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a picture of a 'gents' and 'ladies' toilet
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महिला शौचालय और मेरा अनुभव 

याद है, सिमोन द बोवॉ ने कहा था, किसी व्यक्ति का जन्म महिला के रूप में नहीं होता, वह महिला बन जाते हैं? महिलाओं के लिए बने शौचालय तो अवश्य ही यह निश्चित करते हैं। मुझे यह एहसास है कि मैं यह लेख एक ऐसे समय में लिख रही हूँ जब पूरा भारत स्वच्छ बन रहा है, और जब भारत सरकार ने यह वचन दिया है कि 2019 तक भारत के हर घर में एक शौचालय होगा। सामाजिक चिकित्सा में आपको बताया जाता है कि शौचालय का कितना महत्व होता है और किस तरह से खुले में पेशाब या शौच कर आप खुद को और दूसरों को भी, रोग और संक्रमण के जोखिम में डालते हैं। लेकिन मेरा यह लेख प्रगति या स्वच्छता के विषय पर नहीं लिखा गया है, बल्कि यह तो शौचालय के उपयोग, और इस प्राकृतिक ज़रूरत को पूरा करने के लिए, जेंडर आधारित अंतर को लेकर लिखा गया है। 

मैं आपको यह भी बता दूँ कि मेरा यह लेख बेल्लारी तक के अपने सफ़र के दौरान हुए अनुभवों और रास्ते में महिला यात्रियों के लिए सुविधाओं के अभाव के बारे में बताने के लिए था। लेकिन लेख लिखते समय मुझे यह विचार आया कि सड़क से सफ़र करते समय भी क्यों मेरा ध्यान हर समय अपने जेंडर पर रहता था। फिर उसी क्षण मुझे यह एहसास हुआ कि यात्रा के समय मैं उन्हीं सड़कों, मार्गों और वाहनों कर प्रयोग तो कर सकती थी जिन्हें पुरुष यात्रा के समय करते हैं, लेकिन मैं पुरुषों के शौचालयों का प्रयोग कदापि नहीं कर सकती थी (या करना नहीं चाहती थी)। मुझे यह एहसास तब हुआ जब मैंने चेन्नई से बेल्लारी जाते हुए 11 घंटे कार से सफ़र करते हुए बिताए। इस सफ़र के दौरान मुझे यह पता चल गया कि इस मार्ग पर शौचालय थे तो पर बहुत ही कम या ना के बराबर। मार्ग में जितने भी शौचालय थे, उनमें से बहुत ही कम ऐसे थे जो किसी अंधेरे, अलग-थलग पड़े शराबखाने में नहीं थे, और केवल महिलाओं के लिए बने शौचालयों की संख्या उससे भी कहीं कम थी। ऐसा भी नहीं लगता था कि ये शौचालय महिलाओं और पुरुषों, दोनों के इस्तेमाल के लिए बनाए गए हों, क्योंकि वहाँ जाने पर तो हर तरफ़ केवल पुरुष ही पुरुष दिखाई पड़ते थे मानो ये किसी पुरुषों के क्लब में जाने का पीछे का दरवाजा हो। किसी महिला यात्री के लिए, जिसे महिलाओं के लिए अलग से बने शौचालय इस्तेमाल करने की आदत हो, इस तरह पुरुषों के लिए बने शौचालय को प्रयोग कर पाना खासा असुविधाजनक हो सकता है।  

