A digital magazine on sexuality in the Global South
An image explaining maslow's heirarchy of needs
CategoriesHuman Rights and Sexualityहिन्दी

यौनिक अधिकार? पर लोग भूखे हैं…

यौनिकता को एक अधिकार में गिने जाने पर बहुत चर्चा रही है। नारीवादी आंदोलन में भी यौनिकता के मुद्दे को महत्व मिलने में काफ़ी वक़्त लगा। यही सुनते रहे हैं कि लोग भूखे मर रहे हैं और हमें यौन आनंद की पड़ी है। हालाँकि यौन आनंद का मुद्दा अपने आप में भी हल्का या ग़ैरज़रूरी नहीं, लोग अक्सर यौनिकता (sexuality) को केवल यौन सम्बंध ही समझ लेते हैं। कई साल पहले जब मैं ख़ुद के जीवन में, परिवार से इस बातचीत को लेकर जूझ रहा था, तब भी यह मुश्किल था, और आज भी कई लोग अपने निजी, और सार्वजनिक जीवन में वही संघर्ष कर रहे हैं। भारत में धारा377 का क़ानून बदले समय हो चला है, पर यह बातचीत अभी भी उतनी ही मुश्किल है। कचहरी के निर्णय से अचानक ही लोगों के मन नहीं बदलते।

पर यहाँ मैं जो अनुभव और बातचीत साझा कर रहा हूँ वो धारा 377 के ज़माने की ही है। 2014 में काम के सिलसिले में किसी से दोस्ती हुई, और उन्होंने भी अकस्मात समझ बढ़ाने और खुली बातचीत कर पाने के जज़्बे से समलैंगिकता (homosexuality)के आंदोलन के बारे में पूछ लिया। कुछ देर सोचा कि क्या जवाब दूँ। क्या अपनी पहचान और यौनिक रुझान को बीच में लाने से बातचीत आसान होगी, या मुश्किल। क्या दोस्ती ख़तरे में पड़ जाएगी? क्या मेरी यौनिकता के आधार पर मेरे ये दोस्त मुझे नकार देंगे? फिर लगा यह सवाल मन में आने का मतलब ही है कि यह बातचीत खुल कर करना ज़रूरी है। बात मेरी पहचान पर थी तो इसमें कई और बातें शामिल नहीं हुईं। मैंने भी उस वक़्त यौनिकता को यौनिक रुझान के नज़रिए से ही देखा। इस नज़रिए से सोचा कि मेरी विभिन्नता तभी ज़ाहिर होगी जब मैं करना चाहूँगा। आज मैं यह अच्छी तरह समझता हूँ कि यह मेरा विशेषाधिकार है।

ख़ैर, अजीब लगता है कि यह बातचीत आज भी उसी तरह करने की ज़रूरत पड़ती है। कई नारीवादी और क्विअर साथियों के काम के वजह से मुझे खुलकार बात करने की हिम्मत मिली। इसीलिए यह निजी पत्र और बातचीत बड़े स्तर पर साँझा कर रहा हूँ। शायद इस से किसी को बातचीत की हिम्मत, उसके लिए शब्द, या उसके महत्व की समझ मिले। बस, बातचीत जारी रहे, सहज हो, और हम सभी की समझ को बढ़ाए, यही आशा है।

———- Forwarded message ———
From: xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx
Date: Tue, 14 Dec 2010 at 09:18
Subject:
To: Manak Matiyani <manakmatiyani@gmail.com>

तो मानक भाई मैंने “होमो” मोवेमेंट को विलासिता (luxurious) बोला था, क्यों बोला था वो थोड़े में बताता हूँ,  मानो तुमको एक अनजान जगह पर बेहोश करके छोड़ दिया तो होश में आने के बाद तुम सब से पहले पानी ढूंढोगे, खाना ढूंढोगे, रात कहाँ गुज़ारूँ ये सोचोगे, फिर उसके बाद क्या करोगे? सोचो समलैंगिकता (होमो sexuality) के लिए आन्दोलन (movement) करने का नंबर कब लगता है? यार अब तुम लड़की को जमा रहे हो या लड़के को, कौन देखने आ रहा है?? और कौन तुम्हारे ऊपर केस फाइल कर रहा है?

कितने ही लोग आज भी हमारे देश में भूखे सोते है, हर रोज देश में लोगो को उनके घरोसे खदेड़ा जा रहा है, क्योंकि उनके घर खेत किसी विकास कामों के लिए हड़पे गए हैं।

तो बात ऐसी है , इसलिए मैंने बोला की ये लक्ज़री (luxury)है। आप सही कर रहे हो या गलत इसके बारे में ये कमेन्ट नहीं है।

बाकि क्या हाल है ?

