A digital magazine on sexuality in the Global South

… अधिकाँश लोगों को लगता है कि विकलांगता और यौनिकता के बीच कोई सम्बन्ध नहीं होता – सिवाय तब जब वे हिंसा के मामलों के बारे में सुनते हैं। उन्हें लगता है कि विकलांग लोगों को अपनी यौनिकता, इच्छाओं, ज़रूरतों या रुझानों के बारे में ज़्यादा जानने की ज़रुरत ही नहीं होती क्योंकि वे तो मूल रूप से यौन-रहित होते हैं। अगर ऐसे विकलांग लोग किसी तरह जीवित रह पाते हैं, उन्हें भरपेट भोजन मिल जाता है और वे कुछ कमा भी लेते हैं तो उनका जीवन तो वैसे ही उनकी अपेक्षाओं से कहीं अधिक सफल हो जाता है। ऐसी परिस्थिति में आनंद पाना एक बहुत ही अलौकिक वस्तु हो जाती है क्योंकि विकलांग होकर केवल जीवित रह पाना ही अपने आप में बड़ी बात है, आनंद के बारे में सोचना तो बहुत अधिक की आशा करने जैसा है!

… एक अन्य बात जिसे विकलांगता के साथ रह रहे व्यक्ति अक्सर अनदेखा कर देते हैं वह यह कि दिल टूटना और अस्वीकार कर दिया जाना हर सम्बन्ध में होता है भले ही आप विकलांगता के साथ रह रहे हों या नहीं। दुनिया भर में सैंकड़ों लोग, जो किसी भी तरह से विकलांग नहीं होते, हर साल केवल इसीलिए आत्महत्या करते हैं क्योंकि उन्हें तिरस्कार मिला होता है या उन्हें कोई धोखा देता है। इसलिए अस्वीकार किया जाना या दिल टूटना कोई ऐसी घटना नहीं है जो केवल विकलांग लोगों के साथ ही होती हो।

… विकलांगता के साथ रह रहे लोगों की समस्याओं को सामने लाने की वर्तमान प्रक्रिया में केवल विकलांगता को ही प्रमुख माना जाता रहा है और विकलांगता के साथ रह रहे लोगों में जेंडर विशेष की समस्याओं, खासतौर पर विकलांग महिलाओं की तकलीफ़ों को नज़रंदाज़ किया जाता रहा है। यह चिंता का विषय है और इस समस्या के समाधान के प्रयास किए जाने चाहिए। किसी विकलांग महिला को अपने जेंडर या यौनिकता के कारण दुगने या तगुने भेदभाव और अलगाव का सामना करना पड़ता है लेकिन इस ओर किसी का भी ध्यान नहीं जाता।

… ये यादें उस समय की हैं जब मैं किशोरावस्था और यौवन के बीच की देहलीज़ पर खड़ी थी जब दोस्तों के बीच आमतौर पर प्रेम, आकर्षण जैसे विषयों पर ही बातचीत होती है। लेकिन मैं अपने उस अनुभव के बारे में और उस लड़के के बारे में किसी को भी नहीं बता सकी और इसका कारण यह था कि वह लड़का, जिससे मेरे सम्बन्ध रहे थे, डाउन सिंड्रोम के साथ रह रहा था जो कि एक तरह की बौद्धिक विकलांगता है।

… सुश्री रत्नम आगे बताती हैं कि देवदासी प्रथा के समाप्त होने के बाद, देवदासियों के जीवन की समझ न रखने वाले दर्शकों के बीच भरतनाट्यम नृत्य को स्वीकार्य बनाए रखने के लिए यह ज़रूरी था कि इस शैली में से श्रृंगार रस को कम कर इसे भक्ति उन्मुख किया जाए। एक तरह से देवदासी प्रथा अब प्रासंगिक नहीं रह गयी थी और स्टेज पर नृत्य के माध्यम से इसके चित्रण को केवल आंशिक रूप से ही पुन: शुरू किया जा सकता था। नृत्य में से श्रृंगार को कम करने से इसे फिर प्रचलित करने में सहायता मिली और अब कलाकार को इस नृत्य शैली को नए नज़रिए से देखने और जेंडर व यौनिकता की नयी समझ से अनुरूप प्रस्तुत करने का अवसर मिलने लगा।

… यह लेख हिजड़ा समुदाय पर शोध करते हुए इस बात को समझने का प्रयास है कि हिजडों की भूमिका पर अपना मत रखने के क्या अर्थ हैं और हिजड़ा बनने की प्रक्रियाएँ क्या हैं। यह अध्ययन दिल्ली, भारत, में रहने वाले हिजड़ा समुदाय के नृजातीय (Ethnographic) अध्ययन पर आधारित है और सामाजिक अंग के रूप में हिजड़ा समुदाय के जन्म का अन्वेषण करता है। समाज में प्रचलित अनेक तरह के पूर्वाग्रहों और असहिष्णुताओं के कारण हिजड़ा समुदाय हमेशा से समाज के हाशिए पर घोर गरीबी में जीवन व्यतीत करता रहा है, जिसे सामान्य जीवन की सभी प्रक्रियाओं से बाहर रखा गया।

