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क्विअर लोगों की मानसिक देखभाल – मुझसे बात करें

मेरे यह पूछने पर कि, “जब आप दुखी होते हैं तो किससे बात करते हैं”, जोगप्पा ने ने कहा देवी से बात करती हूँ

पिछले साल मैं जहाँ भी गया, वहां मिलने वाले बहुत से लोगों से मैंने यही प्रश्न पुछा। उनमें से ज़्यादातर लोगों का यही जवाब होता था, “किसी से भी नहीं”

यह प्रश्न पूछे जाने पर कुछ लोगों के चेहरे पर तो असमंजस की झलक भी दिखाई दी। इसके जवाब में सुनने को मिलता, “मुझे समझ नहीं आ रहा। ऐसा कौन है जिससे बात की जाए? मैं अपनी परेशानियों के बारे में किसी और से भला क्यों बात करूं?”

शुरुआती तौर पर यह इस जटिल समस्या की झलक मात्र थी कि क्विअर समुदाय किन्ही ख़ास तरह की मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं के हल कैसे खोजते हैं। लेकिन पिछले एक साल के दौरान, समुदाय के सैंकड़ों लोगों से बातचीत से मुझे यह विश्वास हो चला है कि यह परिस्थिति वाकई गंभीर है।

मैंने लगभग एक साल तक पूरे दक्षिण भारत की यात्रा की है और इस दौरान मैंने समलैंगिक, द्विलैंगिक और ट्रांसजेंडर पुरुष और महिलाओं, इंटर-सेक्स व्यक्तियों, हिज़रा, जोगप्पा समुदाय के लोगों और अनेक दुसरे लोगों से इंटरव्यू लेकर क्विअर समुदाय के  स्वास्थ्य देखभाल से जुड़े अनुभव को समझने का प्रयास किया। खासतौर पर लोगों से बातचीत कर मैं यह जानने की कोशिश करता रहा हूँ कि स्वास्थ्य देखभाल केन्द्रों और अस्पतालों में उन्हें किस तरह के ‘भेदभाव’ का सामना करना पड़ता है। बंगलुरु में इस समुदाय के साथी प्रशिक्षक (पियर एजुकेटर) के तौर पर मैं यह जानने की उम्मीद भी करता हूँ कि समुदाय के लोगों के लिए मानसिक स्वास्थ्य सहायता का कितना महत्व हैं, वे तनाव से कैसे निबटते हैं और ज़रुरत पड़ने पर वे किससे मदद के लिए बात करते हैं ।

मानसिक स्वास्थ्य का महत्व

मुझे मिली अब तक की जानकारी से और लोगों द्वारा बताए गए अनुभवों के आधार पर ऐसा लगता है कि बहुत कम ऐसे (दृढ आत्मचेतना एवं पहचान वाले) लोग होते हैं जो अस्पतालों में खराब स्वास्थ्य सेवाएं मिलने के विरोध में आवाज़ उठाते हैं, ज़्यादातर लोगों को हाशिए पर धकेल दिए जाने का भय होता है और वे स्थिति के जस की तस बनी रहने को ही बेहतर समझते हैं। लेकिन इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि हमें यह पता चलता है कि ज़्यादातर क्विअर लोग मानसिक स्वास्थ्य समर्थन सेवाओं के प्रयोग को, (यहाँ तक कि खुद के लिए एक समर्थन तंत्र बनाने और उसे बरकरार रखने को भी) अधिक महत्व नहीं देते।

यह मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी जानकारी कोई नयी बात नहीं है; सार्वजनिक स्वास्थ्य विषय पर पिछले कई दशकों में किये गए अध्ययनों से यह पता चलता रहा है कि भारत के मध्यम और निम्न सामजिक-आर्थिक स्तर के अधिकाँश लोग स्वास्थ्य सेवाओं का उपयोग करने को बहुत अधिक महत्व नहीं देते और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के उपयोग का स्तर तो और भी कम है। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को केवल गंभीर समस्याओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है, जैसे स्किज़ोफ्रेनिया, दुर्घटना से जुड़ी मानसिक क्षति, जन्मजात तंत्रिका सम्बन्धी विकार आदि। हम एक ऐसे समाज में रह रहे हैं जहाँ एक ओर तो हमारे सरकारी नेता भारत में मानसिक स्वास्थ्य की खराब स्थिति होने को स्वीकार करते हैं, लेकिन वहीँ दूसरी ओर जिन लोगों को काउंसलिंग या मनश्चिकित्सा की सलाह दी जाती है, वे कहते हैं, मैं क्यों काउन्सलिंग के लिए जाऊं, मैं कोई पागल थोड़े ही हूँ!