 

प्रिय xxxxxx,

अच्छा  किया कि तुमने मेल कर दिया, आज कल थोड़ा व्यस्त चल रहा हूँ तो ईमेल पर बात करना आसान है। और सोच कर लिखने का वक़्त भी मिलता है 🙂 तुम्हारी बात सही है। लोगों का भूखा होना, गरीब होना, बेघर होना, बहुत बड़ी समस्याएँ हैं। पर क्या किसी और को लगी हुई भूख मेरी ज़िंदगी की परेशानी को हल कर सकती है? मैं उनकी परिस्थिति के प्रति सचेत हो सकता हूँ, पर क्या यह मेरी परिस्थिति को बदलेगा?

कुछ अधिकार ऐसे होते हैं, जिन्हें जब तक छीन न लिया जाए, उनके होने का एहसास ही नहीं होता। तुम्हारे लिए किसी लड़की को पसंद करना, प्यार में पड़ना, उनके बारे में अपने दोस्तों से और परिवार वालों से बात करना बिलकुल स्वाभाविक है। तुम जैसा सोचते हो, जैसा महसूस करते हो वह आसानी से कह सकते हो।  उस लड़की से शादी कर सकते हो, दोस्तों और परिवार के साथ मिल कर ख़ुशी मना सकते हो। अपना परिवार शुरू कर सकते हो और अपना जीवन उस परिवार के साथ आराम से बिता सकते हो। पर हमारे समाज में कई लोगों को ये सब बिलकुल स्वाभाविक और आसान चीज़ें भी नहीं मिलती। यह मानता हूँ कि शायद तुम शादी या बच्चे ना करनाचाहो और हमारे समाज में इस चयन के लिए मान्यता पाना भी आसान नहीं है। पर समलैंगिकता के बारे में तो बात करना ही मुश्किल है, जीवन और रिश्तों को किस तरह से जीना है, वहाँ तक पहुँचना तो बहुत बाद की बात है।

मुझे लड़कियों की तरफ़ नहीं, लड़कों की तरफ़ आकर्षण होता है पर इस स्वाभाविक एहसास ने ही मेरे किए काफ़ी दिक्कत पैदा करी। बड़े होते वक़्त जब मुझे एहसास हुआ कि मेरी भावनाएँ अन्य लड़कों से अलग हैं, तो मुझे शर्म, डर, उलझन से गुज़रना पड़ा। यह लगा कि अपनी भावना व्यक्त करने पर लोग मुझे मानसिक रूप से बीमार समझेंगे या बिलकुल घिनोना कहेंगे। यह भी कहते कि मैं बच्चों पर एक बुरा प्रभाव डालूँगा, या उनका बलात्कार करने की कोशिश करूँगा। कई लोगों को लगेगा कि मेरे जैसा व्यक्ति प्रेम को अनुभव नहीं करता, केवल वासना और सेक्स के बारे में सोचता है। बहुत लोग डरते हैं कि कहीं मुझे एचआईवी (HIV) संक्रमण या एड्स (AIDS) जैसी बीमारी तो नहीं है। समलैंगिकता और संक्रमण, दोनों को ही लोग घृणात्मक मानते हैं। जब मुझे कोई लड़का पसंद आता, तो सबसे पहले मैं प्यार या ख़ुशी नहीं, डर महसूसकरता। यह सब इसलिए, कि लोगों को होमोसेक्शुअलिटी (homosexuality) और समलैंगिक लोगों के बारे में सही जानकारी और नजरिया नहीं है।

समलैंगिक व्यक्तियों के अनुभव कुछ कुछ ऐसे रहते हैं। अगर किस्मत अच्छी हो और जो व्यक्ति पसंद हो, वह भीआपको पसंद करेंगे। शायद मैं उनके साथ अपना जीवन बिताना चाहूँगा, ठीक वैसे ही, जैसे तुम किसी लड़की के साथ बिताना चाहो। पर हम दोनों को क़ानूनी तौर पर एक परिवार कहलाने का हक़ नहीं होगा।  हम साथ-साथ रह भी सकते हैं, पर एक दुसरे की ज़िन्दगी पर, उसके बारे में निर्णय लेने का कोई कानूनी हक नहीं होगा।  जिस तरह विवाहित लोग एक दूसरे की ज़िन्दगी पर, संपत्ति पर अधिकार जता सकते हैं, हम नहीं जता पाएंगे।  मैं चाहुँ भी तो यह नहीं पक्का कर पाउँगा की मेरे मरने पर मेरी संपत्ति मेरे साथी को मिले।  मेरा परिवार, या उनका परिवार कभी भी कह सकता है कि उनका हक़ ज्यादा है, क्यूंकि मेरा उस व्यक्ति से कोई क़ानूनी या पारिवारिक रिश्ता नहीं है।

