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इससे पोर्न (कामुक सामग्री) का क्या लेना देना? भारत में नारीवाद, यौनिकता, पोर्नोग्राफी और मर्दानगी

 मैं अपनी एक अमेरिकन दोस्त के साथ बातचीत कर रहा था जो स्वयं को दूसरी लहर की नारीवादी मानती हैं और इसीलिए सभी मुख्यधारा की पोर्नोग्राफी और यौन कर्म को महिलाओं का दमन मानती हैं। चर्चा के दौरान उन्होंने यह सवाल सामने रखा ‘क्या आपको लगता है कि क्योंकि अधिकतर आसानी से उपलब्ध पोर्न में पश्चिमी गोरी महिला को दिखाया जाता है इसीलिए भारत जैसे विकासशील देश में जब पुरुष किसी पश्चिमी महिला को अकेले यात्रा करते देखते हैं तो उन्हें लगता है कि वह महिला यौन शोषण और यहाँ तक कि बलात्कार का शिकार बनाई जा सकती है?’ १९८० और १९९० के दशक में नारीवाद की दूसरी लहर की प्रतिक्रिया में उभरे जेंडर, क्वीयर और नारीवाद के अपने ज्ञान के आधार पर मैंने प्रत्युत्तर देते हुए कहा ‘गोरे पुरुष सम्पूर्ण ब्रिटिश राज के इतिहास में अपनी इच्छा से भारतीय महिलाओं का बलात्कार और यौनिक दमन करते रहे, और यह इन्टरनेट के आविष्कार से पहले और पोर्नोग्राफी के उद्योग में तब्दील होने से पहले की बात है’।

निसंदेह, यह जानने के लिए कि किस तरह नारीवाद की दूसरी लहर महिलाओं की असमानता को जाती, यौनिकता, जेंडर, और उपनिवेशीय पहचान के आधार पर हाशिए पर खड़े लोगों की तुलना में विशेष अधिकार देती थी, हमें ब्रिटिश काल के पश्चात् की अंतर्राष्ट्रीय, नारीवाद की तीसरी लहर के पांडित्य (i.e. the writings of Gloria Anzaldúa, bell hooks, Cherríe Moraga, Audre Lorde, Gayle Ruben, Chandra Talpade Mohanty, Inderpal Grewal and Karen Caplen) के परे देखने की आवश्यकता नहीं है।

इसमें कोई संदेह की बात नहीं है कि स्मार्ट फ़ोन सहित डिजिटल मीडिया तकनीकों के नए उभरते प्रारूप ने पोर्नोग्राफी की उपलब्धता को आसान बना दिया है और नए यौनिक अनुभवों को सुगम कर दिया है जो पहले संभव ही नहीं थे (ग्रिंडर, टिंडर, व्हाट्स-ऐप, स्नैपचैट आदि)। भूमंडलीकरण के नाम पर भारतीय अर्थव्यवस्था की आर्थिक विमुक्ति की इस मौजूदा स्थिति में जानकारी और मीडिया (कामुक या अन्य कोई भी) का प्रसार किसी भी एक राष्ट्र के नियंत्रण से बाहर है, चाहे वह हमारी सांस्कृतिक संवेदनशीलता के लिए कितना भी अरुचिकर क्यों न हो। जिनी अब बोतल से बाहर निकल चुका है और समाज की बलशाली आवाजों की तमाम वाचाल वाक्पटुता और सेंसर व्यवस्था की धमकी के बावजूद उसे वापस बोतल में बंद नहीं किया जा सकता है। मुद्दा अब ये रहा ही नहीं कि क्या डिजिटल मीडिया और तकनीक इच्छा, आत्मीयता और यौनिकता पर हमारी समझ को परिवर्तित कर सकेंगी या नहीं, असली सवाल है कि कितना और किस हद तक।

