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सब कुछ पर्दे में है

शुभांगी कश्यप 

एक ऐसे समाज में जहाँ किसी व्यक्ति द्वारा अपनी यौनिकता की खुली अभिव्यक्ति कर पाना प्रतिबंधित हो और जहाँ जेंडर के बारे में पितृसत्ता के स्थापित मानकों को ही अपनाया जाता हो, वहाँ इस संबंध में किसी भी तरह के प्रयोग कर पाना आसान नहीं होता। स्कूलों में बच्चों के लिए व्यापक यौनिकता शिक्षा कार्यक्रम (CSE) के अभाव में, और यौनिकता जैसे विषय पर घर में भी माता-पिता से कोई बातचीत न हो पाने के कारण, बच्चों को अपनी किशोरावस्था की शुरुआत में अनेक तरह की कठिनाईयां आती हैं। युवावस्था के समय उन्हें अपने हमउम्र नवयुवाओं के साथ डेटिंग करने या संबंध बनाने जैसी बातों के बारे में कोई जानकारी नहीं होती।         

बढ़ती उम्र के बच्चे, उनके लिए किस तरह के व्यवहार सही हैं और कौन से काम उन्हें नहीं करने चाहिए, इस बारे में अपने इर्द-गिर्द के वातावरण से ही अनकही जानकारी पा लेते हैं। टेलिविजन पर सैनिटरी नैपकिन या कंडोम का विज्ञापन आते ही घर के बड़ों की घबराहट और शर्मिंदगी देख कर बच्चों को यह यह समझते देर नहीं लगती कि ये ऐसी वस्तुएँ हैं जिनके साथ एक तरह की शर्म का भाव जुड़ा रहता है। ऐसे ही बच्चों के मन में जेंडर से जुड़ी भूमिकाओं के बारे में जानकारी तब घर कर जाती है जब वे देखते हैं कि दिन भर काम करने के बाद दफ्तर से घर लौटे उनके पिता को माँ चाय परोसती हैं। युवा हो रहे बच्चों को हमेशा यह डर रहता है कि कहीं उनके माता-पिता को उनके डेटिंग करने और विपरीत जेंडर के साथ दोस्ती रखने के बारे में पता न चल जाए। और कहीं अगर माँ-बाप को उनके यौन व्यवहार के बारे में भनक लग जाए तो फिर भगवान ही बचाए! फिर तो न जाने परिवार की इज्ज़त का क्या होगा? आमतौर पर भारतीय परिवारों में यही बात बच्चों के मन में बैठा दी जाती है कि जीवन में अपना कैरियर बना लेने से पहले उन्हें किसी तरह के यौन-संबंध नहीं बनाने चाहिए क्योंकि ऐसा करने से उनके लक्ष्य को पूरा कर पाने में अड़चन और रुकावट हो सकती है। फिर भी, न जाने क्यों, किसी व्यक्ति के 25 वर्ष  का होते-होते (कभी-कभी तो 21 का होने पर ही) पूरा परिवार उसके लिए एक सुयोग्य जीवनसाथी की तलाश में जुट जाता है।      

मैंने जब 19 से 24 वर्ष की आयु के युवाओं से यह प्रश्न किया कि उन्हें सबसे पहले “सेक्स” के बारे में जानकारी कब और कैसे हुई थी, तो उनसे मिलने वाले उत्तर कुछ इस तरह के थे –  

“प्रजनन के तरीके के बारे में तो मुझे 12 साल की आयु में पता चल गया था, लेकिन सेक्स करना किसी व्यक्ति के लिए आनंदायक अनुभव होता है और उनकी मर्ज़ी पर निर्भर करता है, यह बात तो मुझे कॉलेज आकर ही पता चली जब मेरी उम्र 19 साल की थी। मुझे इस बारे में और बहुत कुछ सीखना है।” 

