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इंटरव्यू – देवदत्त पटनायक

देवदत्त पटनायक आधुनिक समय में, प्रबंधन, प्रशासन प्रक्रिया और नेतृत्व जैसे क्षेत्रों में पौराणिक विचारों की प्रासंगिकता के विषय पर लिखते हैं। डाक्टरी की पढ़ाई और प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उन्होने 15 वर्ष तक स्वास्थ्य देखभाल उद्योग और दवा निर्माता कंपनियों के साथ काम किया। फिर वे पूरी तरह से लेखन के अपने जुनून में जुट गए। देवदत्त पटनायक अभी तक 30 पुस्तकें और 600 से अधिक कॉलम लिख चुके हैं। उनकी लिखी प्रसिद्ध पुस्तकों में मेरी गीता, जया, सीता, बिज़नस सूत्र और दी सेवेन सीक्रेट सिरीज़ की पुस्तकें शामिल हैं।  

शेफाली अग्रवाल – आप लगभग पिछले 20 वर्ष से अधिक समय से पौराणिक कथाओं के बारे में लिखते रहे हैं और इस विषय पर अपने विचार भी प्रकट करते रहे हैं। क्या आपको लगता है कि अपनी पौराणिक कथाओं, अपने मिथकों को जानना और समझना हमारे लिए ज़रूरी है? क्या ये पौराणिक जानकारी या मिथक हमारे सोचने के तरीके को भी प्रभावित करते हैं? क्या कार्ल युंग के कथन और विचार की तरह आप भी यही मानते हैं कि ये मिथक हमारी सामूहिक अचेत का ही भाग होते हैं?    

देवदत्त पटनायक – हमें यह एहसास नहीं होता लेकिन हम, हम सभी, अपना पूरा जीवन अपने इन मिथकों और मान्यताओं के इर्द-गिर्द, इनके साथ ही व्यतीत करते हैं। हमारी इन मान्यताओं, इन मिथकों से ही हमें अपने आसपास की दुनिया के बारे जानकारी होती है और हमारे जीवन को अर्थ मिलता है। चाहे हमें इन मान्यताओं के होने का एहसास हो या ना हो, लेकिन यही मान्यताएँ हमारे पूरे अस्तित्व को रूप-रंग देती हैं, इनके चलते ही हमारे मस्तिष्क को दुनिया को और इसके तरीकों को समझ पाने में सहायता मिलती है। पश्चिमी दुनिया के ज़्यादातर विद्वानों और विचारकों की तरह ही, कार्ल युंग भी, विचारों की विविधता में विश्वास नहीं करते प्रतीत होते हैं, यहाँ तक कि उनके विचार में अपरिचित अचैतन्य का भी एक ही रूप होता है। इसलिए उनके यह विचार लाभप्रद तो हैं, लेकिन इन्हे कार्ल युंग के ईसाई विचारधारा में पले-बढ़े होने, उनकी यूरोपिय वैचारिक मान्यताओं, फ्रॉयड के विचारों के साथ उनके सम्बन्धों, उनके जीवन काल की समयावधी और भारतीय दर्शन के प्रति उनकी असहजता की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। अपने जीवन काल में भारत के दौरे पर आए कार्ल युंग का सामना जब भारतीय दर्शन पद्धति और विचारधारा से हुआ, तो वे इतने विचलित हो गए कि वास्तविक महर्षि रमण से मिलने की बजाए वैचारिक कट्टरपंथी साधुओं से मिलना ही बेहतर समझा।   

शेफाली – क्या आपको लगता है कि आज के समय में पौराणिक मिथक या घटनाएँ खुद को फिर से दोहरा रही हैं? क्या आज भी, विशेषकर जेंडर के लचीले होने को स्वीकार करने और यौनिकता से जुड़े विचारों को मानने के संबंध में यह प्राचीन पौराणिक मान्यताएँ प्रासंगिक हैं और इनका कुछ प्रभाव पड़ता है?   

