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अपने मन को वापस लेने का समय आ गया है

ऑड्रे लार्ड ने एक बार कहा था, “अपनी देखभाल करने का ये मतलब नहीं कि मैं स्वार्थी हूँ, देखभाल स्वयं की रक्षा करना है और यह एक सियासी संघर्ष है”।

एक नारीवादी के रूप में मैंने हिम्मत रखने और साहस के मूल्य को सीखा है – मुश्किलों से लड़ना और उनसे आगे/बाहर निकलना। जब भी मैं डिप्रेशन से गुज़री, मैंने खुद को हिम्मती बने रहने और मुश्किलों से लड़ने के लिए प्रेरित किया। एक कार्यकर्ता के रूप में एक चीज़ जो मैंने सीखी है वो है दूसरों की मदद करना। दूसरों के लिए मौजूद रहना, और जब उन्हें मेरी ज़रुरत हो तो उन्हें सलाह देने के लिए हिम्मती बने रहना।

हालाँकि, पिछले कुछ समय से मैं सोच रही थी कि हिम्मती बने रहने पर, आदर्श बने रहने या हर ज़रूरतमंद  व्यक्ति के लिए मौजूद रहने की आवश्यकता पर इतना ज़ोर क्यों दिया जाता है। क्या हमें इस बात का एहसास नहीं होता कि इन गुणों को बढ़ावा देने की कोशिश में हम कमज़ोर (वल्नरेबल) होने के बारे में बात करना भूल गए हैं? ये कमज़ोरी जिसे नारीवादी आन्दोलन में हम सदियों से नकारते रहे हैं, क्या यह हमें कुछ ताकत देती है, हमारे जीवन में राहत की कुछ सासें – उस जीवन में जो न्याय के संघर्षों से भरा हुआ है, जो तर्क से घिरा हुआ है? क्या हमारा तर्कसंगत दिमाग इस बात की छूट देता है कि हम भी तर्कशून्यता, अस्तव्यस्तता के साथ रहते हैं। क्या हम बिना किसी आलोचना के शिकार हुए इस तथ्य को स्वीकार कर सकते हैं?

किसी प्रिय व्यक्ति की मृत्यु के दुःख के समय या प्रेमी के साथ सम्बन्ध टूटने के दुःख को झेलते हुए जब आपसे अपने व्यावसायिक और व्यक्तिगत जीवन में एक क्रियाशील व्यक्ति के रूप में कार्य करने की अपेक्षा की जाती है तो कैसा महसूस होता है, इसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है। छ: महीने के अन्दर, मेरे जीवन में दो भयानक घटनाएँ घटी – पहले, मेरे छ: साल के साथी ने मुझसे सम्बन्ध तोड़ लिए, और फिर, मेरी माँ का देहांत हो गया।

जब मेरे साथ रह रहे (लिव-इन) साथी ने मेरे साथ संबंध तोडा, मेरे दोस्तों ने मुझे समझाया कि प्यार हमेशा नहीं रहता और मुझे आगे बढ़ना चाहिए। क्विअर सिद्धांत यह तर्क देता है कि एकल रोमांटिक और यौनिक सम्बन्ध विषमलैंगिक पित्रसत्तात्मक ढांचे (हेट्रोनोर्मेटिव) के अंतर्गत होते हैं और एक आदर्श क्विअर व्यक्ति होने के लिए मुझे प्रेम संबंधों को अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिए। हमारे ब्रेक अप के समय मुझसे तर्कसंगत ढंग से पेश आने की और आगे बढ़ने की अपेक्षा कि जा रही थी। सच कहूं तो, मेरा हर उस व्यक्ति को एक थप्पड़ मारने का मन करता था जो मुझे हिम्मती बने रहने और आगे बढ़ने की राए देता था। मैं दयनीय अवस्था में थी और मैं कुछ समय के लिए अपनी दयनीयता ज़ाहिर करना चाहती थी। मेरा काम प्रभावित हुआ, मेरी सेहत प्रभावित हुई और मैं प्रभावित हुई।

मेरी माँ के साथ मेरे सम्बन्ध बहुत मृदु नहीं थे। हमारे बीच कई कड़वे पल बीते, पर वो और मैं, किसी न किसी रूप में, एक दूसरे के नज़दीक थे। क्योंकि वो एक अन्त्य रोग झेल रही थीं, हम जानते थे कि उनका अंत नज़दीक है, पर उनकी मृत्यु ने मुझे तोड़ दिया, मेरे टुकड़े-टुकड़े कर दिए। फिर से, घर में मुझसे ‘सामान्य’ व्यवहार करने और सबसे बड़ी बेटी होने के नाते अपने पिता का ख्याल रखने की अपेक्षा की जा रही थी। तब भी, मेरा जी करता था लोगों को थप्पड़ लगाने का!