क्योंकि समाज में इसको स्वीकृति नहीं मिलती, कई लोगों को अपनी ज़िन्दगी का यह पहलू अपने परिवार तक से छुपा कर रखना पता है। यह कह पाने की आजादी ही नहीं है की अपने ही लिंग के लोगों की ओर आकर्षण है।  कुछ लोगों का परिवार उनको समझने की कोशिश करता है, कुछ लड़-झगड़ कर परिवार से अलग हो जाते हैं। कईयों की ज़बरदस्ती शादी कर दी जाती है। साथ रहने, जीवन बिताने और अपने प्यार का इज़हार करने की छूट न होने के कारण कई समलैंगिक मर्द छुप कर, या अपनी पत्नी के पीठ पीछे किसी और मर्द से सम्बन्ध रखते हैं। खुद से और पत्नी से भी झूठ बोलना पड़ता है।  शादी के बाहर कोई और रिश्ता रखने की छूट महिलाओं को नहीं मिलती।

हमेशा यह डर लगता हैं कि परिवार को किसी और से पता ना चल जाए।  कभी किसी और को, खासकर किसी पुलिस वाले को मुझे अपने साथी  के साथ देख कर, या हाव-भाव से यह पता चल जाए कि मैं समलैंगिक हूँ, तो वह मुझे कुछ भी करने को मजबूर कर सकते हैं।  मुझसे पैसे ले सकते हैं,मेरे साथ ज़बरदस्ती या यौनिक हिंसा कर सकते हैं। यह डर भी हमेशा मेरे दिमाग में रहता है। यह भी लगता है कि कहीं ऑफिस में किसी को पता चला तो क्या नौकरी से निकाल देंगे। अगर मैं डॉक्टर हूँ और मेरे मरीज़ों (patients) को पता चला तो मेरे पास आना बंद कर देंगे। अगर मैं टीचर हूँ तो शायद मुझे स्कूल से निकाल देंगे।  डर लगता है कि कुछ लोग जिन्हें मैं और मेरा प्यार घिनोना लगता है वो कभी भी मुझे घेर कर मार-पीट सकते हैं और मैं पुलिस के पास भी नहीं जा पाउँगा।  सब इसीलिए क्यूंकि समाज में समलैंगिकता को लेकर कई गलत और निराधार धारणाएँ हैं जिन्हें लोग बिना परखे सही मान लेते हैं। कई लोग जो शायद इससे दिक्कत नहीं रखते, उन्हें इसपर बात करना और औरों को समझाना या तो बहुत कठिन लगता है, या ज़रूरी नहीं लगता।

तो मुझे यह बताओ, कि अगर कोई कहे की तुम्हें अपनी आत्मीयता और व्यक्तित्व को खुलकर ज़ाहिर करने का अधिकार नहीं है, तुम्हें हमेशा अपनी ज़िन्दगी और पहचान के एक ज़रूरी हिस्से को छुपाना चाहिए, अपनी मर्ज़ी से प्यार करने का, अपनी मर्ज़ी से किसी के साथ सेक्स करने का, किसी के साथ वक़्त बिताने का, या ज़िन्दगी बिताने का अधिकार नहीं है, तुम और तुम्हारे साथी एक परिवार की तरह नहीं रह सकते, अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर सकते, तुम्हारी सोच घिनोनी है और तुम्हारा मानसिक संतुलन खराब है। तुम्हें अपनी मर्ज़ी के खिलाफ़ शादी कर लेनी चाहिए क्यूंकि उस से तुम ठीक हो जाओगे, और इस सब के बारे में बात करना ज़रूरी नहीं है।  लोगों को अपना दृष्टिकोण बताना ज़रूरी नहीं है क्यूंकि हमारे देश में कई लोगों के पास घर नहीं है, कपड़े नहीं हैं, बहुत गरीबी है और कई लोग बेघर हैं। उनकी समस्या तुम्हारी समस्या से ज़्यादा बड़ी है।  कोई ऐसा कहे तो तुम्हे कैसा लगेगा? यौनिकता (Sexuality) किसी की भी पहचान (identity) का एक ज़रूरी हिस्सा है। जीवन का हर पल अपनी पहचान को नकारते हुए बिताना शायद भूखे या बेघर होने जैसा कठिन नहीं, पर आसान भी नहीं होता। मुझे नहीं लगता कि दो अलग-अलग मुद्दों को एक दूसरे से तोला जा सकता है।