“मुझे पोर्नोग्राफी देख कर सेक्स के बारे में पता चला जब मेरी उम्र 12 साल की थी”।

“मुझे सेक्स के बारे में लगभग 15 या 16 साल की उम्र में पता चला। इससे पहले फिल्में और दूसरे कार्यक्रम देख कर मुझे यह तो पता था कि सेक्स क्या होता है लेकिन मुझे हमेशा लगता रहता था कि यह ज़रूर कोई निषेध या वर्जित विषय होगा क्योंकि मेरे इर्द-गिर्द कोई भी व्यक्ति इस बारे में कभी बात नहीं करता था। इस बात का ज़िक्र केवल तभी उठता था जब किसी लड़की को किसी के साथ सेक्स कर लेने पर शर्मिंदा किया जाना होता था”। 

आमतौर पर व्यक्ति के मन में यही विचार रहते हैं कि कौमार्य सुरक्षित रखना चाहिए और किसी के साथ तभी संबंध बनाए जाएँ अगर बाद में उनके साथ विवाह करना हो – लेकिन दूसरी ओर वे अनेक तरह की जानकारी मीडिया के माध्यम से और अपने हमउम्र लोगों के संपर्क में आकर भी प्राप्त करते हैं। उनकी उम्र में डेटिंग करने या संबंध बनाने के बारे में जानकारी पाना उनके लिए घर पर लागू होने वाले अनकहे और दक़ियानूसी नियमों की तुलना में ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। यौनिकता के बारे में उन्हें पता चलने वाली यह जानकारी उन सब बातों से बहुत अलग होता है जिन्हे मानने के लिए उन्हें मानसिक रूप से तैयार किया गया होता है। विषमलैंगिक सम्बन्धों के नज़रिए से यदि देखा जाए तो किसी दूसरे व्यक्ति की ओर यौनिक रूप से आकर्षित हो जाना, उन्हें प्रेम करने लगना, पहली बार किसी को किस करना या पहली बार सेक्स करना और इसका मज़ा लेना आदि, ये सब ऐसी घटनाएँ हैं जिनकी उम्मीद एक उम्र में की जा सकती है। लेकिन वे लोग जो खुद को विषमलैंगिक नहीं मानते या जन्म के समय मिली जेंडर पहचान के अनुरूप व्यवहार नहीं रखते, ऐसे लोगों के मन में इन सब घटनाओं को देख-सुन कर अजीब कौतूहल हो सकता है और अनेक तरह के भाव उनके मन में उत्पन्न हो सकते हैं। किशोरों के लिए जीवन में नए अनुभव अनेक बार इसलिए भी उन्हें परेशान कर देते हैं क्योंकि यह नया सब कुछ उनकी उन मान्यताओं से बहुत अलग होता है जो उन्होंने अभी तक देखा और सुना होता है। ऐसे में अगर किशोर किसी भी तरह की दुविधा होने पर अगर अपने माता-पिता से इस बारे में पूछें तो आपस में बातचीत का एक बहुत ही सुरक्षित तरीका सामने आता है जहाँ उनकी सभी समस्याओं का निवारण और प्रश्नों के उत्तर उनके अविभावक दे सकते हैं। लेकिन अगर माता-पिता या बड़ों से बातचीत कर पाने की स्थिति न हो तो ऐसे में ये किशोर खुद को बड़ी ही दुविधा में घिरा पाता हैं जहाँ उनके प्रश्नों के उत्तर उन्हें नहीं मिल पाते। 

ऐसे में अपने प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए किशोर वे सब काम करने के इच्छुक हो जाते हैं जिनकी उन्हें मनाही की गयी होती है। ऐसा कर लेने पर उनके मन में शर्मिंदगी और अपराधबोध बहुत गहरे से घर कर जाता है। किसी भी नवयुवा के लिए यह बहुत ही भ्रामक और तकलीफ़देह स्थिति होती है क्योंकि किसी भी एक काम को करने का अर्थ होगा कि उन्हें पहले से तय दूसरी मान्यताओं का उल्लंघन करना पड़ेगा और वे खुद को इस तरह उल्लंघन कर पाने की स्थिति में नहीं पाते। अगर कोई नवयुवा सेक्स अथवा दूसरी यौन गतिविधि में शामिल होते हैं तो निश्चित है कि इसके बारे में जानकार उनके माता-पिता नाराज़ अथवा दुखी होंगे और अगर वह सेक्स से दूर रहते हैं तो वे अपने हमउम्र साथियों की नज़र में पिछड़ा हुआ और दक़ियानूसी कहलाते हैं। इस तरह से, आनंद पाने की इच्छा, अपराधबोध की एक मोटी तह तले दब जाती है जहाँ व्यक्ति आनंद तो पाना चाहता है लेकिन मन में कुछ “अनैतिक या गलत” कर गुजरने की भावना उसे लगातार झकझोरती रहती है।   