देवदत्त – ईसाई धर्म में प्रचलित मान्यता थी कि ईश्वर सिर्फ़ एक ही है और और वह केवल ईसाई धर्म मानने वालों का ही है। उस समय का यही प्रचलित विचार प्राचीन रोमन साम्राज्य के पतन का कारण बना। इसके बाद ईसाई धर्म की इन मान्यताओं को शिक्षा और जागरूकता के उन विचारों से भी चुनौती मिलने लगी जिनके तहत केवल एक ही ईश्वर के होने के विचार या सिद्धान्त को न मानते हुए विज्ञान और वैज्ञानिक सोच को अधिक महत्व दिया जाता है। अपने अतीत के विचारों और सिद्धांतों में सुधार करने की बजाए इन विचारों को पूरी तरह से नकार देना ही प्रतिष्ठित और क्लासिक अब्राहमवादी सोच है। आज राष्ट्रपति ट्रम्प इसी तर्क के आधार पर हर तरह की वैज्ञानिक सोच को नकार रहे हैं! ‘एक ईश्वर’ और ‘एक ही सच’ की विचारधारा वाली दुनिया में विचारों की विविधता के लिए कोई जगह नहीं होती; एक स्वीकृत विचारधारा के अलावा दूसरे सभी विचार या सोच को केवल एक परिकल्पना, मात्र सिद्धान्त या वैकल्पिक विचार ही समझा जाता है और ये सभी ‘मिथक’ शब्द के ही पर्याय हैं। मूलत: यह हर तरह की विविधता को नकार देने की विचारधारा है। इसी तरह, विविधता के विषय पर समकालिक विचारधारा भी पूरी तरह से निरपेक्ष और जुझारू प्रतीत होती है जिसमे जेंडर के संदर्भ में इसके दो रूपी होने के अलावा किसी और विविध विचार को मानने की कोई जगह नहीं होती। एक ही दिशा में सोचने वाली पश्चिमी वैचारिक प्रक्रिया यही है और पश्चिमी सभ्यता के अब्राहमवादी धर्म इस पौराणिक विचार प्रक्रिया के उत्कृष्ठ उदाहरण हैं। 

शेफाली – आपने अनेक बार यह कहा है कि मिथक या मान्यताएँ पूरी सच्चाई न होकर ‘किसी का सच’ होने जैसे होते हैं। अगर ऐसा ही है तो यह समझ या जान लेना कैसे महत्वपूर्ण या राहत देने वाला होगा कि पहले के जमाने में हिन्दू, जैन और बौद्ध पौराणिक कथाओं में दो से अधिक तरह के जेंडर होने की बात कही गयी है और यह स्वीकारा जाता रहा है कि यौनिकता को अनेक रूपों और तरीकों से व्यक्त किया जा सकता है? 

देवदत्त – हिन्दू, जैन और बौद्ध धर्म के पौराणिक सिद्धान्त कर्म पर आधारित हैं और कर्म को महत्वपूर्ण मानते हैं – किसी व्यक्ति का वर्तमान उसके पूर्व के कर्मों का परिणाम होता है और उसका भविष्य उसके वर्तमान कर्मों पर निर्भर करेगा। इन सिद्धांतों के मूल उद्देश्य दुनिया और जीवन को समझना है, उसे नियंत्रित करना नहीं। ‘कर्म आधारित’ परम्पराओं के इन ऋषि-मुनियों नें यह जाना और स्वीकार भी किया कि जेंडर पुरुष, स्त्री और क्विअर (या किन्नर, क्लिबा, नपुंसक, पंदक, पेदी) होता है। क्वीयर शब्द अन्य सभी तरह के LGBTQI लोगों के संदर्भ में प्रयुक्त होने वाला प्रचलित शब्द है। उनकी यह सोच या सिद्धान्त ज्यूड़ो-क्रिश्चियन-इस्लामिक पौराणिक विचारधारा से बिलकुल अलग है जिसमे ईश्वर का एक ही रूप माना गया है और जहाँ कहीं भी ईश्वर के जेंडर की चर्चा होती है, वहाँ उन्हें पुरुष रूप में व्यक्त किया जाता है। इस विचारधारा में ईश्वर के स्त्री अथवा क्विअर होने का कोई स्थान नहीं है। इस तरह से पौराणिक कथाओं से हमें विभिन्न संस्कृतियों कि विविधता का पता चलता है।  