प्राइड परेड (pride parade) या यौनिकता के अधिकारों का आन्दोलन  इसीलिए ज़रूरी है क्यूंकि लोगों को समलैंगिकता के बारे में जानकारी नहीं है और लोग समझना भी नहीं चाहते।  इसलिए ज़रूरी है ताकि जो लोग अपने आप को गलत समझ कर शर्म और डर के साथ जी रहे हैं, उन्हें एहसास हो की वह अकेले नहीं हैं।  क्यूंकि अपनी मर्ज़ी के अनुसार, आजादी से अपना जीवन बिता पाना भी एक ऐसा मूल अधिकार है जो समाज में बहुत लोगों को नहीं मिलता। और वाकई अगर किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि मैं एक लड़की से जमा रहा हूँ या लड़के से, तो क्यूँ इतने लोगों को समलैंगिकता से परेशानी है? क्यूँ भारत की सरकार एक पुराने कानून को बरक़रार रखने के लिए मामला कोर्ट तक ले गई? अगर फ़र्क नहीं पड़ता तो क्यूँ समलैंगिक लड़के-लड़कियों को घर से भागना पड़ता है, अपनी भावनाएँ छुपानी पड़ती हैं और कई बार अपनी जान लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है। मैं और शायद कई और लोग उस ही दिन का इंतज़ार कर रहे हैं जब किसी को फ़र्क न पड़ता हो। पर इतने सालों के इस आन्दोलन के अनुभव में समझ आ रहा है की उस दिन का केवल इंतज़ार नहीं किया जा सकता, उस दिन को लाने के लिए लग कर काम करना होगा। एक आन्दोलन के तौर पर भी, और एक सोचने समझने वाले व्यक्ति के तौर अपने निजी जीवन में भी। इसीलिए यौनिकता को अपने अनुसार जी पाना विलासिता (luxury) नहीं लगती। जीवन तो बहुत चीज़ों के बिना बिताया जा सकता है, पर क्या अपनी आत्मीयता और अस्मिता को नकारते की ज़रूरत ना होना एक बुनियादी बात नहीं? असल में यह जीवनशैली (lifestyle )नहीं, जीवन (life)की बात है। सेक्शुअलिटी या यौनिकता भी अधिकार का ही आंदोलन है।  अधिकारों में दर्जे नहीं बनाए जा सकते। यह समझ ही गलत है कि आंदोलन एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा या कम्पटीशन में हैं।  अधिकारों के एक बड़े मूवमेंट के अंदर अलग-अलग अधिकारों और आंदोलनों के साथ आने से ही यह सफ़ल होगा।

मुझे जो लगता है लिख रहा हूँ। इसीलिए मैं एलजीटीबीक्यु अधिकारों (LGTBQ rights) और उसकी लड़ाई को ज़रूरी मानता हूँ।  यह लम्बा पत्र तुमसे अपनी बात मनवाने या कन्विंस करने के लिए नहीं लिखा।  बस अपनी समझ ज़ाहिर करने के लिए लिखा। कई और बातें जो कही जा सकती हैं … कही जानी चाहिए, शायद छूट गयीं… पर जो सबसे ज़रूरी लगा वह लिख रहा हूँ।  मुझे लगता है कि सभी से सड़क पर आकर इस आन्दोलन में हिस्सा लेने की अपेक्षा रखना गलत है।   सभी के लिए शायद मुमकिन न हो, शायद ज़रूरी भी न हो और उसमें कुछ गलत नहीं है। पर सभी से मेरी यह अपेक्षा ज़रूर है कि अपने जीवन में और अपने करीबी लोगों के साथ इस तरह की गलत धारणाओं और भेदभाव को बढ़ावा न दें। बल्कि उसके खिलाफ़ राय ज़ाहिर करें। आन्दोलन बहुत बड़े होने की ज़रुरत नहीं।  अगर अपने निजी आन्दोलन में सब किन्हीं दो और लोगों को यह समझा सकें कि खुद को और किसी और को प्यार करने के अधिकार से नफरत न करें तो बहुत बड़ा योगदान होगा।

बाकी हाल बढ़िया हैं। घर और दफ्तर में काफ़ी कामों में व्यस्त हूँ पर मज़े में हूँ। घर में सब को नए वर्ष की शुभकामना देना और मेरा नमस्ते कहना।

सप्रेम,

मानक

Cover Image: (CC BY 2.0)

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Article written by:

Manak is a feminist, queer activist, an Acumen Fellow and the Executive Director of The YP Foundation. Manak's work is aimed at facilitating young people's rights based leadership on issues of Gender, Sexuality, Health, Education and Civic Participation.

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