फिर मैंने जब 19 से 24 वर्ष की आयु के युवाओं के इसी समूह से यह प्रश्न किया कि क्या उन्हें डेटिंग करना या यौन संबंध बनाना ‘कुछ गलत’ लगता है, तो उनसे मिलने वाले उत्तर कुछ इस तरह के थे –

“हाँ, अपने पहले बॉयफ्रेंड के साथ जब मैंने पहली बार किस किया तो लगा कि मैं बहुत गलत कर रही हूँ, ऐसा इसलिए नहीं था क्योंकि मेरा यह किस मेरी इच्छा के बिना या जबर्दस्ती किया गया था। बस उस समय मुझे ऐसा करना गलत लगा था। इस तरह की स्थिति में खुद को पाना बहुत ही अजीब सा होता है क्योंकि देखा जाए तो इसमें गलत कोई भी नहीं है। अब जब मैं पीछे मुड़ कर देखती हूँ तो लगता है कि अगर आपको कभी भी ऐसे गलत लगे तो आपको चाहिए कि आप रुक जाएँ क्योंकि शायद आप सही ओर कदम नहीं बढ़ा रहे होते हैं”। 

हाँ, अपने घर के माहौल और माता-पिता के विचारों के चलते गलत लगा था और मुझे खुद को भी महसूस हुआ था कि इन सब कामों के लिए मेरी उम्र अभी ‘बहुत कम’ है”। 

मुझे लगा था कि मैंने कुछ तो गलत किया है और बहुत से लोगों की उम्मीदों और अपनी खुद की उम्मीदों को भी तोड़ा है। अब उस बारे में सोचने पर लगता है कि उस समय मुझे ऐसा इसलिए लगा था कि सेक्स में मज़ा पाने को आज भी अच्छा नहीं समझा जाता और किसी के साथ शारीरिक संबंध बनाना शायद मुझे भी ‘गंदा’ और ‘अपवित्र’ लगा था। विचित्र बात यह है कि मुझे यह भी पता है कि यौन सुख पाने या सेक्स में आनंद पाने में कुछ भी गलत नहीं है। लेकिन हमारे मन में ये भावनाएँ इतनी गहरी बैठी हुई हैं कि आज भी इस बारे में सोचकर मुझे ग्लानि होती है”। 

किसी व्यक्ति को मन ही मन चाहना, उनके साथ डेट पर जाना या छिप कर उनके साथ शारीरिक अंतरंगता रखना आजकल भारत में आम बात हो गई है। लेकिन फिर भी, माता-पिता जानबूझकर इस वास्तविकता से अनभिज्ञ बने रहते हैं क्योंकि वे इस बारे में किसी तरह की चर्चा नहीं करना चाहते। पुराने विचारों के माता-पिता तो आज भी अपने बच्चों के डेटिंग करने या अपना जीवन साथी खुद चुनने का विरोध करते हैं। भारत के अनेक भागों में माता-पिता द्वारा अपने बच्चों के लिए वर या वधू तलाश कर उनका विवाह करवाना, आज भी प्रचलित नियम या तरीका बना हुआ है

मैंने जब नवयुवाओं के उस समूह में उत्तर देने वालों से पूछा कि क्या उन्हें यह सोच कर डर लगता है कि कहीं उनके माता-पिता को उनके प्रेम सम्बन्धों और / या सेक्स सम्बन्धों के बारे में पता चला को क्या होगा? इसपर उनके उत्तर इस प्रकार थे – 

