politics and Pagalpan’ में सहभागियों ने यह माना था कि यौनिकता और मानसिक रोगों के मामले में सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इन विषयों पर बातचीत ही नहीं की जाती, कोई इस विषय को उठाना ही नहीं चाहता। अगर हम एक बार यह स्वीकार कर लें और मान लें कि यौनिकता भी हमारे जीवन के दूसरे अनुभवों की तरह ही एक जीवन अनुभव है, तो इससे हमारे विचारों पर किस तरह असर होगा और कैसे दूसरों की मदद करने और उनका पुनर्वास करवाने के हमारे प्रयास प्रभावित होंगे? 

रत्नाबोली – यह एक कठिन सवाल है। अंजलि संस्था में न केवल लोगों के पुनर्वास बल्कि उनके सामाजिक समावेश पर भी ध्यान देते हैं। अब जब सामाजिक समावेश की बात हो तो उसमें यौनिकता को स्वीकारा जाना भी बेहद ज़रूरी है। लेकिन संस्था में आने वाली किसी भी सहभागी के साथ काम करना शुरू करने पर, उनके साथ परस्पर विश्वास, आदर और एक राय कायम हो जाने के बाद ही उनकी यौनिकता को स्वीकारने या कर पाने के स्तर तक हम पहुँच पाते हैं। उनके अनुभवों में उत्पीड़न, हिंसा, अधिकारों के हनन, प्यार, लगाव, स्पर्श महसूस करने की भूख की कहानियों की भरमार होती है, और इसीलिए उनकी यौनिकता की पहचान भी उनके इन नकारात्मक अनुभवों से ही हो पाती है। मानसिक रोगियों के किसी अस्पताल में, जहाँ रोगियों को जीवन जीने का एक न्यूनतम स्तर मुहैया नहीं हो पाता, वहाँ हम यौनिकता, रोमांस और प्रेम जैसी बातों को उठाने में थोड़ा हिचकिचाते हैं – क्योंकि हमें यह भी ध्यान रखना होता है कि इस तरह की बातें शुरू करने से कहीं उनके मन में दबी और दूसरी ऐसी बातें निकल कर सामने न आने लगें जिसके लिए उन्हें हमारी और अधिक सहायता की ज़रूरत पड़े। इसलिए बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि सहभागी और आपके बीच किस तरह के संबंध हैं। कुछ सहभागियों ने हमें अपनी मर्ज़ी से प्रेम और रोमांस के बारे में बताया जो संस्था में रहते हुए शुरू हुआ और पनपा। अब ऐसे में हमारे सामने कठिनाई यह होती है कि हम उनकी इन कहानियों पर किस तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करें। अंजलि संस्था में एक महिला थीं जो कैंटीन में काम करती थीं और वहाँ एक मजदूर से उनके संबंध बन गए। हमें भनक लग गयी थी कि कुछ खिचड़ी पक रही थी। आखिर में जब उन्होंने खुद हमें बताया, तो मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं कैसे और क्या कहूँ। हम जानते थे कि वह व्यक्ति ठेकेदार के पास मजदूरी करते हैं और काम खत्म होने के बाद वह चले जाने वाले हैं। हमें हार कर उन महिला को यह कहना ही पड़ा कि उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि यह लंबे समय तक चलने वाला प्रेम नहीं है। अब इसी बात की चर्चा अगर हमने उन महिला के डॉक्टर से कर ली होती, तो उनका चाय घर (कैंटीन) में आना ही बंद करवा दिया जाता और उन्हें ‘नियंत्रण में’ रखने के लिए उनकी दवा की खुराक कुछ बढ़ा दी गयी होती। 