तो, यहाँ मैं दो विषयों पर चर्चा करना चाहती हूँ – पहला, कमज़ोर होने का अधिकार और दूसरा, स्वयं कि देखभाल करने का अधिकार।

कमज़ोर होने के बारे में क्यों, जबकि एक ज़माने से हम में से कुछ जो नारीवादी आन्दोलन और क्विअर आन्दोलन का हिस्सा रहे हैं, इसकी आलोचना करते रहे हैं? हमने अपने क्लाइंट से, उन लोगों से जिन्होंने हिंसा झेली है, हिम्मती बने रहने और स्वाबलंबी होने के लिए कहा है। पर इस बात को स्वीकार करना कि आप भी कमज़ोर हो सकते हैं एक ऐसी शक्ति है जिसका सामना कुछ नहीं कर सकता! क्योंकि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल के लिए, हमें कम से कम इस बात को स्वीकार करना होगा कि हम कमज़ोर हैं। हम सभी को दुःख महसूस करने, ईर्ष्या महसूस करने, या निरर्थक महसूस करने की आज़ादी की ज़रुरत है क्योंकि ये सभी वास्तविक भावनाएँ हैं और हम सभी सामाजिक प्राणी हैं। हम सभी को सामाजिक तौर पर ईर्ष्या करने, अपने रोमांटिक-यौनिक साथी पर हक जताने के सन्देश मिलते हैं और कभी-कभी हम इर्शालू और अंकुश रखने वाले बन जाते हैं। और अगर हम इन कमज़ोरियों के बारे में बात कर पाएंगे तभी हम स्वयं की देखभाल के बारे में बात कर सकेंगे।

स्वयं की देखभाल खुद को संभाल कर रखने जैसा है; यह खुद का खुद के प्रति प्यार है, और यह पित्रसत्ता और वैश्वीकृत दुनिया के खिलाफ़ विद्रोह है जो एक व्यस्त और प्रतिस्पर्धात्मक जीवन को मान्यता देती है। आधुनिक महिला से उम्मीद की जाती है कि वो विशिष्ट महिला (सुपरवुमन) हो। भारतीय टेलीविज़न पर आने वाले विज्ञापन को ही देखिए। ऐसी महिला की बहुत तारीफ़ की जाती है जो घर के अन्दर के साथ-साथ घर के बाहर भी काम करे। इन महिलाओं को इस तरह से प्रस्तुत किया जाता है जैसे उन्हें आराम करने या स्वयं की देखभाल करने की कोई ज़रुरत ही नहीं है!!

अक्सर जब हम ‘स्वयं की देखभाल’ शब्दों का प्रयोग करते हैं, इसे स्वार्थी होना समझ लिया जाता है। पर स्वयं की देखभाल करना स्वार्थी होना नहीं है, यह अपना ध्यान रखना है – वो स्वयं जिसकी हम हमेशा उपेक्षा करते रहते हैं! मैं स्वयं की देखभाल में दक्ष नहीं हूँ, पर पिछले कुछ समय में मैंने अपनी देखभाल करने के लिए जो किया है वो साझा कर सकती हूँ:

  • खुद को पहले रखना। हाँ, ये मेरा पहला नियम है। मुझसे ज़्यादा कुछ महत्वपूर्ण नहीं है।
  • “ना” कहना। आत्म-रक्षा के सत्रों में, नारीवादी सत्रों में भी, हम लोगों को हिंसा के खिलाफ़ “ना” कहना सिखाते हैं। वैसे, यहाँ “ना” थोडा अलग है। इसका मतलब है उन चीज़ों के लिए “ना” कहना जो आप नहीं संभाल सकते हैं, चाहे वो किसी की मदद करना ही क्यों ना हो। ये व्यक्तिगत सीमा बनाने के बारे में है।
  • ये जानना महत्वपूर्ण है कि हर परिस्थिति में मुझे एक ही चीज़ नहीं चाहिए होगी। कभी हो सकता है मैं दोस्तों के साथ बाहर जाना पसंद करूं और कभी हो सकता है मैं अकेले रहना और कुछ ना करना पसंद करूं। हाँ, कुछ भी नहीं जो उपयोगी हो, और मैं जानती हूँ कि ये ठीक है। मुझे हर वक़्त आदर्श या उत्पादक होने की आवश्यकता नहीं है।
  • नकारात्मक लोगों को अपने जीवन से उखाड़ फेकना। हाँ, ये बहुत ज़रूरी है। हमें उन लोगों या फिर दोस्तों के साथ बना कर रखने की कोई ज़रुरत नहीं है जो सकारात्मक होने से ज़्यादा नकारात्मक हैं। उन्हें अपने जीवन से उखाड़ फेकने से डरें नहीं। मुझ पर विश्वास करें, मैंने ये किया है और मैं बहुत खुश हूँ।
  • कमज़ोर होने और गलती करने के अपने अधिकार को पहचानना। मुझे अपने जीवन में गलती करने का और कमज़ोर होने का पूरा अधिकार है। मैं जब चाहूं तब रो सकती हूँ और मुझे किसी व्यक्ति की ज़रुरत नहीं है जो मुझे हिम्मती रहने को कहे।