आजकल अक्सर ही मेरा मिलना ऐसे भारतीय नारीवादी और सक्रियतावादियों से हो रहा है जो पोर्नोग्राफी की उपलब्धता को भारतीय पुरुषों के यौन शोषण और बलात्कार करने से जोड़ कर देखते हैं, ठीक वैसे ही जैसे मेरी अमेरिकन मित्र ने संकेत किया था। और लगातार मैं अपनेआप को पुरुषों और उनके पोर्न देखने के अधिकार का समर्थन करते हुए पाता हूँ। पोर्नोग्राफी के प्रसार और यौन शोषण की समस्या में सीधे सम्बन्ध की कल्पना करना ना केवल महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा और बलात्कार के उन अनगिनत कारणों को नज़रंदाज़ करने का जोखिम प्रस्तुत करता है जो इसकी व्यापकता में योगदान देते हैं, ऐसे तर्क सभी पुरुषों को मानवता एवं साधन से वंचित कर देते हैं और मानते हैं कि वे अपने शरीर के गुलाम हैं। सुर्ख़ियों में रहे गैंग रेप के कुछ मामलों के आलावा, जिन्होंने पूरे विश्व का ध्यान भारत में महिलाओं के खिलाफ़ हो रही यौन हिंसा की ओर खिंचा है, महिलाओं एवं अन्य जेंडर अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ यौन हिंसा एक ऐसी समस्या है जो इन्टरनेट और पोर्नोग्राफी के प्रसार के ज़माने के पहले से चली आ रही है। जैसा कि निवेदिता मेनन जैसी नारीवादियों ने अर्थपूर्ण ढंग से तर्क प्रस्तुत किया है, यौन हिंसा या जेंडर आधारित हिंसा की समस्या का सीधा सम्बन्ध दंडाभाव और पीड़ित व्यक्ति को दोषी ठहराने की संस्कृति से है जो पूरे भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था और भारतीय समाज में फैली हुई है।

 


भारत में यौन हिंसा और जेंडर असमानता को हाल में मिली तवज़्ज़ो के बावजूद भारतीय मर्दानगी पर महत्वपूर्ण विचार-विमर्श सार्वजानिक संवाद से अभी भी अनुपस्थित है। बलात्कार और यौन हिंसा पर चर्चा केवल महिला मुद्दों के क्षेत्र में ही स्थिर रहती है और इसमें पुरुषों के जीवन और अनुभवों को शामिल नहीं किया जाता है। जैसा कि नारीवादी विद्वान बेल हुक्स का कहना है, यदि हम अपने जीवन के पुरुषों में बदलाव चाहते हैं और चाहते हैं कि वे अधिक प्यार करने वाले, देखभाल करने वाले और न्यायसंगत साथी, भाई, पिता और पुत्र बने, तो हमें उन्हें वही संवेदना और समझदारी प्रदान करनी होगी जो नारीवादी कार्यक्रम उनसे चाहते हैं। जहाँ दूसरी लहर के नारिवादिओं ने ज़्यादातर इस ख्याल को नकार दिया, तीसरी लहर की नारीवादी सोच ने क्वीयर और जेंडर विषय की विद्यता के साथ पुरुषों के जीवन पर चर्चा को प्रवेश प्रदान किया जो उन्हें स्वतः ही ‘शोषणकर्ता’ और महिलाओं के ‘मान’ के ‘रक्षक’ के इन दो वर्गों तक सीमित नहीं रखती। पुरुषों के साथ एक स्वस्थ, समर्थन प्रदान करने वाले सम्बन्ध के लिए हमें मर्दानगी की अपनी समझ जटिल करनी होगी और यह समझ भी कि पुरुष कैसे पुरुष बनना सीखते हैं।

पुरुष बनना सीखने की प्रक्रिया उतनी ही जटिल और हिंसक हो सकती है जितना महिला बनना सीखने की प्रक्रिया। भारतीय पुरुषों में पोर्नोग्राफी का प्रचलन होने के बावजूद, मैं अपने शोध के दौरान कई ऐसे नवयुवा पुरुषों के संपर्क में आया जिन्होंने पोर्नोग्राफी और अन्य प्रचलित मीडिया जैसे संगीत विडियो और बॉलीवुड फिल्मों में विषमलैंगिक पुरुषों के प्रतिनिधित्व पर एतराज़ की भावना जताई है। जहाँ पोर्न स्टार मर्दानगी की एक चरम सीमा का प्रतिनिधित्व करते हैं वहीँ वे हमारी संस्कृति में प्रचलित मर्दानगी के प्रतिनिधि जैसे फिल्मस्टार सलमान खान या हिप हॉप कलाकार यो यो हनी सिंह से मूल रूप में अलग नहीं हैं। पितृसत्तात्मक समाज के अंतर्गत पुरुष विज्ञान (मेन्स स्टडीज) के ज्ञाता इसे ‘मुख्य धारा की मर्दानगी’ के रूप में परिभाषित करते हैं, जो इस प्रकार के अभ्यास के रूप में समझी जाती है जिसे वे मर्द प्रस्तुत और अभिनीत करते हैं जो सामाजिक वर्गीकरण में सबसे ऊपर हैं और महिलाओं और यौन एवं जेंडर अल्पसंख्यकों पर नियंत्रण बनाए रखना चाहते हैं। पुरुषों के साथ उनके रोजमर्रा के जीवन पर चर्चा करने पर यह साफ़ हो जाता है कि कुछ ही पुरुष मुख्य धारा की मर्दानगी में फिट होते हैं। प्रभावी, बलशाली, विषमलैंगिक, सफ़ल, स्वाधीन, पितृसत्तात्मक पुरुष केवल टीवी, फिल्मों और पोर्नोग्राफी में ही पाए जाते हैं। ये प्रतिनिधित्व शायद ही कभी पुरुष के जीवंत अनुभवों को प्रतिबिंबित करते हैं जो लगातार पारिवारिक जिम्मेदारियों, सामाजिक भूमिकाओं, आर्थिक विपत्ति और यौनिक अपेक्षाओं में स्वयं को लाचार पाते हैं।