मानसिक स्वास्थ्य को अधिक महत्त्व न देने और इन सेवाओं की कम उपलब्धता के कारण क्विअर समुदाय के लोगों पर इसका अधिक बुरा प्रभाव पड़ता है और वे सामाजिक रूप से और ज्यादा उपेक्षित हो जाते हैं। हमें यह तो मालूम ही है कि क्विअर लोगों को, भले ही उनकी जाति, धर्म, वर्ग या आर्थिक स्तर कुछ भी हो, अपनी यौनिक एवं जेंडर पहचान के कारण प्रत्यक्ष और परोक्ष, दोनों तरीकों से उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। अपने घर से लेकर, स्कूल, कॉलेज, काम करने की जगह, आस-पड़ोस में, सिनेमा या प्रचलित साहित्य में उनके चित्रण, हर जगह क्विअर लोगों को मानसिक यातना और तनाव का सामना करना पड़ता है और इस मानसिक तनाव के परिणामों से अछूता रह पाना लगभग असंभव सा होता है। ऐसे में अगर मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिकता न दी जाए, या फिर अगर क्विअर समुदाय के लोग सिर्फ़ अपनी पहचान के कारण ही स्वास्थ्य सेवाओं के उपयोग में भेदभाव का सामना करते रहें, तो यह मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता और उनको उपयोग ना करने या ना कर पाने के बीच का एक कुचक्र बन जाएगा।

तनाव से ध्यान हटाना

क्विअर समुदाय के लोग मानसिक तनाव का सामना किस तरह करते हैं, यह एक जटिल प्रश्न है। मुझसे बात करने वाले बहुत से क्विअर लोगों ने बताया कि तनाव से पार पाने के लिए वे आमतौर पर इस तनाव से अपना ध्यान हटाने की कोशिश करते हैं। तनाव से कुछ समय के लिए छुटकारा पाने में टेलीविज़न, सिनेमा, साहित्य, संगीत, शराब, सिगरेट, नशीली दवाओं का सेवन, सेक्स, नाच-गाना, पार्टी करना आदि मददगार हो सकते हैं। लेकिन लम्बे समय तक इन तरीकों की मदद लेते रहने से, बजाए तनाव का समाधान करने के, ये तरीके तनाव की स्थिति को टालने के साधन बन जाते हैं। इसके अलावा अगर तनाव से ध्यान बटाने का तरीका खुद ही एक लत हो तो इससे और अधिक तनाव भी उत्पन्न हो सकता है। बहुत ज्यादा जटिल स्थितियों में कभी-कभी ध्यान बटाने के लिए लोग खुद को नुक्सान पहुंचाने लगते हैं जिससे कि शारीरिक और मानसिक व् भावनात्मक समस्या उत्पन्न हो सकती है जिसके लिए तुरंत चिकित्सीय सहायता लेनी पड़ सकती है।

दुसरे, जीवन-उपयोगी कौशल के बारे में बहुत साधारण जानकारी के अभाव में थोड़ा सा तनाव भी एक गंभीर समस्या बन सकता है। पीयर काउंसलिंग के अपने सेवाकाल में मैंने जिन लोगों से चर्चा की, उनमें से बहुत से लोग समस्याओं को सुलझाने, बातचीत कर पाने या किसी कमी या अलगाव की स्थिति से निबटने जैसी साधारण समस्याओं से जूझ रहे हैं  हालाँकि एक व्यस्क व्यक्ति में इन आम कुशलताओं का होना बहुत ज़रूरी होता है। क्विअर समुदाय के लोगों के लिए यह समस्याएं इतनी विकट इसलिए भी हो जाती हैं क्योंकि भारत में बचपन से ही परिवारजन अपने बच्चों की जेंडर और यौनिकता पर नियंत्रण रखने में इतना मशगूल होते हैं कि उन्हें कभी भी सामजिक तनावों से जूझ पाने के लिए तैयार करने में सहायक तरीकों पर बिलकुल भी ध्यान नहीं देते।