मानसिक स्वास्थ्य का हमारी यौनिक इच्छाओं से करीब से जुड़ाव होता है। क्विअर पहचान से जुड़े कलंक के कारण क्विअर लोगों को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े अनेकों मसलों से गुज़ारना पड़ सकता है। इस बात पर लम्बी चर्चा करने की ज़रुरत है और मुझे विश्वास है लोगों ने इस विषय पर बात की होगी। तो, यहाँ मैं व्यक्ति की यौनिकता पर मानसिक स्वास्थ्य के असर के बारे में बात करूंगी और इसमें यौनिक पहचान शामिल नहीं है।

सबसे पहले, मानसिक स्वास्थ्य के मसलों से जूझ रही महिलाओं को यौनिक रूप से ठीक और इच्छा-करने-योग्य नहीं माना जाता। मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों में महिलाओं को यौनिक प्राणी ना मानते हुए कैदी की तरह रखा जाता है, उनके बाल काट दिए जाते हैं, उन्हें आकार रहित कपड़े पहनने को दिए जाते हैं, और उनसे इच्छा के बारे में बात करने का तो सवाल ही नहीं उठता। आत्मीयता यौनिकता का महत्वपूर्ण अंग है। कभी-कभी एक स्पर्श ही आपकी त्वचा की भूख को तृप्त कर सकता है। एक आलिंगन दर्द को दूर कर सकता है। पर जब मानसिक स्वास्थ्य की बात आती है तो आत्मीयता को कितना महत्त्व दिया जाता है?

जब मेरे मानसिक रोग के बारे में पता चला, तब मेरे यौनिक-रोमांटिक साथी मेरे हर व्यवहार को बारीकी से देखने लगे और उन व्यवहारों को असामान्य, चरम या ऐसे व्यवहारों की तरह पहचान करने लगे जिनकी ओर ध्यान देने की आवश्यकता थी। ज़्यादातर, दवाइयां मेरे शरीर और दिमाग को सुन्न कर देती थी। मैं मुश्किल से ही शायद कभी यौनिक रूप से उत्तेजित हो पाती थी। मुझे शारीरिक रूप से उत्तेजित होने और अपने साथी के साथ सेक्स के लिए तैयार होने में समय लगता था। मुझे याद है, कुछ समय तो अपने साथी को आनंद प्रदान करने के लिए मुझे अधिक प्रयत्न करना पड़ता था। और किसी-किसी समय मैं अचानक सेक्स करने के लिए उतावली हो जाती थी। यह उनके लिए एक झटके की तरह होता था कि वही महिला जो सेक्स में कोई रूचि नहीं दिखा रही थी, अब अचानक सेक्स करना चाहती थी! जब मैंने अपने मनोचिकित्सक से इस बारे में बात की तो उन्होंने इसे महत्वपूर्ण विषय ना मानते हुए इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। और जब मेरा मासिक कई महीनो के लिए बंद हो गया तो हॉर्मोन के उतार चढ़ाव के कारण मुझे दर्द और हॉट फ्लशेस (अचानक गरम महसूस करना) होने लगे। ये भी उनके लिए कोई महत्वपूर्ण विषय नहीं था। सच कहूं तो, दवाइयों/ रसायनों का जो मिश्रण रोज़ आप लेते हैं, उसके कारण आप अपने शरीर और दिमाग पर से सारा नियंत्रण खो देते हैं।

उन महिलाओं के जिनके बच्चे हैं और विकलांगता के साथ रह रहे लोगों के लिए, नारीवादी आन्दोलन काम से जुड़ी के स्थिति के अनुरूप ढलने वाले और समर्थक होने की मांग कर रहा है। मुझे लगता है एक और क्षेत्र जहाँ हमें प्रावधान बनाने की ज़रुरत है, वो है मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मसलों के साथ रह रहे लोगों के लिए समर्थन। समय आ गया है कि हम मानसिक स्वास्थ्य और स्वयं की देखभाल पर चर्चा को नारीवादी विषय के रूप में करें। यह निश्चय ही पित्रसत्ता के खिलाफ़ एक विद्रोह है जो महिलाओं को उनके खुद के बारे में सोचने की इजाज़त नहीं देता है। उन्हें हमशा दूसरों के लिए उपस्थित होना होता है। शायद ये वो समय है जब हमें अपने मन पर भी उसी प्रकार नियंत्रण वापस लेना होगा जैसे हमें अपने शरीर पर लिया है।

TARSHI की दीपिका श्रीवास्तव द्वारा अनुवादित

To read this article in English, please follow this link: http://www.tarshi.net/inplainspeak/its-time-to-take-back-our-minds/ 

Illustration by Warwick Goble

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Article written by:

Rituparna Borah is co-founder of Nazariya – A Queer Feminist Resource Group. She is a queer feminist activist with over 10 years of experience in working on issues of gender and sexuality. With Nirantar, an organisation that works on issues of gender and education, she was extensively involved in planning and conducting trainings on sexuality with organisations, collectives, rural communities, gender trainers, lawyers, students, and government officials. She had also been involved in building a Muslim girls’ leadership programme through ICT in Lucknow, India. Rituparna has contributed towards Adolescence Education Programme training material published by the National Council on Education, Research and Training (NCERT). She is actively involved with collectives such as the Delhi Queer Pride Committee, CCSA (Citizen’s Collective Against Sexual Assault), Qashti LBT, and Voices Against 377.

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