अधिकतर विषमलैंगिक पुरुष ‘सह-आपराधिक मर्दानगी’ के वर्ग में आते हैं। जहाँ वे प्रभुत्व और महिला के दमन की प्रक्रिया में सीधे भागिदार नहीं होते हैं, वे उन विशेष अधिकारों और पुरुस्कारों का लाभ उठाते हैं जो हमारे समाज में पुरुष होने पर मिलते हैं और पितृसत्तात्मक ढांचे को बनाए रखने लिए ज़िम्मेदार हैं। वे पितृसत्ता की इस पराधीनता और सह-आपराधिकता की एक भारी कीमत भी चुकाते हैं। जैसा कि समाजशाश्त्री और मनोवैज्ञानिक कहते हैं पूरे विश्व के पितृसत्तात्मक ढांचे में पुरुष बनने के औपचारिक और अनौपचारिक तरीके में अक्सर भावनात्मक, शारीरिक और/ या यौनिक हिंसा शामिल होती है।

भारत में युवा उरुष अक्सर ही एक दूसरे की मर्दानगी को नियंत्रित करने के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं जो उनकी मर्दानगी पर सवाल उठाएं। सामजिक व्यवस्था जैसे मिलिट्री, स्थानीय बिरादरी और बोर्डिंग स्कूल में प्रचलित पुरुषों के बलात्कार एवं यौन शोषण के प्रति हमारे समाज का सामूहिक विस्मरण युवा पुरुषों को हिंसक अपराधी बनाने में इन्टरनेट पर उपलब्ध सबसे विचित्र पोर्नोग्राफी की तुलना में कहीं ज्यादा ज़िम्मेदार है। यह भी ध्यान में रखना आवश्यक है कि भरात के गरीब और वैतनिक वर्ग के लड़कों में पुरुषों का पुरुषों के द्वारा यौन शोषण एक सामान्य बात है, क्योंकि इस तरह की हिंसा सामजिक अनुक्रम को नियंत्रित करने के तरीके हैं। इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि सैनिक बल अपने नियंत्रण में आने वाले जन समूह को वश में करने के लिए और उन्हें दबाने के लिए बलात्कार, विशेषकर पुरुषों के साथ बलात्कार, का इस्तेमाल करते हैं। यौन शोषण से पीड़ित पुरुषों को शायद ही वो सहारा और स्वीकृति मिलती हैं जो (कुछ) महिलाओं को मिलती है। बल्कि उनका उपहास किया जाता है और वे मज़ाक के पात्र बन जाते हैं, उनकी मर्दानगी पर सवाल उठाए जाते हैं और उन्हें नियमित रूप से चुप करा दिया जाता है। नतीज़ों की कोई समझ के बिना और किसी स्वीकृति के बिना, इस तरह की यौन हिंसा का समावेशन पीड़ितों को इसी प्रकार की हिंसा दूसरो के साथ करना सिखाता है। ये केवल भारत की विशेष समस्या नहीं है। हाल ही में अमेरिका में हुई सामूहिक गोलीबारी की घटना जिसमें अकेले बंदूकधारी ने अमरीका के स्कूलों में संवेदनहीन हत्याएं की हैं, हेज़िंग की संस्कृति से सीधे सम्बंधित हैं और स्वस्थ मर्दानगी और यौनिकता पर महत्वपूर्ण चर्चा की कमी को दर्शाती हैं।