संभावनाएँ तो अनेक हैं, लेकिन उन्हें अमली जामा पहनाने में समय लगता है। तो ऐसे में, जहाँ स्वीकारता ही महत्वपूर्ण है, वहाँ हम वास्तविकता को, एक तो देर से स्वीकार करते हैं और दूसरे, फिर इससे आगे कुछ नहीं करते। मुझे लगता है कि केवल स्वीकार कर लेना ही काफ़ी नहीं है, इस पर साथ ही साथ आगे कुछ कार्यवाही भी की जाने चाहिए। इस वर्ष सितम्बर में हम, एक दूसरी एनजीओ, संगत के साथ मिलकर ‘समुदायों में मानसिक स्वास्थ्य’ के विषय पर एक अंतर्राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस आयोजित करने जा रहे हैं। संगत संस्था भी मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करती है। इस कॉन्फ्रेंस का उद्देश्य वास्तविक परिस्थितियों में जमीनी स्तर पर देशभर के कार्यकर्ताओं और के अनुभवों को जानना और समझना है। इस कॉन्फ्रेंस में भाग लेने वाले सभी लोग, मानसिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता, एनजीओ कर्मी, सरकारी टीमें और दूसरे लोग कुछ नया सीखने की एक ऐसी प्रक्रिया में सहभागी बनेंगे जहाँ उनकी सीखी कई जानकारियों को चुनौती दी जाएगी और परखा जाएगा। इस कॉन्फ्रेंस इस एक प्रमुख विषय, कुशलता बनाए रखने के विचार में जेंडर और यौनिकता को संभावनाओं और नए विचारों के दायरे में लाना, होगा।           

शिखा – अब मैं अपने आखिरी सवाल पर आती हूँ। मानसिक रोग के क्षेत्र में काम करने के संदर्भ में, क्या कभी आपको यौनिकता और सम्बन्धों से जुड़े कुछ सकारात्म्क अनुभव भी हुए हैं।  

रत्नाबोली राय: हाँ, अनेक बार। इसी साल मैंने एक फिल्म का निर्माण किया जिसका नाम है Love In The Time Of Madness. इस फिल्म में दिखाया गया है किस तरह दो औरतों ने, अपने जीवन की घटनाओं की मूक दर्शक न बनी रहकर अपनी इच्छाओं और यौनिकता को व्यक्त किया। इन दोनों ही औरतों को बंदी बनाकर रखा जाता था और इनकी यौनिक स्वतन्त्रता की आदत के कारण इनके बारे में लोगों की बड़ी क्रूर राय थी। यह दोनों ही महिलाएँ बड़े जीवट वाली हैं और खुद को मानसिक रोगी करार दिए जाने का विरोध करती हैं। इनमें से एक बहुत स्मार्ट हैं, खुले विचारों की हैं और चुपचाप कुछ भी सहती नहीं हैं, इसलिए सज़ा के तौर पर उन्हें उनके परिवार वाले पावलोव अस्पताल में भर्ती करवा देते हैं। यहाँ वह हमारे कार्यक्रम से जुड़ती हैं और उनकी हालत में लगातार सुधार होता जाता है। मानसिक रोगियों के अस्पताल से छुट्टी मिलने पर वह अपने घर वापिस जाती हैं और अपना फ़ेसबुक अकाउंट बनाती हैं जहाँ उनकी मुलाक़ात एक पुरुष से ऑनलाइन होती है। दोनों में प्रेम हो जाता है और वो शादी कर लेते हैं। 