“मुझे आज भी यह सोच डर लगता है कि कहीं मेरे माता-पिता को मेरे प्रेम-सम्बन्धों की भनक न लग जाए। मेरे माता-पिता, खास कर मेरे पिताजी, प्रेम संबंध बनाने को अच्छा नहीं मानते। उन्हें लगता है कि प्रेम संबंध बनाने से बच्चों का ध्यान अपने कैरियर को सँवारने की ओर से हट जाता है। मेरी माँ को लगता है कि एक बारे कैरियर बना लेने का बाद डेटिंग करने में कोई हर्ज़ नहीं है। अगर मेरे पिताजी की मर्ज़ी चली तो शायद मेरी शादी भी मेरे माता-पिता द्वारा चुने गए जीवन साथी से होगी”। 

“हाँ बिलकुल। हमें यह बताया गया था, या बताया नहीं बल्कि यह मान लिया जाता था कि बचपन में हमारा एकमात्र काम केवल पढ़ाई पर ध्यान देना होता है और हमें वही काम करने हैं जो एक 16 वर्ष के व्यक्ति को करने चाहिए। दूसरे किसी व्यक्ति के साथ डेटिंग करना हमारा काम नहीं था और किसी के साथ सेक्स करने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। मुझे तो खुद यह सोच कर हमेशा डर लगता था कि कहीं मेरे माता-पिता को मेरे क्विअर होने की जानकारी हो गयी तो क्या होगा। इस तरह से मेरे लिए तो यह भी एक अतिरिक्त डर था”। 

“नहीं, अपने माता-पिता के साथ मेरे संबंध बहुत खुले हैं और हम किसी भी और कैसे भी विषय पर बातचीत कर सकते हैं”।

“मेरे माता-पिता उदारवादी प्रगतिशील प्रकृति के हैं। उन्हें इस बात से ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता कि मैं किसी के साथ डेटिंग करूँ। लेकिन फिर भी उन्हें यह कभी भी अच्छा नहीं लगेगा अगर उन्हें पता चले कि मेरे किसी के साथ सेक्स संबंध भी हैं”।

मेरे प्रश्नों का उत्तर देने वाले अधिकतर उत्तरदाताओं ने बताया कि कुछ पता न होने की स्थिति में वे अपने मित्रों या हमउम्र लोगों से सलाह लेते हैं। आनंद या मज़ा लेने और फिर अपराधबोध होने के बीच की सीमाओं को समझना, सम्बन्धों में सहमति के होने को जानना, संबंध बनाने की आतुरता होते हुए भी केवल परिवार के भय के कारण पीछे हटना आदि – ये सब कुछ ऐसी स्थितियाँ हैं जिनका सामना आज भारत का कोई भी किशोर या नवयुवा करते हैं और खुद ही इन दुविधाओं को पार करने की कोशिश में लगे रहते हैं। लेकिन इस स्थिति से बचना बहुत हद तक संभव है और यह बिलकुल ज़रूरी नहीं है कि किशोर खुद को ऐसी परिस्थितियों में अकेला पाएँ। अगर अविभावकों, माता-पिता और बच्चों के बीच यौनिकता के बारे में खुल कर और ईमानदारी से बातचीत हो सके तो न केवल ये सभी बाधाएँ दूर सकती हैं बल्कि किशोरों और नवयुवाओं को शर्मिंदगी और अपराधबोध का सामना भी नहीं करना पड़ेगा।    

सोमेन्द्र कुमार द्वारा अनुवादित 

To read this article in English, please click here.

 

Cover Image: Pixabay

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Shubhangi is a graduate in Psychology (Hons) from the University of Delhi. She is working to raise mental health awareness through online and offline campaigns. Being an avid reader and indulging in artistic avenues helps her to make sense of the world. She is interested in issues of gender and sexuality to understand how years of patriarchal conditioning plays out in her life. With every new opportunity, she hopes to explore, learn, and unlearn.

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