… विवाह के बाद कनाडा में रहने वाली अपनी बड़ी बहन को पहला पत्र लिखते हुए (फिल्म इसी सीन से शुरू होती है) वह अपने इस नए घर और ससुराल के लोगों के बारे में बताती हैं, ख़ास तौर पर, अपने घर में इस खुली जगह के बारे में जहाँ से, वह घंटों तक, अपने जन्म-स्थान, अपने शहर को देख सकती हैं। लेकिन, फिल्म में आगे चलकर, बालकनी की यही छोटी सी जगह – जो घर के बाहर और भीतर, निजी और सार्वजनिक तथा स्वतंत्रता व् घुटन की अनिश्चितता के बीचों-बीच टिकी है – रोमिता और उनके पति पलाश के बीच घरेलु कलह में, विवाद का एक मुद्दा बन जाती है।

… ‘परिवार’ और ‘यौनिकिता’ शब्द एक साथ लिख कर खोजने पर गूगल पर कुछ दिखाई नहीं देता। हालांकि यहाँ ‘बाल यौन शोषण’, ‘किशोर एवं यौनिकता’, ‘यौन साथी की अदला-बदली करने वाले दम्पति’ और ‘ऐतिहासिक काल से संस्कृतियों में यौनिकता’ जैसे विषयों पर अनेक अकादमिक अध्यनन दिखाई पड़ते हैं। थोड़ा और ढूँढने पर किसी व्यक्ति की यौनिकता के विभिन्न पहलुओं और उन व्यक्ति के अपने परिवार और दुनिया के साथ संबंधों पर कुछ फिल्में भी दिखाई पड़ती हैं। संभव है कि कुछ पुस्तकों की जानकारी भी यहाँ हो।

… ‘परिवार’ और ‘यौनिकता’ दोनों की ही किसी भी व्यक्ति के निजी जीवन में बहुत जटिल भूमिका होती है। ये दोनों ही किसी व्यक्ति के जीवन में अनेक तरह की भावनात्मक उलझने पैदा करते हैं और वास्तविकता यही है कि इनके कारण व्यक्ति को अनेक बार दिल टूटने के अनुभव से गुजरना पड़ता है। इसलिए इसमें कोई हैरानी नहीं कि इन दोनों के बारे में लोगों के मन में केवल एक ही दुविधा होती है कि इन्हें स्वीकार कैसे किया जाए – जैसे परिवार द्वारा यौनिकता को स्वीकार किया जाना; परिवार के प्रत्येक सदस्य के विचारों और तरीकों को दुसरे सदस्यों द्वारा स्वीकार किया जाना, ख़ासकर तब जब सबके विचार एक दुसरे से अलग हों; एक पारंपरिक परिवार के परिप्रेक्ष्य में अपनी खुद की यौनिकता को स्वीकार कर पाना आदि-आदि।

… आज हम ऐसी दुनिया में रहते हैं, जहाँ रोज़ ही अलग-अलग तरह की परिवार व्यवस्थाएँ बन रही हैं। अब वे दिन नहीं रहे जब जन्म देकर ही संतान पायी जा सकती थी या विवाह केवल परिवार की रजामंदी से ही होते थे या परिवार की उत्पत्ति केवल विवाह के आधार पर ही होती थी। लोगों के व्यवहार करने के तरीके में, एक दुसरे के साथ, जो उनके अन्तरंग हैं उनके साथ, दुनिया के बारे में जिनके साथ साझी सोच है उनके साथ और जो स्वीकृत सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यताओं को बदलने के लिए तैयार हैं, उनके साथ अब बदलाव आया है।

… मुझे अपने शोध के दौरान मिली जानकारी से यही पता चला है कि किशोरों में रोमांटिक प्रेम संबंधों को उनके माता-पिता अक्सर ‘ध्यान भटकाने वाला’ करार देते हैं जिससे पढाई पर ‘बुरा असर’ पड़ता है, जो ‘जोखिम से भरा’ है और एक ऐसा काम है ‘जिसे नहीं किया जाना चाहिए’। प्रेम करने के बारे में सिर्फ़ पढाई ख़त्म हो जाने के बाद ही सोचना चाहिए। लेकिन यह सोच इस सत्य को मिटा नहीं सकती कि किशोर प्रेम सम्बन्ध बनाते हैं और यौन सम्बन्ध भी!

… देश में मानसिक स्वास्थ्य की सार्वजनिक सेवायों की दुर्दशा और अत्यंत महंगे निजी मानसिक उपचार, जो केवल कुलीन वर्ग के लिए सीमित है, के चलते इस तरह के अधिकाँश लोगों को किसी भी तरह की मदद या सेवा नहीं मिल पाती है। हमारे देश में मनोसामाजिक विकलांगता के बारे में जानकारी का अभाव है और इससे जुड़े ज़्यादातर अनुभव देश में विद्यमान जादू-टोने या धार्मिक अंधविश्वासों के माध्यम से दिखाई पड़ते हैं।

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