किसी से बात करना

समुदाय के लोगों के साथ चर्चा में यह बात बार बार उभर कर सामने आयी कि अपनी समस्या के बारे में किसी से बात न कर पाने के कारण ही लोगों में मानसिक समस्याएं और अधिक जटिल रूप ले लेती हैं। उनमें से बहुत से लोगों के जीवन में मित्र और समुदाय के अन्य लोग थे जिनके साथ वे समय बिताते और मज़े करते थे लेकिन जब उन्हें रोना हो या जब वे बहुत दुखी हो जाते थे तो ऐसे में वे समुदाय के दुसरे लोगों या अपने मित्रों से सहायता नहीं मांगते थे। वे अपनी समस्याओं के बारे में किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या पीयर काउंसलर या समुदाय से अपने किसी मित्र से भी सलाह लेने को बहुत अधिक महत्व नहीं देते थे। लोगों का मानना यह था कि किसी से बात करने का कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि इससे समस्या का कोई हल नहीं निकलने वाला था। इनके मित्रों को भी यही लगता था कि तनाव की स्थिति का कोई हल नहीं है। उन्हें यह भी लगता था कि जब उनके मित्र आदि कोई उनकी सहायता नहीं कर सकते तो उनके साथ समय बिताने का भी कोई लाभ नहीं था। इस पुरे प्रकरण में मुख्यत: यही विचार था कि किसी और से बात करने का क्या लाभ जबकि हर कोई लाचार हैं? इसलिए तनाव से ध्यान हटाने को ही अधिक लाभप्रद समझा जाता था।

हालांकि तनाव से ध्यान बटाने के कई तरीके दोबारा उठ खड़े होने की क्षमता को बढ़ाने में बहुत हद तक लाभप्रद हो सकते हैं लेकिन वे तनाव के स्थिति के कारणों को सुलझाने में असमर्थ रहते हैं। अपने तनाव के बारे में दूसरों से बातचीत कर लेने से मानसिक स्वास्थ्य पर तनाव के दुष्प्रभावों को कम किया जा सकता है। क्विअर समुदाय के लोगों के लिए अपनी समस्या या अपने तनाव के बारे में समूह के दुसरे उन लोगों से चर्चा करने से, जो ऐसे ही तनाव का अनुभव कर चुके हों, इससे निजात पाने में मदद मिल सकती है। कुछ अध्ययनों से पता चला है कि समुदाय के दुसरे लोगों से निकटता और सामाजिक समर्थन मिलने से डिप्रेशन कम हो सकता है और दुष्चिन्ता दूर करने में भी मदद मिल सकती है। कुछ अन्य अध्ययनों से यह भी पता चला है कि दुसरे लोगों के साथ अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करने से और समस्याओं के हल के बारे में चर्चा करने से गंभीर मानसिक रोग के साथ रह रहे लोगों को भी लाभ हो सकता है

बंगलुरु में ‘गुड ऐज़ यू’ नाम के एक सहायक समूह में काम करने के दौरान और कई दुसरे लोगों के साथ काम करते हुए मेरा व्यक्तिगत अनुभव भी यही रहा है कि अपने जैसे दुसरे लोगों से या अपनी ही जैसी दशा से गुज़र रहे लोगों से बातचीत करना मानसिक स्वास्थ पर अच्छा प्रभाव डालता है। अध्ययनों से पता चलता है कि मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होने से शारीरिक स्वास्थ्य भी अच्छा बना रहता है और व्यक्ति में तनाव और समस्याओं से जूझने की बेहतर क्षमता विकसित होती है और वह सामाजिक एवं मानसिक संसाधनों का बेहतर उपयोग कर सकते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि दूसरों से बातचीत कर, अपने अनुभव बाँट कर व्यक्ति जितना हल्का महसूस करते हैं उतना ही उनका स्वास्थ्य अच्छा रहता है और आनेवाली तनाव की नयी परिस्थितियों से निबटने की उनकी क्षमता बढ़ जाती है और वह अधिक प्रभावशाली तरीके से इनका मुकाबला कर सकते हैं।

