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हँसे या न हँसे?

अगर आप उसपर हँस सकते हैं तो सब कुछ मज़ाकिया है।”

लुईस कैरोल

लुईस कैरोल को अधिकार-आधारित परिप्रेक्ष्य वाला माना जा सकता है क्योंकि वह हर किसी की हँसने की ताकत (एजेंसी) की पुष्टि करते हैं। लेकिन, हर किसी को हर बात मज़ाकिया नहीं लगती है, और ये हमें मानहानि के दावों की बढ़ती संख्या, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े कानून और हास्य में रूढ़िवादी तरीकों के प्रयोग पर विभिन्न समूहों द्वारा विरोध में स्पष्ट रूप से दिखता है। नारीवादी के रूप में, यह हमें कभी-कभी एक बेहद मुश्किल स्थिति में डाल देता है – क्या चुटकुले बुरे होते हैं? क्या चुटकुले लैंगिकवादी (सेक्सिस्ट) होते हैं? और यदि होते हैं, तो हम हास्य को पुनः कैसे हासिल करें, और क्या हास्य में अपमानजनक होने के अलावा कुछ और अधिक होने की संभावना है?

मैं उस तरह के हास्य की बात करने की कोशिश कर रही हूँ जिसमें संस्कृतियाँ बनाने की क्षमता है। कुछ सिद्धांतवादी इसे रिलीफ थ्योरी कहते हैं, जहाँ हास्य को प्रबल प्रणालियों का मज़ाक उड़ाने के मौके की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है, और हास्य उन मुद्दों पर प्रवेश बिंदु या चर्चा शुरू करने का मौका हो सकता है जिनके बारे में आम तौर पर बात नहीं की जाती है। तब प्रणालियों या व्यवस्थाओं में, हास्य अपनी स्वयं की उप-संस्कृतियों और परिभाषाओं को बनाने का अवसर बन जाता है। लोकप्रिय संस्कृति (पॉपुलर कल्चर) हास्य का उपयोग संदर्भ देने/प्रस्तुत करने के लिए आधार के रूप में करती है। आदर्श बालक से जुड़ा पोस्टर अभियान विभिन्न दृष्टिकोण के लोगों के बीच बातचात शुरू करने का एक अच्छा ज़रिया बन गया। हास्य को परिभाषित करने की प्रवृत्ति आम है हालाँकि हम सभी जानते हैं कि स्पष्टीकरण हास्य को ख़त्म कर देते हैं। यह इसे व्यक्तिपरक होने की एक अनूठी सुंदरता देता है, और साथ ही भावना और संवेदनशीलताओं के लिए जगह छोड़ देता है।

ऐसे कई तरह के चुटकुले हैं जो साझा होते रहते हैं। ऐसे चुटकुले जिन्हें हम सुनते हैं, समझते हैं और जिनके बारे में सोचते हैं। चुटकुले जिनपर हम हँसने का फैसला करते हैं और चुटकुले जो हमें बुरे लगते हैं और जिनपर हम नाराज़ होने का फैसला करते हैं। हम अपने बारे में, अपनी आदतों के बारे में मज़ाक करते हैं, और फिर हम चुटकुलों का इस्तेमाल विध्वंसक रूप में, उन चीजों के बारे में बात करने के लिए करते हैं जिनके बारे में हम शायद ही बात कर सकते हैं। हास्य कई स्थितियों के लिए प्रवेश बिंदु है जहाँ से हम वर्जित विषयों के बारे में बात कर सकते हैं, और हास्य के ज़रिए हम दमनकारी विषयों पर पलटवार और उपहास कर सकते हैं। कभी-कभी उपहासित ही हमारे साथ हँसता है और कभी-कभी इन चुटकुलो की क्षमता का विरोध करता है।

एक साल पहले चार्ली हेब्डो के विवाद में हास्य जकड़ा गया था। हमने हास्य के अपने अधिकार के लिए लड़ाई की, हमने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ा, और यह एक नागरिक के अधिकारों का मामला बन गया। व्यंग्य का अधिकार; आलोचना का अधिकार; एक प्रणाली की खिल्ली उड़ाने का अधिकार। यह एक आक्रामक कृत्य, एक हमलावर कृत्य बन गया। ग्रीक दार्शनिक प्लेटो ने अपने रिपब्लिक में मनोरंजन का वर्णन एक भावना के रूप में किया है जिससे हंसी जन्म लेती है जो अन्य हिंसक भावनाओं के जन्म और स्वयं पर नियंत्रण खोने की ओर ले जाती है। प्लेटो वास्तव में हास्य के बड़े प्रशंसक नहीं थे और हास्य में कोई अच्छी संभावना नहीं देखते थे।

हँसे या न हँसे?

फिर भी, क्या हम उप-संस्कृतियों के संदर्भ में हास्य के बारे में सोच सकते हैं, क्या पता हास्य घाव भरने का तरीका बन जाए,  क्या पता इसमें चीजों/विषयों के बारे में चर्चा करने, और उप-संस्कृतियाँ पैदा करने की संभावना हो तो? हास्य की अपनी प्रकृति ही उल्लंघनकारी है, यह सीमाओं के बाहर काम करता है; क्या इसके सहज या अन्तर्निहित तत्वों को हाशिए की कथाओं को शामिल करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है? क्या हास्य को हाशिए पर मुद्दों और जो मुद्दे ‘फोकस’ में या चर्चा के केंद्र में नहीं हैं उनके लिए प्रवेश बिंदु के रूप में देखा जा सकता है? भारतीय संदर्भ में यौनिकता पर चर्चा विभिन्न रूप ले रही है। हम पूंजीवादी बाजारों को सेवाएँ प्रस्तुत करते देखते हैं, हम बहुत सारे चैनलों को सेक्स से जुड़े मुद्दों पर शो बनाते देखते हैं, और हम बच्चों को गुप-चुप तरीके से इसके बारे में बात करते हुए देखते हैं। जो हम नहीं देखते हैं, वह है इसके बारे में बात करने में सहजता, हम इस विषय को हमेशा एक भारी विषय के रूप में ही देखते हैं, लोग जिस तरह से इसके बारे में मज़ाक करते हैं हमें उसमें अंतरंगता नहीं दिखती है, और यही वह जगह है जहाँ हास्य एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