शेफाली – अपनी पुस्तक ‘शिखंडी और कुछ अनसुनी कहानियाँ’ में आपने पाठकों के सामने हमारी लिखित और मौखिक कथा परम्पराओं की अनेक कहानियों के माध्यम से क्विअर व्यवहारों की जानकारी रखी है। इनमें से अनेक कहानियाँ या तो भुला दी गयी थीं या फिर उन्हें अनदेखा किया जाता रहा है। क्या इस तरह इन प्राचीन कहानियों को ‘भुला दिया जाना’ उन्हें लोगों के स्मृति पटल से हटा देने के लिए जानबूझकर किया जाता रहा है? और क्या कारण हैं की आपने इन्हीं कहानियों को लोगों के सामने लाने का फैसला किया? 

देवदत्त – जानबूझकर कर या किसी षड्यंत्र के तहत किए जाने के सिद्धान्त को हम धार्मिक कट्टरपंथियों और ऐक्टिविस्ट्स के विचार के लिए छोड़ देते हैं। बहुत से लोग इनमें में अलग-अलग कहानियों को अपने-अपने संदर्भ और प्रसंग अनुसार प्रयोग में लाते रहे हैं। अनेक शिक्षाविद् इन कथाओं से परिचित रहे हैं किन्तु वे प्रमुख विषमलैंगिक मुद्दों पर ध्यान देना अधिक महत्वपूर्ण समझते हैं और क्विअर मुद्दों को परे हटा देते हैं। अधिकतर धार्मिक गुरुओं और धर्म प्रमुखों को शायद इनकी जानकारी नहीं है क्योंकि आज के समय मे धर्म का ध्यान प्रमुख रूप से यौनिकता पर न होकर ब्रहमचर्य का पालन करने की ओर अधिक है। मैंने इन कथाओं का संकलन केवल यह सोचकर किया है कि जेंडर को राजनीतिक रूप दिए बिना या क्वीयर व्यवहारों को शैक्षिक शब्दावली में न उलझाते हुए इन कहानियों को सरल रूप में पाठकों तक पहुंचाया जाए। 

शेफाली – चलिए ‘शिखंडी’ पुस्तक में लिखी कथाओं के बारे में तो समझ आ गया, आप हमें यह बताएं कि किसी भी कथा को लोगों के सामने लाने के पीछे आपका क्या कारण है? पौराणिक कथाओं और विचारों में आपकी रुचि किस तरह बनी और विकसित हुई?  

देवदत्त – मेरा मानना है कि कहानियाँ, दुनिया के बारे में हमारे दृष्टिकोण को व्यक्त करती हैं। ‘सुखांत’ कहानियाँ यूरोप और उत्तरी अमरीका की कहानियों की उत्कृष्ट उदाहरण हैं क्योंकि ईसाई धर्म के प्रभाव के चलते वहाँ लोगों का मानना है कि एक दिन पूरी मानव सभ्यता या दुनिया का ‘उद्धार’ होना है। पश्चिमी कहानियों में कहानी के कथानक और नाटकीयता की प्रधानता रहती है जबकि भारतीय कहानियाँ भाव और विचार प्रधान होते हैं। मानवीय जीवन की विविधता को समझने और जानने का एक आसान माध्यम कहानियाँ होती हैं। कहानियों से ही हमें पता चलता है कि ‘न्याय’ और ‘समानता’ जैसे सिद्धान्त ग्रीक और ईसाई पौराणिक कथाओं की ही देन हैं और ये विचार पूरी दुनिया में नहीं पाए जाते जैसा कि अनेक राजनेता और ऐक्टिविस्ट्स, जो दुनिया का ‘उद्धार’ करनेकी बात करते हैं, हमें अक्सर बताते रहते हैं।  

