A digital magazine on sexuality in the Global South

Author: Pramada Menon

a silhouette of a person standing with an umbrella

यादों के ताने बाने उलझाती सुलझाती मैं

ख्वाबों को बुनान और उसके साथ खेलना – एक अलग ही अहसास है। तुम राजा, तुम रंक। तुम लेखक तुम निर्देशक। तुम्हारा बस चलता है। हम सब के अंदर अलग ख्वाब भरे हुए हैं।

यादों के ताने बाने उलझाती सुलझाती मैं

चाय पीते-पीते अचानक बारिश की बूंदों की आवाज़ सुनाई दी। मैं ख़ुशी से बाहर झाकने लगी और तुमसे मैंने कहा कि चलो बहार बैठते हैं, भीगते हैं, कितना मज़ा आएगा। तुम हसने लगे और कहा बॉलीवुड का असर है ये, वार्ना भीगने में क्या मज़ा है? अब भी बारिश होते ही मुझे याद आती है…
An abstract image of various colours

Too Big

Why do we always assume that violence is done to us by someone else and not that we do it to ourselves quite easily and then have a million explanations to justify why we do not eat, why we use Fair and Lovely face cream, why we spend hours in the gym under duress, and why we focus incessantly on how much one has gained or lost in kilos and not in a metaphysical sense?
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