लोकप्रिय कॉमेडी समूह ऑल इंडिया बकचोद के हास्य वीडियो पोस्ट करने के कारण #SaveNetNeutrality बहस के बारे में लोगों के बीच चर्चा बढ़ी।  विरोध प्रदर्शन या खिल्ली (शुद्ध देसी रोमांस) के रूप में सड़कों पर हास्य ही था, जो पुलिस और रुढ़िवादी चरमपंथियों को सड़कों पर प्यार का सामना करने के लिए लाया। यह पिंक चड्डी अभियान का हास्य ही था जो कंसोर्टियम ऑफ पब-गोइंग, लूज एंड फॉरवर्ड विमेन को सार्वजनिक मंच पर लाया। पिछले कुछ वर्षों से ऑनलाइन दुनिया मीम और ट्रोल से भर सा गया है जो कभी-कभी युद्ध क्षेत्र की तरह लग सकता है। प्रत्येक स्थिति चित्र और आलेख की मदद से सरल कर प्रस्तुत कर दी जाती है, और हास्य इन सब विचारों के परिपक्व होने के लिए नींव रखता है। यह वह जगह है जहाँ हम इन स्थानों को पुनः प्राप्त करने के बारे में सोच सकते हैं जो सेक्सिस्ट, नस्लवादी, समलैंगिकता पर नकारात्मक विचारों (होमोफोबिया) के चुटकुलों से भरे हुए हैं। हम अक्सर किसी भी मुद्दे के आसपास धारणाओं को बदलने के लिए कानूनों और नीतियों की ओर देखते हैं, ज़्यादातर हिंसा के पहलू पर ध्यान केंद्रित करते हैं, खासकर यौनिकता के मुद्दों के आसपास। हास्य वह वैकल्पिक स्थान हो सकता है जहाँ हम यौनिकता से जुड़ी विषय सामग्री बनाएँ और इसे सभी के लिए सुलभ बनाएँ। स्पूफ़, मीम, और पंच लाइनों के साथ इंटरनेट की बाढ़ यौनिकता के आसपास सकारात्मक बातचीत को बढ़ावा देती है। कई घटनाओं में, लोगों ने सीधे टकराव के बजाय हास्य का रास्ता लिया है। उदाहरण के लिए, जब गायक यसुदास ने जींस पहनने के लिए मलयाली लड़कियों की आलोचना की, जिसे उन्होंने कहा कि ‘भारतीय संस्कृति’ में उचित नहीं है, तो लड़कियों ने जवाब में खुद के मुंडू – जो किसी समय पर केरल में महिलाओं द्वारा पहना जाता था – पहने हुए चित्रों को ऑनलाइन पोस्ट किया था।

इसी तरह, जब बेल्जियम पुलिस ने 2015 में पेरिस, बेरूत और बगदाद में एक साथ हमलों के बाद आने जाने पर प्रतिबंध जारी किए, तो लोगों ने ट्विटर पर बिल्लियों के मीम भेजे और सुनिश्चित किया कि उनके शहरों में भय का वातावरण न बने।

क्या चुटकुले नारीवादी हो सकते हैं?

क्या स्टैंड-अप कॉमेडी शो बनाना संभव है जो एक से अधिक विषयों के बीच के संबंधों (इंटरसेक्शनल) को प्रस्तुत करते हों और किसी को चोट भी न पहुँचाएँ? अपने बारे में चुटकुले बनाना हम में से बहुतों के लिए एक सुरक्षित आश्रय है। चाहे वह अपने खुद के परिवारों, अपने खुद के साथी, अपने खुद के धर्म के बारे में चुटकुले बनाना हो… इन्हें स्टैंड-अप कॉमेडियनों के लिए सुरक्षित माना गया है, लेकिन क्या कलाकार विभिन्न ‘वादों/वादियो (isms)’  की अंतरक्षेत्रीयताओं (इंटरसेक्शनेलिटीज़) को भी इसमें शामिल कर सकते हैं? क्या हम ‘खुद’ (सेल्फ) को हास्य और यौनिकता के साथ नारीवादी जुड़ाव के लिए महत्वपूर्ण स्थान के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं?

सुकराती परंपरा को मानते हुए, मैं अपने विचारों को प्रश्नों के रूप में छोड़ रही हूँ, क्योंकि उत्तर बातचीत को खत्म कर देते हैं। कोई हँस सकता है या नहीं, इस सवाल का फैसला दर्शकों पर छोड़ना सबसे बेहतर है; लेकिन क्या हम हास्य के साथ सकारात्मक तरीके से अधिक जुड़ना चाहते हैं, यह हमारे लिए एक शानदार अवसर होगा।

मैं पल्लवी का उनकी टिपण्णी के लिए शुक्रिया अदा करना चाहती हूँ।

सुनीता भदोरिया द्वारा अनुवादित

To read this article in English, please click here.

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Article written by:

Jasmine Lovely George is a feminist activist and an independent researcher working on issues of Sexuality and Law in India. She is also the founder of "Hidden Pockets" - a mapping project on sexuality and spaces.

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