पर मेरे मामले में, और बहुत से अपने क्लाइंट्स के मामले में भी, मैंने पाया कि बातचीत और चर्चा की प्रक्रिया को दोहराते  रहने से भी मदद मिलती है। विशेषज्ञों से मदद लेने, अपने मित्रों से चर्चा करने या दुसरे क्विअर लोगों से अपने अनुभव साझा करने ने हमारे सफ़र को आसान बनाया। अपने जैसी स्थिति से गुज़र चुके दुसरे लोगों के अनुभवों से सीखने से भी मदद मिलती है। साथी समर्थन देने के बारे में छपी सामग्री की समीक्षा के अध्ययन में यह पता चला कि साथी समर्थन समूह और तंत्र या नेटवर्क समस्या निवारण की आशा और विश्वास को बनाय रखने में मददगार रहे हैं, कठिन परिस्थितियों से पार पाने के आत्मा-विश्वास और आत्म-प्रबंधन में वृद्धि करते हैं, और इसके परिणामस्वरूप सामाजिक-मेलमिलाप को भी अधिक बेहतर करने में मददगार रहे हैं। इसलिए साथी समूह से मदद लेने में अधिक व्यक्तिगत लाभ हो सकता है। इसी तरह उपलब्ध संवेदी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और डॉक्टरों की मदद लेना भी उपयोगी हो सकता है और पीयर सहायता समूह इन विशेषज्ञों तक पहुँच संभव करने में सहायक हो सकते हैं।

इसलिए किसी भी तनावपूर्ण स्थिति से निबटने और उससे उबरना सीखने का सबसे आसान तरीका यह है कि किसी दुसरे व्यक्ति के साथ इस बारे में बातचीत की जाए। आप किसी से भी बात कर सकते हैं, चाहे वह कोई दोस्त हो, कोई पीयर काउंसलर, कोई टेलीफोन हेल्पलाइन, स्काइप या चैट पर काउंसलर हो या किसी मनोविज्ञानी से बात करें, जो भी आपके लिए सुलभ हो। आप चाहें तो अपने मित्रों का ऐसा समूह भी ढूंढ सकते हैं जिनसे आप किसी भी विषय पर किसी भी समय बातचीत कर सकें और समय बिता सकें या फिर आप किसी समर्थन समूह का हिस्सा भी बन सकते हैं भले ही वह समूह कितनी भी आरंभिक मदद करने की स्थिति में क्यों न हो। अपने जैसे अनुभवों वाले या अपनी समान स्थिति से गुज़र रहे लोगों के किसी समूह कर भाग बनने से तनाव बहुत हद तक कम हो जाता है। आप इनमें से कोई भी एक या सभी कुछ कर सकते हैं और याद रखिए कि परिस्थितियों में सुधार हो, यह ज़रूरी नहीं, ज्यादा ज़रूरी है कि आप इन परिस्थितियों से पार पाने में अधिक सक्षम हो पाएं।

सोमेंदर कुमार द्वारा अनुवादित

To read this article in English, please click here.

 

यह लेख आंशिक रूप से मुंबई के टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज की ओर से किए गए एक शोध अध्ययन पर आधारित है जिसमें गैर-सामान्य जेंडर वर्गों और यौनिकता वर्ग के साथ स्वास्थ्य देखभाल में होने वाले भेदभाव का अध्ययन किया गया था। टाटा इंस्टिट्यूट के शोध सहायक अनुराग पी नायर को इस लेख की समीक्षा करने के लिए धन्यवाद।

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Article written by:

Vinay Chandran is Executive Director of Swabhava Trust (estd. 1999), an NGO in Bangalore offering support services to LGBT people. He is also a peer counsellor on the Sahaya Helpline (estd. 2000). He is co-editor of the book Nothing to Fix: Medicalisation of Sexual Orientation and Gender Identity (Sage/Yoda Press, 2016)

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