शेफाली – जैसा कि आप कहते हैं, मिथक और पौराणिक कथाएँ केवल रूपक या चिन्ह मात्र होते हैं, वे विचारों को आगे बढ़ाने का एक साधन हैं। लेकिन बहुत बार हमने देखा है कि इन मिथकों की व्याख्या अक्षरशः कर ली जाती है। क्या आपको नहीं लगता कि आपके पाठक या दूसरे लोग भी आपके द्वारा बताई गयी कहानियों को इसी तरह समझ लेंगे, उनकी व्याख्या करेंगे या उनसे सीख प्राप्त कर लेंगे? 

देवदत्त – एक इंजीनियर और एक कलाकार के सोचने के ढंग में बहुत अंतर होता है। कोई भी इंजीनियर गणित को अधिक महत्व देता है और रूपकों को निरर्थक समझता है। इसी तरह कुछ लोग बातों को समझने के लिए विविध संदर्भों में अनेक अर्थ रखने वाले चिन्हों की बजाए उन चिन्हों को अधिक महत्व देते हैं जिनका किसी संदर्भ विशेष से कोई सरोकार न होकर एक ही अर्थ होता है। पश्चिमी शिक्षाविद और विद्वान प्रत्येक भारतीय कथानक या विचार को एक ही दृष्टि से देखते हैं। इसीलिए उनके लिए शिवलिंग मात्र ‘पुरुष-लिंग’ के प्रतीक चिन्ह के अलावा कुछ भी नहीं है। उनके इस दृष्टिकोण को चुनौती देने वाले प्रत्येक कथन को ब्राह्मणवादी विचारधारा या मध्यमवर्गीय सोच कर नाम देकर नकार दिया जाता है।       

शेफाली – किसी भी अन्य सफल लेखक और वक्ता की तरह, आपके अनेक प्रशंसक हैं, लेकिन साथ ही साथ आपके अनेक आलोचक भी हैं जो हिन्दुत्व को देखने के अपने ढंग को सुरक्षित रखने के विचार से आपकी आलोचना करते नहीं थकते। आपको क्या लगता है, कि क्या आप पौराणिक गाथाओं और कहानियों को फिर से दोहरा कर उनके इन प्रयासों को विफल करना चाहते हैं?

देवदत्त – तर्क और विचार प्रक्रिया के माध्यम से ‘सत्य की खोज’ कर पाने का सिद्धान्त पश्चिमी सभ्यता की देन है जो उनके ग्रीक और ईसाई तरीके से सोचने की प्रक्रिया पर आधारित है। ऐसे में हिन्दुत्व के अपने ढंग को सुरक्षित रखने का विचार रखने वाले लोगों की विचार-प्रक्रिया या तो पश्चिमी रंग-ढंग में रंग चुकी है या फिर वे अपने उस अहम के शिकार हैं जो विचारों की विविधता की सच्चाई को स्वीकार नहीं कर पाता। उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाना चाहिए क्योंकि वे खुद अपनी ही क्षमता के चलते या फिर अपने रोष की तीव्रता के कारण संकुचित हो गए हैं। 

शेफाली – आपने पौराणिक गाथाओं के माध्यम से, सरल रूप से कई सिद्धांतों, जैसे चुनाव, दायित्व, स्वतन्त्रता सरीखे विषयों को लोगों के सामने रखा है और इनकी व्याख्या की है। 2017 के जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए आपने कहा था, “जो लोग समझ नहीं पाते, वही श्लोकों का प्रयोग करते हैं”। क्या आपको लगता है कि ऐक्टिविस्ट्स, यौनिकता और जेंडर के बारे में चर्चा करते समय जटिल शब्दावली का प्रयोग कर अकारण ही अनेक सरल सिद्धांतों और विचारों को कठिन बना देते हैं?