मार्ग में इस तरह महिला यात्रियों के लिए शौचालय न होने पर मेरी पहली प्रतिक्रिया खुद में अपमानित महसूस होने की थी। यह तो ऐसा ही है जैसे महिलाओं से इन सड़कों पर यात्रा करने की कल्पना ही न की जाती हो। फिर उसके बाद मुझे दक्खन के इस राष्ट्रीय राजमार्ग 205 पर 6 घंटे के सफ़र का ध्यान आया। यह राजमार्ग पूर्वी आंध्र प्रदेश के चट्टानी मार्गों से होकर गुज़रता है और इस पर दूर तक फैली शुष्क भूमि या सूरजमुखी के लहलहाते खेत दिखाई पड़ते हैं। यह दृश्य इतना मनोहारी होता है कि किसी भी नीरस व्यक्ति के अंदर के कवि को जगा दे, लेकिन शौचालय जाने की विवशता के चलते मुझे रह-रहकर केवल जल्दी ही किसी शौचालय के दिख जाने का ध्यान आ रहा था। सड़क लगभग निर्जन और वीरान थी। वहाँ बहुत कम लोग दिख रहे थे, और वास्तव में वे सभी सड़क किनारे बैठे हुए थे। मुझे लगता है कि वे किसी बस या अन्य सवारी का इंतज़ार कर रहे होंगे। मार्ग में कोई बस स्टॉप नहीं थे, न ही कोई गाँव, इसलिए यह तो निश्चित था कि शौचालय भी नहीं होंगे – न पुरुषों के लिए और न ही महिलाओं के लिए। ऐसे में देखा जाए तो सड़कें तो महिलाओं के साथ भेदभाव नहीं कर रहीं थीं; हाँ पुरुषों को इससे कोई फ़र्क पड़ता नहीं जान पड़ रहा था। राष्ट्रीय राजमार्ग 205 पर चलने वाले अधिकांश वाहन ट्रक और दूसरी भारी गाडियाँ थीं जो तमिलनाडू और आंध्र प्रदेश से देश के उत्तरी भागों में ढुलाई के लिए माल ले जा रही थीं, और कुछ जो वापिस आ रही थीं। इस सड़क पर अक्सर पुरुष ड्राईवर सड़क के किनारे गाड़ी रोककर खुद को हल्का करते हुए देखे जा सकते हैं। मेरी कार के ड्राईवर ने भी इस प्रयोजन से कई बार गाड़ी रोकी। उन्हें जब भी अपना मूंह धोना होता या कुछ खाने के लिए गाड़ी रोकनी होती तो वह हमेशा मुझे बोलकर जाते लेकिन मैंने देखा कि जब उन्हें शौचालय जाने के लिए रुकना होता तो वे धीरे से गाड़ी रोककर निकल जाते। मुझे समझ में आ गया था कि इस बारे में बात करना वर्जित समझा जाता है।  

लेकिन हमारा शरीर इन वर्जनाओं को नहीं समझता। आखिरकार मुझे ड्राईवर को कहना ही पड़ा और मैंने धीमे से यह सुझाव भी दे दिया कि मुझे सड़क किनारे खेतों में जाने में भी कोई विशेष आपत्ति नहीं थी। लेकिन शायद मेरे ड्राईवर को लगा कि खेतों में जाना मेरे वर्ग के खिलाफ़ था या फिर मेरे महिला होने के कारण सही नहीं था। उन्होंने सुझाव दिया कि वह कार को कुछ तेज़ चला लेंगे ताकि जल्दी ही हम अनंतपुर पहुँच जाएँ, उन्हें उम्मीद थी कि वहाँ ज़रूर कोई ‘अच्छी’ व्यवस्था होगी। अनंतपुर पहुँचने पर भी शराब के कई बार को छोड़कर आगे निकल जाने पर उन्होंने (क्षमा भाव से) कहा कि इन सड़कों पर अधिकतर यात्री पुरुष ही थे। अंत में हमें एक पेट्रोल पम्प मिला जहाँ महिलाओं के लिए अलग से शौचालय था, बस उसके दरवाजे की चिटकनी नहीं लगती थी। यहाँ पर मैंने शौचालय का प्रयोग किया और वहाँ सफ़ाई करने वाली एक बूढ़ी महिला ने इस दौरान दरवाजे को पकड़कर बंद रखे रखा। वापसी के सफ़र में, मैंने बहुत ही कम पानी पिया और राष्ट्रीय राजमार्ग 205 पूरा खत्म होने और दक्षिणी आंध्र प्रदेश में चित्तूर पहुँचने तक इंतज़ार किया। यहाँ एक कैफ़े कॉफ़ी डे में मुझे पुरुषों और महिलाओं के साझे शौचालय (जिसके दरवाजे में चिटकनी थी) को इस्तेमाल करने दिया गया बशर्ते कि मैं वहाँ कुछ खरीदूँ। यहाँ विडम्बना यह रही कि मैंने एक कॉफ़ी खरीदी, जो मूत्रवर्धक मानी जाती है।  