मेरे अनेक नारीवादी मित्र, फिल्म के इस परियों की कहानी की तरह खत्म होने को लेकर चिंतित थे। लेकिन आखिरकार, यह फैसला तो उन महिला का ही है। फिल्म में दूसरी महिला, बड़े ही चाव से अपनी इच्छाओं के बारे में बात करती हैं, वह अपने यौनिक रुझानों को समझती हैं और उन्हें उम्मीद है कि किसी न किसी दिन वह ज़रूर इन्हें पूरा कर पाएंगी। फिल्म में वह ट्रेन में अपनी अनेक यात्राओं के दौरान पुरुषों से मिलने के अनुभवों के बारे में बताती हैं। कैमरे के सामने इस महिला ने हमें बताया कि कैसे एक बार वह ट्रेन में एक ‘गोरे, गोल-मटोल और सुंदर’ युवक से मिली थीं। उनकी बातों में सुंदरता यह थी कि उन्होंने स्वीकार किया कि वे उस युवक के प्रति आकर्षित हो गयी थीं। उनके मन में अपने व्यवहार को लेकर किसी भी तरह का कोई अफसोस नहीं था लेकिन कोई बहुत ज़्यादा उम्मीदें भी नहीं थीं; वह को केवल उस समय अपने मन में उठ रही उन भावनाओं से ही खुश थीं, क्योंकि यह सबकुछ उनकी अपनी इच्छा से हो रहा था। इसी से मैं वापिस अपनी उसी बात पर लौटती हूँ जब मैं कह रही थी कि बातचीत कितनी ज़रूरी है, इसका कितना महत्व है। अगर एक ऐक्टिविस्ट या एक विशेषज्ञ के रूप में उनसे यह बातचीत नहीं करती कि अपनी इच्छाओं को स्वीकार कर लेना कितना महत्वपूर्ण होता है, तो संभव है कि ये दोनों महिलाएँ जीवन भर एक दोहरा जीवन जीती रहती और खुद को ही गलत और कलंकित समझ कर शर्मसार होती रहतीं। 

हमने महिलाओं के लिए यौनिकता के विषय पर एक अभ्यास पुस्तिका भी तैयार की है। बांग्ला भाषा में इसका शीर्षक है ‘एई आमादेर प्रेम कहिनी’ (My Book of Love)। यह पुस्तक अस्पतालों में भर्ती रह चुकी और/या मनो:सामाजिक विकलांगता के साथ रह रही महिलाओं को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। अपने अनुभवों से हम यह तो जानते हैं कि अनेक कारणों से यौनिक इच्छाओं को प्रकट कर पाना कई बार कठिन हो जाता है। मानसिक रोगी को दी जाने वाली दवाएं इनमें से एक कारण है और अस्पताल के कड़े पितृसत्तात्म्क कानून, दूसरा। इन दोनों के कारण व्यक्ति के समझने बूझने की क्षमता क्षीण हो जाती है और उनकी कलपनशीलता जाती रहती है। इसलिए हमारी यह पुस्तक उनकी यौनिकता को स्वीकार करते हुए उन्हें अपने यौनिक रुझानों और विचारों को उजागर करने के लिए प्रेरित करती है। इस पुस्तक में हमने पहचान, सहमति, आनंद, निजता जैसे सैद्धांतिक विषयों को शामिल किया है और शरीर, इसकी बनावट और चरम आनंद (औरगैस्म) जैसे विषयों पर भी चर्चा की है। इन सभी बातों को कविताओं, लघु कहानियों, कथा-चित्रों के साथ, बीच-बीच में डाला गया है। यह सभी महिलाओं की कल्पना को उड़ान देने के लिए हैं। इस अभ्यास पुस्तिका को क्रिया संस्था के सहयोग से तैयार किया गया है और बहुत जल्दी ही इसका विमोचन और वितरण किया जाना है। आप यह देखें कि, लोग जब भी यौनिकता के बारे में बात करते हैं तो वे हिंसा पर भी बात करते हैं; ऐसा लगता है मानो मानसिक स्वास्थ्य रोगियों के जीवन में यौनिकता को केवल इसी रूप में पहचाना जाता है। लेकिन सिर्फ़ ऐसा ही नहीं है, इसके अलावा भी इनके जीवन में बहुत सी खुशी से भरी, सेक्सी, प्यारी घटनाएँ और कथाएँ भी होती हैं।      

सोमेद्र कुमार द्वारा अनुवादित 

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Reads, writes, does Sudoku, grows plants and walks with dogs as a reasonable option to running with wolves. Is a consultant with TARSHI, focusing on health, disability, gender and rights issues. A post-graduate from XLRI, graduated from Hindu college, Delhi University.

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