देवदत्त – अपने विचारों की सटीकता पर संदेह करने वाले हर व्यक्ति, ‘संस्कृत’ या ‘कठिन शब्दों’ का प्रयोग अपने विचारों के लिए बैसाखी के रूप में करता है। कोई भी बात या विचार केवल इसलिए सही नहीं होती क्योंकि वह वेदों में लिखी गयी है, या सुकरात अथवा फूको द्वारा कही गयी है। किसी भी विचार या सिद्धान्त को सामने रखते हुए व्यक्ति के खुद अपने मन में उस विचार की सटीकता के प्रति आस्था होनी चाहिए। यह बहुत ज़रूरी है। बेहतर होगा कि सिद्धान्त के प्रति व्यक्ति की आस्था उसके दृढ़ विश्वास के कारण उपजी हो। 

हम देखते हैं कि किस तरह अपना ही अर्थ साधने वाले अनेक समूह और पैरोकार जेंडर के आधार पर दुनिया को विभाजित करने में लगे हैं। अब दुनिया में जेंडर के इसी विभाजन को आगे बढ़ाते हुए वे हर तरह की क्विअर पहचान और व्यवहार के लिए सिस और ट्रान्सजेंडर लोगों के बीच वर्ग अनुक्रम बनाने में लगे हैं। हर विचार, व्यवहार और प्रक्रिया को परिभाषा की सीमायों में बांधने की यह लालसा वर्गीकरण विज्ञान के कारण उत्पन्न होती है। किसी भी विचार या व्यवहार को परिभाषित कर, हम उसे नियंत्रण में रखने और नियामित करने की ही कोशिश करने में लगे होते हैं।

विचारों की अपनी कोई भाषा या बोली नहीं होती; भाषा का काम विचारों के प्रसार को आसान बनाना है न कि इस पर नियंत्रण करना। आधुनिक काल के कई क्विअर ऐक्टिविस्ट कठिन शब्दावली के अधिक प्रयोग से खुद को ही नष्ट करने की राह पर निकल चुके प्रतीत होते हैं और इस प्रक्रिया में वे अपने विचारों को ही निरर्थक बना देते हैं। 

शेफाली – क्या मिथकों के निर्माण की प्रक्रिया पौराणिक काल के साथ ही समाप्त हो चुकी है? या फिर आज भी मिथक बनते हैं? अगर ऐसा होता है, तो आपके विचार से मिथकों के निर्माण की यह प्रक्रिया क्या विस्तारात्मक होती है या फिर यह लोगों के विचारों को संकुचित अथवा सीमित कर देती है। या फिर कहीं यह प्रश्न एक झूठे विरोधाभास भरे विचार को ही प्रस्तुत तो नहीं कर रहा?  

देवदत्त – मानव जाति हमेशा ही नए मिथकों को जन्म देने में लगातार लगी रहती है। खुद को जन नायक या उद्धारक या फिर व्यवस्था का शिकार समझने वाला प्रत्येक राजनीतिक व्यक्ति या ऐक्टिविस्ट वास्तव में पश्चिमी सभ्यता में उपजे मिथकों में जीता है। विविधता और अंतर को स्वीकार करने वाला प्रत्येक राजनीतिक व्यक्ति या ऐक्टिविस्ट भारतीय वैचारिक परंपरा के मिथक में जी रहा है। प्रत्येक वह राजनीतिक व्यक्ति या ऐक्टिविस्ट जिसे लगता है कि समाज में व्यवस्था और सामंजस्य रखने के लिए वर्ग क्रम का होना ज़रूरी है, वह चीन के लोगों के वैचारिक मिथक से प्रेरित होता है। लेकिन दुनिया को देख पाने के हमारे तंग नज़रिए वाले तरीके में (क्योंकि हम सही सोचते हैं/ धर्म को मानते हैं और सभ्य लोग हैं), हम यह मान लेते हैं कि मिथक केवल ऐतिहासिक समय या किन्ही अलग भौगोलिक परिस्थितियों में ही होते हैं।  

सोमेन्द्र कुमार द्वारा अनुवादित 

To read this article in English, please click here.  

 

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