खैर, अपने इस अनुभव के बाद मैं सोच में पड़ गयी कि रास्ते में जहाँ भी पुरुषों के लिए शौचालय बने हुए हैं, वहाँ आखिर महिलाओं के लिए अलग से शौचालय बना देना कितना कठिन होगा? फिर मुझे यह ख्याल भी आया कि आखिर हमें अलग से दो तरह के शौचालय बनाने की क्या ज़रूरत होगी! क्यों नहीं महिलाएँ भी उसी शौचालय का उपयोग करें जिसका पुरुष करते हैं? 

मुझे लगता है कि महिलाओं के लिए शौचालय उपलब्ध कराने के लिए पहले यह ज़रूरी है कि हम यह मानें कि महिलाएँ भी दूसरी जगहों पर जाने के लिए घर से बाहर निकलती हैं। यह ज़रूरी नहीं कि हम हमेशा किसी दूसरे राज्य में जाने के लिए 11 घंटे का सफ़र ही करें। हो सकता है हम काम पर जाने के लिए घर से निकलें हों, अपने बेटे या बेटी को कहीं छोड़ने जा रहे हों, या फिर आसपास कहीं शॉपिंग करने या आस-पड़ोस में किसी से मिलने ही जा रहे हों। जैसा भी हो, वास्तविकता यह है कि महिलाओं को भी वक़्त-बे-वक़्त शौचालय जाने की ज़रूरत पड़ सकती है। चलिए अगर मासिक धर्म को छोड़ भी दें, लेकिन शौचालय इस्तेमाल करने की ज़रूरत महसूस होते ही इसके उपलब्ध होने की आवश्यकता को तो सभी मनुष्यों के लिए समझना ज़रूरी है, भले ही वे किसी भी जेंडर या सेक्स के हों। या फिर ऐसा तो नहीं कि हम महिलाओं के मूत्र विसर्जन के बारे में सोच कर ही इतने असहज हो जाते हैं कि हम यह मान लेना बेहतर समझते हैं कि ऐसा होता ही नहीं है। यहाँ मैं जल्दी से एक हिन्दी फ़िल्म, हाइवे का ज़िक्र करना चाहूंगी, जिसमें एक सीन में दिखाया गया है कि वीरा बनी आलिया भट्ट, जिन्हें एक ट्रक में बंधक बना कर रखा गया है, अचानक गायब हो जाती हैं और उन्हें अगुवा करने वाले व्यक्ति परेशान हो जाते हैं। ढूँढने पर यह व्यक्ति पाते हैं कि वीरा एक जगह ओट में बैठी पेशाब कर रही हैं। वीरा को देख यह व्यक्ति मन ही मन खुद को लज्जित भी महसूस करते हैं जबकि उन्होंने खुद भी हल्का होने के लिए ट्रक को रोका था। वीरा उनसे पूछती हैं कि उन्हें क्या लगता है, क्या वीरा को शौचालय इस्तेमाल करने की ज़रुरत नहीं महसूस हुई होगी? लेकिन अगुवाकार के पास वीरा की इस बात का कोई जवाब नहीं होता। 