पुरुष, चाहे उन्होंने जहाँ भी जन्म लिया हो, कभी भी हावी होने वाले या हिंसक के रूप में नहीं जन्म लेते हैं। पुरुष और महिला बनना सीखने में सामजिक प्रक्रियाओं और परिस्थितियोँ की एक लड़ी शामिल होती है जो जेंडर एवं यौनिक व्यक्तिपरकता के पूरे विस्तार का निर्माण करती है। मेरे अनुभव में, पुरुष के यौनिक विकास को प्रभावित करने में पोर्नोग्राफी और अन्य प्रचलित दृश्य मीडिया की भूमिका उन असंख्य अन्य विषयों की तुलना में बहुत कम है जिनपर हमें ध्यान देने की आवश्यकता है जैसे यौन हिंसा को सही तरीके से सम्बोधित करना, व्यापक यौनिकता शिक्षा मोहिया करना, और युवा लड़कों को इस प्रकार का पालन पोषण करना और भावनात्मक समर्थन देना कि वे बड़े होकर आदर करने वाले, प्यार करने वाले और संवेदनशील पुरुष बन सकें।

पोर्नोग्राफी बस एक अन्य प्रकार की लिखित/दृश्य प्रस्तुति है जिसको ज़िम्मेदारी के साथ भी उपयोग किया जा सकता है या इसे दूसरों के ऊपर हिंसा करने के साधन के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। मुख्यधारा की तुलना में ‘बदला लेने वाले पोर्न’ (रिवेंज पोर्न) का प्रचलन हमारी समाहिक अवचेतना के लिए अधिक परेशान करने वाला होना चाहिए जिसमें एक ठुकराया हुआ पूर्व-प्रेमी अपनी अंतरंग तस्वीरों और वीडियो को साथी को निचा दिखाने के उद्येश्य से सार्वजानिक कर देता है। भारतीय दंड संहिता के सूचना एवं तकनीकी अधिनियम के २००८ के संसोधन में बदला लेने वाले या रिवेंज पोर्न को अपराध करार दिया गया है और इस पर पांच वर्ष तक का कारावास हो सकता है, इसके बाद भी बदला लेने वाले पोर्न के अधिकतर केस अक्सर रिपोर्ट नहीं होते या उनकी तफ्तीश नहीं की जाती है।

इस भूमण्डलीकरण/ इंटरनेट युग की दुविधा यही है कि यह हम पर तस्वीरों और जानकारी की बौछार कर देता है पर ऐसे कोई साधन नहीं प्रदान करता जिससे हम ये फर्क कर सकें की क्या जानकारी है और क्या (सही शब्द के आभाव में) मनोरंजन। एक नारीवादी पहुँच युवा पुरुषों को व्यापक सेक्स-सकारात्मक शिक्षा प्रदान करने के साथ उन्हें ऐसे साधन प्रदान करती है जिससे वे मुख्यधारा वाली मर्दानगी की प्रचलित प्रस्तुति की आलोचना कर सकें। सेंसर करने के बजाए, जोकि बार-बार बेअसर साबित हुआ है, यदि हम युवा पुरुषों को व्यापक सेक्स-सकारात्मक शिक्षा के साथ-साथ उस हुनर का अवसर प्रदान कर सकें जिससे वे दृश्य मीडिया का विवेकपूर्ण ढंग से इस्तेमाल कर सकें तो अनपेक्षित प्रभाव और युवा लोगों में अयोग्यता की भावना को कम किया जा सकता है जो पोर्नोग्राफी या यो यो हनी सिंह के गाने देखने से उत्पन्न हो सकती है।

प्रस्तावित लेख

The Will to Change by bell hooks (2004)

Dude You’re a Fag by CJ Pascoe (2007)

Seeing Like A Feminist by Nivedita Menon(2012)

Role of Honour by Amandeep Sandhu (2012)

प्रस्तावित फिल्म

Tough Guise by Jackson Katz (1999)

Mardistan (Macholand) by Harjant Gill (2013)

The Mask You Live In by Jennifer Siebel Newsom (2015)

TARSHI कि दीपिका श्रीवास्तव द्वारा अनुवादित

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Article written by:

Harjant Gill works as Assistant Professor of Anthropology at Towson University, Maryland, USA. He received his PhD from the American University. His research examines the intersections of masculinity, modernity, transnational migration and popular culture in India. Gill is also an award-winning filmmaker and has made several ethnographic films that have screened at film festivals, academic conferences and on television networks worldwide including BBC, Doordarshan and PBS. His website is www.tilotamaproductions.com.

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