इस तरह से अगर देखा जाए तो मूत्र विसर्जन करना भी जेंडर आधार पर विभाजित हो गया है। अपने से अलग जेंडर के व्यक्ति को ऐसा करते हुए देखना इतना असहज और शर्मसार करने वाला समझ लिया गया कि इस कार्य के लिए भी जेंडर भेद के अनुसार, महिला और पुरुषों के लिए अलग-अलग स्थान बना दिए गए हैं। लेकिन अगर देखा जाए तो हम ऐसी दुनिया में नहीं रहते जहाँ केवल दो ही जेंडर मौजूद हों और ऐसे में हम फिर एक बार उस प्रश्न पर आ कर रुक जाते हैं जिसे अनेक बार जेंडर सिद्धान्त विशेषज्ञों ने उठाया है कि, अगर पुरुषों और महिलाओं के लिए उनके जेंडर आधार पर अलग-अलग शौचालय बनाए जा रहे हैं तो ऐसे में कोई शिश्न धारी ट्रान्सजेंडर महिला, या कोई शिश्न रहित ट्रान्सजेंडर पुरुष किस शौचालय का प्रयोग करेंगे? अगर कोई व्यक्ति इंटर-सेक्स हों तो वह कहाँ जायेंगे? या फिर आप खुद से यह सवाल भी कर सकते हैं – क्यों नहीं हर कोई एक ही शौचालय का प्रयोग करे? या फिर जो भी उपलब्ध शौचालय हैं, उन्हें, और स्वयं को भी, इस तरह से तैयार किया जाए कि प्रत्येक जेंडर के लोग उनका प्रयोग सुविधाजनक तरीके से कर सकें। 

मुझे लगता है कि इस तरह की आशा करना वास्तव में युटोपियन या आदर्शवादी समाज की कल्पना मात्र ही होगी ख़ासकर तब जबकि हमारे देश में शौच के लिए बाहर निकलने पर भी महिलाओं को अनेक खतरों का सामना करना पड़ रहा है। पिछले कुछ महीनों में अनेक ऐसी खबरें आयीं हैं जिनसे पता चलता है कि किस तरह से रात को कोई महिला शौच के लिए बाहर निकली तो उन्हें अगुवा कर लिया गया या फिर उनका रेप हो गया। इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए हर घर में शौचालय बनाया जाना प्रस्तावित है। मुझे ऊटी में रहने वाली मेरी एक मित्र ने बताया कि उनके क्षेत्र में औरतें अपने घर पर भी परिवार के पुरुषों की जानकारी में शौचालय नहीं जाती, वे शौचालय का प्रयोग भी उसी समय (सुबह सवेरे मूंह अंधेरे या फिर रात में देर से) करती हैं जैसे वे खेतों में शौच के लिए जाती थीं।   

अलग-अलग शौचालय बनाने के अपने लाभ हैं, विशेषकर जब कि एक जेंडर को दूसरे जेंडर से खतरा महसूस होता हो। लेकिन इस पूरे कृत्य को सामान्य बना देने और इसे जेंडर भेद से दूर करने से संभव है कि महिलाओं को, जहाँ कहीं भी वे हों, प्रयोग के लिए आसानी से शौचालय उपलब्ध हो सकें। 

सोमेन्द्र कुमार द्वारा अनुवादित

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Cover Image: Moneylife.In

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Shweta's life is a little bit like a patchwork quilt. She started her career as a medical doctor, and then worked as a medical writer, producing multimedia content on sexual and reproductive health for several NGOs. Currently, she is a student of sociocultural anthropology, discovering the pleasures of being entangled with transnational and queer feminist scholarship and activism. She is grateful to the many people she has met in her life—family, friends, co-workers and mentors—who constantly push her to made her political views more and more nuanced. She hopes her writing reflects her openness to new modes of engaging with the world, and her curiosity about life. She writes about gender and sexuality both from her personal experiences, and from the academic interest she takes in the subtle textures of human experiences. She has called many places home in her life. Currently, she resides in Washington DC, USA and Chennai, India.

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